गदल कहानी का सारांश (रांगेय राघव)【gadal kahaanee ka saaraansh (raangey raaghav)】

         
                                   💐 गदल कहानी 💐
                                      【रांगेय राघव】

◆ कहानीकार के रूप में रांगेय राघव की सर्वाधिक पहचान गदल से ही बनी।

◆ राजस्थान के एक गांव की एक जाति विशेष की स्त्री गदल इस कहानी की नायिका है।

◆ आचलिक परिवेश के संस्पर्श के साथ गूजर जाति के सांस्कृतिक परिवेश का इसमें जितना यथार्थ चित्रण है, उतना ही मानवीय खूबियों और कमजोरियों का कलात्मक भी है।

◆ ‘गदल’  कहानी प्रकाशन :- 1955 में 

◆ नारी की अस्मिता, संघर्ष, प्रेम और साहस की प्रस्तुति की दृष्टि से यह कहानी अद्वितीय है।

◆  ‘गदल” कभी पराजित नहीं होती, अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं करती और नहीं सामाजिक नियमों और रूढ़ियों की परवाह करती है। यहां तक कि दरोगा से भी वह तनिक भी डरती नहीं है।

◆  मधुरेश के अनुसार “गदल का ग्रामीण परिवेश निश्चय ही प्रेमचन्द की कहानियों के परिवेश से बहुत भिन्न है। इसके बहुत से समाजशास्त्रीय कारण तो है ही, भौगोलिक दृष्टि से राजस्थान के आस-पास का क्षेत्र और गूजरों के समाज की रीति-नीति के कारण भी कहानी में एक विशिष्ट आंचलिक परिवेश अपनी पूरी चटक और गंध के साथ उभरा है गदल के चरित्र की कुछ साधारण सी नाटकीय अतिरंजना के बावजूद यह परिवेश ही वस्तुतः कहानी को इस हद तक जीवन्त बना सका है।”

◆ यह कहानी प्रेमचन्द की कहानियों के परिवेश से ही भिन्न नहीं है, बल्कि अन्तर्वस्तु के स्तर पर भी भिन्न हैं। यहां जिसे अतिरंजना कहा गया है, वह कहानी में निहित चरित्र का नयापन है। जिन परिस्थितियों में गदल’ ने अपने होने का एहसास कराया है, वह उसके जन अधिकारों के प्रति प्रतिबद्धता का सूचक है समाज को बांधने वाला तत्व क्या है? यह भी इसका एक कोण है।

◆  रांगेय राघव अपनी कहानी ‘गदल में इन दारुण स्थितियों के विरोध में एक स्त्री के विद्रोह की कथा कहते हैं।

◆  गदल का यह विद्रोह न अराजक है और न उद्दण्ड है, बल्कि वह जनवादी है, क्योंकि उसमें एक मानवीय बहाव है और जीवन अपने ढंग से संचालित करने का निर्णय है। सामाजिक रूढ़ियों पर प्रहार का साहस जितना गदल दिखाती है, उतना किसी अन्य कहानीकार की कहानी की नारी पात्र नहीं दिखा पाती।

◆ डॉ० कमलाकर गंगावणे ने लिखा है कि “गदल’ कहानी सत्य घटना पर आधारित है। इस सम्बन्ध में डॉ० रांगेय राघव के स्नेही श्री श्रवण कुमार ने जानकारी दी कि वैर के पंचकोसी में कुछ वर्ष पूर्व इस प्रकार की घटना हुई थी। लेकिन इसके तुरन्त बाद वे कहते हैं कि “गदल कहानी का सृजन आकस्मिक नहीं हुआ है। ‘गदल’ लेखक का चिह्नान है, जो मनुष्य की खोज करता है, उस मनुष्य के चरित्र को समाज व्यवस्था में से ऊपर उठाने का प्रयत्न करता है।

◆  स्वयं लेखक का कथन है. ‘गदल मेरी एक पुरानी विचार-दृष्टि से निकली धारा का एक और बिन्दु हैं ‘गदल’ की सृजन प्रेरणा यही है।”

