तमस उपन्यास के महत्वपूर्ण कथन (tamas upanyas ke mahatvpurn kathan)

                  💐 तमस उपन्यास 💐

◆ रचयिता :-  भीष्म साहनी

◆ प्रकाशन :- 1973

◆ दो खण्डों में विभाजित

◆ यह उपन्यास  विभाजन कालीन दंगों तथा उसके पीछे कार्य कर रही अंग्रेजों की नीति ‘फूट डालो और राज्य करो का पर्दाफाश करता है।

◆  केन्द्र स्थल  :-  तत्कालीन पंजाब के पश्चिमी भाग( मुसलमानों का बाहुल्य स्थल।)

◆ उपन्यास में सिर्फ पाँच दिन की घटनाओं को चित्रित किया गया है।

उपन्यास का मुख्य उद्देश्य :-  अंग्रेजों द्वारा सांप्रदायिक दंगे की भूमिका प्रस्तुत करना और दंगों के परिणामस्वरूप भीषण विनाश का दृश्य प्रस्तुत करना है ।

◆ भीष्म साहनी ने अपनी आत्मकथा ‘आज के अतीत’ में तमस उपन्यास के संबंध में यह कहा है :-

● मुझे ठीक से याद नहीं कि कब बम्बई के निकट, भिवंडी नगर में हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए। पर मुझे इतना याद है कि उन दंगों के बाद मैंने ‘तमस’ लिखना आरम्भ किया था।

● भिवंडी नगर बुनकरों का नगर था, शहर के अन्दर जगह-जगह खड्डियाँ लगी थीं, उनमें से अनेक बिजली से चलनेवाली खड्डियाँ थीं। पर घरों को आग की नज़र करने से खड्डियों का धातु बहुत कुछ पिघल गया था। गलियों में घूमते हुए लगता हम किसी प्राचीन नगर के खंडहरों में घूम रहे हों। पर गलियाँ लाँघते हुए, अपने क़दमों की आवाज़, अपनी पदचाप सुनते हुए लगने लगा, जैसे मैं यह आवाज़ पहले कहीं सुन चुका हूँ। चारों ओर छाई चुप्पी को भी ‘सुन’ चुका हूँ। अकुलाहट भरी इस नीरवता का अनुभव भी कर चुका हूँ। सूनी गलियाँ लाँघ चुका हूँ ।

● पर मैंने यह चुप्पी और इस वीरानी का ही अनुभव नहीं किया था। मैंने पेड़ों पर बैठे गिद्ध और चीलों को भी देखा था। आधे आकाश में फली आग की लपटों की लौ को भी देखा था, गलियों सड़कों पर भागते क़दमों और रोंगटे खड़े कर देनेवाली चिल्लाहटों को भी सुना था, और जगह-जगह से उठनेवाले धर्मान्य लोगों के नारे भी सुने थे, चीत्कार सुनी थी।

● कुछेक दिन तक बम्बई में रहने के बाद में दिल्ली लौट आया। आमतौर पर मैं शाम के वक्त लिखने बैठता था। मेरा मन शाम के वक़्त लिखने में लगता है। न जाने क्यों। पर उस दिन नाश्ता करने के बाद में सुबह-सवेरे ही मेज़ पर जा बैठा ।

● यह सचमुच अचानक ही हुआ, पर जब कलम उठाई और कागज़ सामने रखा तो ध्यान रावलपिंडी के दंगों की ओर चला गया। कांग्रेस का दफ़्तर आँखों के सामने आया। कांग्रेस के मेरे साथी एक के बाद एक योगी रामनाथ, बशीजी, बालीजी, हकीमजी, अब्दुल अजी …..मास्टर अर्जुनदास…. गया। उनके चेहरे आँखों के सामने घूमने लगे अज़ीज़, जरनैल डूबता चला

