उत्तरी फाल्गुनी के आस – पास निबंध (uttara phalguni ke aas paas nibandh)

💐उत्तराफाल्गुनी के आसपास(कुबेरनाथ राय) 💐

◆  ललित निबंध

◆ वर्षा ऋतु की अंतिम नक्षत्र है :-  उत्तराफाल्गुनी।

◆ हमारे जीवन में गदह-पचीसी सावन- मनभावन है, बड़ी मौज रहती है।
* गदह-पचीसी का अर्थ :- गधा-पचीसी
* गधा-पचीसी का अर्थ :-अज्ञानता की स्थिति,
बेसिर पैर की बातें करना, अर्थहीन बातें करना।

◆ 27 वे साल में आते ही :-  घनघोर भाद्रपद के अशनि-संकेत मिलने लगते हैं।

◆ 30 वे साल में :-
●विद्युन्मय भाद्रपद के काम, क्रोध और मोह का तमिस्त्र सुख भोगते हैं।
●  स्वभाव के अनुसार हमारी सिसृक्षा कृतार्थ होती है।

◆  40वे साल लगते ही :- भाद्रपद की अंतिम नक्षत्र उत्तराफाल्गुनी में प्रवेश कर जाते हैं।

◆  40वे साल के दो-चार वर्ष बाद :- उत्तराफाल्गुनी के अंतिम चरण में जरा और जीर्णता की आगमन

◆ सृजन संपृक्त, सावधान, सतर्क, सचेत और कर्मठ जीवन :- तीस और चालीस के बीच फिर चालीस से पैंतालीस तक उत्तराफाल्गुनी का काल।
(30से 40के बीच या  40 से 45 तक)

◆  उत्तराफाल्गुनी का काल में प्रवेश करते ही:-
● शरीर की षटकर्मियों में थकावट आने लगती है ● अस्ति, जायते, वर्धते ये तीन धीरे-धीरे शांत होने लगती हैं, उनका वेग कम होने लगता है और इनके विपरीत तीन विपतरिणमते, अपक्षीयते, विनश्यति प्रबलतर हो उठती हैं,।
●  उन्हें प्रदोष बल मिल जाता है
● वे शरीर में बैठे रिपुओं के साथ साँठ-गाँठ कर लेती हैं और फल होता है
●  जरा के आगमन का अनुभव।

◆ पैंतालीस के बाद में :-
●  शीश पर काश फूटना शुरू हो जाता है।
● वातावरण में लोमड़ी बोलने लगती है
● शुक और सारिका उदास हो जाते हैं
● मयूर अपने श्रृंगार-कलाप का त्याग कर देता है। ● मानस की उत्पलवर्णा मारकन्याएँ चोवा-चंदन और चित्रसारी त्याग कर प्रव्रज्या का बल्कल-यसन धारण कर लेती हैं।

◆ जीवन का वह भाग, जिस पर हमारे जन्म लेने की सार्थकता निर्भर है :- पच्चीस और चालीस या ठेल ठालकर पैंतालीस के बीच

◆ पच्चीस और चालीस या ठेल ठालकर पैंतालीस के बीच के पूर्व :- हमारे जीवन की भूमिका या तैयारी का काल है और इसके बाद फलागम’ या निमीसिस (Nemesis) की प्रतीक्षा है।

◆ जो हमारे हाथ में था, जिसे करने के लिए हम जन्मे थे, वह वस्तुतः घटित होता है :- पच्चीस और पैंतालीस के बीच

◆ पच्चीस और पैंतालीस के बीच के बाद :- मन और बुद्धि के वानप्रस्थ लेने का काल है

◆  पच्चीस पैंतालीस की अवधि में  :- असल हीर रचती है तीसोत्तरी।

◆  तीसोत्तरी के वर्षों का स्वभाव :-
●  शाण पर चढ़ी तलवार की तरह है
● वर्ष-प्रतिवर्ष उन पर नई धार, नया तेज चढ़ता जाता है

◆ चालीसवें वर्ष तक लेखक किन लोगों पर  क्रोध आता है। :- जो विधाता ब्रह्मा को बूढ़ा कहते हैं और चित्र में तथा प्रतिमा में उन्हें वयोवृद्ध रूप में प्रस्तुत करते हैं।

◆  लेखक ने दक्षिण भारत के एक मंदिर में  क्या देखा :-  ब्रह्मा की एक अत्यंत सुंदर तीसोत्तर युवा मूर्ति को

◆ ब्रह्मा को देखकर  लेखक कलाकार की औचित्य-मीमांसा पर मुग्ध हो गया। जो सर्जक है, जो सृष्टिकर्ता है, वह निश्चय ही चिरयुवा होगा।

