कृष्ण काव्य की प्रवृत्तियां(Krishna kavy ki pravartiya)

कृष्ण काव्य की प्रवृत्तियां(Krishna kavy ki pravartiya)

1. निर्गुण ब्रह्म के स्थान पर सगुण ब्रह्म की आराधना पर बल ।

2. भक्ति के बहुआयामी स्वरूप का अंकन – संख्य एवं कांता भाव की प्रधानता,वात्सल्य भक्ति के साथ नवधा भक्ति को महत्व।

3. लीला गान में अत्यधिक रूचि।

4. गुरु महिमा और नाम स्मरण की महत्ता का बखान।

5. समकालीन सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन की अभिव्यक्ति – चरावाही संस्कृति का प्रतिपादन।

6. बाल जीवन का मनोवैज्ञानिक अंकन-घुटरुन, चलना, मक्खन खाना ,सोना आदि क्रियाओं का चित्रण।

7. प्रकृति का मनोहर चित्रण – उद्दीपन रूप तथा आलंबन रूप का चित्रण।

8. रीति – तत्वों का समावेश :- नायिका भेद,हाव-भाव और हेला रीति का समागम।

9. वात्सल्य और श्रृंगार की प्रमुखता।

10. विरहानुभूति की मार्मिक अभिव्यंजना – विरह की विभिन्न अन्तर्दशाओं का चित्रण।

11. प्रेम के लौकिक और अलौकिक स्वरूप का चित्रण।

12. कृष्ण का ब्रह्म रूप में चित्रण।

13. नारी मुक्ति।

14. लोक संग्रह।

15. आश्रय तत्व का विरोधः

16. काव्य रूप – मुक्तक काव्य की प्रधानता।

17. प्रमुख काव्य भाषा – ब्रजभाषा

18. गेय पद परंपरा।

19. लयात्मक सौंदर्य ।

20. सूरदास के काव्य को पशु चारण काव्य की संज्ञा दी गई है। पशुचारण काव्य में आदिम मनोभाव की अभिव्यक्ति होती है।

21. कृष्ण भक्त कवियों के प्रभाव से ब्रज भाषा का विकास अखिल भारतीय स्तर पर हुआ है।

 

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