गन्धमादन(gandhamadan) [राघव करुणो रस]

गन्धमादन(gandhamadan) [राघव करुणो रस]

★  निबन्धकार – कुबेर नाथ राय

प्रकाशन वर्ष – जुलाई,1972 ई.

विधा- ललित निबंध

★ कुल पृष्ठ – 317

★कुल निबंध – 15

★ इसमें संग्रह निबंधओं के नाम
1. शब्द श्री
2. नदी तुम बीजाक्षरा
3. अन्नपूर्णा बाण भूमि
4. गौरी – मार्ग और कामुक मेघ
5. राघव करुणो रस
6. चित्र – विचित्र
7. जल दो,स्फटिक जल दो
8. शरद् – बाँसुरी और विपन्न मराल
9. उजड्ड वसन्त और हिप्पी जलधर
10. विकल चैत्ररथी
11. किरण सप्तपदी
12. मायावी शिखरों के प्रेक्षागृह
13. सनातन नदी :नाम धीवर
14. छप्पन भोगो की इतिहास नदी
15. स्नान एक सहस्त्र शीर्षा अनुभव

                 💐 राघव करुणो रस 💐

• नये साहित्य में करुण रस की नवीनतम स्थिति – निर्वासन।

• नये साहित्य में निर्वासन भाव का स्वतंत्र विकास स्थाई भाव जैसा बन गया है। ऐसे हालत में निर्वासन की कल्पना कर लेना कोई समस्या नहीं है।

• निर्वासन का शाब्दिक अर्थ – निष्कासन या बलपूर्वक किसी को किसी राज्य या भू – भाग से निकाल देना।

• निर्वासन एक साहित्यिक व्यथा नहीं है बल्कि विश्व – स्तर पर भी मनुष्य निर्वासन की व्यथा भोग रहा है।

• निर्वासन का जो रूप अर्थ, काम के अधिक सुख में उत्पीडित – अमेरिका में ।

• निर्वासन के रूस में त्रास और दैन्य से पीड़ित पश्चिमी यूरोप में नहीं है।

• रूस, चीन या तिब्बत में निर्वासन की विधा बिल्कुल अलग है।

• सर्वत्र निवासन भोग रहा है – मनुष्य

• हिंदुस्तान में व्यापक तौर पर है – निर्वासन

• यह सभी अपने आप को परिवेश से निर्वासित अनुभव करते हैं – शरणार्थियों,विस्थापितों, पुरानी ईमानदार कांग्रेसियों,आदर्शवादी पार्टी – कर्मियों, अल्पसंख्यक ईमानदार अफसरों।

• कारण और वस्तुस्थितियां विभिन्न है पर शाप एक ही है- निर्वासन के साथ बौद्धिक अजनबीपन के शिकार।

• सब के शीश पर प्रेत की तरह मंडरा रहा है- निर्वासन के साथ बौद्धिक अजनबीपन के शिकार।

• अजनबीपन भारत देश में बहुत कम है ।

• यातना दोहरी – निर्वासन और अजनबीपन

• अजनबीपन का अर्थ है – अपरिचित होना

• निबंधकार कुबेरनाथ राय निर्वासन एवं अजनबीपन की समस्या को विश्व स्तर पर ले रहे हैं।

• वर्तमान मनुष्य बिना कारण निर्वासित है – : ऐतिहासिक शक्तियों के द्वारा (नई पीढ़ी या मनुष्य का कोई अपराध नहीं है।)

• अकारण निर्वासन का उदाहरण है:- रामायण में

• रामायण में राम उसी तरह निर्वासित हुए थे जिस तरह आज का नया मनुष्य।

• अकारण ही निर्वासन हुए :- राम और आज का नया मनुष्य

• राम एवं आज का नया मनुष्य निरपराध है।

• राम और आज का नया मनुष्य दोनों के परिवेश की सतही समानता के बावजूद अपने संदर्भ में उन की प्रतिक्रिया समानधर्मी नहीं होती है क्योंकि राम का व्यक्तित्व निर्वासन सन्दर्भ के भीतर जैसी प्रतिक्रिया करता है, वैसा नये मनुष्य का व्यक्तित्व नहीं है।

• राम का व्यक्तित्व (निर्वासन के संदर्भ में) :-
★ राम के निर्वासन का चरम रूप सीता हरण के पश्चात और लंका अभियान के पूर्व के मध्यात्तर में मिलता है।