◆ गदल सत्य कथा नहीं है। इसमें लेखक की कल्पनाशीलता और जनवादी विचारधारा का सम्मिश्रण है। व्यवस्था का जो विरोध पुरुष वर्ग नहीं कर पाता. एक नारी करती है और वह भी उसके लिए, जिसने जीते जी उसका होने से इन्कार कर दिया। यदि यह कल्पना भी है तो इसका स्तर बहुत ऊंचा है।

💐 गदल कहानी के मुख्य पात्र :-

◆ गदल (मुख्य व महिला पात्र) 【उम्र :- 45 वर्ष 】
◆ गुन्ना (गांव – गदल का द्वियंगत पति)【उम्र :- 55 वर्ष 】
◆ डोडी(गदल का देवर व गदल के प्रति प्रेम भाव रखने वाला तथा समाज में मान की उपेक्षा रखने वाला)【उम्र :- 50 वर्ष 】
◆  मौनी (गांव :- गोली,गदल का दूसरा पति)【उम्र :- 32 वर्ष 】
◆ निहाल(गदल का बड़ा बेटा)【उम्र :- 30 वर्ष 】
◆ नारायण (गदल का छोटा बेटा)【उम्र :- 22 वर्ष 】
◆ घोटया मैना का चंदा गिर्राज ग्वारिया
◆ चिरंजी पुजारी (गढवाले हनुमानजी के मंदिर का)
◆ चिम्मन कढेरा (इसने निहाल को कहा – डोडी दिन भर मनमौजी बाबा की धूनी के पास रहा।)

◆ घोटया मैना का चंदा गिर्राज ग्वारिया।

💐 गदल कहानी के पात्रों का परिचय :-

डोडी का परिचय :-
★ उम्र :- 50 वर्ष 【 गदल के विवाह के समय डोडी की उम्र 19  वर्ष थी】
★ खारी गूजर
★ गुन्ना का सगा भाई
★ बहू थी, बच्चे भी हुए। सब मर गए।
★अपनी जगह अकेला रह गया।
★ लंबा खारी गूजर
★ खिचड़ी मूँछें
★ मोटी फतुही और धोती पहनती था।
* फतुही :- एक प्रकार की कमर तक की बिना बाहों की कुरती जिसमें सामने की ओर बटन या हुक लगाए जाते हैं, बंडी ।
★ उसकी धोती घुटनों के नीचे उतरने के पहले ही झूल देकर चुस्त-सी ऊपर की ओर लौट जाती थी।
★  उसका हाथ कर्रा (सख्त)था।

गदल का परिचय :-
★ उम्र :- 45 वर्ष (विधवा के समय )
★रंग – गोरा ( लेकिन आयु के धुँधलके में अब मैला-सा दिखने लगा )

★ फुर्तीली
★ जीवन भर कठोर मेहनत करने वाली
★ विवाह के समय 14 साल की
★ पति का नाम :- गुन्ना  【विवाह के समय 24 साल का】
★ जब गदल विधवा हुई तब बड़ा बेटा निहाल तीस वर्ष के पास पहुँच रहा था।
★ गदल के दो पुत्र और दो पुत्रियां थी।
★ बड़ा पुत्र का नाम :-  निहाल (30 साल का)
        √ निहाल के दो पुत्र (बड़े की उम्र 7 साल एवं छोटे की उम्र 4 साल)            
       √ निहाल के एक पुत्री (गोद में रहने वाली थी)
• गदल की बडी बहु को ‘दुल्ल’ कहती थी।

★ छोटे पुत्र का नाम :- नरायन(22 साल का)
         • इसकी पत्नी मां बननेवाली थी।
  
★ दो पुत्रियों के नाम :- चंपा (विवाह – झाज गांव में)
                               चमेली (विवाह – विश्वारा गांव में)
• इन दोनों पुत्रियों के भी संतान हो चुकी थी।

★ नया पति :- मौनी लौहरे गूजर  (32 साल का , गांव  –  गोली)
• गदल मौनी की भाभी को ‘दुल्लो’ कहती थी।

◆  गुन्ना का परिचय :–
★ उम्र :- 55 वर्ष (मरते समय)
★  पत्नी :- गदल (विवाह के समय 14 साल की)

