उठ जाग मुसाफिर निबंध(uth jaag musaaphir nibandh)

💐 उठ जाग मुसाफिर निबंध (विवेकीराय)💐

◆ प्रकाशन :- 2012 ई. उठ जाग मुसाफिर निबंध संग्रह से।

◆  पिछली बार गया तो एक सवाल खड़ा मिला, ‘आपने इतना बड़ा पुस्तकालय गाँव में खड़ा तो कर दिया पर कोई पुस्तक पढ़नेवाला नहीं रहा तो उसका क्या होगा ?’

◆ प्रश्न सुनकर मास्टर साहब अर्थात् जगदीश बाबू का चिरपरिचित मुक्तहास बिखर गया और आधा उत्तर तो प्रश्नकर्ताओं को जैसे इसी में मिल गया कि यह भी कोई प्रश्न है ?

◆  शेष आधे उत्तर के रूप में पूरे आत्मविश्वास के साथ एक प्रश्न ही उन्होंने उछाल दिया, ‘अरे भाई, रात होती है, अँधेरा होता है तो तुम चाहो या ना चाहो, प्रभात का प्रकाश स्वयमेव उतर आता है कि नहीं ?’

◆   ऐसा लगा था जैसे दिनकर की कविता- पंक्तियाँ आकर खड़ी हो मास्टर साहब के पक्ष में गवाही दे रही हैं, ‘
जवानी की आँखों में ज्वाला होती है,
बुढ़ापे की आँखों में प्रकाश होता है!’ और यही कारण है कि-
जवानी संचय होती है बुढ़ापा दान होता है
जवानी  सुंदर होती है बुढ़ापा महान् होता है।

◆  गाँववालों, बहुत लगन के साथ जवानी में संचित किया यह विशाल पुस्तकालय आयु के पंचानबे (95)पड़ाव पर तुम्हें सौंप रहा हूँ ।

◆ महानता की कल्पना को तब गहरा धक्का लगा जब उन्हें बेहाल हीन स्थिति में देखा ‘जरा तुषारभिहंता शरीर सरोजिनी ?”

◆ चौकी पर बिस्तर नहीं। अधोवस्त्र के रूप में मात्र खादी का अंडर विअर है और खादी का ही एक पुराना गमछा ओढ़े जैसे हैं। वस्त्र दोनों साफ-सुथरे नहीं। फिर एक धक्का लगा। खादी के चमाचम धवल धुले वस्त्रों के लिए वे एक प्रतिमान समझे जाते हैं।

◆ उत्तराभिमुख बैठकखाने के आगे लता – पत्रादि से घिरे पूरे प्रांगण को घेरकर जो एक अरगनी है वह बराबर आँखों पर चढ़ने वाले कपड़ों, धुलने के बाद सूखने के लिए डाले गए वस्त्रों, धोती, कुरता, बंडी, चादर और गमछा आदि से सज्जित मिलती।

◆  कोई व्यक्ति पास नहीं हैं तो क्या मान लें कि- ‘बूढ़ों के साथ लोग कहाँ तक वफा करें ?
लेकिन न आती मौत तो बूढ़े भी क्या करें ?’
लेकिन स्थिति ऐसी नहीं थी। वहाँ न तो सेवा करनेवालों का अभाव था और न ही मौत का इंतजार था। मात्र वे बीमार थे। कभी बीमार न पड़नेवाला आदमी बीमार था। यही कारण था कि ‘आश्रम एक सुहावन पावन’ जैसा वह आवास उदास था। उधर मैं अपने सोच में डूबा था, उधर कई लोग वहाँ पहुँचकर उन्हें जगाने लगे थे, “बाबा, बाबा, यह देखिए, आप से मिलने कौन आए हैं ?”

◆ आँखें खोलकर मेरी ओर देखते उन्होंने कहा, ‘शरदचंद्रजी बैठ जाइए।’ अर्थात् वे मुझे पहचान न सके।

◆ शरदचंद्र उनके विद्यालय के प्राचार्य का नाम था।

◆ बहुत कड़वा सत्य था। भीतर बेचैनी होने लगी। सामने वे ही तो हैं पर यह कौन बोल रहा है?

◆  कितना क्रूर, कठोर और दुर्दम है समय के हाथों इस प्रकार झटक दिया जाना! उनके एक स्वजन ने कान के पास मुँह कर जोर से जब मेरा नाम बताया तो जैसे तरंगित हो गए, सोए-सोए सुपरिचित खुले हुए ऊँचे स्वर में बोले, क्षमा, बारंबार, क्षमा हजार बार, क्षमा बैठिए बैठिए शरीर है न ठीक हो जाता है तो पिछली बार की तरह बनारस चला जाएगा।

◆  आप कहेंगे तो आगे इलाहाबाद या फिर दिल्ली तक चले चलेंगे। अरे, आपको चाय पिलाओ, भाई भोजन का भी वक्त है फिर न हो तो आज पुस्तकालय के लिए एक बैठक भी कर लेंगे।’

◆  बोलते बोलते एकदम चुप हो गए। लगा कि बोलने में कठिनाई हो रही है खुले हुए ऊँचे नीरोग जैसे स्वर की उनके तो वही थी पर उसका आत्मविश्वास से पूर्ण पहले जैसा स्वाभाविक ताप नहीं था और ठंडापन छिप नहीं रहा था।

◆  सामनेवाला चकितकारी सत्य बहुत आहत कर रहा था। एक साल के भीतर ही यह क्या हुआ ? क्या सचमुच बुढ़ापा अचानक धमककर चकित कर देता है कि अरे, यह क्या हुआ ?

◆  राष्ट्रीय स्तर के एक विद्यामंदिर के इस तेजस्वी शिक्षक, गांधीवादी चिंतन और जीवन शैली में आजीवन रसे बसे सदाबहार, स्वास्थ्य के लिए प्रसिद्ध ग्राम मनीषी तथा सुरुचिपूर्ण सुवेश में सदा सहास मिलनेवाले इस समाजसेवी को ऐसे बेहाल कैसे देख रहा हूँ ?

