ठकुरी बाबा संस्मरणात्मक रेखाचित्र(thakuri baba sansmaranatmak rekhachitr)

                   💐 ठकुरी बाबा (महादेवी वर्मा)💐

◆ प्रकाशन :- 1947ई.

◆ स्मृति की रेखाएं से

◆ संस्मरणात्मक रेखाचित्र

◆ इस रेखाचित्र में ग्रामीण समाज का चित्रण है।

◆  महादेवी वर्मा रेखाचित्रों में जिन चरित्रों का वर्णन किया है वे समाज के गरीब एवं अशिक्षित वर्ग से संबद्ध हैं।

◆ महादेवी के कल्पवास की कुटिया में संक्राति के एक दिन पहले संध्या समय ग्रामीण यात्रियों का एक दल आ घुसा।

◆ एक बूढ़े सज्जन कल्पवास के रैनबसेरे में ठहरने की अनुमति माँगने लगे। वे अकेले न थे पूरी एक टोली थी उनके साथ ठहरने की अनुमति मिल गई। चूँकि – वृद्ध सज्जन का स्वर स्नेहसिक्त था और उसमें आत्मीयता भी थी ।

◆  लेखिका की पर्णकुटी कोलाहल से परिपूर्ण हो गई। इस बूढ़े बाबा ने पर्णकुटी के बरामदे में अपना पूरा आडम्बर फैला लिया।

◆  फटी और अनिश्चित रंग वाली दरी, दूसूती का बिछौना, मैले फटे कपड़ों की गठरी, लाल चिलम का मुकुट पहने नारियल का काला हुक्का, सुरती का बटुआ, काली मिरजई, तैल स्नान से चिकनी बनी गाँठदार लाठी और निवाड़ से बनी खटपटी
रेखाचित्रकार ने बूढ़े बाबा के सामान के साथ उनका हुलिया भी पेश कर दिया।

◆  ‘सिर का अग्रभाग खल्वाट होने के कारण चिकना चमकीला था, पर पीछे की ओर कुछ सफेद केशों को देखकर जान पड़ता था कि भाग्य की कठोर रेखाओं से सभीत होकर वे दूर जा छिपे हैं। छोटी आँखों में विषाद, चिंतन और ममता का ऐसा सम्मिश्रित भाव था जिसे एक नाम देना संभव नहीं। लंबी नाक के दोनों और खिंची हुई गहरी रेखाएँ दाढ़ी में विलीन हो जाती थीं। ‘

◆ नंगे पाँव और घुटनों तक ऊँची धोती पहने इस बूढ़े बाबा की लंबी सफेद दाढ़ी के बीच कुछेक काले बाल विचित्र-सा आकर्षण पैदा करते थे। यही थे ठकुरी बाबा।

◆ ठकुरी बाबा’ महादेवी के कल्पवास के दौरान उनसे आश्रय माँगने आई ग्रामीण स्त्रियों की टोली तथा उनके साथ आए बूढ़े व्यक्ति का चित्रण है।

◆ ठकुरी बाबा मस्तमौला और  फक्कड़  स्वभाव के थे।

◆ वे एक भावुक, सरल, उदार एवं सहज स्वभाव वाले ग्रामीण थे।

◆  लोगों की मनोरंजन करना उनका पैतृक धंधा था। उन्होंने परिवार और संपत्ति की कभी चिंता नहीं की।

◆ ठकुरी बाबा व्यावसायिक बुद्धि से परे काव्योपजीवी भावुक व्यक्ति हैं।

◆  ठकुरी बाबा की काव्य मंडली में उनके रिश्तेदार ही हैं।

◆  महादेवी ने इस रेखाचित्र में यथास्थान अंधपरम्परा एवं रूढ़ियों समाज को दर्शाया है।