💐 गदल कहानी का सारांश :-

◆ गदल का परिचय :-
●  गूजर जाति की लड़की
●  गुन्ना के साथ शादी 【14 वर्ष की उम्र में】
●  परिवार खाता-पीता था
●  गुन्ना मरा गया 【55वर्ष की उम्र में】
●  गदल विधवा हो गयी【45 वर्ष की उम्र में】
● गुन्ना की मृत्यु के समय गदल का बड़ा बेटा निहाल 30 वर्ष का था।
● गदल के दो बेटे थे:-
★ बड़ा बेटे का नाम :-  निहाल
★ छोटा बेटे का नाम:-   नरायन
●  गदल के देवर का नाम :- डोड़ी 【 उसकी शादी भी हुई थी और बच्चे भी थे लेकिन अब कोई जीवित न रहा】
●  निहाल अपने चाचा को बहुत मानता था और डोड़ी भी उसे बहुत चाहता था।
●  पति की मृत्यु के बाद ‘गदल देवर से व्याह रचाना चाहती थी, लेकिन डोड़ी को यह मंजूर न था ।
● चोट खाई ‘गदल’ मौनी लौहरा के घर जा बैठी लौहरा की पत्नी तो मर गयी थी किन्तु परिवार भरा-पूरा था।
● इस तरह ‘गदल’ ने अपने मन से जवान बेटे-बहुओं को छोड़कर नया घर बसा लिया।

◆  बलराज पाण्डेय के अनुसार ‘गदल एक ऐसी स्त्री है जो विधवा होने के बाद जाति-बिरादरी की परवाह न कर पति के रूप में दूसरे पुरुष को चुनने का निर्णय लेती है। वह अपनी जिन्दगी अपनी शर्तों पर जीती है। वह जैसे पुरुष वर्चस्व को चुनौती देने वाली अकेली स्त्री है, जिससे उसका पति पुत्र, देवर और अन्ततः पुलिस भी परास्त हो जाती है। प्रेम स्वाभिमान और स्वतन्त्र निर्णय लेने के साथ गदल एक नयी परम्परा की ओर संकेत करती है। इसलिए उसका चरित्र जनवाद की परिधि में आता है। यह चरित्र हिन्दी कथा साहित्य में अकेला और विलक्षण है हो सकता है कि शास्त्रीय दृष्टि यह जनवादी चरित्र न हो, पर अपनी संघर्ष क्षमता और मानवीय उदात्तता का पक्ष इसमें बेजोड़ है।
●  कहानी में मोड़ उस क्षण आता है, जब मौनी की भाभी दुल्लों ने गदल के बारे में उलटा – पुलटा कहा
★ अब चुप क्यों हो गया देवर?
★बोलता क्यों नहीं?
★मेरी देवरानी लाया है कि सास!
★तेरी बोलती क्यों नहीं कढ़ती?
★ऐसी न समझियों तू मुझे रोटी तवा पर पलटते मुझे भी आंच लगती, जो मैं इसकी खरी खोटी सुन लूंगी, समझा? मेरी अम्मा ने भी मुझे चूल्हे की मट्टी खाकर ही जना था। हां!”
★”अरी तो सौता गदल ने पुकारा, मट्टी न खा के आई, सारे कुनबे को चबा जायेगी डायन!
★ ऐसी नहीं तेरी गुड़ की भेली है, जो न खायेंगे हम तो रोटी गले में फंदा मार जायेगी।

◆ इसी के बाद उसका छोटा बेटा नरायन ‘गदल’ के पास पिता के गहने लेने आता है और गदल कड़े तथा हंसुली उतार कर फेंक देती है।

◆ गदल का साहस और स्त्रीत्व उस समय भी दिखाई देता है।

◆ जब वह डोड़ी की मृत्यु के बाद अपने घर पहुंचती है, जहां उसके बेटे और जेठ से उसकी बहस होती है।

◆ गदल को इस बात पर भी आपत्ति थी कि मुन्ना के मौत के बाद जो कारज(मृत्युभोज)हुआ, उसमें केवल 25 आदमी खिलाये गये थे अपने बेटों को वह कायर करार देती है जहां बिरादरी कारज में न्योता दे काका के गदल ने कहा निहाल सकपका गया। बोला, पुलिस गदल ने सीना ठोक कर कहा, ‘बस?’ लुगाई बकती हैं।

◆ पटेल ने कहा ‘गोली चलेगी तो?”