◆  इस उपन्यास में आजादी के ठीक पहले का पंजाब और सांप्रदायिकता भय के अंधेरे में डूबे वे चंद दिन, धार्मिक जड़ता को इस्तेमाल करती पूँजीपरस्त राजनीति और उससे रक्त-रंजित हजारों बेकसूर लोग, सूअर और गाय को बचा लेने का पुण्य और उसी के लिए होती हुई मनुष्य की हत्याएँ….इस दंगे-फसाद के पीछे खतरनाक मस्तिष्क ।

◆  मुरादअली के माध्यम से अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर रिचर्ड नत्यू से सुअर मरवाकर मस्जिद की सीढ़ियों पर डलवा देता है । प्रतिक्रियास्वरूप मुसलमान गाय को काटकर धर्मशाला के सामने फेंक देते हैं। परिणाम स्वरूप सारे शहर और फिर उसके पश्चात् कस्बे और ग्रामों में भीषण साम्प्रदायिक दंगा फैल जाता है।

◆ डिप्टी कमिश्नर इसे रोकने का कोई प्रयास नहीं करता है। जब भीषण नर-संहार हो चुकता है, तभी शांति व्यवस्था का प्रयास किया जाता है। पुलिस की चौकियाँ बिठाई जाती हैं । अमन कमेटी की स्थापना कराई जाती है। सारी घटना पर अंत में उपन्यासकार यही निष्कर्ष निकालता है कि – “फिसाद कराने वाला भी अंग्रेज, फिसाद रोकने वाला भी अंग्रेज, भूखों मारने वाला भी अंग्रेज, रोटी देनेवाला भी अंग्रेज, घर से बेघर करने वाला भी अंग्रेज, घरों में बसाने वाला भी अंग्रेज।”

           💐 उपन्यास के महत्वपूर्ण कथन 💐

(1.) “सुअर की पिछली टाँग पकड़कर सुअर को उलटा कर दो। गिरा हुआ सुअर जल्दी से उठ नहीं सकता। फिर उसके गले की नस काट दो। सुअर मर जाएगा।” (नत्थू के  साथी भीखू चमार ने कहा )

(2.) “हमने कभी सुअर मारा नहीं मालिक, और सुनते हैं सुअर मारना बड़ा कठिन काम है। हमारे बस का नहीं होगा हुजूर खाल-बाल उतारने का काम तो कर दें। मारने का काम तो पिगरीवाले ही करते हैं।”(नत्थू ने मुरादअली को कहा)

(3.)  लैम्प की रोशनी के दायरे में उस आदमी का केवल पाजामा ही नज़र आ रहा था। लगता था धड़ के बिना दो टाँगें चली आ रही हैं।
* उस आदमी :- बख्शीजी के लिए

(4.) “मुल्ला मियाँ मिशालची, तीनों एक समान, लोकाँ नूँ दरसण चाणना, आप नौ जाण ।”(बख्शीजी के नज़दीक पहुँचने पर अज़ीज़ ने छूटते ही शेर पढ़ा )

(5.) “मैं सुबह-सुबह तुम जैसे आदमी के मुँह नहीं लगना चाहता। दूर रहो तुम।” (जरनैल ने कश्मीरीलाल से कहा)

(6.) “मैं तुम्हारा पर्दाफाश करूँगा। तुम्हारा कम्युनिस्टों के साथ उठना-बैठना है मैं जानता हूँ। देवदत्त कम्युनिस्ट के साथ कुबड़े हलवाई की दूकान पर मैंने तुम्हें छैनामुर्गी खाते देखा है।”(जरनैल ने कश्मीरीलाल से कहा)

(7.) “मैंने यह तो नहीं कहा कि मेहताजी ने टिकट का वादा किया है। टिकट देने का अख्तियार तो प्रान्तीय कमेटी को है और सिफारिश जिला कमेटी करेगी। अन्दरखाते प्रधान और मन्त्री फैसला कर लें तो अलग बात है पर वह काम हम नहीं करने देंगे दोनों प्रधान और मन्त्री खड़े सुन रहे हो। बड़े-बड़े ठेकेदारों को टिकट मिलने लगा तो बस कांग्रेस ख़त्म हुई समझो ।” (शंकर  मेहताजी के संबंध सभी प्रार्टी कर्त्तायों से कहा रहा है)