★ किष्किंधा काण्ड के भीतर सुग्रीव – अभिषेक के बाद माल्यवत – शिखर पर बिताये गये ( कुछ महीने निर्वासन और निस्संगता की तीव्रतम स्थिति है।)

★ मन बालि वध की उत्तेजना से पीड़ित है ।

★ नूपुर और वस्त्र देखकर राम को अंदाजा हो गया कि उनका शत्रु रावण ही है।

★ जटायु ने भी राम को यही सूचना दी कि रावण ही आपका शत्रु है।

★ राम को महाप्रतापशाली शत्रु रावण की चिंता है।

★ राम को अपने अकेलेपन और असहायता का बोध।

★ राम को बलि के वध की उत्तेजना।

★ मैथिली के प्रति करुणा।(सीता के लिए)

★ राम की अनिश्चितता भविष्य की चिंता।

★ वर्षा काल आ जाने से कोई भी प्रयत्न नहीं।

★ शरद के आगमन की प्रतीक्षा। तब तक निष्क्रिय बैठे रहो शरद ऋतु न आ जाये। (राम का धीरे- गंभीर और करुण श्यामल रूप दुख के अंधकार के भीतर से
फूटता है।)

• राम के रूप और आत्म – संघर्ष को वाल्मिकी और तुलसीदास ने वर्षा – वर्णन और शरद् – वर्णन के माध्यम से प्रस्फुटित किया है।

• वाल्मीकि के वर्णन में आत्म संघर्ष की ही प्रधानता है।

• वाल्मीकि का वर्षा – वर्णन नायक की व्यथा और उस की सहज धीरता, उस की काम कातरता और उसके शान्त सौंदर्य बोध का घोर अंतर्द्वंद प्रस्तुत करता है।

• राम अपनी उत्तेजना को प्रकृति के शान्त सौंदर्य बोध में के डुबो कर एक शान्त बिन्दु पाने का दर्निवार प्रयत्न कर रहे हैं।

• वाल्मीकि ने यह दिखाया है कि यह असह्म दुःख मिट नही पाता। इसे भोगने के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं ,कोई विकल्प नहीं।

• राम की उत्तेजना और तीव्र हो गयी है -: शरद ऋतु में/ वाल्मीकि के शरद् वर्णन में।

• वाल्मीकि के शरद् वर्णन में राम की उत्तेजना और तीव्र हो जाती हैं ।

• राम की उदात्त धीरता को तुलसी ने शरद् वर्णन तक तो जाते – जाते इस आत्मसंघर्ष में नयी बना देते और उन का मन शांत, स्थिर और सवाल हो जाता है।

• क्षितिज के शिखरों पर मेघों की नील सोपान पंक्ति खड़ी है,नील अंबर तक आरोहण करने के लिए।

• राम प्रारंभ में ही कहते हैं ।लक्ष्मण देखा –

“संधा रागोत्थितैस्ताम्रैरन्तष्वपि च पाण्डुभि। स्निग्वैरभ्रपटच्छेदैर्वद्धव्रणमिवाम्बरम्।। ………………………………………।। ………………………………………..।। …………………………………………।।

सीतेव शोक संतप्ता मही वाष्प विभचच्चुति।।

(किष्किंधा काण्ड, सर्ग 27) अर्थात् संन्ध्या के कारण आकाश का रंग ताम्रवर्णों और पाण्डुर है। लगता है कि आकाश के हृदय में भी घांव है और भीगे बादलों को पट्टी में उस पर बंधी है। संध्या चंदन से चर्चित पाण्डुरवर्णी बादलों वाला आकाश कामातुर सा लगता है, जिस का चेहरा पीला पड़ गया है और मन्द मारुत जिस की कामोत्तेजना का विश्वास है। तेज धूप से पीड़ित नये जल सो सीची धरती से वाष्प उठ रही है, जैसे यह शोक संतप्त सीता हो। (किष्किंधा कांड, सर्ग 27 से)

• राम के अपने अंदर के घाव को विश्व प्रकृति में हृदय में पाते है। विश्व प्रकृति के हृदय में -: “वद्ध व्रणमिवाम्बरम्”(आकाश के हृदय में भी घांव है)