◆ गदल ने कहा, धरमधुरन्धरों ने तो डूबो ही दी सारी गुजरात डुब गयी, माधो अब किसी का आसरा नहीं कायर ही कायर बसे हैं।

◆ फिर अचानक कहा मैं करू परबन्ध? तू?

◆  निहाल ने कहा? ‘हां मैं! और उसकी आंखों में पानी भर आया।

◆ गदल ने कहा, ‘वह मरते बखत(वक्त) मेरा नाम लेता गया है न तो उसका पर बन्ध में ही करूंगी।”

◆  उधर मौनी परेशान इधर डोडी का काम हो रहा था।

◆ कानून के अनुसार 25 आदमी से ज्यादा भीड़ नहीं होनी चाहिए। परन्तु गदल तो गदल थी उसने दीवान से तमक कर कहा कि हम धरम नहीं छोड़ेंगे जब बेटे डरने लगे, तब गदल ने उनको ललकारा और अपनी कोख का वास्ता दिया।

◆ पुलिस हथियार बन्द होकर आयी।

◆  दरोगा ने कहा कि 25 आदमी से ऊपर है। कानून और बिरादरी में जंग छिड़ा। अन्धकार में गोलियां चलने लगीं।

◆ गदल ने सबको खाकर उठने की सौगन्ध दी गदल ने एक बन्दूक वाले से भरी बन्दूक छीन ली और सबको निकल जाने का आदेश दिया।

◆ गदल ने अपने पेट में गोली मार ली थी गूजर जाति की बेटे-बहुओं वाली विधवा ने अपने प्रेम के खातिर जान की बलि दे दी।

◆ कहानी का अन्त इस तरह होता है युद्ध समाप्त हो गया था।गदल रक्त से भीगी हुई पड़ी थी। पुलिस के जवान इकट्ठे हो गये दरोगा ने पूछा, ‘यहां तो कोई नहीं?”  ‘हुजूर!”

◆  एक सिपाही ने कहा, ‘यह औरत है। दरोगा आगे बढ़ आया उसने देखा और पूछा, तू कौन है?”

◆ गदल मुस्कराई और धीरे से कहा कारज हो गया दरोगा जी आत्मा को शान्ति मिल गयी।

◆ दरोगा ने झल्लाकर कहा, पर तू है कौन?’

◆  गदल ने और भी क्षीण स्वर से कहा, जो एक दिन अकेला न रह सका, उसी की और सिर लुढ़क गया। उसके होठों पर मुस्कराहट ऐसे ही दिखाई दे रही थी, जैसे अब पुराने अन्धकार में जलाकर लाई हुई …. पहले की बुझी लालटेन ।”

◆ राजनीतिक अर्थ में इसे जनवादी परिदृश्य नहीं कहा जा सकता, किन्तु पुरुषवादी व्यवस्था में एक मानिनी स्त्री द्वारा प्रेम पर मर-मिटने की यह अद्वितीय कथा है।

◆ यह उस मान्यता के विरुद्ध विद्रोह है जिसमें लज्जा को स्त्री का आभूषण माना जाता है स्त्री को एक बड़ी सामाजिक शक्ति में प्रस्तुत कर, उसकी स्वाधीनता में अटूट विश्वास दिखाकर रांगेय राघव ने अपनी जनवादी दृष्टि का ही परिचय दिया है।

💐 गदल कहानी के कथन:-

◆ ”हत्यारिन! तुझे कतल कर दूँगा!” (यह आवाज गदल के बडे बेटे निहाल की थी) 【गदल कहानी पहली पंक्ति】
* हत्यारिन – गदल के लिए

● गदल ने बडे बेटे निहाल से कहा –  ”करके तो देख! तेरे कुनबे को डायन बनके न खा गई, निपूते!”
* तेरे – निहाल के लिए
* निपूते – गदल ने निहाल को कहा।

●  डोडी ने निहाल से कहा  — ”आख़िर तेरी मैया है।”
* तेरी :- निहाल के लिए
* मैया :- गदल के लिए

● गदल का कथन –  ”कढ़ीखाए! तेरी (निहाल के लिए) सींक पर बिल्लियाँ चलवा दूँ! समझ रखियो! मत जान रखियो! हाँ! तेरी आसरतू नहीं हूँ।”

● गदल ने डोडी को कहा — ”मैं जानती हूँ, निहाल में इतनी हिम्मत नहीं। यह सब तैने किया है, देवर!”

