अमृतसर आ गया कहानी(amrtasar aa gaya kahani)

      💐अमृतसर आ गया है कहानी💐
              【भीष्म साहनी】

◆ प्रकाशन :-.1971ई.

◆ प्रमुख पात्र :-
● कथानायक
● दुबला बाबू
● सरदार जी
● बुढ़िया
● तीन पठान व्यापारी
● लटकती मूँछों वाला आदमी

◆ भीष्म.साहनी ने कहानी में व्यक्ति के मनोविज्ञान को बहुत ही सुक्ष्मता से रेखांकित किया है।

◆  विभाजन कालीन परिस्थितियों ने व्यक्ति को क्रूर बना दिया था, मानवता मर चुकी थी, इन्हीं क्रूर मानसिकताओं का चित्रण भीष्म साहनी ने अपनी कहानी ‘अमृतसर आ गया में बखूबी किया है। प्रतिहिंसा का यथार्थपरक चित्रण इस कहानी में देखने को मिलता है।

◆ ‘अमृतसर आ गया’ परिस्थतिवश उत्पन्न हुई क्रूर मानसिकता की कहानी है।

◆  विभाजन के पूर्व जो लोग परस्पर सौहार्द के साथ रहते थे, विभाजन की खबर सुनते ही उनके वार्तालाप तथा क्रिया कलाप में अविश्वसनीय परिवर्तन आ जाता है, साम्प्रदायिकता हावी हो जाती है, व्यक्ति,
व्यक्ति न रहकर सम्प्रदाय का प्रतिनिधित्व करने लगता है।

◆ पठान द्वारा दुबले बाबू का मजाक उड़ाया जाना बाबू के मन में ग्रन्थि पैदा कर देता है, तथा पठान द्वारा हिन्दू औरत को लात मारना बाबू के मन में उत्पन्न बदले की भावना को और भी प्रबल कर देता है। सारी बातें एक साथ मिलकर विस्फोटक स्थिति उत्पन्न कर देती है।

◆ भीष्म साहनी ने अपनी कहानियों को यथार्थ के विभिन्न स्तरों पर प्रस्तुत किया है, कुंठा, घुटन, संत्रास तथा रिश्तों मे उत्पन्न बिखराव इनकी कहानियों के मुख्य स्वर हैं।

◆  मेरे सामनेवाली सीट पर बैठे सरदार जी देर से मुझे लाम के किस्से सुनाते रहे थे।

◆  सरदार जी लाम के दिनों में बर्मा की लड़ाई में भाग ले चुके थे।

◆ सरदार जी गोरे फौजियों की खिल्ली उड़ाते रहे थे।

◆ डिब्बे में तीन पठान व्यापारी भी थे:-
● एक हरे रंग की पोशाक पहने ऊपरवाली
पठान व्यापारी बर्थ पर लेटा हुआ था।
● पोशाक पहने ऊपरवाली आदमी बड़ा हँसमुख था और बड़ी देर से मेरे साथवाली सीट पर बैठे दुबला बाबू (पेशावर का रहने वाला)के साथ  मजाक कर रहा था।

◆ मेरे सामने दाई ओर कोने में, एक बुढ़िया मुँह- सिर ढाँपे बैठा थी और देर से माला जप रही थी।

◆ मैं बड़ा खुश था क्योंकि मैं दिल्ली में होनेवाला स्वतंत्रता दिवस समारोह देखने जा रहा था।

◆ उन दिनों के बारे में सोचता हूँ, तो लगता है, हम किसी झुटपुटे में जी रहे हैं। शायद समय बीत जाने पर अतीत का सारा व्यापार ही झुटपुटे में बीता जान पड़ता है। ज्यों-ज्यों भविष्य के पट खुलते जाते हैं, यह झुटपुटा और भी गहराता चला जाता है।

◆ उन्हीं दिनों पाकिस्तान के बनाए जाने का ऐलान किया गया था।

◆ मेरे सामने बैठे सरदार जी बार-बार मुझसे पूछ रहे थे कि पाकिस्तान बन जाने पर जिन्ना साहिब बंबई में ही रहेंगे या पाकिस्तान में जा कर बस जाएँगे।

◆  एक ओर पाकिस्तान बन जाने का जोश था तो दूसरी ओर हिंदुस्तान के आजाद हो जाने का जोश।