◆  प्राचीन या बहुकालीन का अर्थ :-  जर्जर या बूढ़ा नहीं होता है।

◆ जो सर्जक है, पिता है, प्रॉफेट है, नई लीक का जनक है, प्रजाता है,वह रूप- माधव या रोमैंटिक काम किशोर भले ही न हो, परंतु वह दाँत-क्षरा, बाल-झरा, गलितम् पलितम् मुंडम् कैसे हो सकता है?
*अङ्गं गलितं पलितं मुण्डं दशनविहीनं जातं तुण्डम् ।
वृद्धो याति गृहीत्वा दण्डं तदपि न मुञ्चत्याशा पिण्डम् (शंकाराचार्य द्वारा  रचित चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् का छठा छन्द)

अर्थ –  (वृद्धावस्था में) अंग गलित (या ढीले, निष्क्रिय) हो चुकते हैं, शिर के बाल पक जाते हैं, मुख दंतविहीन हो जाता है। इस अवस्था को प्राप्त बूढ़ा व्यक्ति लाठी ले के चलता है। इतने सब के बावजूद जीवन की आशा पिंड नहीं छोड़ती।

◆  जवानी एक चमाचम धारदार खड्ग है।
* जवानी एक चमकदार धार वाली तलवार है।

◆ लेखक इन लोगों की श्वेतकेश वृद्ध के रूप में कल्पना नही करते :- सृष्टिकर्ता ,कवि, विप्लव नायक, सेनापति ,शूरवीर और विद्रोही की।

◆  प्रजापति विधाता को सदैव तीस वर्ष के पट्ठे सुंदर, युवा के सुंदर रूप में ही कल्पित करना समीचीन है।

◆  तीसवाँ वर्ष जीवन के सम्मुख फण उठाए एक प्रश्न चिह्न को उपस्थित करता है और उस प्रश्न-चिह्न को पूरा- पूरा उसका समाधान मूल्य हमें चुकाना ही पड़ता है।

◆  किसी भी पुरुष या नारी की कीर्ति गरिमा, इसी प्रश्न चिह्न की गुरुता और लघुता पर निर्भर करती है।

◆ गौतम बुद्ध ने उनतीस वर्ष की अवस्था में गृह त्याग कर अमृत के लिए महाभिनिष्क्रमण किया।

◆  यीशु क्राइस्ट ने तीस वर्ष की अवस्था में अपना प्रथम संदेश ‘सरमन ऑन दी माउंट’ (गिरिशिखर – प्रजनन) दिया था और तैंतीसवें वर्ष में उन्हें सलीब पर चढ़ा दिया गया।

◆ वाल्मीकि के अनुसार रामचंद्र को भी तीस के आसपास ही (वास्तव में 27 वर्ष की वयस में) वनवास हुआ था। उस समय सीता की आयु अठारह वर्ष की थी और वनवास के तेरहवें वर्ष में अर्थात सीता के तीसवों पार करते-करते ही सीताहरण की ट्रेजेडी घटित हुई थी।

◆  तीसवाँ वर्ष सदैव वरण के महामुहूर्त के रूप में आता है और संपूर्ण दशक उस वरण और तेज के दाह से अविष्ट रहता है।

◆ तीसोत्तर दशक जीवन का घनघोर कुरुक्षेत्र है।

◆  तीसोत्तर का काल :-
●  गदह पचीसी के विपरीत एक क्षुरधार काल है
●  जिस पर चढ़कर पुरुष या नारी अपने को अविष्कृत करते हैं।
● अपने मर्म और धर्म के प्रति अपने को सत्य करते हैं ।
● अपनी अस्तित्वगत महिमा उद्घाटित करते हैं।

◆ चालीसा लगने के बाद पैंतालीस तक:-
● यह स्थिति की उत्तराफाल्गुनी चलती है।
● इसमें ही जीवन की प्रतिकूल और अनुकूल उमियाँ परस्पर के संतुलित को खोना प्रारंभ कर देती हैं।
● प्राणशक्ति अवरोहण की ओर उन्मुख हो जाती है।
● इसके बाद अनुकूल उर्मियाँ स्पष्टतः थकहर होने लगती हैं और प्रतिकूल उर्मियाँ प्रबल होकर देह की गाँठ-गाँठ में बैठे रिपुओं से मेल कर बैठती हैं।
● मन हारने लगता है
● सृष्टि अनाकर्षक और रति प्रतिकूल लगने लगती है।
● बुद्धि का तेज घट जाता है।
●  वह स्वीकारपंथी (कनफर्मिस्ट) होने लगती है।
●  आत्मा की दाहक तेजीमयी शक्ति पर विकार का धूम्र छाने लगता है।

◆  दोस्तोव्हस्की के विचार :-
* फ़्योदोर दोस्तोयेव्स्की :- रूसी भाषा के एक महान् साहित्यकार, विचारक, दार्शनिक और निबन्धकार ।

● इन्होंने चालीस के बाद ही जीवन को धिक्कार दे दिया था ।
●  मैं चालीस वर्ष जी चुका चालीस वर्ष ही तो असली जीवन काल है।
● तुम जानते हो कि चालीसवाँ माने चरम बुढापा ।
● चालीस से ज्यादा जीना  :- असभ्यता है, अश्लीलता है, अनैतिकता है।
● भला चालीस से आगे कौन जीता है? मूर्ख लोग और व्यर्थ लोग (नोट्स फ्रॉम अंडर ग्राउंड से )