• राम अपने अंदर के घाव को विश्व प्रकृति के हृदय में पाते है और यह घाव तब तक और अधिक होता है जब नीले आकाश में बिजली चमकती है।

• राम को लगता है कि मानो,रावण के अक में कातर तपस्विनी वैदेही हो।

• राम कहते हैं- ” हे सौमित्र,पर्वत के सानु(पर्वत का शिखर) पर फूले हुए कुटजो को देखो। ये मेरे उठ शोकाभिभूतमन में काम – सन्दीपनार्थ पुष्पित हो रहे है।”

• अब असह्य दुःख की अन्तर्धारा सारी कोमलता को भेद कर प्रतापशाली शत्रु की चिंता के रूप में आ जाती है । फिर शोक और कातरता या बेचैनी का अनुष्टुप् छन्द लौट आता है।

• रावण द्वारा सीता को हरण कर ले जाना दुःख राम को है यह दुख प्रेमिका के लिए रीतिबद्ध नागर का दु:ख नहीं है। यह पवित्रता और सौन्दर्य के आहत होने पर बोध किया एक विश्वव्यापी दुःख है।

• इस दुःख में तपस्विनी वैदेही और पवित्र मैथिली की कातर अवस्था के प्रति करुणा अधिक है और व्यक्तिगत निजी काम व्यथा कम ।

● यह दुःख प्रेमिका के लिए रीतिबद्ध नागर का दुःख नहीं है। यह ‘तपस्विनी वैदेही’ ‘पवित्र मैथिली’ की कातर अवस्था के प्रति करुणा अधिक है और व्यक्तिगत निजी काम-व्यथा कम।।      –  राघवः करुणो रसः (कुबेरनाथ राय)

★ तपस्विनी वैदेही और पवित्र मैथिली दोनों शब्द सीता के लिए आये है।

* माता सीता के पिता के विभिन्न नाम *

★ बिना जनक – जननी के संयोग से जन्म होने के कारण शिशु जनक

★ मृत देह से उत्पन्न होने के कारण विदेह

★ मंथन से उत्पन्न होने के कारण मिथि कहलाया।
मिथि के नाम पर ही मिथिला नगर का निर्माण हुआ।

● वैदेही :- विदेहराज की पुत्री सीता
● मैथिली :- मिथिला की राजकुमारी सीता

• इस दुःख का राम कातर (भयभीत) रूमानी नायक की तरह नहीं वहन करते  हैं ।

• राम धीरता की समुन्द्र है और दुःख उन्हें उद्धार की चिंता की ओर प्रेरित करता है।

• राम का दु: ख असहनीय है और उनके व्यक्तित्व का एक अंश उसे दिन-रात भोग रहा है ।

• वाल्मीकि के अनुसार इस असह्य दुःख की नियति से कोई मुक्ति नहीं,कोई क्षमा नहीं । कोई शांत बिंदु नहीं।

• तुलसी यातनामय निर्वासन और आत्मसंघर्ष के बीच से नायक को शांत बिंदु को ओर ले गए हैं।

• तुलसी के राम की व्यक्तित्व की जड़े अगाध धीरज के समुद्र में है :- राम का व्यक्तित्व

• राम का व्यक्तित्व किसके सान है? :- नीलाम्बुज श्यामल कोमल के समान

• तुलसीदास ने उत्तेजना आत्मसंघर्ष से शांत बिंदु तक की मानसिक प्रक्रिया को मूलतः चार स्तरों में विभाजित किया है।

• उत्तेजना के प्रथम आघात से जब राम दीन भाव से ‘हे खगमृग, हे मधुकर श्रेणी’ में आदि कहते हैं।( तुलसी को लगता है कि राम का व्यक्तित्व इस समय टूट जायेगा)

• राम का व्यक्तित्व टुटता नहीं है राम के भीतर अमृत और प्राण की शक्तियां सक्रिय हैं ।

• सारी सृष्टि पीड़ित और उल्लसित है यह पीड़ा राम भी भोगते है,पर उन के भीतर का देवता, उन का सहज पुनीत मन,अनासक्ति के अमृत से उस यातना को सींच कर कर ठण्डा रहा है।

• जो आत्मसंघर्ष वाल्मीकि के वर्षा – वर्णन में है वह तुलसी के वसन्त वर्णन (अरण्यकांड) में है।