◆ योम-ए-आजादी की तैयारियाँ भी चल रही थीं।

◆ जेहलम का स्टेशन पीछे छूट चुका था जब ऊपर वाली बर्थ पर बैठे पठान ने एक पोटली खोल ली और उसमें से उबला हुआ मांस और नान-रोटी के टुकड़े निकाल कर अपने साथियों को देने लगा। 

◆ वजीराबाद स्टेशन पर गाड़ी रुकी थी और नए मुसाफिरों का रेला अंदर आ गया था।

◆ वजीराबाद स्टेशन पर  गाड़ी  छूटने से पहले एक छोटी-सी घटना घटी। एक आदमी साथ वाले डिब्बे में से पानी लेने उतरा और नल पर जा कर पानी लोटे में भर रहा था तभी वह भाग कर अपने डिब्बे की ओर लौट आया। छलछलाते लोटे में से पानी गिर रहा था। लेकिन जिस ढंग से वह भागा था, उसी ने बहुत कुछ बता दिया था।

◆ जितनी देर कोई मुसाफिर डिब्बे के बाहर खड़ा अंदर आने की चेष्टा करता रहे, अंदर बैठे मुसाफिर उसका विरोध करते रहते हैं। पर एक बार जैसे-तैसे वह अंदर जा जाए तो विरोध खत्म हो जाता है और.वह मुसाफिर जल्दी ही डिब्बे की दुनिया का निवासी बन जाता है, और अगले स्टेशन पर वही सबसे पहले बाहर खड़े मुसाफिरों पर चिल्लाने लगता है – नहीं है जगह, अगले डिब्बे में जाओ… घुसे आते हैं….

◆ तभी मैले-कुचैले कपड़ों और लटकती मूँछों वाला एक आदमी दरवाजे में से अंदर घुसता दिखाई दिया। चीकट, मैले कपड़े, जरूर कहीं हलवाई की दुकान करता होगा।

◆  वह लोगों की शिकायतों- आवाजों की ओर ध्यान दिए बिना दरवाजे की ओर घूम कर बड़ा-सा काले रंग का संदूक अंदर की ओर घसीटने लगा।

◆ “बंद करो जी दरवाजा, बिना पूछे चढ़े आते हैं, अपने बाप का घर समझ रखा है। मत घुसने दो जी, क्या करते हो, धकेल दो पीछे… और लोग भी चिल्ला रहे थे।

◆ लटकती मूँछों वाला आदमी अपना सामान अंदर घसीटे जा रहा था और उसकी पत्नी और बेटी संडास के दरवाजे के साथ लग कर खड़े थे।

◆ लटकती मूँछों वाले आदमी ने कहां:-
‘टिकट है जी मेरे पास, मैं बेटिकट नहीं हूँ।’

◆  बर्थ पर बैठा पठान बोला- ‘निकल जाओ इदर से, देखता नई ए. इदर जगा नई ए।’

◆ पठान ने आव देखा न ताव, लटकती मूँछों वाले मुसाफिर के लात जमा दी,पर लात उसको लगने के बजाए उसकी पत्नी के कलेजे में लगी और वहीं ‘हाय हाय’ करती बैठ गई।

◆ लटकती मूँछों वाले की पत्नी के चोट लगने पर कुछ मुसाफिर चुप हो गए थे। केवल कोने में बैठो बुढ़िया कर लाए जा रही थी – ए तो बैठने दो। आजा बेटी, तू मेरे पास आ जा। जैसे-तैसे सफर काट लेंगे। छोड़ो बे जालिमो, बैठने दो ।’

◆ बहुत बुरा किया है तुम लोगों ने, बहुत बुरा किया है।’ बुढ़िया ऊँचा- ऊँचा बोल रही थी – तुम्हारे दिल में दर्द मर गया है। छोटी-सी बच्ची उसके साथ थी। बेरहमो, तुमने बहुत बुरा किया है, धक्के दे कर उतार दिया है।'( लटकती मूँछों वाले आदमी की पत्नी और बेटी के लिए बोल रही थी समान छुट जाने की वजह से फिर से उतर गये)

◆ तभी मेरी बगल में बैठे दुबले बाबू ने मेरे बाजू पर हाथ रख कर कहा – ‘आग है, देखो आग लगी है।’

◆  जब गाड़ी शहर छोड़ कर आगे बढ़ गई तो डिब्बे में सन्नाटा छा गया। मैंने घूम कर डिब्बे के अंदर देखा, दुबले बाबू का चेहरा पीला पड़ गया था और माथे पर पसीने की परत किसी मुर्दे के माथे की तरह चमक रही थी।