◆  निहाल ने अपनी मां गदल से कहा- ”शरम क्यों आएगी इसे? शरम तो उसे आए, जिसकी आँखों में हया बची हो।”
@  हया :-अनुचित या अनैतिक काम करने से रोकने वाली लज्जा, व्रीड़ा, लज्जा, लाज, शर्म

◆ गदल ने डोडी से कहा — ”खाती भी कब? कमबख़्त रास्ते में मिले। खेत होकर लौट रही थी। रास्ते में अरने-कंडे बीनकर संझा के लिए ले जा रही थी।” (कमबख़्त -निहाल के लिए)
* संझा का अर्थ :- शाम

◆ निहाल की पत्नी का कथन  — ”अरे, अब लौहरों की बैयर आई हैं; उन्हें क्यों ग़रीब खारियों की रोटी भाएगी?”
@ बैयर  का अर्थ :- पत्नी( गदल के लिए)

◆ निहाल ने गदल को कहा –  ”सुन ले, परमेसुरी, जगहँसाई हो रही है। खारियों की तो तूने नाक कटाकर छोड़ी।”
* परमेसुरी का अर्थ :- देवी (यहां गदल के लिए )

◆ डोडी ने गदल से कहा — ”सब चले जाते हैं। एक दिन तेरी देवरानी चली गई, फिर एक-एक करके तेरे भतीजे भी चले गए। भैया भी चला गया। पर तू जैसी गई; वैसे तो कोई भी नहीं गया। जग हँसता है, जानती है?”

◆ गदल ने डोडी से कहा — ”जग हँसाई से मैं नहीं डरती देवर! जब चौदह की थी, तब तेरा भैया मुझे गाँव में देख गया था। तू उसके साथ तेल पिया लट्ठ लेकर मुझे लेने आया था न, तब? मैं आई थी कि नहीं? तू सोचता होगा कि गदल की उमर गई, अब उसे खसम की क्या ज़रूरत है? पर जानता है, मैं क्यों गई?”

◆’तु तो बस यही सोच करता होगा कि गदल गई, अब पहले-सा रोटियों का आराम नहीं रहा। बहुएँ नहीं करेंगी तेरी चाकरी देवर! तूने भाई से और मुझसे निभाई, तो मैंने भी तुझे अपना ही समझा! बोल झूठ कहती हूँ?” (गदल ने डोडी को कहा)

◆ ”बस यही बात है देवर! अब मेरा यहाँ कौन है! मेरा मरद तो मर गया। जीते-जी मैंने उसकी चाकरी की, उसके नाते उसके सब अपनों की चाकरी बजाई। पर जब मालिक ही न रहा, तो काहे को हड़कंप उठाऊँ? यह लडक़े, यह बहुएँ! मैं इनकी ग़ुलामी नहीं करूँगी!” ” (गदल ने डोडी को कहा)

◆ ”पर क्या यह सब तेरी औलाद नहीं बावरी। बिल्ली तक अपने जायों के लिए सात घर उलट-फेर करती है, फिर तू तो मानुष है। तेरी माया-ममता कहाँ चली गई?” ” (डोडी ने गदल से कहा)
@ बावरी :- बावली(गदल के लिए)

◆ ”कायर! भैया तेरा मरा, कारज किया बेटे ने और फिर जब सब हो गया तब तू मुझे रखकर घर नहीं बसा सकता था। तूने मुझे पेट के लिए पराई डयौढी लँघवाई।”(गदल ने डोडी से कहा)

◆ “चूल्हा मैं तब फूँकूँ, जब मेरा कोई अपना हो। ऐसी बाँदी नहीं हूँ कि मेरी कुहनी बजे, औरों के बिछिए छनके। मैं तो पेट तब भरूँगी, जब पेट का मोल कर लूँगी।” (गदल ने डोडी से कहा)
√  बाँदी :- दासी
कुहनी बजना :- काम करना