• संघर्ष – भूमि में आकर वैराग्य और अनासक्ति के वातावरण को और सबल बना है :- कल्याण के कल्पवृक्ष स्वरूप नारद

• पम्पासर आते हैं फिर राम बली का वध करते हैं।

• रावण जैसे शत्रु की चिंता, अनिश्चित भविष्य तथा निष्क्रिय स्थिति की पीड़ा के संदर्भ में वर्षा आती है।

• उत्तेजना का पर्याप्त अवसर होने पर भी राम का मन सहज धीरता की स्थिति में है।

• प्रियाहीन डरपत मन मोरा इस पंक्ति में सतत जागरूक व्यथा का एक संकेत मात्र करते हैं।

● “प्रियाहीन डरपत मन मोरा” कहकर अंतर की सतत् जागरूक व्यथा का एक संकेत मात्र कर देते हैं।  
           .-  राघवः करुणो रसः (कुबेरनाथ राय)
इस पंक्ति ‘प्रियाहीन’ शब्द किस के लिए आया है। – राम जी के लिए

★ प्रियाहीन डरपत मन मोरा का अर्थ :- प्रिया (सीताजी) के बिना मेरा मन डर रहा है।

 ★घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा॥
दामिनि दमक रह नघन माहीं। खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं॥ – किष्किंधा काण्ड से

भावार्थ:-आकाश में बादल घुमड़-घुमड़कर घोर गर्जना कर रहे हैं, प्रिया (सीताजी) के बिना मेरा मन डर रहा है। बिजली की चमक बादलों में ठहरती नहीं, जैसे दुष्ट की प्रीति स्थिर नहीं रहती।

• राम को मयूर नृत्य और मेघ गर्जन से प्रिया (सीता) की याद आती है।

• राम उत्तेजना को प्रकृति के शान्त सतोगुणी सौंदर्य में लीन कर देते हैं।

• सारी मानसिक भूमि अचानक हरी-भरी और नील – रमणीय हो उठती है।

• राम दुःख और उत्तेजना शान्त सौंदर्य में स्नान करके शुद्ध हो चुके हैं।

• राम का मन शरद् तक प्रकृतिस्थ हो जाता है यानी राम का मन शरद् ऋतु आते – आते शांत हो जाता है।

• शरद् ऋतु समूची प्रक्रिया की अंतिम कड़ी है।

• राम जानते हैं कि शोक का समुंद्र विस्तीर्ण है।

• राम अब शांत उत्तेजनाहीन मन से उद्धार की चिंता करने की समर्थ है।

• वाल्मीकि का चित्र मानवीयता की दृष्टि से तुलसी से अधिक वास्तविक लगता है लेकिन निर्वासन के भीतर से ‘धीर गंभीर स्निग्ध श्यामल’ रूप तुलसी में भी अधिक सशक्त ढंग से अभिव्यक्ति होता है।

• सहज सौंदर्य बोध और सतोगुणी मन की यह विजय धीर – करुण रस के प्रतीक राघव के अधिक उपयुक्त है।

• वाल्मीकि का चित्र एवं तुलसी का चित्र में समानता:-

★ दोनों का चित्र मानवीय।
★ दोनों का चित्र सहज।
★ जीवन में दोनों का अस्तित्व है और दोनों वास्तविक है।

• वाल्मीकि और तुलसी के चित्र में अन्तर :-
★ वाल्मीकि का यथार्थ जबकि तुलसी का अतिमापरक(ट्रांसेण्डेण्टल यथार्थ)
★ वाल्मीकि के चित्र एक की मिसाले ज्यादा मिलती है जबकि तुलसी में मिसाले कम।
★ वाल्मीकि की से महिमा का जन्म नही होता जबकि तुलसी की से महिमा का जन्म होता है।राम मनुष्य की महिमा के प्रतीक है।

• नये मनुष्य निर्वासन मे शान्त सौन्दर्य बोध के अमृत स्पर्श का अभाव है।

• ऐतिहासिक शक्तियों ने (नाजीवाद,कम्युनिजम,महायुद्ध और विभाजन) उस के ऊपर जितना निर्वासन थोपा है,उस से ज्यादा उस ने ऊपर जितना निर्वासन आगे बढ़ कर वरण कर लिया है।