(8.) ” इस वक्त चुप रहिए मेहताजी, यह कांग्रेस के पैसे से नहीं खा रहा हूँ, अपने पैसे से खा रहा हूँ। अपना ज़र खर्चा है। आपके साथ लौटकर बातें होंगी। मैंने आप-जैसे बहुत देखे हैं।”(शंकर ने कहा)

(9.) “देख लेना मेहताजी, हम प्रभातफेरी शुरू कर देंगे। तीन गलियाँ लाँघ जाएँगे तो मास्टर दौड़ा आएगा। कहेगा बछड़ा दूध पी गया था, मैं क्या करता। इस तरह ये लोग काम करते हैं।” (बख्शीजी ने मेहताजी से कहा)

(10.)  रामदास ने प्रभातफेरी पर गीत गाया :-
“जरा वी लगन आज़ादी दी
लग गई जिन्हीं दे मन दे विच ।
ओह मजनूँ वण फिरदे ने
हर सेहरा हर बन दे विच ।”

(11.) फ़कीर का गीत :-
“तैनूँ गाफला जाग न आई चिड़ियाँ बोल रहियाँ…!” [ ऐ गाफिल, तू अभी तक सोया पड़ा है जबकि पक्षी चहचहाने लगे हैं ]

(12.)  “कांग्रेस सबकी जमात है। हिन्दुओं की, सिखों की, मुसलमानों की आप अच्छी तरह जानते हैं महमूद साहिब, आप भी पहले हमारे साथ ही थे।”(मंडली की ओर से एकबड़ी उम्र के आदमी ने कहा)

(14.) “अज़ीज़ और हकीम हिन्दुओं के कुत्ते हैं। हमें हिन्दुओं से नफरत नहीं, इनके कुत्तों से नफरत है।”( वयोवृद्ध कांग्रेसी ने कहा)

(15.) “मौलाना आज़ाद हिन्दुओं का सबसे बड़ा कुत्ता है। गांधी के पीछे दुम हिलाता फिरता है, जैसे ये कुत्ते आपके पीछे दुम हिलाते फिरते हैं।”( वयोवृद्ध कांग्रेसी ने कहा)

(16.)  “आज़ादी सबके लिए है। सारे हिन्दुस्तान के लिए है।” “हिन्दुस्तान की आज़ादी हिन्दुओं के लिए होगी, आज़ाद पाकिस्तान में मुसलमान आजाद होंगे।”
( वयोवृद्ध कांग्रेसी ने कहा)

(17.) “गांधीजी का फरमान है कि पाकिस्तान उनकी लाश पर बनेगा, मैं भी पाकिस्तान नहीं बनने दूँगा।”(गान-मंडली में से एक दुबला-पतला सरदार ने कहा)

(18.) “मुझे कोई चुप नहीं करा सकता। मैं नेताजी सुभाष बोस की फौज़ का आदमी हूँ। ” (जरनैल ने कहा)

(19.) ” यह बड़ी ऐतिहासिक घाटी है। हिन्दुस्तान में आनेवाले सभी हमलावर इसी रास्ते से आए थे। मध्य एशिया से आनेवाले भी और मंगोलिया से आनेवाले भी।”
(रिचर्ड ने लीजा से कहा)

(20.).”सभी सिखों के नाम के पीछे सिंह लगा रहता है।” (रिचर्ड ने लीजा से कहा)

(21.) “बुद्ध के बुतों की यही सबसे बड़ी खूबी है। एक हल्की सी मुस्कान बुद्ध के होंठों पर खेलती रहती है।” (रिचर्ड ने लीजा से कहा)

(22.) ” बहुत चालाक नहीं बनो, रिचर्ड मैं सब जानती हूँ। देश के नाम पर लोग तुम्हारे साथ लड़ते हैं, और धर्म के नाम पर तुम इन्हें आपस में लड़ाते हो।”( लीजा ने रिचर्ड  से कहा)