◆ “लेकिन बेहाल कैसे ? संभवतः यह नियति और जिजीविषा का संघर्ष है। अभी यात्राएँ करनी हैं। पुस्तकालय के भविष्य को सँवारना है।

◆ मकान जर्जर होने से क्या ? मकान मालिक जवान है। वह इस सुंदर संसार को और सुंदर बनाने के लिए जिएगा। यहाँ खड़े होकर बंशी बजाएगा।

◆ हाय रोग, हाय दया करे उसकी बलाय नहीं, वह रोएगा धोएगा नहीं पड़ा रहेगा शांत, मौन कोई शिकवा – शिकायत नहीं।

◆ अपने प्रिय कवि कबीर साहब की तरह ‘बेहद के मैदान में सोया है। कुछ ‘निरंतर’ हो रहा है। क्या हो रहा है? शायद सुमिरन भजन ? आश्चर्य ?

◆ इधर मैं उनके एक स्वजन से उनकी अप्रत्याशित अवस्था के विषय में जानकारी ले रहा था और उधर अपनी मौज में जैसे मुझे सुना रहे हैं, उसी अमंद स्वर में, अर्धमुँदी आँखों में बोलते जा रहे हैं, ‘
रामनाम लड्डू गोपाल नाम घीव हरि का नाम मिश्री और घोर घोर पीव’ ‘
झूठे सुख को सुख कहत मानत हैं मन मोद, जगत चबेना काल को चहककर ‘
अंतकाल तुम सुमिरन गति और फिर चहककर कुछ मौज में-
‘माता बिन आदर कौन करे ?
बरखा बिन सागर कौन भरे ?
राम बिना दुःख कौन हरे ?”

◆ अगली बार जल्दी आइए तो अपने साहित्यिक
पुस्तकालय पर चौबीस घंटे का हरिकीर्तन कराया जाए।’

◆ वही मुद्रा, वही अधमुँदी आँखें, वही निर्भाव भाव में चौकी पर लेटे-लेटे बोलना, जैसे किसी और से नहीं, स्वयं से बोल रहे हैं, आत्मलीन, आत्म संबोधन !

◆ अब मैं बहुत हैरान हूँ इस ‘रामनाम लड्डू’, सुमिरन भजन, हरिकीर्तन और ‘राम बिना दुःख कौन हरे’ वाली धार्मिक लाइन पर कभी उन्हें इस प्रार्थी भाव में देखा नहीं। फिर दुःख हरने में माता की सनातन भूमिका का स्मरण ?

◆ उनके जीवन और चिंतन शैली को देखते, ये बातें बेमेल पड़ गले से उत्तर नहीं रही हैं। तो क्या मान लें कि यह ‘हारे को हरि नाम वाली स्थिति हैं ?

◆  मगर हारे कहाँ हैं? अभी तो मन जवान है, लड़ रहा है, पुस्तकालय की मीटिंग कर रहा है। यात्राएँ कर रहा है! मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। तो, यहाँ तो जीत ही जीत है, अंत भला तो सब भला यात्रा के इस पड़ाव की यह श्रेष्ठतम स्थिति है कि आधि-व्याधि सहित मौत को पछाड़कर आदमी अपनी मौज में दहाड़ता रहे।

◆  नहीं, यहाँ पराजय का अस्तित्व नहीं है। कहाँ किसी अपनी बीमारी या किसी डॉक्टर या स्वजन की चर्चा हो रही है ?

◆ चर्चा है ‘गोपाल नाम घीव’ की अर्थात् अगले पड़ाव पर चलते-चलते में घी खाकर तगड़े बन जाएँ। यही आदर्श वीरता है।

◆ यह एक ‘निराला’ संदर्भ है। सत्य है कि ‘रेत सा तन ढह गया है। मगर किसका ? वह जो एक कल्पित नाम रूप है, क्या उसका, जिसके लिए वह ‘मैं’ का प्रयोग करता है? नहीं, ‘मैं अलक्षित हूँ यही कवि कह गया है।’

◆ वह अलक्षित है। यह जो दिखाई पड़ रहा है, जो अगणित बंधनों में जकड़ा है वह नहीं है। गुण और संस्कार ही नहीं, अपना यह ओढ़ा हुआ व्यक्तित्व, कल्पित संबंध और अर्जित ज्ञान भी महामारक बंधन ! तो अब यह परम पुरुषार्थ देखो, यह निर्बंध असंग पुरुष इस बँधे हुए पुल से गुजर जाने के लिए उद्यत है। यही कारण है कि जीवन भर गांधी अरविंद, राधाकृष्णन और कबीर आदि से लेकर दिनकर, पंत, प्रसाद, प्रेमचंद और हजारी प्रसाद आदि को पढ़नेवाला अब स्वयं को पढ़ रहा है-
‘अपना दीप अपने आप अपना जिआ अपना वेद अपने अनुभवों की राशि विपुल पुराण’

◆  क्या ‘माता बिन आदर कौन करे ?’ उसी का एक महत्त्वपूर्ण पाठ है ?  जीवन-यात्रा से थका प्रत्येक यात्री विश्राम चाहता है। उसे माता की परम पावन गोद का आश्रय चाहिए।उसके आदर में निर्द्वद्व विश्राम है और वह निर्विघ्न आश्रय है। उसके आदर में ही विश्राम की और आश्रय की स्थिति है। इसीलिए जीवन की बीहड़ बेला में उसे स्मरण करते हैं।

◆ क्रूर कठिन संसार द्वारा झटक दिए जाने पर जब धुंधलके – धुंध में किसी अवांछित हाशिए पर पहुँच गए तो और किसे याद करें ? उस आदर का स्मरण मात्र एक दुःखहर सहलाव है, सांत्वना का बल है, एक रोमांच है, अहोभाव है और हर्षित विराम है। किसी कवि की पंक्तियाँ उमड़ रही हैं-
“माँ चंदन की गंध है, माँ रेशम का तार,
बँधा हुआ जिस तार में, सारा ही घर द्वार ।
यहाँ वहाँ सारा जहाँ नापें अपने पाँव,
माँ के आँचल सी नहीं, और कहीं भी छाँव थके, यात्री को अब ठहराव चाहिए, विश्राम चाहिए,
माँ के आँचल की छाँव चाहिए। माता बिन आदर कौन करे ?