◆  सरदार जी उठ कर मेरी सीट पर आ बैठे।

◆ नीचे वाली सीट पर बैठा पठान उठा और अपने दो साथी पठानों के साथ ऊपर वाली बर्थ पर चढ़ गया।

◆ पठानों के मन का तनाव फौरन ढीला पड़ गया। जबकि हिंदू-सिक्ख मुसाफिरों की चुप्पी और ज्यादा गहरी हो गई।

◆ एक पठान ने अपनी वास्कट की जेब में से नसवार की डिबिया निकाली और नाक में नसवार चढ़ाने लगा। अन्य पठान भी अपनी-अपनी डिबिया निकाल कर नसवार चढ़ाने लगे।(नसवार का अर्थ :- सूँघनी)

◆  बुढ़िया बराबर माला जपे जा रही थी। किसी-किसी वक्त उसके बुदबुदाते होंठ नजर आते, लगता, उनमें से कोई खोखली-सी आवाज निकल रही है।

◆ “बहुत मार-काट हुई है, बहुत लोग मरे हैं। लगता था, वह इस मार-काट में अकेला पुण्य कमाने चला आया है।” (वह :-मुसाफिरों को पानी पिलाने वाला)

◆ किसी अज्ञात आशंकावश दुबला बाबू मेरे पासवाली सीट पर से उठा और दो सीटों के बीच फर्श पर लेट गया। उसका चेहरा अभी भी मुर्दे जैसा पीला हो रहा था।

◆ बर्थ पर बैठा पठान उसकी ठिठोली करने लगा – ‘ओ बेंगैरत, तुम मर्द ए कि औरत ए? सीट पर से उट कर नीचे लेटता ए। तुम मर्द के नाम को बदनाम करता ए।’

◆  रास्ते में ही रुक जाती तो डिब्बे के अंदर का सन्नाटा और भी गहरा हो उठता। केवल पठान निश्चित बैठे थे। हाँ, उन्होंने भी बतियाना छोड़ दिया था, क्योंकि उनकी बातचीत में कोई भी शामिल होने वाला नहीं था ।

◆ तसबीह  का अर्थ :- माला

◆ खिड़की के बाहर आकाश में चाँद निकल आया और चाँदनी में बाहर की दुनिया और भी अनिश्चित, और भी अधिक रहस्यमयी हो उठी।

◆ सहसा दुबला बाबू खिड़की में से बाहर देख कर ऊँची आवाज में बोला ‘हरबंसपुरा निकल गया है।’

◆  ‘ओ बाबू, चिल्लाता क्यों ए?”, तसबीह वाला पठान चौंक कर बोला- ‘इदर उतरेगा तुम? जंजीर खींचूँ?” और खी खी करके हँस दिया। जाहिर है वह हरबंसपुरा की स्थिति से अथवा उसके नाम से अनभिज्ञ था।

◆  दुबला बाबू फिर ऊँची आवाज में चिल्लाया- ‘अमृतसर आ गया है।’

◆ दुबला बाबू ने फिर से कहा और उछल कर खड़ा हो गया, और ऊपर वाली बर्थ पर लेटे पठान को संबोधित करके चिल्लाया- ‘ओ बे पठान के बच्चे ! नीचे उतर

◆ तेरी मैं लात न तोडूं तो कहना, गाड़ी तेरे बाप की है?’ दुबला बाबू ने चिल्लाया।

◆ दुबला बाबू चिल्लाए जा रहा था – ‘अपने घर में शेर बनता था। अब बोल, तेरी मैं उस पठान बनानेवाले की ।

◆ बुढ़िया ने कहा – ‘वे जीण जोगयो, अराम नाल बैठो। वे रब्ब दिए बंदयो, कुछ होश करो।’

◆  दुबला बाबू का चेहरा अभी भी बहुत पीला था और माथे पर बालों की लट झूल रही थी। नजदीक पहुँचा, तो मैंने देखा, उसने अपने दाएँ हाथ में लोहे की एक छड़ उठा रखी थी।

◆ डिब् में घुसते समय दुबला बाबू ने छड़ को अपनी पीठ के पीछे कर लिया और मेरे साथ वाली सीट पर बैठने से पहले उसने हौले से छड़ को सीट के नीचे सरका दिया।

◆  सीट पर बैठते ही उसकी आँखें पठान को देख पाने के लिए ऊपर को उठीं। पर डिब्बे में पठानों को न पा कर वह हड़बड़ा कर चारों ओर देखने लगा।