(23.) “मतलब गलियाँ साफ़ करने से नहीं, इसके पीछे जो जज्बा काम कर रहा है।”(बुजुर्ग ने कहा)

(24.) “नालियाँ साफ़ करने से स्वराज्य नहीं मिलेगा।”(शंकर ने कश्मीरीलाल से कहा)

(25.) ” हवा में छोड़ा हुआ अग्निबाण आगे बढ़ता है, उसकी नोक घर्षण के कारण चमकती है, उसमें से अंगारे फूटते हैं । महाभारत के युद्ध में ऐसा ही अग्निबाण छोड़ा गया था। हवा को काटता चला जा रहा था । फिर वह कौरवों के एक योद्धा की ढाल से जा लगा, ढाल में से अंगारे फूटने लगे । पर तीर फिर भी आगे बढ़ता गया।”(मास्टरजी का कथन)

(26.) “जिस मनुष्य में योगशक्ति है वह सब कुछ कर सकता हिमालय की तलहटी पर एक योगीराज योग साधना कर रहे थे। उन्हें सिद्धि प्राप्त थी। एक दिन जब वह समाधि में थे तो एक म्लेच्छ उनकी समाधि भंग करने के लिए वहाँ जा पहुँचा। म्लेच्छ तो गन्दे लोग होते हैं, म्लेच्छ नहाते नहीं, पाखाना करके हाथ नहीं धोते, एक-दूसरे का झूठा खा लेते हैं, समय पर शौच नहीं जाते, तो वह गन्दा म्लेच्छ योगीजी के सामने खड़ा उन्हें घूरता रहा उसकी कलुषित छाया पड़ने की देर थी कि योगीजी ने अपने नेत्र खोले, आँखों में से ऐसी दैवी ज्योति निकली कि म्लेच्छ वहीं खड़ा खड़ा भस्म हो गया।…”(मास्टर जी ने रणवीर से कहा)

(27.) ” मगर ताक़त तो ब्रिटिश सरकार के हाथों में है और आप ब्रिटिश सरकार के नुमाइन्दा हैं। शहर की रक्षा तो आप ही की जिम्मेदारी है । “( रिचर्ड ने कहा)

(28.)”अगर शहर में पुलिस गश्त करने लगे, जगह-जगह फौज़ की चौकियाँ बिठा दी जाएँ तो दंगा-फसाद नहीं होगा, स्थिति काबू में आ जाएगी।”(बख्शीजी ने रिचर्ड से कहा)

(29.)“मुसलमान का दुश्मन हिन्दू नहीं है, मुसलमान का दुश्मन वह मुसलमान है जो दुम हिलाता हिन्दुओं के पीछे-पीछे जाता है, उनके टुकड़ों पर पलता है….।”(मौलादाद  ने हकीमजी से कहा)

(30.)”ओये उड़ी उड़ी कियाँ तक्कणै
माहड़े सुत्थणे नी चूड़ियाँ ।” ( क्यों तुम झुक-झुककर मेरी सलवार के चुन्नटों को घूरे जा रहो हो ? )[मज़दूर गाना गा रहा है】

(31.) “पीछे से मरी रोड तक और आगे से कम्पनी बाग तक सारा इलाका हिन्दुओं का है। चारों तरफ खाते-पीते हिन्दू लोग रहते हैं। आप लोगों को कोई खतरा नहीं ।” (देवदत्त का कथन)

(32.) “सभी गालियाँ देते हैं, न काम, न धाम दो-दो पैसे के पाँड़ियों, मज़दूरों, कुलियों को इकट्ठा करता फिरता है, उन्हें लेक्चर झाड़ता फिरता है, हरामी, मुँह पर दाढ़ी नहीं उतरी, लीडर बन गया है, सुअर का बच्चा “
(देवदत्त को परिवार वाले गालियां देते है)

(33.) “साथी का सैद्धान्तिक आधार कच्चा है। जज़्बात की रौ में बहकर कोई कम्युनिस्ट नहीं बनता, इसके लिए समाज विकास को समझना जरूरी है।” (साथी जगदीश को कहा गया)