◆ लेखक के अनुसार चालीस वर्ष के बाद जीवन के सहज लक्षणों का, परिवर्तन-परिवर्धन- सृजन का आत्मिक और मानसिक स्तरों पर ह्रास होने लगता है।

◆ लेखक ने कहा – “मैं साठा तब पाठा की उक्तिवाली गंगा की कछार का निवासी हूँ।”

◆  चालीस अवधि को पाँच वर्ष और आगे बढ़ाकर देखता हूँ, यद्यपि दोस्तोव्हस्की की मूल थीसिस मुझे सही लगती है।

◆ शक्तिक्षय की प्रक्रिया चालीस के बाद ही प्रारंभ हो जाती है, यद्यपि वह अस्पष्ट रहती है।

◆ मैं इस समय 1972 ईस्वी अपना अड़तीसवाँ पावस झेल रहा हूँ।(लेखक जब यह निबंध लिख रहे थे तब 38 साल के थे। 1972 में)

           💐 नक्षत्रों बारे जानकारी 💐

◆ नक्षत्र किसे कहते है ?
● चंद्रमा पृथ्वी की पूरी परिक्रमा 27.3 दिनों में करता है और 360 डिग्री की इस परिक्रमा के दौरान सितारों के 27 समूहों के बीच से गुजरता है। चंद्रमा और सितारों के समूहों के इसी तालमेल और संयोग को नक्षत्र कहा जाता है। 

● जिन 27 सितारों के समूह के बीच से चंद्रमा गुजरता है वही अलग अलग 27 नक्षत्र के नाम से जाने जाते हैं।

◆ 27 नक्षत्रों के नाम  :-
1. अश्विन नक्षत्र(शुभ नक्षत्र)
2. भरणी नक्षत्र(अशुभ नक्षत्र)
3. कृत्तिका नक्षत्र(अशुभ नक्षत्र)
4.  रोहिणी नक्षत्र(शुभ नक्षत्र)
5. मृगशिरा नक्षत्र(शुभ नक्षत्र)
6. आर्द्रा नक्षत्र
7. पुनर्वसु नक्षत्र(शुभ नक्षत्र)
8. पुष्य नक्षत्र(शुभ नक्षत्र)
9.  आश्लेषा नक्षत्र(अशुभ नक्षत्र)
10. मघा नक्षत्र(अशुभ नक्षत्र)
11. पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र
12. उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र(शुभ नक्षत्र)
13.  हस्त नक्षत्र
14. चित्रा नक्षत्र(शुभ नक्षत्र)
15. स्वाति नक्षत्र
16. विशाखा नक्षत्र
17. अनुराधा नक्षत्र(शुभ नक्षत्र)
18.  ज्येष्ठा नक्षत्र
19. मूल नक्षत्र
20. पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र
21. उत्तराषाढ़ा नक्षत्र(शुभ नक्षत्र)
22.  श्रवण नक्षत्र
23.  घनिष्ठा नक्षत्र(शुभ नक्षत्र)
24.  शतभिषा नक्षत्र
25. पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र
26.  उत्तराभाद्रपद नक्षत्र(शुभ नक्षत्र)
27.  रेवती नक्षत्र(शुभ नक्षत्र)

◆  पूर्वाफाल्गुनी का विकारग्रस्त यौवन जल पी-पीकर ‘क्ष’ से भी आगे एक पग ‘विक्षिप्त’ हो चुका हूँ और शीघ्र ही मोह मूढ होनेवाला हूँ!

◆ भाद्र की पहली नक्षत्र है मघा ।

◆ मघा में अगाध जल है।

◆ पृथ्वी की तृषा आश्लेषा और मघा के जल से ही तृप्त होती है।

◆ यदि मघा में धरती की प्यास नहीं बुझी तो उसे अगले संवत्सर तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है।

◆ मघा का जल श्रेष्ठ है।

◆ मघा मेष की झड़ी झकोर का स्तव गान कवि और किसान दोनो खूब करते हैं: ‘बरसै मघा झकोरि झकोरी। मोर दुइ नैन चुवै जस ओरी’ मघा बरसी, मानो दूध बरसा, मधु बरसा।

◆  इस मघा के बाद आती है पूर्वाफाल्गुनी जो बड़ी ही रद्दी कंडम नक्षत्र है।

◆ पूर्वाफाल्गुनी का पानी फसल जायदाद के लिए हानिकारक तो है ही, उत्तर भारत में बाढ़-वर्षा का भय भी सर्वाधिक इसी नक्षत्र – काल में रहता है।

◆  उत्तर भारतीय गंगातीरी किसान किस नक्षत्र को  कीर्तिनाशा-कर्मनाशा नक्षत्र मानते हैं? :-पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र को

◆ भाद्रपद की अंतिम नक्षत्र :- उत्तराफाल्गुनी

◆ उत्तराफाल्गुनी के बारे में :-
● जो समूचे पावस में मघा के बाद दूसरी उत्तम नक्षत्र है।
● इसका पानी स्वास्थ्यप्रद और सौभाग्यकारक होता है।