◆ कुल मिलाकर यह निज घर वापस लौटने की लालसा है। पर घर की आपाधापी से, श्रम से छुट्टी मिले। दासत्व से छुट्टी मिले। ‘सर्वोहि आत्मगृहे राजा।’ स्वस्थ रहें तो सानंद रहें।

◆  कुल मिलाकर जो जिया वह सब ‘मोह मूल परमारथ नाहीं।’ और ‘मोह सकल व्याधिन कर मूला।’ इन्हीं सारी सारी व्याधियों से ग्रस्त ‘दुखिया सब संसार है।’

◆ जो स्वस्थ होगा वही शांत होगा, ‘निर्मान मोहा’ होगा, निर्द्वद्व- निश्चेष्ट होगा, बेपहचान होगा और वही बोल सकेगा, ‘माता बिन आदर कौन करे ?’,

◆भवरोग रोगी माता का नहीं, रोग का, दवा का, डॉक्टर का, अस्पताल का राग अलापता विक्षिप्त रहेगा।

◆ कहाँ ऐसी मौज नसीब होगी कि रामनाम लड्डू बाँटे तो, मास्टर साहब स्व में स्थित हैं। बाँट रहे हैं, लो दुनिया के लोगों, लड्डू लो, घी-मिश्री लो और फिर परमलाभ के लिए राम का नाम लो । राम बिना दुःख कौन हरे ? और मेरे लिए माता का प्यार अलम है।

◆ जीवन भर कबीर को पढ़नेवाला अब कबीर को जीएगा। जीवन की यही वरेण्य स्थिति है। जब चाहे चली गई तो फिर चिंता कहाँ टिकेगी और फिर तो ‘मनुआ बेपरवाह !’ क्या मस्ती है

◆ यह जो है सब नई यात्रा की प्रस्थान प्रक्रिया है। यह ‘वासांसि जीर्णानि को त्यागने और ‘नवानि गृह्णाति’ के मध्य का सचल परिदृश्य है। परम पावन है। ‘मृत्यु रे, तुहु मम श्याम समान!’

●  रवि बाबू का श्याम ही मास्टर साहब की माता है।

◆ तुम्हीं हो माता तुम्हीं पिता हो, अब तुम्हारा प्यार ही वांछित है। संसार पीछे छूट गया। अब कैसा बंधन ?

◆ स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में लोग एक गीत गाया करते थे-
‘हम दीवानों की क्या हस्ती हैं आज यहाँ कल वहाँ रहे मस्ती का आलम साथ चला, हम धूल उड़ाते जहाँ चले।’

◆  माता का प्यार पाने के लिए उनकी गोद में ? मगर वह तो बहुत-बहुत पीछे छूट गई। जन्मदात्री माँ की गोद अब असंभव । संभव है उनकी भारतमाता की गोद प्रकृति माता की गोद।

◆  हम भारतवासी कितने सौभाग्यशाली हैं और हमारी संस्कृति कितनी समृद्ध है कि आदर, प्यार और दुलार सहित जीवनदात्री हमारी माताओं की विस्तृत सूची है गंगा, गीता, गायत्री और धरती सहित अनेक देवी- देवताओं की अधिक पवित्र संज्ञाएँ ‘माता’ शब्द से जुड़ती हैं।

◆ जन्मदात्री भौतिक माता से कुछ अधिक ही भावात्मक संबंधोंवाली माताओं के स्मरण में रोमांच देखते हैं।

◆  भौतिक जीवन की माताएँ कुमाता भी हो जाती हैं। (इस बीसवीं इक्कीसवीं शताब्दी का आधुनिक दौर इस संदर्भ में बहुत कुख्यात हुआ)

◆ भावात्मक संबंधवाली माताओं का स्नेह- कोष सुपुत्रों के लिए कभी रिक्त नहीं होता। उनका आदर, अवदान और आशीर्वाद बहुत ही शक्तिशाली होता है, साथ ही अकृत्रिम, सहज और निःस्वार्थ !

◆  भारतमाता के प्रति भक्ति, समर्पण और सेवा-भाव की तरंगों ने एक तिरंगा इतिहास रच दिया, लिखा, सुना नहीं, वह सब आँखों देखा सच है।

◆  मास्टर साहब के जीवन का प्रभात और पूर्वाह्न का जीवन ‘विजयी विश्व तिरंगा’ और ‘भारतमाता जननि हमारी, उसको शीश झुकाएँगे’ जैसे गीतों की गुंजार में रमा था।

◆ लेखक सबसे पहले मास्टर साहब को एक प्रभातफेरी में देखा था। उनके गाँव पर एक बारात में गया था। गरमी का दिन था। वह सारा गाँव आजादी के दीवानों का गाँव है। सुबह लगभग चार बजे समवेत स्वरों की आकर्षक गीत गा रहे थे। आगे दो व्यक्ति हैं, कुछ बड़े-बड़े झंडे लिये एक युवा और एक प्रौढ़ व्यक्ति हैं उनको लोग संत जी कहते हैं और जो युवक है, कॉलेज में पढ़ता है, उसका नाम जगदीश है।
* एक युवा :- जगदीश
* एक प्रौढ़ व्यक्ति :- लोग संत जी कहते थे।(मास्टर साहब)