◆ “समझा देवर! तूने तो नहीं कहा तब। अब कुनबे की नाक पर चोट पड़ी, तब सोचा। तब न सोचा, जब तेरी गदल को बहुओं ने आँखें तरेरकर देखा। अरे, कौन किसकी परवा करता है!” (गदल ने डोडी से कहा)

◆ ”गदल, मैं बुढ्ढा हूँ। डरता था, जग हँसेगा। बेटे सोचेंगे, शायद चाचा का अम्माँ से पहले से नाता था, तभी चाचा ने दूसरा ब्याह नहीं किया। गदल, भैया की भी बदनामी होती न?” (डोडी ने गदल से कहा)

◆  ”भैया का बड़ा ख़याल रहा तुझे? तू नहीं था कारज में उनके क्या? मेरे सुसर मरे थे, तब तेरे भैया ने बिरादरी को जिमाकर होठों से पानी छुलाया था अपने। और तुम सबने कितने बुलाए? तू भैया दो बेटे। यही भैया हैं, यहीं बेटे हैं? पच्चीस आदमी बुलाए कुल। क्यों आख़िर? कह दिया लड़ाई में क़ानून है। पुलिस पच्चीस से ज़ियादा होते ही पकड़ ले जाएगी! डरपोक कहीं के! मैं नहीं रहती ऐसों के।” (गदल ने डोडी से कहा)
√ कारज का अर्थ :- मृत्युभोज

◆ ”सौ बार कहूँ लाला!” 【’लाला’ डोडी के लिए  】(गदल का कथन)

◆ गदल ने डोडी से कहा— ”मरद है! अरे कोई बैयर से घिघियाता है? बढ़कर जो तू मुझे मारता, तो मैं समझती, तू अपनापा मानता हैं।”

◆  दुल्लो (मौनी की भाभी) ने गदल से कहा — ”आ गई देवरानी जी! रात कहाँ रही?”
★ गदल ने दुल्लो (मौनी की भाभी) को जवाब दिया — ”सो, जेठानी मेरी! हुकुम नहीं चला मुझ पर। तेरी जैसी बेटियाँ है मेरी। देवर के नाते देवरानी हूँ, तेरी जूती नहीं।”

◆  गदल ने मौनी से कहा — ”हम तो दो जने हैं। अलग करेंगे खाएँगे।”

◆ दुल्ल ने मौनी से कहा – ‘अब चुप क्यों हो गया, देवर? बोलता क्यों नहीं? देवरानी लाया है कि सास! तेरी बोलती क्यों नहीं कढती? ऐसी न समझियो तू मुझे! रोटी तवे पर पलटते मुझे भी आँच नहीं लगती, जो मैं इसकी खरी-खोटी सुन लूँगी, समझा? मेरी अम्माँ ने भी मुझे चूल्हे की मिट्टी खा के ही जना था। हाँ!”

◆  ”मिट्टी न खा के आई, सारे कुनबे को चबा जाएगी डायन। ऐसी नहीं तेरी गुड़ की भेली है, जो न खाएँगे हम, तो रोटी गले में फंदा मार जाएगी।” 【गदल ने दुल्लो (मौनी की भाभी) से कहा】

◆  गदल ने अपने कड़े और हँसली उतारकर फेंक दी और नरायन से कहा — ”भर गया दंड तेरा! अब मरद का सब माल दबाकर बहुओं के कहने से बेटों ने मुझे निकाल दिया है।”
(उसी समय लोटा-डोर लिए मौनी लौटा था)

◆ दुल्लो ने मौनी से कहा — ”सुना तूने देवर! देवरानी को गहने दे दिए। घुटना आख़िर पेट को ही मुडा। चार जगह बैठेगी, तो बेटों के खेत की डौर पर डंडा-धूआ तक लग जाएँगे, पक्का चबूतरा घर के आगे बन जाएगा, समझा देती हूँ। तुम भोले-भाले ठहरे। तिरिया-चरित्तर तुम क्या जानो। धंधा है यह भी। अब कहेगी, फिर बनवा मुझे।”