◆ लेखक अड़तीसवें पावस में अपने जीवन का पूर्वाफाल्गुनी काल भोग रहे है यद्यपि साथ ही साथ द्वार पर उत्तराफाल्गुनी का आगमन भी देख रहे है।

◆ लेखक के पूर्वाफाल्गुनी का अंतिम पानपात्र  होंठों से संलग्न है।
●  क्रोध लेखक की खुराक है।(लेखक इसे ‘विद्रोह’ कहकर पुकारता है)
● लोभ लेखक का नयन-अंजन है।(लेखक इसे ‘प्रगति’ कहकर पुकारता है)
● काम-भुजंग लेखक का  क्रीडा-सहचर है। (लेखक इसे ‘नवलेखन’ कहकर पुकारता है)

◆ इसमें जीर्णता और जर्जरता नहीं। यह जरा और वृद्धत्व का प्रतीक नहीं।

◆ पूर्वाफाल्गुनी द्वारा प्रदत्त विक्षिप्तता भी यौवन का ही एक अनुभव है।

◆ मेरे सम्मुख द्वार पर काल – नट्टिन अर्थात् उत्तराफाल्गुनी त्रिभंग रूप में खड़ी है और मैं उसमें मार की तीन कन्याओं तृषा-रति- आर्ति को एक साथ देख रहा हूँ।

◆ कांचनपद्म कांति, कर-पल्लव, कुणितकेश, बिंबाधर, विशाल बंकिम भ्रू, दक्षिणावर्त नाभि, और त्रिवली रेखा से युक्त इस भुवन मोहन रूप को मैं देख रहा हूँ और इसको आगमनी में अपने भीतर बजती उपंग को निरंतर सुन रहा हूँ।

◆ उपंग एक विचित्र बाजा है। काल- पुरुषों की उँगलियाँ चटाक चटाक पड़ती है और आहत नाद का छंदोबद्ध रूप निकलता है बीच-बीच में हिचकी के साथ। यह हिचकी भी उसी काल- विदूषक की भडती है और यह उपंग के तालबद्ध स्वर को अधिक सजीव और मार्मिक कर देती है।

◆  वानप्रस्थ का शरद काल होता है।

◆  इस क्षण तो बस मौज ही मौज है, भले ही वह कटुतिक्त मौज क्यों न हो, काम भुजंग के डॅसने पर तो नीम भी मीठी लगती है।

◆  अतः यह काल नटी, यह पूर्वाफाल्गुनी या उत्तराफाल्गुनी, यह ‘नैनाजोगिन कितनी भी भ्रान्ति, माया या मृगजल क्यों न हो, मैं इसके रूप में आबद्ध हूँ।

◆ इसमें मुझे वही स्वाद आ रहा है जो मायापति भगवान को अपनी माया के काम मधु का स्वाद लेते समय प्राप्त होता है और जिस स्वाद को लेने के लिए वे परमपद के भास्वर सिंहासन को छोड़कर हम लोगों के बीच बार-बार आते हैं।

◆जिसकी श्रंगारहीन शरद यवनिका के पीछे जीर्ण हेमंत और मृत्युशीतल शिशिर की प्रेतछाया झलकती रहेगी।

◆ तुम अगले बीस-बाईस वर्षों के लिए इस उत्तराफाल्गुनी के पगों को स्तंभित कर दो और वह अगले बीस-बाईस वर्ष तुम्हारे द्वारदेश पर, शिथिल दक्षिण चरण, ईषत कृंचित जानु के साथ आभंग मुद्रा ग्रीव खड़ी रहे और तुम्हारे हुकुम की प्रतीक्षा करती रहे?

◆ यह उत्तराफाल्गुनी एक रस साठ वर्ष की आयु तक बनी रहे? है कोई ऐसा उपाय? यह प्रश्न रह-रहकर मैं स्वयं अपने ही से पूछता हूँ।

◆  आज से तेरह वर्ष पूर्व भी मैंने इस प्रश्न पर चिंता की थी और उक्त चिंतन से जो समाधान निकला उसे मैंने कार्य रूप में परिणत कर दिया। परंतु इन तेरह वर्षों में असंख्य भाव-प्रतिभाओं के मंडपात हुए हैं और आज मैं मूल्यों के कबंध-वन में भाव-प्रतिभाओं के केतु-कांतार में बैठा हूँ।

◆  एक ग्रीक दार्शनिक की उक्ति :-  “एक नदी में हम दुबारा हाथ नहीं डाल सकते, क्योंकि नदी की धार क्षण- प्रतिक्षण और ही और होती जा रही है। काल-प्रवाह भी एक नदी है और इसकी भी कोई बूँद स्थिर नहीं।”