◆ प्रभातफेरी में लोग गा रहे थे
‘उठ जाग मुसाफिर भोर भई, अब रैन कहाँ जो सोवत है!’ 【मास्टर साहब का प्रिय गीत】

◆  उस सेनानी पीढ़ी की भारतमाता के प्रति, स्वाधीनता और नवजागरण के प्रति समर्पित तथा गहरी संशक्ति समय का एक ज्वलंत सत्य है।

◆ आत्म जागरण बनाम राष्ट्र जागरण गीत की प्रथम कड़ी का भाव प्रवाह दोनों ओर हैं-
उठ जाग मुसाफिर भोर भई, अब रैन कहाँ जो सोवत है।
जो सोवत है सो खोवत है, जो जागत है सो पावत है।

◆  भारतमाता वंदिनी है और अगली पंक्तियों में जगने, और कुछ करने का आह्वान हैं और अंत में कहा गया- ‘जब खेती चिड़िया चुग डारी एकजुट होने फिर पछताए क्या होवत है।’

◆ जागरूकता मंत्र ‘उठो जागो’ का राष्ट्र व्यापी मंत्र प्रभात बेला में स्पंदित है।

◆ कोई भारतमाता का ‘भगत’ भी है और ‘सिंह’ भी है तो वह क्या करता है ‘जवानों को जगाने के लिए कौंसिल में बम फेंका और फिर फाँसी पर चढ़ने जा रहा है तो भारतमाता से विदा माँगता है, बहुत लोकप्रिय गीत था, बिदा कर दो मुझे माता !

◆  एक निराला कवि है जो इस बात पर तड़प रहा है कि ‘सिंहों की माँद में आया है आज स्यार’, और फिर वही ‘जागो नगपति, जागो विशाल ।’

◆  कोई छायावादी कवि प्रसाद रूप में नवजागरण मंत्र फूँक रहा है, ‘बीती विभावरी जाग री।’

◆  शुरुआत भारतेंदु ने की ‘डूबत भारत नाथ बेगि अब जागो।’
◆  प्रभात फेरी की यह श्रृंखला, गीत-गुंजार से पहुँचती है, आत्म बलिदान की मंजिल तक, ‘वंदिनी माँ को न भूलो, राग में अब मत्त झूलो, हों जहाँ बलि शीश अगणित, एक सिर मेरा मिला लो।’

◆ वंदिनी भारतमाता स्वतंत्र हुई, परंतु उस त्यागी बलिदानी और आजादी की दीवानी पीढ़ी पुत्रों के सपने कहाँ पूर्ण हुए।

◆ अब तो भारतमाता का नाम लेना भी गुनाह जैसा ! उस नाम का सारा रोमांच वोट तंत्र के बुलडोजर में चैंपकर चूर-चूर हो गया।

◆ कुर्सी कमाई, पार्टी प्रोपर्टी और लोकतंत्र बनाम धनबल तंत्र बाहुबल तंत्र वाले अंधे युग के भ्रष्टाचार भक्त गा- बजाकर नाच रहे हैं
, ‘अब हाँ नाच्यौ बहुत गोपाल’ चोर मचाये शोर!

◆ तब मास्टर जैसा व्यक्ति अब क्या बोले ? किस सोए देश को जगाए ? अब मान ले, पुस्तकालय उसका भारत है। अँधेरी रात के बाद प्रकाश को आना ही है। तब ? वह घर लौटे, माता बाट देख रही है। माता बिन आदर कौन करे !

◆  ‘माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्या: ‘ एक शब्द जोड़कर उसे एक उच्चासन प्रदान करे, मातृभूमि ! जन्म दिया माता सा जिसने किया सदा लालन-पालन जिसकी मिट्टी जल से ही है, रचा गया हम सबका तन ।

◆ पं. मन्नन द्विवेदी गजपुरी की इस कविता में मातृभूमि के अवदानों को, लता – द्रुमादि सहित रक्षाकारी उपादानों की ओर संकेत के बाद कवि एक मार्मिक बात कहता है कि माता की गोद तो केवल बचपन में मिलती है, परंतु मातृभूमि तो मृत्युपर्यंत अपना स्नेह लुटाती है और मृत्यु के बाद अशरण-शरण बन अपने में मिला लेती है! अंत में कवि कहता है- “ऐसी मातृभूमि मेरी है, स्वर्ग से भी प्यारी। जिसके पद कमलों पर मेरा, तन, मन, धन सब बलिहारी ॥ “

◆ यह है माता, मातृभूमि, जन्मभूमि, स्वर्गलोक से भी प्यारी, ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी एक जगा हुआ व्यक्ति इसके लिए तड़प रहा है। इस तड़पन में गीता के ऊँचे ज्ञान की गूंज है।

◆  यह भूमि, (अष्टभेदी प्रकृति में प्रमुख ) ही माता है और पुरुष में परमात्मा पिता है।

◆ इसी माता, भूमि, मातृभूमि और सबका भाव जिसके सपनों में डूबा मुसाफिर पूरे देश को जगाता है।

◆ माता बिन आदर कौन करे :-
● एक धन्यता का भाव है
● एक भावभीनी जननी जन्म भूमि की प्रार्थना है, ● एक मंत्र है
●  सुमिरन भजन और कीर्तन है
●  जीवन साधना का सार है
●   संसार का आश्रय हार है और परमाश्रय जीवन की जीत है।

◆ अंतिम परीक्षा की घड़ी में वाल्मीकि की सीताजी ने भी पुकारा था- ‘माधवी देवी विवर दातुमर्हति।’ पृथ्वी माता मुझे अपनी गोद में स्थान दें। माता का आदर मिला। वे उत्तीर्ण हुईं।

◆ अंत में बता दूँ, उस दिन मास्टर साहब को एक विजेता की स्थिति में देखा। देह गेह अलीक माया की तरंगें नहीं थीं।

💐 उठ जाग मुसाफिर निबंध (विवेकीराय)💐

◆ प्रकाशन :- 2012 ई. उठ जाग मुसाफिर निबंध संग्रह से।

◆  पिछली बार गया तो एक सवाल खड़ा मिला, ‘आपने इतना बड़ा पुस्तकालय गाँव में खड़ा तो कर दिया पर कोई पुस्तक पढ़नेवाला नहीं रहा तो उसका क्या होगा ?’

