काव्य हेतु(kavy hetu)

◆ हेतु का शाब्दिक अर्थ :- कारण

◆ काव्य हेतु का अर्थ :- जिनके के कारण काव्य का सृजन होता है।

◆ काव्य हेतु की परिभाषा :- काव्य रचना का सामर्थ्य
उत्पन्न कर देने वाले कारण ही काव्य हेतु कहलाते है।

◆ काव्य हेतु के भेद :- 3
1. प्रतिभा
2. व्युत्पत्ति
3. अभ्यास

■ प्रतिभा,व्युत्पत्ति और अभ्यास मानने वाले आचार्य :-
1. वाग्भट्ट
2. हेमचंद्र
3. जगन्नाथ
4. आ.महावीर प्रसाद द्विवेदी
5. आचार्य रामचंद्र शुक्ल
6. सुमित्रानंदन पंत
7. डॉ नगेंद्र

◆ शॉर्ट ट्रिक्स :-
• वाग्भट्ट हेमचंद्र की प्रतिभा जगन्नाथ जैसी है।
• महावीर राम ने पंत और नगेंद्र की प्रतिभा को देखी।

■ शक्ति(प्रतिभा), व्युत्पत्ति और अभ्यास मानने वाले आचार्य :-

1. रुद्रट
2. मम्मट
3. सुरति मिश्र
4. कुलपति मिश्र

◆ शॉर्ट ट्रिक्सः- कुलपति मम्मट ने सुरति का रुद्र शक्ति रूप देखा।

■ प्रतिभा,श्रुत(व्युत्पत्ति) और अभ्यास मानने वाले कवि :- जयदेव

■ शक्ति(प्रतिभा), निपुणता(व्युत्पत्ति) और अभ्यास मानने वाले कवि :- जगन्नाथ प्रसाद भानु

■ शक्ति(प्रतिभा), अभ्यास और समाधि मानने वाले आचार्य :- राजशेखर

■ पूर्व संस्कार (प्रतिभा), सद्ग्रंथों का अध्ययन और अभ्यास मानने वाले कवि :- बिहारी भट्ट