◆ शताब्दी के आठवें दशक के इस प्रथम चरण में मुझे उसी प्रश्न को पुनः पुनः सोचना है कैसे जीर्णता या जरा को, यदि संपूर्णतः जीतना असंभव हो तो भी फाँकी देकर यथासंभव दूरी तक वंचित रखा जाए? कैसे अपने दैहिक यौवन को नहीं, तो मानसिक यौवन को ही निरंतर धारदार और चिरंजीवी रखा जाय?  मैंने सीधा-सीधा उत्तर ढूँढ निकाला था : ‘ययाति की तरह पुत्रों से यौवन उधार लेकर।’ अर्थात मैं कोई नौकरी न करके कॉलेज में अध्यापन करूँ तो मुझ पचपन या साठ वर्ष की आयु तक युवा शिष्य-शिष्याओं के मध्य वास करने का अवसर सुलम होगा। मैं इनकी आशा- आकांक्षा, उत्साह, साहस, उद्यमता आदि से वैसे ही अनुप्राणित और आविष्ट रहूँगा जैसे चुंबकीय आकर्षण क्षेत्र में पड़कर साधारण लोहा भी चुंबक बन जाता है।

◆  विगत दशक के अंतिम दो वर्षों में जब मेरे ये बालखिल्य सहचरगण छिन्नमस्ता राजनीति के रँगरूट बनने लगे, जब इन्होंने मेरे गुरुओं, गांधी-विवेकानंद विद्यासागर सर आशुतोष की प्रतिमाओं का एवं उनके द्वारा प्रतिपादित मूल्यों का अनर्गल मुंडपात करना शुरू कर दिया।

◆  नए दार्शनिकों ने कहना प्रारंभ किया कि अध्यापक और छात्र के बीच भी श्रेणी शत्रुओं का संबंध है क्योंकि अध्यापक भी ‘स्थापित व्यवस्था’ का एक अंग है और व्यवस्था’ का भंजन ही श्रेष्ठतम पुरुषार्थ है।

◆ नई पीढ़ी के दार्शनिकों यथा हिवर्ट मारक्यूज, चेग्वारा, ब्रैंडिटकोहन आदि की चिंतनधारा से यथासंभव अल्प – स्वल्पे परिचय पा करके मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि मैं इन अपने भाइयों, अपने हृदय के टुकड़ों के साथ जो आज छिन्नमस्ता राजनीति के रंगरूट हैं, कुछ ही दूर तक, आधे रास्ते ही जा सकता हूँ।

◆ पुरुरवा का शब्दार्थ होता है :-
● रवों (आवाजों या नारों) से आक्रांत
● पूरित पुरुष ‘ययाति’ पुरानी पीढ़ी का प्रतीक ।
●  पुरुरवा नई पीढ़ी का प्रतीक

◆ मैं कैसे अपना चेहरा, अपनी आत्म-सत्ता, अपना व्यक्तित्व त्याग दूँ? ‘छिन्नमस्त’ पुरुष बनकर यौवन लेने से क्या लाभ?

◆ बिना मस्तक के बिना अपने निजी नयन-मुख-कान के इस उधार प्राप्त नवयौवन का नया अर्थ होगा?

◆ रूप, रस, गंध और गान से वंचित रह जाऊँगा।

◆  केवल शिश्नोदरवाला व्यक्तित्व लेकर कौन जीवन-यौवन भोगना चाहेगा? कम-से-कम बुद्धिजीवी तो नहीं ही । आत्मार्थ पृथिवी त्यजेत? अतः मुझे चिरयौवन को इन शिष्य पुरुरवाओं की नई पीढ़ी से दान के रूप में नहीं लेना है।

◆ तेरह वर्ष पहले का चिंतित समाधान आज व्यर्थ सिद्ध हो गया है।

◆ मुझे  अन्यत्र चिरयौवन का अनुसंधान करना है। कहीं-न-कहीं मेरे ही अंदर अमृता कला की गाँठ होगी। उसे ही मुझे आविष्कृत करना होगा।

◆  मैं अपने ही हृदय समुद्र का मंथन करके प्राण और अमृत के स्रोत किसी चंद्रमा को आविष्कृत करूँगा । तेरह वर्ष पुराना समाधान आज काम नहीं आ सकता।

◆ मैं मानता हूँ कि समाज और शासन में शब्दों के व्यूह के पीछे एक कपट पाला जा रहा है।

◆  मैं बालखिल्यों के क्रोध की सार्थकता को स्वीकार करता हूँ।

◆ छिन्नमस्ता शैली के सस्ते रंगांध और आत्मघाती समाधान को भी मैं बेहिचक बिना शील-मुरौवत के अस्वीकार करता हूँ।

◆ अपना मस्तक काटकर स्वयं उसी का रक्त पीना तंत्राचार – वीराचार हो सकता है परंतु यह न तो क्रांति है और न समर पुरानी पीढ़ी का चिरयक्षत्व मुझे भी अच्छा नहीं लगता।

◆ मैं चाहता हूँ कि वह पीढ़ी अब खिजाब आरसी का परित्याग करके संन्यास ले ले।

◆  शासन और व्यवस्था के पुतली घरों की मशीन कन्याएँ उनकी बूढी उँगलियों के सूत्र संचालन से ऊब गई हैं और उनकी गति में रह रह कर छंद-पतन हो रहा है।