◆ प्रश्न सुनकर मास्टर साहब अर्थात् जगदीश बाबू का चिरपरिचित मुक्तहास बिखर गया और आधा उत्तर तो प्रश्नकर्ताओं को जैसे इसी में मिल गया कि यह भी कोई प्रश्न है ?

◆  शेष आधे उत्तर के रूप में पूरे आत्मविश्वास के साथ एक प्रश्न ही उन्होंने उछाल दिया, ‘अरे भाई, रात होती है, अँधेरा होता है तो तुम चाहो या ना चाहो, प्रभात का प्रकाश स्वयमेव उतर आता है कि नहीं ?’

◆   ऐसा लगा था जैसे दिनकर की कविता- पंक्तियाँ आकर खड़ी हो मास्टर साहब के पक्ष में गवाही दे रही हैं, ‘
जवानी की आँखों में ज्वाला होती है,
बुढ़ापे की आँखों में प्रकाश होता है!’ और यही कारण है कि-
जवानी संचय होती है बुढ़ापा दान होता है
जवानी  सुंदर होती है बुढ़ापा महान् होता है।

◆  गाँववालों, बहुत लगन के साथ जवानी में संचित किया यह विशाल पुस्तकालय आयु के पंचानबे (95)पड़ाव पर तुम्हें सौंप रहा हूँ ।

◆ महानता की कल्पना को तब गहरा धक्का लगा जब उन्हें बेहाल हीन स्थिति में देखा ‘जरा तुषारभिहंता शरीर सरोजिनी ?”

◆ चौकी पर बिस्तर नहीं। अधोवस्त्र के रूप में मात्र खादी का अंडर विअर है और खादी का ही एक पुराना गमछा ओढ़े जैसे हैं। वस्त्र दोनों साफ-सुथरे नहीं। फिर एक धक्का लगा। खादी के चमाचम धवल धुले वस्त्रों के लिए वे एक प्रतिमान समझे जाते हैं।

◆ उत्तराभिमुख बैठकखाने के आगे लता – पत्रादि से घिरे पूरे प्रांगण को घेरकर जो एक अरगनी है वह बराबर आँखों पर चढ़ने वाले कपड़ों, धुलने के बाद सूखने के लिए डाले गए वस्त्रों, धोती, कुरता, बंडी, चादर और गमछा आदि से सज्जित मिलती।

◆  कोई व्यक्ति पास नहीं हैं तो क्या मान लें कि- ‘बूढ़ों के साथ लोग कहाँ तक वफा करें ?
लेकिन न आती मौत तो बूढ़े भी क्या करें ?’
लेकिन स्थिति ऐसी नहीं थी। वहाँ न तो सेवा करनेवालों का अभाव था और न ही मौत का इंतजार था। मात्र वे बीमार थे। कभी बीमार न पड़नेवाला आदमी बीमार था। यही कारण था कि ‘आश्रम एक सुहावन पावन’ जैसा वह आवास उदास था। उधर मैं अपने सोच में डूबा था, उधर कई लोग वहाँ पहुँचकर उन्हें जगाने लगे थे, “बाबा, बाबा, यह देखिए, आप से मिलने कौन आए हैं ?”

◆ आँखें खोलकर मेरी ओर देखते उन्होंने कहा, ‘शरदचंद्रजी बैठ जाइए।’ अर्थात् वे मुझे पहचान न सके।

◆ शरदचंद्र उनके विद्यालय के प्राचार्य का नाम था।

◆ बहुत कड़वा सत्य था। भीतर बेचैनी होने लगी। सामने वे ही तो हैं पर यह कौन बोल रहा है?

◆  कितना क्रूर, कठोर और दुर्दम है समय के हाथों इस प्रकार झटक दिया जाना! उनके एक स्वजन ने कान के पास मुँह कर जोर से जब मेरा नाम बताया तो जैसे तरंगित हो गए, सोए-सोए सुपरिचित खुले हुए ऊँचे स्वर में बोले, क्षमा, बारंबार, क्षमा हजार बार, क्षमा बैठिए बैठिए शरीर है न ठीक हो जाता है तो पिछली बार की तरह बनारस चला जाएगा।

◆  आप कहेंगे तो आगे इलाहाबाद या फिर दिल्ली तक चले चलेंगे। अरे, आपको चाय पिलाओ, भाई भोजन का भी वक्त है फिर न हो तो आज पुस्तकालय के लिए एक बैठक भी कर लेंगे।’

◆  बोलते बोलते एकदम चुप हो गए। लगा कि बोलने में कठिनाई हो रही है खुले हुए ऊँचे नीरोग जैसे स्वर की उनके तो वही थी पर उसका आत्मविश्वास से पूर्ण पहले जैसा स्वाभाविक ताप नहीं था और ठंडापन छिप नहीं रहा था।

◆  सामनेवाला चकितकारी सत्य बहुत आहत कर रहा था। एक साल के भीतर ही यह क्या हुआ ? क्या सचमुच बुढ़ापा अचानक धमककर चकित कर देता है कि अरे, यह क्या हुआ ?

◆  राष्ट्रीय स्तर के एक विद्यामंदिर के इस तेजस्वी शिक्षक, गांधीवादी चिंतन और जीवन शैली में आजीवन रसे बसे सदाबहार, स्वास्थ्य के लिए प्रसिद्ध ग्राम मनीषी तथा सुरुचिपूर्ण सुवेश में सदा सहास मिलनेवाले इस समाजसेवी को ऐसे बेहाल कैसे देख रहा हूँ ?