• शांत और सौन्दर्यबोध को “वर्डस्वार्थियन या रूमानी” कह कर तिरस्कृत करना।

• रामायणकार ने वर्षा और शरद् का वर्णन केवल महाकाव्य की परिभाषा सम्मत परिपाटी के लिए नहीं किया है।

• वाल्मीकि व तुलसीदास यह दिखाना चाहते हैं की कि शांत सौंदर्य बोध में निर्वासन का विष कटता है।

• अयोध्या कांड में और सीताहरण के पूर्व वर्षा – वर्णन दिया जा सकता है पर वाल्मीकि या तुलसी ने उपर्युक्त कारण ही वर्षा- वर्णन को निर्वाचन की तीव्रतम अवस्था के संदर्भ में रखा है।

• सौंदर्य बोध अवसर जात का निदान है,सौंदर्य बोध स्थाई निदान नहीं है।

• स्थाई निदान अनासक्ति या ‘स्व’ के प्रति तटस्थता।

• राम के दोनों आंखों के तारे :- भरत और लक्ष्मण

• राम के हृदय की सहज सांस :- मैथिली

• राम मे सहज प्रेम है, पर आसक्ति नहीं। सहज प्रेम आत्मा का अमृत रस है,पर आसक्ति आत्मा का बंधन है।

• राम रोमियो या दुष्यंत नहीं है।

• सीता की अग्नि – परीक्षा के अवसर पर राम स्पष्ट बता देते हैं:- “मैथिली यह युद्ध है मैं ने तुम्हारे प्रति आसक्ति या कामना से नहीं किया। ऐसा मुझे करना है था अतः मैंने किया।”

• रावण का वध राम ने व्यक्ति व्यक्तिगत रोष के कारण या पत्नी के उद्धार के लिए नहीं करते है। पत्नी- उद्धार तो निमित्त मात्र था।

• राम का वास्तविक उद्देश्य(रावण का वध करने का उद्देश्य):- ऋत चक्र की बिगड़ी गति को ठीक करना।

• राम ने बालि का वध का अकारण ही किया लेकिन राम ने जरा भी मनस्ताप नही है क्योंकि “यह राजनीतिक आवश्यकता थी,यह एक अनिवार्यता थी।”(कुटनीतिज्ञ राजगोपालचारी के अनुसार)

• बाली का वध करने में राम को मनस्ताप इसलिए नहीं हुआ क्योंकि क्रोध या रोष की प्रेरणा से उन्होने मारा नहीं था।

• वाल्मीकि के अनुसार” हे वीर, वानर श्रेष्ठ, इस समय धरती के सम्राट भरत है। उन के द्वारा स्थापित और परिचालित धर्मचक्र के विपरीत तुम कार्य कर रहे थे। अतः मेरा कर्तव्य था कि उन पर विधान से भिन्न मर्यादा का निग्रह करुँ। मैं ने किसी व्यक्तिगत कारण तुम्हें नहीं मारा है।”

• राम मनुष्य है,राम ने मनुष्यता का वरण उसी सीमा तक किया जहां शील और करुणा का संबंध है।

• राम के व्यक्तित्व की शील और करुणा मनुष्यता- मुखी है ।

• राम की स्व’ की तटस्थता या अनासक्ति ईश्वरीयता- मुखी है।

• राम के संपूर्ण व्यक्तित्व का चरित्र वाल्मिकी से अधिक परिष्कृत ढंग से तुलसीदास में मिलता है।

• राम ने बलि का वध ‘ऋत’ की रक्षा के लिया किया।

• बालि की कोमल वाणी सुनने पर(“प्रभु अजहूँ मैं पालकी अन्त काल गति तोरि”) राम को मनुष्यता और उनकी निर्मम तटस्था को दबा कर उभर जाती है और राम विगलित हो जाते हैं।

• राम बालि के शीश को सहला कर कहते हैं “अचल करौ तनु,राखहु प्राना।”यह राम का करुणामय रूप।

• राम के धीर – गंभीर के साथ – साथ स्निग्ध,करुण, श्यामल।

• आज के नये मनुष्य स्वयं को ‘स्व’ कोटर में बंद कर लिया।

• आज के नये मनुष्य :-
★ घुरीहीन
★ प्रतिबद्धता किसी में नहीं
★ देश, राष्ट्र, समाज, परिवार,मानवीय भाव आदि
से अलग हो कर जीना चाहता है।
★ स्वयं को संकुचित कर ‘स्व’ के भीतर निर्वासन भोगने की सोचता है।