◆ यह बिल्कुल न्याय संगत प्रस्ताव है कि पूर्व पीढ़ी अपनी मनुस्मृति और कौपीन बगल में दबाकर पुतलीघर से बाहर हो जाय और नई पीढ़ी को, अर्थात हमें और हमारे बालखिल्यों को अपने भविष्य के यश-अपयश का पट स्वयं बुनने का अवसर दे जिससे वे भी अपने कल्पित नक्शे, अपने अर्जित हुनर को इस कीर्तिपट पर काढ़ने का अवसर पा सकें।

◆ यह सब सही है। परंतु क्या इन सब बातों की संपूर्ण सिद्धि के लिए इस पुतलीघर का ही अग्निदाह, पुरानी पीढ़ी द्वारा बुने कीर्तिपट के विस्तार का दाह, उनके श्रम फल का तिरस्कार आदि आवश्यक हैं?

◆ इस स्थल पर डॉ. राधाकृष्णन या आचार्य विनोबा भावे की राय को उद्धृत करूँ तो वह क्रांति के इन दुग्ध कुमारों के लिए कौड़ी की तीन ही होगी।

◆ मैं लेनिन जैसे महान क्रांतिकारी की राय उद्धृत कर रहा हूँ! 1922 ई. मैं लेनिन ने लिखा था :-

● उस सारी सभ्यता-संस्कृति को जो पूँजीवाद निर्मित कर गया है, हमें स्वीकार करना  होगा और उसके द्वारा ही समाजवाद गढ़ना होगा।
● पूर्व पीढ़ी के सारे ज्ञान, सारे विज्ञान, सारी यांत्रिकी को स्वीकृत कर लेना होगा। उसकी सारी कला को स्वीकार कर लेना होगा।
● हम सर्वहारा संस्कृति के निर्माण की समस्या तब तक हल नहीं कर सकते जब तक यह बात साफ-साफ न समझ लें कि मनुष्य जाति के सारे विकास और संपूर्ण सांस्कृतिक ज्ञान को आहरण किए बिना यह संभव नहीं, और उसे समझ कर सर्वहारा संस्कृति की पुनर्रचना करने में हम सफल हो सकेंगे।
● सर्वहारा संस्कृति अज्ञात शून्य से उपजनेवाली चीज नहीं और न यह उन लोगों के द्वारा गढ़ी ही जा सकती है जो सर्वहारा संस्कृति के विशेषज्ञ विद्वान कहे जाते हैं ये सब बातें मूर्खतापूर्ण है। इनका कोई अर्थ नहीं होता ।
● सर्वहारा संस्कृति उसी ज्ञान का स्वाभाविक सहज विकास होगी जिसे पूँजीवादी, सामंतवादी और अमलातांत्रिक व्यवस्थाओं के जुए के नीचे हमारी संपूर्ण जाति ने विकसित किया है।

◆  लेनिन द्वारा कही बाते स्वामी दयाननंद या पं. महावीरप्रसाद द्विवेदी की होती तो बड़ी आसानी से कह सकते मारो गोली ! सब बूज्र्व बकवास है।

◆ क्रांतिकारियों का पितामह लेनिन, जिसे एक कट्टर बंगाली मार्क्सवादी नीरेंद्रनाथ राय ने अपनी पुस्तक ‘शेक्सपियर- हिज ऑडिएंस के पृष्ठ (49-50) पर उद्धृत किया है।

◆ आज प्रायः लोग पुकारकर कहते हैं ‘देखो, देखो जोखिम उठा रहा हूँ, मूल्य भंजन कर रहा हूँ। अरे बंधु, जोखिम उठा रहे हो या नाम कमा रहे हो? यह तो आज अपने को प्रतिष्ठित बनाने और जाग्रत सिद्ध करने का सबसे सटीक तरीका शॉर्टकट’ यानी तिरछा रास्ता है। जोखिम तुम नहीं उठा रहे हो तुम तो धार के साथ बह रहे हो और यह बड़ी आसान बात है आज जोखिम वह उठा रहा है जो नदी की वर्तमान धारा के प्रतिकूल, धार के हुकुम को स्वीकारते हुए कह रहा है: ‘मूल्य भी क्या तोड़ने की चीज है जो तोड़ोगे? वह बदला जा सकता है तोड़ा नहीं जा सकता। मूल्य स्थिर या सनातन नहीं होता, यह भी मान लेता हूँ। परंतु एक अविच्छिन्न मूल्य प्रवाह, एक सनातन मूल्य परंपरा का अस्तित्व तो मानना ही होगा।’