(34.)”हाँ सरदार में इन्हें जानता हूँ महमूद धोबी हमारे घर के कपड़े धोता है, और पीर की कब्र के सामने जो मियांजी रहते हैं वे मेरे दादाजी के साथ बहुत उठते-बैठते हैं।” (रणवीर ने शम्भू से कहा)

(35.)”देखो जी, हम लोग चमड़े का काम करते हैं। जानवरों की खाल खींचना, उन्हें मारना हमारा काम है। तूने सुअर को मारा। अब वह उसे मस्ज़िद के सामने फेंके या हाट-बाज़ार में बेचे इससे हमें क्या? और तुम्हें क्या मालूम वही सुअर था या नहीं था जिसे मसीत के सामने फेंका था ? तेरा इसमें क्या है?”(नत्थू की पत्नी ने कहा)

(36.) “मैं तो इन पैसों से धोतियाँ लूँगी, ज़रूर लूँगी। तेरी कमाई के पैसे हैं। मेहनत की मजूरी है।” (नत्थू की पत्नी ने कहा)

(37.) “जब तू मेरे पास होती है तो मुझे लगता है मेरे पास सबकुछ है।”(नत्थू भावोदेलित होकर पत्नीसे बोला)

(37.) “जिसका दिल साफ़ होता है उसे भगवान कुछ नहीं कहते।” (नत्थू की पत्नी बोली)

(38.)”ये अशरफ और लतीफ होंगे। वही गाँव के लीगी हैं। वहीं पाकिस्तान के नारे लगाते रहते हैं।’ हरनामसिंह ने मन ही मन कहा।

(39.) “जहाँ सबको जानता था, वहाँ किसी ने आसरा नहीं दिया, सामान लूट लिया और घर को आग लगा दी। यहाँ जाननेवालों से क्या उम्मीद हो सकती है? उन लोगों के साथ तो मैं खेल बड़ा हुआ था।” (हरनामसिंह ने कहा)

(40.) “करमावालियों दरवाज़ा खोलो, असी मुसीबत दे मारे आए हाँ।” (बन्तो ने  ऊँची आवाज़ में कहा)
* करमावालियों :- मुस्लिम महिला अकरो और उसकी सास के लिए

(41.)”तेरे हाथ का दिया अमृत बराबर है बहन, हम तुम्हारा किया कभी नहीं उतार सकते।” (हरनामसिंह ने कहा)

(42.)  “मेरा घरवाला और बेटा दोनों गाँववालों के साथ बाहर गए हुए हैं। वे अभी लौटते होंगे। मेरा घरवाला तो अल्लाह से डरनेवाला आदमी है, तुम्हें कुछ नहीं कहेगा, पर मेरा बेटा लोगी और उसके साथ और लोग भी हैं । तुमसे वे कैसा सलूक करेंगे, में नहीं जानती। तुम अपना नफा-नुकसान सोच लो।”(घर की मालकिन राजो बोली)

(43.) हरनामसिंह  शिथिल-सी आवाज़ में बोला, “सत बचन, जो वाहगुरु को मंजूर होगा वहीं होगा। तेरे दिल में रहम जगा, तूने दरवाज़ा खोल दिया। अब तू कहेगी बाहर चले जाओ तो हम बाहर चले जाएँगे। चल बन्तो, उठ…”

(44.) “तुमने मेरे घर का दरवाज़ा खटखटाया है, दिल में कोई आस लेकर आए हो। जो होगा देखा जाएगा। तुम लौट आओ ।”(घर की मालकिन राजो बोली)

(45.)  “हमारा ट्रंक है, बड़ा काला ट्रंक हमारी दूकान लूटते रहे हैं।” (हरनामसिंह ने अपनी पत्नी से कहा)
* अकरों का ससुर लेकर आया ट्रक

(46.)  “एहसान अली है। मैं इसे जानता हूँ। इसका मेरे साथ लेन-देन रहा है।” ” (हरनामसिंह ने अपनी पत्नी से कहा)