• राम का जो निर्वासन हुआ उसे वनवास कहते है।

• राम के निर्वासन में (वनवास में ) मुक्ति नील आकाश- तले,रम्य दारुण वन में , छह ऋतुओं की हवाओं के परिवेश में उन्हें निर्वासन भोगने को कहा गया था। :- स्व की कोटर मे नही(आज के नये मनुष्य में नही है)

• राम निर्वासन तो भोगते हैं पर अजनबीपन की यातना उन्हें नहीं भोगनी पड़ती है।

• निबन्धकार के मित्र ने यह एक बार सवाल उठाया “राम और नए मनुष्य – दोनों पर अकारण निर्वासन लादा गया। पर क्या कारण है कि राम ने निर्वासन में रचना की जबकि आज का आदमी केवल की ओर आत्मक्ष्य करता है।”

• किसी रचना के लिए सृष्टि के लिए अकेलापन आवश्यक है।

• प्रत्येक विधाता अकेले-अकेले सृजन या रचना का कष्ट भोगता है।

• राम की रचना – शक्ति अजनबीपन के कारण कुण्ठित नही है।

• निशिचर (राक्षस) कामरूप होता है और स्वभाव में मायावी होता है।

• अकेलापन जाने – अनजाने लोगों के बीच – पद्म पनमिवाम्भसा वाला अकेलापन।

• निर्वासन या अकेलापन मूलतः शाप की स्थिति नहीं है। यह शाप की स्थिति तब हो जाती है जब अजनबी-पन के भी आकर जुट जाये।

• निर्वासन का अर्थ रचनाकार का नित्य अकेलापन हो तो यह शाप की स्थिति नहीं है।

• जब निर्वासन अर्थ विश्व से, मनुष्य से, सौंदर्य से, अपने आप से अजनबीपन हो तो यह अवश्य ही शाप की स्थिति है।(निर्वासन की ऐसी स्थिति को निबंधकार कुबेर नाथ राय हेय मानते हैं।)

• राम का जीवन ट्रेजडी है।

• ट्रेजेडी की आवश्यकता :-

★बड़ी महिमा की अवतारणा के लिए
★ महासत्य की स्थापना के लिए

• ये महासत्य सिद्धि के पूर्व बलि मांगते हैं इनका अवतरण विश्व के लिए मंगलमय होता है ।

• राम को प्रारंभ में वन में निर्वासन मिला, बाद राजदरबार की छोटी सीमा में ही निर्वासन भोगना पड़ा। कम – से – कम लव – कुश के 12 -14 वर्ष के हो जाने तक, शासन निर्मम निर्वासन की स्थिति में चलना पड़ा , रामराज्य की सारी मर्यादाओं के साथ। वरण का पथ,रचना का पथ, सत्य का पथ,महिमा का पथ सदा निर्जन – निस्सग होता है।

• निर्मम निर्वासन पर चलने व्यक्ति ऋत चक्र का सहचर होता है। जैसे :- राम

• राम का समस्त जीवन महासत्य की व्याख्या है।

• महाभारत के अंतिम पर्व स्वर्गारोहण में यही बात प्रतीक रूप से प्रस्तुत की गयी है।

• श्वान रूप धर्म की उस चरम बिंदु तक साथ दे सकता है।

• राम का जीवन :- साक्षात् करूण

• राम ईश्वर की तरह अनासक्त तटस्थ और महिमामय है तो मनुष्य की तरह धीर वीर,गंभीर है।( राम:- स्निग्ध,श्यामल,करुण)

• उस नीलोत्पल के कोमल स्पर्श से मेरा अस्तित्व विगलित होकर ही फिर वायवीय हो जाता है और हल्का – हल्का सौरभ बन कर मनोरम पम्पासर के धीर समीरण में लीन हो जाता है। तब राम ने द्वारा भोगी गयी सारी व्यथा एवं उनके जीवन की संपूर्ण करुणा का में सहयोगी साक्षी बन जाता हूं और उस क्षण भर की लघु अवधि में लगता है कि मैं भी देवता ही हूं।

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