◆ नए बालखिल्य दार्शनिक कहेंगे- ‘यह धार के विपरीत जाना हुआ। यह तो प्रतिक्रियावाद है। ऐसी अवस्था में मेरा उन्हें उत्तर है : ‘कभी-कभी नदी की धार पथभ्रष्ट भी हो जाती है। वह सदैव प्रगति की दिशा में ही नहीं बहती। वह स्वभाव से अधोगति की ओर जानेवाली होती है। और आज? आज तो वन्याकाल है। वन्याकाल में धार पथभ्रष्ट रहती है। वह कर्मनाशा – कीर्तिनाशा – कालमुखी बनकर हमारे गाँव को रसातल में पहुँचाने आ रही है। अतः इस क्षण हमारी प्यारी नदी ही शत्रुरूपा हो गई है। और यदि गाँव को बचाना है तो हम धार के प्रतिकूल समर करेंगे। यदि हम अपना घर-द्वार फूँककर तमाशा देखकर मौज लेनेवाले आत्मभोगी ‘नीरो’ की संतानें नहीं है तो हमें इस नदी से समर करना ही होगा। यही हमारी जिजीविषा की माँग है। और इसके प्रतिकूल जो कुछ कहा जा रहा है, वह ‘नई पीढ़ी की बात हो या पुरानी की, मुमुक्षा का मुक्ति भोग है। यह सब विद्रोह नहीं बुव डेथविश का नया रूप है।’

◆ अतः मैं धार के साथ न बहकर अकेले  अपने अंदर की अमृता कला का आविष्कार करने को कृत संकल्प हूँ।

◆  बिना रोध के बिना तट के जो धार है वह कालमुखी वन्या है, रोधवती और तटिनी नहीं या यह तो मैं मानता ही हूँ कि सर्जक या रचनाकार के लिए नॉनकनफर्मिस्ट होना जरूरी है। इसके बिना उसकी सिसृक्षा प्राणवती नहीं हो पाती और नई लीक नहीं खोज पाती। अतः मुझे भी विद्रोही दर्शनों से अपने को किसी न किसी रूप में आजीवन संयुक्त रखना ही है।

◆ एक लेखक होने के नाते यही मेरी नियति है, और इस तथ्य को अस्वीकृत करने का अर्थ है अपनी सिसृक्षा की सारी संभावनाओं का अवरोध परंतु लेखक, कवि या किसी भी साहित्येतर क्षेत्र के सर्जक या विधाता को यह बात भी गाँठ में बाँध लेनी चाहिए कि शत-प्रतिशत अस्वीकार या नॉनकनफर्मिज्म’ से भी रचना या सृजन असंभव हो जाता है।

◆ पुराने के अस्वीकार से ही नए का आविष्कार संभव है। यह कुछ हद तक ठीक है। परंतु नए भावों या विचारों के उद्गम’ के बाद ‘उपकरण या अभिव्यक्ति के साधन का प्रश्न उठता है और इसके लिए ‘नॉनकनफर्मिज्म’ को त्यागकर पचहत्तर प्रतिशत पुराने उपकरणों में से ही निर्वाचित संशोधित करके कुछ को स्वीकार कर लेना होता है।

◆ रचना की ‘आइडिया’ के आविष्कार के लिए तो अवश्य विद्रोही मन’ चाहिए। परंतु रचना का कार्य (प्रॉसेस) सर्जक या रचनाकार के लिए नॉनकनफर्मिस्ट होना जरूरी है। इसके बिना उसकी सिसृक्षा प्राणवती नहीं हो पाती और नई लीक नहीं खोज पाती। अतः मुझे भी विद्रोही दर्शनों से अपने को किसी न किसी रूप में आजीवन संयुक्त रखना ही है।

◆  रचना का कार्य (प्रॉसेस) आइडिया के आविष्कार के साथ ही समाप्त नहीं हो जाता । रचना-प्रक्रिया में स्वीकारवादी मन की भी उतनी ही आवश्यकता है। अन्यथा ‘आइडिया’ या ज्ञान का ‘क्रिया’ में रूपांतर संभव नहीं। अतः प्रत्येक सर्जक या विधाता, जीवन के चाहे जिस क्षेत्र की बात हो, ‘विद्रोही’ और ‘स्वीकारवादी दोनों साथ ही साथ होता है।

◆ शत-प्रतिशत अस्वीकार के फैशनेबुल दर्शन के प्रति मेरा आक्षेप यह भी है कि यह एक स्वयं आरोपित ‘नो एक्जिट’ (द्वारा या वातायन रहित अवरुद्ध कक्ष) है, इसको लेकर बहुत आगे तक नहीं जाया जा सकता है।

◆  यह दर्शन विषय और विधा दोनों की नकारात्मक सीमा बाँधकर बैठा है और इसके द्वारा अपने ‘स्व’ को भी पूरा-पूरा नहीं पहचाना जा सकता है, तो स्व’ से बाहर, इतिहास और समाज को समझने की तो बात ही नहीं उठती।