◆ “लेकिन बेहाल कैसे ? संभवतः यह नियति और जिजीविषा का संघर्ष है। अभी यात्राएँ करनी हैं। पुस्तकालय के भविष्य को सँवारना है।

◆ मकान जर्जर होने से क्या ? मकान मालिक जवान है। वह इस सुंदर संसार को और सुंदर बनाने के लिए जिएगा। यहाँ खड़े होकर बंशी बजाएगा।

◆ हाय रोग, हाय दया करे उसकी बलाय नहीं, वह रोएगा धोएगा नहीं पड़ा रहेगा शांत, मौन कोई शिकवा – शिकायत नहीं।

◆ अपने प्रिय कवि कबीर साहब की तरह ‘बेहद के मैदान में सोया है। कुछ ‘निरंतर’ हो रहा है। क्या हो रहा है? शायद सुमिरन भजन ? आश्चर्य ?

◆ इधर मैं उनके एक स्वजन से उनकी अप्रत्याशित अवस्था के विषय में जानकारी ले रहा था और उधर अपनी मौज में जैसे मुझे सुना रहे हैं, उसी अमंद स्वर में, अर्धमुँदी आँखों में बोलते जा रहे हैं, ‘
रामनाम लड्डू गोपाल नाम घीव हरि का नाम मिश्री और घोर घोर पीव’ ‘
झूठे सुख को सुख कहत मानत हैं मन मोद, जगत चबेना काल को चहककर ‘
अंतकाल तुम सुमिरन गति और फिर चहककर कुछ मौज में-
‘माता बिन आदर कौन करे ?
बरखा बिन सागर कौन भरे ?
राम बिना दुःख कौन हरे ?”

◆ अगली बार जल्दी आइए तो अपने साहित्यिक
पुस्तकालय पर चौबीस घंटे का हरिकीर्तन कराया जाए।’

◆ वही मुद्रा, वही अधमुँदी आँखें, वही निर्भाव भाव में चौकी पर लेटे-लेटे बोलना, जैसे किसी और से नहीं, स्वयं से बोल रहे हैं, आत्मलीन, आत्म संबोधन !

◆ अब मैं बहुत हैरान हूँ इस ‘रामनाम लड्डू’, सुमिरन भजन, हरिकीर्तन और ‘राम बिना दुःख कौन हरे’ वाली धार्मिक लाइन पर कभी उन्हें इस प्रार्थी भाव में देखा नहीं। फिर दुःख हरने में माता की सनातन भूमिका का स्मरण ?

◆ उनके जीवन और चिंतन शैली को देखते, ये बातें बेमेल पड़ गले से उत्तर नहीं रही हैं। तो क्या मान लें कि यह ‘हारे को हरि नाम वाली स्थिति हैं ?

◆  मगर हारे कहाँ हैं? अभी तो मन जवान है, लड़ रहा है, पुस्तकालय की मीटिंग कर रहा है। यात्राएँ कर रहा है! मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। तो, यहाँ तो जीत ही जीत है, अंत भला तो सब भला यात्रा के इस पड़ाव की यह श्रेष्ठतम स्थिति है कि आधि-व्याधि सहित मौत को पछाड़कर आदमी अपनी मौज में दहाड़ता रहे।

◆  नहीं, यहाँ पराजय का अस्तित्व नहीं है। कहाँ किसी अपनी बीमारी या किसी डॉक्टर या स्वजन की चर्चा हो रही है ?

◆ चर्चा है ‘गोपाल नाम घीव’ की अर्थात् अगले पड़ाव पर चलते-चलते में घी खाकर तगड़े बन जाएँ। यही आदर्श वीरता है।

◆ यह एक ‘निराला’ संदर्भ है। सत्य है कि ‘रेत सा तन ढह गया है। मगर किसका ? वह जो एक कल्पित नाम रूप है, क्या उसका, जिसके लिए वह ‘मैं’ का प्रयोग करता है? नहीं, ‘मैं अलक्षित हूँ यही कवि कह गया है।’

◆ वह अलक्षित है। यह जो दिखाई पड़ रहा है, जो अगणित बंधनों में जकड़ा है वह नहीं है। गुण और संस्कार ही नहीं, अपना यह ओढ़ा हुआ व्यक्तित्व, कल्पित संबंध और अर्जित ज्ञान भी महामारक बंधन ! तो अब यह परम पुरुषार्थ देखो, यह निर्बंध असंग पुरुष इस बँधे हुए पुल से गुजर जाने के लिए उद्यत है। यही कारण है कि जीवन भर गांधी अरविंद, राधाकृष्णन और कबीर आदि से लेकर दिनकर, पंत, प्रसाद, प्रेमचंद और हजारी प्रसाद आदि को पढ़नेवाला अब स्वयं को पढ़ रहा है-
‘अपना दीप अपने आप अपना जिआ अपना वेद अपने अनुभवों की राशि विपुल पुराण’

◆  क्या ‘माता बिन आदर कौन करे ?’ उसी का एक महत्त्वपूर्ण पाठ है ?  जीवन-यात्रा से थका प्रत्येक यात्री विश्राम चाहता है। उसे माता की परम पावन गोद का आश्रय चाहिए।उसके आदर में निर्द्वद्व विश्राम है और वह निर्विघ्न आश्रय है। उसके आदर में ही विश्राम की और आश्रय की स्थिति है। इसीलिए जीवन की बीहड़ बेला में उसे स्मरण करते हैं।

◆ क्रूर कठिन संसार द्वारा झटक दिए जाने पर जब धुंधलके – धुंध में किसी अवांछित हाशिए पर पहुँच गए तो और किसे याद करें ? उस आदर का स्मरण मात्र एक दुःखहर सहलाव है, सांत्वना का बल है, एक रोमांच है, अहोभाव है और हर्षित विराम है। किसी कवि की पंक्तियाँ उमड़ रही हैं-
“माँ चंदन की गंध है, माँ रेशम का तार,
बँधा हुआ जिस तार में, सारा ही घर द्वार ।
यहाँ वहाँ सारा जहाँ नापें अपने पाँव,
माँ के आँचल सी नहीं, और कहीं भी छाँव थके, यात्री को अब ठहराव चाहिए, विश्राम चाहिए,
माँ के आँचल की छाँव चाहिए। माता बिन आदर कौन करे ?