√ स्त्री को पंजाबी भाषा में त्रिया कहते हैं। त्रिया शब्द पंजाबी से हिंदी में आया है।
• त्रिया-चरित्र का शाब्दिक अर्थ :- स्त्रियों का आचरण (स्त्रियों द्वारा किसी समय या परिस्थिति विशेष पर की जाने वाली चतुराई या चालाकी।)
√ तिरिया-चरित्तर शब्द :- गदल के लिए
√ तुम शब्द :- मौनी के लिए

◆ गदल ने  दुल्लो से कहा — ”वाह जेठानी, पुराने मरद का मोल नए मरद से तेरे घर की बैयर चुकवाती होंगी। गदल तो मालकिन बनकर रहती है, समझी! बाँदी बनकर नहीं। चाकरी करूँगी तो अपने मरद की, नहीं तो बिधना मेरे ठेंगे पर। समझी! तू बीच में बोलनेवाली कौन?”
@ बिधना का अर्थ -विधाता

◆मौनी ने गदल से कहा-  ”बहुत बढ़—बढ़कर बातें मत हाँक, समझ ले घर में बहू बनकर रह!”

◆ गदल ने मौनी से कहा- ”अरे तू तो तब पैदा भी नहीं हुआ था, बालम!तब से मैं सब जानती हूँ। मुझे क्या सिखाता है तू? ऐसा कोई मैंने काम नहीं किया है, जो बिरादरी के नेम के बाहर हो। जब तू देखे, मैंने ऐसी कोई बात की हो, तो हज़ार बार रोक, पर सौत की ठसक नहीं सहूँगी।”
√ बालम शब्द :- मौनी के लिए
√ सौत शब्द :- मौनी की भाभी दुल्लो के लिए
√  ठसक :- अभिमानपूर्ण हाव भाव, गर्वीली चेष्टा, नखरा

◆ निहाल ने काका(डोडी ) से कहा –  ”तुमसे न कहूँगा, तो कहूँगा किससे? दिन-भर तो तुम मिले नहीं। चिम्मन कढेरा कहता था, तुमने दिन-भर मनमौजी बाबा की धूनी के पास बिताया, यह सच है?”

◆ बनिए का आदमी निहाल से घी कटऊ का किराया लेने आया था।

◆ ”उसी कुलच्छनी कुलबोरनी के पास।”( निहाल ने नरायन को अपनी मां (गदल) पास भेजा )
√ कुलच्छनी,कुलबोरनी :- गदल के लिए
√ नरायन गदल की कड़े और हँसली लेकर आया था।

◆ ”न जाने तुम्हें उससे क्या है, अब भी तुम्हें उस पर ग़ुस्सा नहीं आता। उसे माँ कहूँगा मैं?” (निहाल ने डोडी से कहा)

◆ ”पर बेटा, तू न कह, जग तो उसे तेरी माँ ही कहेगा। जब तक मरद जीता है, लोग बैयर को मरद की बहू कहकर पुकारते हैं, जब मरद मर जाता है, तो लोग उसे बेटे की अम्माँ कहकर पुकारते हैं। कोई नया नेम थोड़ी ही है।” (डोडी ने निहाल से कहा)

◆ निहाल ने नरायन को अपनी मां पास क्यो भेजा :-
”दंड भरवाने भेजा था। सो पंचायत जुड़वाने के पहले ही उसने तो गहने उतार फेंके।”

◆ डोडी ने निहाल से  कहा — ”तो वह यह बता रही है कि घरवालों ने पंचायत भी नहीं जुड़वाई? यानी हम उसे भगाना ही चाहते थे। नरायन ले आया?”
√ वह – गदल के लिए

◆ चिरंजी ने निहाल से कहा— ”अरे, वह वहाँ ढोल सुन रहा है। मैं अभी देखकर आया हूँ।”
√ वह :- डोडी के लिए
√ वहा :- ढोला गान सुनने

◆ डोडी ने निहाल से कहा — ”अरे, सोच तो, बेटा! मैंने ढोला कितने दिन बाद सुना है।

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2 comments

  1. Girdhari Singh

    Best post please,,Send post Kafan,,Usne Kaha, Mamta, populer Story of Hindi literature Thank you so much

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