◆  ठकुरी बाबा  के चरित्र ने महादेवी को काफी प्रभावित किया।

◆  ठकुरी बाबा चारण(भाट) वंश के थे तथा पैतृक धंधे के कारण अपना घर नहीं बसा सके थे परंतु पत्नी की मृत्यु के बाद अपनी बेटी की जिम्मेदारी ने उन्हें सही गृहस्थ बनाया।

◆ भौजाइयों ने ठकुरी की पत्नी की निंदा का अभियान जारी रखा ताकि उसकी गर्दन पर मेहनत-मशक्कत का कठोर जुआ लादा जा सके। रेखाचित्रकार महादेवी की टिप्पणी है- ‘ठकुरी बेचारे कवि ठहरे। शुष्क यथार्थता उनकी भाव- बोझिल कल्पना के घटाटोप में प्रवेश करने के लिए रंध्र ही न पाती थी।’

◆ सौतेले भाइयों की पत्नियों की निंदा के कारण ठकुरी की पत्नी दुनिया छोड़ गई थी। (प्रसूति ज्वर से पीड़ित होकर )

◆ ठकुरी बाबा की पत्नी डेढ़ वर्ष की  बेटी को छोड़कर मर गयी थी।

◆ बेटी बेला के लिए वही बाप भी थे और माँ भी।

◆ प्रथम पत्नी की मृत्युपरांत से सौतेले बड़े भाई के नेतृत्व में जीवनयापन करते हैं।

◆ ठकुरी बाबा की बेटी का नाम :-बेला

◆ ठकुरी का दामाद चेचक के कारण अंधा हो गया।

◆ ठकुरी का दामाद और घर चलाने वाली बड़ी मौसी भी उनकी काव्य मंडली का हिस्सा बन गए।

◆ ठकुरी चिकारा बजाकर भक्ति के पद गाते हैं, दामाद खंजरी पर तान संभालता है, बूढ़ी मौसी तन्मय होकर मंजीरा झनकार देती है और बेला घर का झंझट सिर पर ओढ़े भागती-दौड़ती रहती है। ठकुरी के घर पर अब एक भैंस, दो पछाहीं गायें और थोड़ी-बहुत खेती है। अतः जीवन-यापन की मूलभूत समस्या अब उन्होंने हल कर ली है।

◆ कोई गुड़ की एक डली के बदले उनसे आधा सेर आटा ले जाता है, कोई चार मिर्च देकर आलू शकरकंद का फलाहार पा जाता है, कोई तोला भर दही के बदले कटोरा भर चावल उड़ा ले जाता है और रत्ती भर घी देकर लुटिया भर दूध मांग लेता है।

◆ कल्पवास के लिए वे जिस कुटुम्ब या टोली को साथ लाए हैं, उनमें विधवा ठकुराइन हैं जो परिवार की उपेक्षा के कारण ठकुरी की सहज अनुकम्पा पाकर फूली न समाती है।

◆ अपने पति से उपेक्षित एक सहुआइन हैं जो दो किशोर बालकों को पालने के लिए कठिन संघर्ष से गुज़र रही हैं।

◆ ठकुरी के कुटुम्ब में एक विधुर काछी अपनी दो बेटियों के साथ मौजूद हैं। इनके अतिरिक्त एक ब्राह्मण दम्पत्ति भी हैं।

◆ भक्तिन और ठकुरी समेत पूरा कुटुम्ब कल्पवास की अवधि में माघी पूर्णिमा के पहले आने वाली त्रयोदशी की रात लेखिका के यहाँ भजन-कीर्तन का आयोजन करता है।

◆  ठकुरी चिकारा की खूंटी ऐंठ रहे थे, अंधा दामाद खजड़ी बजा रहा था, बेला आरती फूलबत्ती आदि का काम संभाले थी। सब मिल-जुलकर गीत गाती हैं। औरतें भक्ति के गीत गाती हैं और ठकुरी ने अपने गीत सुनाए।