◆ कुल मिलाकर यह निज घर वापस लौटने की लालसा है। पर घर की आपाधापी से, श्रम से छुट्टी मिले। दासत्व से छुट्टी मिले। ‘सर्वोहि आत्मगृहे राजा।’ स्वस्थ रहें तो सानंद रहें।

◆  कुल मिलाकर जो जिया वह सब ‘मोह मूल परमारथ नाहीं।’ और ‘मोह सकल व्याधिन कर मूला।’ इन्हीं सारी सारी व्याधियों से ग्रस्त ‘दुखिया सब संसार है।’

◆ जो स्वस्थ होगा वही शांत होगा, ‘निर्मान मोहा’ होगा, निर्द्वद्व- निश्चेष्ट होगा, बेपहचान होगा और वही बोल सकेगा, ‘माता बिन आदर कौन करे ?’,

◆भवरोग रोगी माता का नहीं, रोग का, दवा का, डॉक्टर का, अस्पताल का राग अलापता विक्षिप्त रहेगा।

◆ कहाँ ऐसी मौज नसीब होगी कि रामनाम लड्डू बाँटे तो, मास्टर साहब स्व में स्थित हैं। बाँट रहे हैं, लो दुनिया के लोगों, लड्डू लो, घी-मिश्री लो और फिर परमलाभ के लिए राम का नाम लो । राम बिना दुःख कौन हरे ? और मेरे लिए माता का प्यार अलम है।

◆ जीवन भर कबीर को पढ़नेवाला अब कबीर को जीएगा। जीवन की यही वरेण्य स्थिति है। जब चाहे चली गई तो फिर चिंता कहाँ टिकेगी और फिर तो ‘मनुआ बेपरवाह !’ क्या मस्ती है

◆ यह जो है सब नई यात्रा की प्रस्थान प्रक्रिया है। यह ‘वासांसि जीर्णानि को त्यागने और ‘नवानि गृह्णाति’ के मध्य का सचल परिदृश्य है। परम पावन है। ‘मृत्यु रे, तुहु मम श्याम समान!’

●  रवि बाबू का श्याम ही मास्टर साहब की माता है।

◆ तुम्हीं हो माता तुम्हीं पिता हो, अब तुम्हारा प्यार ही वांछित है। संसार पीछे छूट गया। अब कैसा बंधन ?

◆ स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में लोग एक गीत गाया करते थे-
‘हम दीवानों की क्या हस्ती हैं आज यहाँ कल वहाँ रहे मस्ती का आलम साथ चला, हम धूल उड़ाते जहाँ चले।’

◆  माता का प्यार पाने के लिए उनकी गोद में ? मगर वह तो बहुत-बहुत पीछे छूट गई। जन्मदात्री माँ की गोद अब असंभव । संभव है उनकी भारतमाता की गोद प्रकृति माता की गोद।

◆  हम भारतवासी कितने सौभाग्यशाली हैं और हमारी संस्कृति कितनी समृद्ध है कि आदर, प्यार और दुलार सहित जीवनदात्री हमारी माताओं की विस्तृत सूची है गंगा, गीता, गायत्री और धरती सहित अनेक देवी- देवताओं की अधिक पवित्र संज्ञाएँ ‘माता’ शब्द से जुड़ती हैं।

◆ जन्मदात्री भौतिक माता से कुछ अधिक ही भावात्मक संबंधोंवाली माताओं के स्मरण में रोमांच देखते हैं।

◆  भौतिक जीवन की माताएँ कुमाता भी हो जाती हैं। (इस बीसवीं इक्कीसवीं शताब्दी का आधुनिक दौर इस संदर्भ में बहुत कुख्यात हुआ)

◆ भावात्मक संबंधवाली माताओं का स्नेह- कोष सुपुत्रों के लिए कभी रिक्त नहीं होता। उनका आदर, अवदान और आशीर्वाद बहुत ही शक्तिशाली होता है, साथ ही अकृत्रिम, सहज और निःस्वार्थ !

◆  भारतमाता के प्रति भक्ति, समर्पण और सेवा-भाव की तरंगों ने एक तिरंगा इतिहास रच दिया, लिखा, सुना नहीं, वह सब आँखों देखा सच है।

◆  मास्टर साहब के जीवन का प्रभात और पूर्वाह्न का जीवन ‘विजयी विश्व तिरंगा’ और ‘भारतमाता जननि हमारी, उसको शीश झुकाएँगे’ जैसे गीतों की गुंजार में रमा था।

◆ लेखक सबसे पहले मास्टर साहब को एक प्रभातफेरी में देखा था। उनके गाँव पर एक बारात में गया था। गरमी का दिन था। वह सारा गाँव आजादी के दीवानों का गाँव है। सुबह लगभग चार बजे समवेत स्वरों की आकर्षक गीत गा रहे थे। आगे दो व्यक्ति हैं, कुछ बड़े-बड़े झंडे लिये एक युवा और एक प्रौढ़ व्यक्ति हैं उनको लोग संत जी कहते हैं और जो युवक है, कॉलेज में पढ़ता है, उसका नाम जगदीश है।
* एक युवा :- जगदीश
* एक प्रौढ़ व्यक्ति :- लोग संत जी कहते थे।(मास्टर साहब)