(47.) “ताला क्यों तोड़ती हो बेटी, यह लो चाभी, यह हमारा ही ट्रंक है।” (हरनामसिंह ने बोला)

(48.) “एहसान अली में हरनामसिंह हूँ, तुम्हारी घरवाली ने हमें यहाँ पनाह दी है। गुरु महाराज तुम्हें सलामत रखें। यह ट्रंक हमारा है, पर अब इसे तुम अपना ही समझो। अच्छा हुआ जो यह तुम्हारे हाथ लगा, किसी दूसरे के हाथ नहीं लगा ।”( हरनामसिंह ने एहसान अली से कहा)

(49.) “अम्मा ने इन्हें पनाह दी है। मैंने कहा भी था काफिर हैं, इन्हें अन्दर मत घुसने दो, पर अम्मा ने मेरी बात नहीं मानी।” (अकराँ ने ससुर से कहा)

(50) “मैं तो तुमसे कुछ नहीं कहूँगा, हरनामसिंह, तुम मेरे घर आए हो, पर अब तुम यहाँ से चले जाओ। मेरे बेटे को पता चल गया कि तुम यहाँ पर हो तो वह तुम्हारे साथ अच्छा सुलूक नहीं करेगा।”(एहसान अली ने हरनामसिंह कहा)

(51.)  “गाँववालों को भी पता चले बताया है? तेरे पेट में बात नहीं पचती ?…तू क्या चाहता है, रमज़ाना ? घर में ख़ून करेगा? घर में पनाह लेनेवाले को मारेगा? यह आदमी हमारी जान-पहचान का है, हम इसके देनदार रहे हैं।”(राजो ने अपने पुत्र रमजान अली से कहा)

(52.) “बहुत बक-बक नहीं कर माँ, शहर में इन काफिरों ने दो सौ मुसलमान हलाल कर डाले हैं।”(रमजान अली ने अपनी माँ राजो से कहा)

(53.) “मैं के जाणा भैण, अपणा – अपणा नसीबा चहवाँ पासे अग लगी है।” ( मैं क्या जानूँ बहन ? मैं नहीं जानती मैं तुम्हारी जान बचा रही हूँ या तुम्हें मौत के मुँह में झोंक रही हूँ। चारों तरफ़ आग लगी है ।)【  राजो ने बन्तो से कहा】

(54.)राजो ने अपना हाथ अपने कुर्ते की जेब में डाला और सफेद कपड़े में लिपटी एक छोटी-सी पोटली निकाल लाई।
“एह तुसाँडे सन्दूक विचों मिले हन। मैं कडूढ लियायी हाँ तुसाँडे ऊपर
“यह लो, यह तुम्हारी चीज़ है।” “क्या है राजो बहन ?”
औखा वेला आया है, ज़ेवर कोल होये ताँ सहारा होवेगा।”
(ये तुम्हारे ट्रक में से मिले हैं, तुम्हारे दो गहने हैं। मैं निकाल लाई हूँ तुम्हारे आगे कठिन समय है, पास में दो गहने हुए तो सहारा होगा ।)

(55.) “वाहगुरु तुम्हें सलामत रखे बहन, अच्छे करम किए थे जो तुमसे मिलना हुआ।” (बन्तो ने राजो से कहा)

(56.)”अभी इसने कलमा नहीं पढ़ा है। जब तक यह कलमा नहीं पढ़ता यह काफिर है, मुसलमान नहीं है।(रमजान अली ने कहा)

(57.)”फिसाद करवानेवाला भी अंग्रेज, फिसाद रोकनेवाला भी अंग्रेज़ भूखों मारनेवाला भी अंग्रेज़, रोटी देनेवाला भी अंग्रेज़, घर से बेघर करनेवाला भी अंग्रेज़, घरों में बसानेवाला भी अंग्रेज़…”  ( बख्शीजी ने कहा)

(58.)“कितने हिन्दू मरे, कितने मुसलमान मरे, रिचर्ड ? (लीजा ने रिचर्ड  से कहा)