◆ यह शत-प्रतिशत अस्वीकार का दर्शन कभी अस्तित्ववाद का चेहरा लेकर आता है तो कभी नव्य मार्क्सवाद का (क्लासिकल मार्क्सवाद से भिन्न); और ये दोनों मानसिक बौद्धिक स्तर पर मौसेरे भाई हैं। ये एक ही ह्रासोन्मुखी संस्कृति की संतानें हैं।
* मानसिक बौद्धिक स्तर पर मौसेरे भाई :- अस्तित्ववाद और नव्य मार्क्सवाद
* ह्रासोन्मुखी संस्कृति की संतानें :- अस्तित्ववाद और नव्य मार्क्सवाद

◆ योगशास्त्र में मन की पाँच अवस्थाएँ कही गई हैं: क्षिस, विक्षित, विमूढ, निरुद्ध और आरूढ़ ये दोनों दर्शन विमूढ स्थिति के दो भिन्न संस्करण हैं, अतः दोनों त्याज्य हैं।

◆ यह बाढ़ वन्या का काल है। नदी अपनी दिशा भूलकर, कूल छोड़कर उन्मुक्त हो गई है, अतः बुद्धजीवी वर्ग से धीरता और संयम अपेक्षित है। घबराकर वन्या की पथभ्रष्ट धार के प्रति आत्मसमर्पण करने की अपेक्षा जल के उत्तरण, वन्या के ‘उतार’ की प्रतीक्षा करना अधिक उचित है। पानी हटने पर नदी फिर कूलों के बीच लौट जाएगी। नदी अपनी शय्या यदि बदल भी दे, तो भी नई शय्या के साथ कोई कूल, कोई अवरोध तो उसे स्वीकार करना ही होगा। यह नया कूल भी उसी पुराने कूल के ही समानान्तर होगा। नदी तब भी समुद्रमुखी ही रहेगी। उलटकर हिमाचलमुखी कभी नहीं हो सकती। अतः इस वन्या नाट्य के विष्कंभक के बीच का समय मैं न तो बहुत महत्वपूर्ण मानता हूँ और न बहुत चिंताजनक।

◆   मेरा विश्वास है कि कल नहीं तो परसों हम अर्थात पुरानी पीढ़ी का युवा और मेरे बालखिल्य छात्र-छात्राएँ अर्थात नई युवा पीढ़ी, दोनों मिलकर इस शासन एवं व्यवस्था के पुतलीघर की नृत्य कन्याओं के कत्थक नृत्य को साथ-साथ संचालित करेंगे। यह पुतलीघर ऐसा है कि इसमें अनुशासित संयमित तालबद्ध कत्थक ही चल सकता है। अन्यथा जरा भी छंद पतन होने पर कोई न कोई भयावह पुतली एक ही झपट्टे में हड्डी आँत तक का भक्षण कर डालेगी क्योंकि इन पुतलियों में से कोई-कोई विषकन्याएँ भी हैं।
* बालखिल्य का अर्थ :- पुराणानुसार ब्रह्मा के रोएं से उत्पन्न ऋषियों का एक वर्ग जिसका प्रत्येक ऋषि डीलडौल में अंगूठे के बराबर कहा गया।

◆ अतः मैं चेष्टा करूँगा कि अपने अंदर की अमृता कला का आविष्कार करके इस उत्तराफाल्गुनी काल को बीस बाइस वर्ष के लिए अपने अंतर में स्थिर अचल कर दूँ, बाहर-बाहर चाहे शरद बहे या निदाघ हू-हू करे। तब मैं अपने बालखिल्य सहचरों के साथ व्यवस्था की इन पुतलियों का छंदोबद्ध नृत्य भोग सकूँगा।

◆ एक दिन वह भी आएगा जब कोई चिल्लाकर मेरे कानों में कहेगा ‘फाइव ओ क्लाक! पाँच बज गए!’ कोई मेरे शीश पर घंटा बजा जाएगा, कोई मेरे हृदय में बोल जायगा : बहुत हुआ । बहुत भोगा अब नहीं । अब, अहं अमृतं इच्छामि। अहं वानप्रस्थ चरिष्यामि। और तब मैं व्यवस्था के पुतलीघर की इन यंत्रकन्याओं से माफी माँगकर उत्तर पुरुष की जय जयकार बोलते हुए मंच से बाहर आ जाऊँगा और अपने को विसर्जित कर दूँगा लोकारण्य में खो जाऊँगा अपरिचित, वृक्षोपम अवसर प्राप्त, रिटायर्ड जथाओं के महाकांडार में अभी नहीं। अभी तो मैं विश्लेषण के पाँव की काट जवान है।

◆ अब, अहं अमृतं इच्छामि। अहं वानप्रस्थ चरिष्यामि ।’ और तब मैं व्यवस्था के पुतलीघर की इन यंत्रकन्याओं से माफी माँगकर उत्तर-पुरुष की जय जयकार बोलते हुए मंच से जाऊँगा और अपने को विसर्जित कर दूँगा लोकारण्य में, खो जाऊँगा अपरिचित, वृक्षोपम, अवसर प्राप्त, रिटायर्ड स्थाणुओं के महाकांतार में। पर अभी नहीं । अभी तो मैं विश्वेश्वर के साँड़ की तरह जवान हूँ ।

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