◆ प्रभातफेरी में लोग गा रहे थे
‘उठ जाग मुसाफिर भोर भई, अब रैन कहाँ जो सोवत है!’ 【मास्टर साहब का प्रिय गीत】

◆  उस सेनानी पीढ़ी की भारतमाता के प्रति, स्वाधीनता और नवजागरण के प्रति समर्पित तथा गहरी संशक्ति समय का एक ज्वलंत सत्य है।

◆ आत्म जागरण बनाम राष्ट्र जागरण गीत की प्रथम कड़ी का भाव प्रवाह दोनों ओर हैं-
उठ जाग मुसाफिर भोर भई, अब रैन कहाँ जो सोवत है।
जो सोवत है सो खोवत है, जो जागत है सो पावत है।

◆  भारतमाता वंदिनी है और अगली पंक्तियों में जगने, और कुछ करने का आह्वान हैं और अंत में कहा गया- ‘जब खेती चिड़िया चुग डारी एकजुट होने फिर पछताए क्या होवत है।’

◆ जागरूकता मंत्र ‘उठो जागो’ का राष्ट्र व्यापी मंत्र प्रभात बेला में स्पंदित है।

◆ कोई भारतमाता का ‘भगत’ भी है और ‘सिंह’ भी है तो वह क्या करता है ‘जवानों को जगाने के लिए कौंसिल में बम फेंका और फिर फाँसी पर चढ़ने जा रहा है तो भारतमाता से विदा माँगता है, बहुत लोकप्रिय गीत था, बिदा कर दो मुझे माता !

◆  एक निराला कवि है जो इस बात पर तड़प रहा है कि ‘सिंहों की माँद में आया है आज स्यार’, और फिर वही ‘जागो नगपति, जागो विशाल ।’

◆  कोई छायावादी कवि प्रसाद रूप में नवजागरण मंत्र फूँक रहा है, ‘बीती विभावरी जाग री।’

◆  शुरुआत भारतेंदु ने की ‘डूबत भारत नाथ बेगि अब जागो।’
◆  प्रभात फेरी की यह श्रृंखला, गीत-गुंजार से पहुँचती है, आत्म बलिदान की मंजिल तक, ‘वंदिनी माँ को न भूलो, राग में अब मत्त झूलो, हों जहाँ बलि शीश अगणित, एक सिर मेरा मिला लो।’

◆ वंदिनी भारतमाता स्वतंत्र हुई, परंतु उस त्यागी बलिदानी और आजादी की दीवानी पीढ़ी पुत्रों के सपने कहाँ पूर्ण हुए।

◆ अब तो भारतमाता का नाम लेना भी गुनाह जैसा ! उस नाम का सारा रोमांच वोट तंत्र के बुलडोजर में चैंपकर चूर-चूर हो गया।

◆ कुर्सी कमाई, पार्टी प्रोपर्टी और लोकतंत्र बनाम धनबल तंत्र बाहुबल तंत्र वाले अंधे युग के भ्रष्टाचार भक्त गा- बजाकर नाच रहे हैं
, ‘अब हाँ नाच्यौ बहुत गोपाल’ चोर मचाये शोर!

◆ तब मास्टर जैसा व्यक्ति अब क्या बोले ? किस सोए देश को जगाए ? अब मान ले, पुस्तकालय उसका भारत है। अँधेरी रात के बाद प्रकाश को आना ही है। तब ? वह घर लौटे, माता बाट देख रही है। माता बिन आदर कौन करे !

◆  ‘माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्या: ‘ एक शब्द जोड़कर उसे एक उच्चासन प्रदान करे, मातृभूमि ! जन्म दिया माता सा जिसने किया सदा लालन-पालन जिसकी मिट्टी जल से ही है, रचा गया हम सबका तन ।

◆ पं. मन्नन द्विवेदी गजपुरी की इस कविता में मातृभूमि के अवदानों को, लता – द्रुमादि सहित रक्षाकारी उपादानों की ओर संकेत के बाद कवि एक मार्मिक बात कहता है कि माता की गोद तो केवल बचपन में मिलती है, परंतु मातृभूमि तो मृत्युपर्यंत अपना स्नेह लुटाती है और मृत्यु के बाद अशरण-शरण बन अपने में मिला लेती है! अंत में कवि कहता है- “ऐसी मातृभूमि मेरी है, स्वर्ग से भी प्यारी। जिसके पद कमलों पर मेरा, तन, मन, धन सब बलिहारी ॥ “

◆ यह है माता, मातृभूमि, जन्मभूमि, स्वर्गलोक से भी प्यारी, ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी एक जगा हुआ व्यक्ति इसके लिए तड़प रहा है। इस तड़पन में गीता के ऊँचे ज्ञान की गूंज है।

◆  यह भूमि, (अष्टभेदी प्रकृति में प्रमुख ) ही माता है और पुरुष में परमात्मा पिता है।

◆ इसी माता, भूमि, मातृभूमि और सबका भाव जिसके सपनों में डूबा मुसाफिर पूरे देश को जगाता है।

◆ माता बिन आदर कौन करे :-
● एक धन्यता का भाव है
● एक भावभीनी जननी जन्म भूमि की प्रार्थना है, ● एक मंत्र है
●  सुमिरन भजन और कीर्तन है
●  जीवन साधना का सार है
●   संसार का आश्रय हार है और परमाश्रय जीवन की जीत है।

◆ अंतिम परीक्षा की घड़ी में वाल्मीकि की सीताजी ने भी पुकारा था- ‘माधवी देवी विवर दातुमर्हति।’ पृथ्वी माता मुझे अपनी गोद में स्थान दें। माता का आदर मिला। वे उत्तीर्ण हुईं।

◆ अंत में बता दूँ, उस दिन मास्टर साहब को एक विजेता की स्थिति में देखा। देह गेह अलीक माया की तरंगें नहीं।

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