(59.) “अब हम एक साथ घूम-फिर सकते हैं। यहाँ का देहाती इलाका सचमुच बड़ा सुन्दर है उस दिन, इस सैदपुर में ही, फलों के बाग के पास गुज़रते हुए मैंने लार्क पक्षी की आवाज़ सुनी। इस मौसम में वहाँ लार्क पक्षी मिलता है। मुझे नहीं मालूम था कि इस गर्म देश में भी यह पक्षी रहता होगा मैं हैरान हो गया। और भी तरह-तरह के पक्षी मिलते हैं जिन्हें तुमने पहले कभी नहीं देखा होगा ।”(रिचर्ड ने लीजा से कहा)

(60.) “तुम कैसे जीव हो रिचर्ड, ऐसे स्थानों पर भी तुम नए-नए पक्षी देख सकते हो, लार्क पक्षी की आवाज़ सुन सकते हो?”
(लीजा ने रिचर्ड से कहा)

(61.) लीज़ा, सिविल सर्विस हमें तटस्थ बना देती है। हम यदि हर घटना के प्रति भावुक होने लगें तो प्रशासन एक दिन भी नहीं चल पाएगा।”(रिचर्ड ने लीजा से कहा)

(62.)”चिड़ी जितनी तो तेरी जान है, तुझ पर हमला करके किसी ने लेना क्या है?” (शंकर ने कश्मीरीलाल से कहा)

(63.) हमला क्या पहलवानों पर किया जाता है? हमला हमेशा कमज़ोर लोगों पर किया जाता है।” (जीतसिंह ने कहा)

(64.)”बापू ने कहा कि हिंसा मत करो। अब फ़िसाद के वक्त मुझ पर कोई हमला कर दे तो मैं क्या करूँ? क्या उस वक्त मैं उसके सामने हाथ जोड़ हूँ-मार से भाई, गर्दन झुका हूँ, काट ले भाई गर्दन क्या करूँ?”  (कश्मीरीलाल ने बख्शीजी से कहा)

(64.) “गांधीजी ने कहा है कि खुद तशद्दुद नहीं करो। गांधीजी ने यह कहीं नहीं कहा कि कोई तुम पर हमला करे तो तुम उसका जवाब ही नहीं दो।” (शंकर ने कहा)

(65.)“ तलवार में तो अपनी ताकत लगती है ना। पिस्तौल में तो बस घोड़ा दबाते जाओ और मारते जाओ।”(शंकर का कथन)

(66.)”सूरे नियें धीये ज़हर नही।”
( मिठाई है, सुअर की बच्ची, ज़हर नहीं है ।) 【अल्लाहरक्खा ने प्रकाशो से कहा】
*  मिठाई :- सफ़ेद बर्फी

(67.) “ऐसा खूबसूरत शहर, सरदारजी, जैसे दुल्हन खड़ी हो।” (हयातबख्श ने कहा)
* खूबसूरत शहर :- रंगून

(68.)”शाम को जब रोशनी हो तो चारों तरफ़ जगमग, समन्दर का किनारा, ऐसी सजधज आपको क्या बताऊँ, जैसे दुल्हन खड़ी हो साफ-सुथरी सड़कें, देखते औल नहीं भरती थी।”(हयातबख्श सरदारजी से रंगून शहर के बारे बता रहा था)

(69.)“जुए के अड्डे चलाता है। दो अड्डे हैं उसके। पुलिसवालों के साथ मिलकर अड्डे चलाता है। अब शहर में गांधीजी आएँ, नेहरूजी आएँ और उनके पीछे-पीछे नाचता फिरे, तो इससे वह कांग्रेसी हो जाता है? खादी वह नहीं पहनता।” ( लाला श्यामलाल  आँकड़ा बाबू को कान में मंगलसेन के संबंध में रहा था)
* मंगलसेन  :- जिला कमेटी का सदस्य

(70.)“अमन तो तुम्हारे साहब ने करवा दिया है। फ़साद करवाने के बाद अब अमन करवा रहा है।”(मनोहरलाल का कथन)

 

तमस उपन्यास का सारांश

तमस  उपन्यास के पात्रो का परिचय

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