◆ डिब्बे में तरह-तरह की आड़ी-तिरछी मुद्राओं में मुसाफिर पड़े थे। उनकी बीभत्स मुद्राओं को देख कर लगता, डिब्बा लाशों से भरा है।

◆ डिब्बे के बाहर मुझे धीमे-से अस्फुट स्वर सुनाई दिए। दूर ही एक धूमिल सा काला पुंज नजर आया। नींद की खुमारी में मेरी आँखें कुछ देर तक उस पर लगी रहीं, फिर मैंने उसे समझ पाने का विचार छोड़ दिया। डिब्बे के अंदर अँधेरा था, बत्तियाँ बुझी हुई थीं, लेकिन बाहर लगता था, पौ फटने वाली है।

◆ सचमुच एक आदमी डिब्बे की दो सीढ़ियाँ चढ़ आया था। उसके कंधे पर एक गठरी झूल रही थी, और हाथ में लाठी थी और उसने बदरंग से कपड़े पहन रखे थे और उसके दाढ़ी भी थी।

◆ फिर मेरी नजर बाहर नीचे की ओर आ गई। गाड़ी के साथ-साथ एक औरत भागती चली आ रही थी, नंगे पाँव, और उसने दो गठरियाँ उठा रखी थीं। बोझ के कारण उससे दौड़ा नहीं जा रहा था। डिब्बे के पायदान पर खड़ा आदमी बार-बार उसकी ओर मुड़ कर देख रहा था और हाँफता हुआ कहे जा रहा था – ‘आ जा, आ जा, तू भी चढ़ आ, आ जा!’

◆ वह आदमी हाँफ रहा था – ‘ख़ुदा के लिए दरवाजा खोलो। मेरे साथ में औरतजात है। गाड़ी निकल जाएगी…!

◆  सहसा डंडहरे से उस आदमी के दोनों हाथ छूट गए और वह कटे पेड़ की भाँति नीचे जा गिरा। और उसके गिरते ही औरत ने भागना बंद कर दिया, मानो दोनों का सफर एक साथ ही खत्म हो गया हो।

◆ मानो जानना चाहता हो कि उसके हाथों से खून की बू तो नहीं आ रही है। फिर वह दबे पाँव चलता हुआ आया और मेरी बगलवाली सीट पर बैठ गया।

◆ किसी ने जंजीर खींच कर गाड़ी को खड़ा नहीं किया था, छड़ खा कर गिरी उसकी देह मीलों पीछे छूट चुकी थी। सामने गेहूँ के खेतों में फिर से हल्की-हल्की लहरियाँ उठने लगी थीं।

◆ अपने सामने बैठा देख कर सरदार दुबला बाबू के साथ बतियाने लगा – ‘बड़े जीवट वाले हो बाबू, दुबले-पतले हो, पर बड़े गुर्दे वाले हो । बड़ी हिम्मत दिखाई है। तुमसे डर कर ही वे पठान डिब्बे में से निकल गए। यहाँ बने रहते तो एक-न- एक की खोपड़ी तुम जरूर दुरुस्त कर देते…’ और सरदार जी हँसने लगे।

◆ दुबला बाबू जवाब में मुसकराया – एक वीभत्स – सी मुस्कान, और देर तक सरदार जी के चेहरे की ओर देखता रहा।

◆ अमृतसर स्टेशन आते ही उस दुबले-पतले सहमे हुए बाबू के प्रतिक्रियाओं में अन्तर आ गया।

◆ बाबू के हौसले बुलन्द हो गये और वह चिल्ला-चिल्ला कर पठान को गालियां देने लगा।

◆ उस हिन्दू औरत को पठान द्वारा लात मारे जाने का बदला लेने का बाबू को यह उचित अवसर जान पड़ा, वह अब अपने क्षेत्र में था जहाँ वह बहुसंख्यक है, समय की नज़ाकत को समझते हुए पठान वहीं उतर जाते हैं।

◆  बाबू के सिर में जुनून सवार हो गया था, मुस्लिम वृद्ध यात्री द्वारा गाड़ी में चढ़ने की चेष्टा करते समय बाबू उसके सिर पर लोहे की छड़ से वार कर देता है।

◆ सरदार ने कहा उसके डर से ही पठान इस डिब्बे से भाग गये और जवाब में बाबू के चेहरे पर एक वीभत्स मुस्कान फैल गयी।

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