◆  महादेवी का कहना है- ‘हमारे सभ्यता- दर्पित शिष्ट समाज का काव्यानन्द छिछला और उसका लक्ष्य सस्ता मनोरंजन’ है

◆  महादेवी की स्मृति में उनके द्वारा गाया गया दूसरा गीत भी झंकृत हो उठता है- ‘जागिए कृपानिधान पंछी बन बोले ‘। रेखाचित्रकार को ऐसा प्रतीत होता है मानो इस प्रभाती के द्वारा वे जागरण का संदेश दे रहे थे।

◆  महादेवी के शब्दों में “सहुआइन ने पहले बादुर से झाँका, फिर एक पैर भीतर रखकर विनीत भाव से जो कहा, उसका आशय था कि अब दिये को विदा कर देना चाहिए, उसकी माँ राह देखती होगी, हँसी मेरे होठों तक आकर रूक गई। जब इनके लिए सब कुछ सजीव है, तब ये दीपक की माँ की और उसकी प्रतीक्षा की कल्पना क्यों न करें। बुझाये देती हूँ, कहने पर सहुआइन ने आगे बढ़कर आँचला की हवा से उसे बुझा दिया। बेचारी को भय था कि मैं शहराती शिष्टाचार हीनता के कारण कहीं फूँक से ही बुझा बैठूं । “

◆ कल्पवास की रात के बाद लेखिका को ठकुरी बाबा बाबा दो वर्ष बाद मिले। उनका शरीर काफी कमजोर हो चुका था परंतु उनके संगीत की तन्मयता अभी भी वही थी। अपनी जर्जर अवस्था में भी उनका संगीत लेखिका को जागरण का संदेश प्रतीत होता है।

◆ ‘ठकुरी बाबा’ में कल्पवास की घटनाओं के साथ-साथ उन्होंने भक्तिन के चरित्र के भी कुछ पहलुओं को उजागर किया है परंतु उनका केंद्र ठकुरी बाबा का चरित्र हो रहा है। हालांकि उन्होंने कल्पवास की प्रथा एवं धार्मिक विश्वासों पर भी प्रकाश डाला है।

◆ महादेवी को ठकुरी बाबा गाँवों में सहृदय व्यक्तियों के प्रतिनिधि लगते हैं, जो आज के शहरी पूँजीवादी व्यक्तिवाद के युग में नहीं मिलते।

◆  आज के पूँजीवादी तथा भागदौड़ के शहरी जीवन में ठकुरी बाबा जैसा चरित्र मिलना मुश्किल है।

◆ ‘ठकुरी बाबा’ द्वारा महादेवी वर्मा ने समाज के दलित, शोषित एवं वंचित वर्ग के प्रति चेतना जगाने की कोशिश की है।

◆ महादेवी वर्मा का उद्देश्य लोगों को अंधविश्वास, सामाजिक असमानता तथा सड़े गले रीति रिवाजों के चंगुल से आजाद कराना है।

◆ महादेवी वर्मा ने इस रेखाचित्र द्वारा कुलीन और जन संस्कृति के अंतर को दिखाया है।

◆  इस रचना के द्वारा उन्होंने पुरुष प्रधान समाज में पितृसत्तात्मक समाज में स्त्रियों के उत्पीड़न, स्त्रियों की निस्सहायता, मजदूरों-किसानों के शोषण एवं उपेक्षा को दिखाना चाहा है।

◆ महादेवी के रेखाचित्र संस्मरणात्मक है, जिनमें उन्होंने अपने संपर्क में आए केंद्रीय पात्र की स्मृतियों को क्रमबद्ध रूप में घटनात्मक शैली में प्रस्तुत किया है।

◆ महादेवी इस रेखाचित्र में जिन पात्रों का चित्रांकन करती हैं वे सभी पात्र मुख्यरूप से स्त्री, दलित और बूढ़े हैं एवं ग्राम परिवेश से सम्बद्ध है।

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