■ शक्ति (प्रतिभा),अध्ययन और लोकानुभव मानने वाले कवि :- भिखारी दास

■ प्रतिभा,शास्त्र ज्ञान (व्युत्पत्ति) और अभ्यास मानने वाले आचार्य :- दंडी

■ लोक, विधा और प्रकीर्ण मानने वाले आचार्य :- वामन

● काव्य हेतु की संख्या एक मानने वाले आचार्य :-

©भामह 【केवल “प्रतिभा” को काव्य का हेतु माना】

● काव्य हेतु की संख्या दो मानने वाली कवित्रयी :-

© महादेवी वर्मा 【प्रतिभा और व्युत्पत्ति】

● काव्य हेतु की संख्या तीन मानने वाले आचार्य :-

★ भारतीय काव्यशास्त्र आचार्य :-

© दंडी 【प्रतिभा,शास्त्र ज्ञान (व्युत्पत्ति) और अभ्यास】

© रूद्रट【शक्ति(प्रतिभा), व्युत्पत्ति और अभ्यास 】

© वामन【लोक, विधा और प्रकीर्ण】

© राजशेखर【शक्ति(प्रतिभा), अभ्यास और समाधि 】

© मम्मट 【शक्ति(प्रतिभा), व्युत्पत्ति और अभ्यास 】

©जयदेव【प्रतिभा,श्रुत(व्युत्पत्ति) और अभ्यास】

© वाग्भट【शक्ति(प्रतिभा), व्युत्पत्ति और अभ्यास】

© हेमचंद्र 【शक्ति(प्रतिभा), व्युत्पत्ति और अभ्यास】

©जगन्नाथ【शक्ति(प्रतिभा), व्युत्पत्ति और अभ्यास】

★रीतिकाल के कवि:-

© सुरतिमिश्र【शक्ति(प्रतिभा), व्युत्पत्ति और अभ्यास】

© जगन्नाथ प्रसाद भानु【शक्ति(प्रतिभा), निपुणता
(व्युत्पत्ति) और अभ्यास】

© बिहारी भट्ट【पूर्व संस्कार (प्रतिभा), सद्ग्रंथों का अध्ययन और अभ्यास 】

©कुलपति मिश्र【शक्ति(प्रतिभा), व्युत्पत्ति और अभ्यास 】

©भिखारी दास【शक्ति (प्रतिभा),अध्ययन और लोकानुभव】

★आधुनिक काल के कवि:-

©आ.रामचंद्र शुक्ल【शक्ति(प्रतिभा), व्युत्पत्ति और अभ्यास】

© डॉ.नगेंद्र【शक्ति(प्रतिभा), व्युत्पत्ति और अभ्यास】

© आ. महावीर प्रसाद द्विवेदी【शक्ति(प्रतिभा), व्युत्पत्ति और अभ्यास】

© सुमित्रानंदन पंत【शक्ति(प्रतिभा), व्युत्पत्ति और अभ्यास】

● काव्य हेतु की संख्या छः मानने वाले कवि :-

© श्रीपति 【शक्ति, निपुणता,लोकमत,विपत्ति, अभ्यास और प्रतिभा】

◆ प्रतिभा :-

• प्रतिभा का अर्थ :- प्रकाश

• दिनकर प्रतिभा को अनिर्वचनीय शक्ति मानते हैं।

• नगेन्द्र ने प्रतिभा शब्द का प्रयोग चेतना के लिए किया है।

• प्रतिभा को लोजाइनस प्रकृति नाम दिया।

• प्रमुख कार्य :– बिम्ब विधान करना

• प्रतिभा को अंत: रण की उद्भाषित क्रिया कहा है। (आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने कहा)

• प्रतिभा को शक्ति कहने वाले विद्वान :- राजशेखर, रूद्रट,मम्मट,सुरति मिश्र कुलपति मिश्र,भिखारीदास जगन्नाथप्रसाद भानु।

• प्रतिभा को पूर्ण संस्कार कहा :- बिहारी भट्ट ने

• प्रतिभा को वामन ने जन्मांतर से प्राप्त संस्कार कहा है।

• राजशेखर ने प्रतिभा के दो भेद किये है :-

1. कारयित्री
• यह जन्मजात होती है।
• इसके तीन भेद :-
© सहज :- पूर्वजन्म के संस्कार से प्राप्त
© आहार्या :- जन्म के संस्कारों से प्राप्त
© औपदेशिकी :- तंत्र – मंत्र के साधना से प्राप्त उत्पन्न

2. भावयित्री :- पाठक का उपकार करने वाली

• रूद्रट के अनुसार प्रतिभा के दो भेद :-

1. सहजा :- यह स्वाभाविक रूप से द्वारा उत्पन्न

2. उत्पाद्या :- यह अर्जित होती है।

◆ उत्पत्ति :-

• उत्पत्ति का अर्थ :- प्रगाढ़, पांडित्य, बहुज्ञता अथवा ज्ञान

• उचित – अनुचित का विवेक व्युत्पत्ति है (राजशेखर के अनुसार)

• उत्पत्ति को प्रतिभा का संस्कार माना है।

• उत्पत्ति, प्रतिभा से श्रेष्ठ है।( राजशेखर ने माना)

• उत्पत्ति के लिए दण्डी ने “निर्मल प्रतिभा”शब्द का प्रयोग किया।

• उत्पत्ति के लिए मम्मट ने “निपुणता”शब्द का प्रयोग किया।

• उत्पत्ति के लिए राजशेखर ने “बहुज्ञता” शब्द का प्रयोग किया।

◆ अभ्यास :-

• अभ्यास का अर्थ :- निरंतर प्रयास करना

• अभ्यासको दण्डी ने सर्वाधिक अधिक महत्व दिया।

• अभ्यास लिए के “एकनिष्ठ श्रम की बात” दंडी ने कई है।

• अभ्यास के लिए “यत्न” शब्द का प्रयोग भामह ने किया।

◆ समाधि :-

• मन की एकाग्रता समाधि हैा (राजशेखर के अनुसार)

• काव्यकर्म में कवि की समाधि सर्वोत्कृष्ट साधन है। (श्याम देव)

• समाधि को आभ्यांतर प्रयत्न कहा है और इसे शक्ति का एक कारण माना है।(राजशेखर ने)

• समाधि अवधान या एकाग्रता कहा है।(वामन ने)

• इसको काव्य का चतुर्थ हेतु मानने की ओर संकेत सर्वप्रथम आचार्य वामन ने किया।

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