दिल्ली दरबार दर्पण निबंध, भारतेन्दु हरिश्चंद्र(dilli darbar darpan nibandh)

                 💐 दिल्ली दरबार दर्पण 💐

निबंधकार – भारतेंदु हरिश्चंद्र

◆ इस निबंध में 1877 ई. में लगे दिल्ली दरबार का वर्णन मिलता है।

◆ यहाँ भारतेंदु की राजभक्ति और देशभक्ति की मिश्रित भावना देखी जा सकती है।

◆  बड़े शासनाधिकारी राजाओं को  :- एक  रेशमी  झड़ा और सोने का तगमा मिला।

◆ झडे़ बारे जानकारी :-
● पीतल के चमकीले मोटे डडो  पर राजराजेश्वरी का एक मुकुट बना था।
● एक पट्टी लगी थी जिस पर झडा पाने वाले राजा का नाम लिखा था।
● फरहरे पर जो डंडे से लटकता था स्पष्ट रीति पर उन के शस्त्र आदि के चिन्ह बने हुए थे।

◆ झंडा और तगमा देने के समय श्रीयुत वाइसराय ने प्रत्येक राजा से क्या  कहा?
“मैं श्रीमती महारानी की तरफ से यह झंडा खास आप के लिये देता हू, जो उनके हिन्दुस्तान की राजराजेश्वरी की पदवी लेने का यादगार रहेगा। श्रीमती को भरोसा है कि जब कभी यह झंडा खुलेगा आप को उसे देखते हो केवल इसी बात का ध्यान न होगा कि इगलिस्तान(इग्लैण्ड) के राज्य के साथ आप के खैरखाह राजसी घराने का कैसा दृढ संबंध है। मैं श्रीमती महारानी हिन्दुस्तान की राजराजेश्वरी की आज्ञानुसार आप को यह तगमा भी पहनाता हू ईश्वर करे आप इसे बहुत दिन तक पहिने और आप के पीछे यह श्राप के कुल मैं बहुत दिन तक रह कर उस शुभ दिन को याद दिलावे जो इस पर छपा है।”

◆  किलात के खा को भी झंडा नहीं मिला।

◆ किलात के खा को  मिला :- एक हाथी, जिस पर 4000 की लागत का हौदा था, जड़ाऊ गहने, घड़ी, कारचोबी कपड़े, कमखाब के थान वगैरह सब मिलाकर 25000 की चीजे तुहफे में मिलीं।

◆ लम्बी घनी  दाढ़ी के कारण खा साहिब का चेहरा बड़ा भयानक था ।

◆ खा साहिब को बैठने के लिये  वाइसराय के चबूतरे के नीचे वही कुर्सी मिली थी जो और राजाओ को मिली।

◆  खा साहिब के मिजान में रूखापन बहुत है।

◆ सब से बढ़कर बुद्धिमान हमें एक महात्मा देख पढ़े जिन से वाइसराय ने कहा कि आप का नगर तो तीर्थं गिना जाता है। इस समय दिल्ली को भी तीर्थं ही के समान पाते है।

◆  यह जगह तो सब तीर्थो से बढ़कर है, जहा आप हमारे “खुदा” मौजूद हैं।
* खुदा :- वाइसराय के लिए

◆  नौबाब साहिब ने कहा कि हमने और रईसों की तरह अपनी उम्र खेल कूद में नहीं गवांयी वरन् लड़कपन ही से विद्या के उपार्जन में चित्त लगाया।

◆ नौबाब साहिब ने बहुत से राजभक्ति के वाक्य भी कहे।

◆ वाइसराय ने उत्तर दिया कि हम आपकी (नौबाब साहिब) की अंग्रेजी विद्या पर इतना मुबारकबाद नहीं देते जितना अंग्रेजों के समान पर आप का चित्र होने के लिये।

◆ नौबाब साहिब ने कहा कि मै ने इस भारी अवसर के वर्णन में अरबी और फारसी का एक पद्य ग्रन्थ बनाया है जिसे मैं चाहता हू कि किसी समय श्रीयुत वाइसराय को सुनाऊं।

◆ 26 तारीख को सत्र के अन्त में महारानी तंजौर वाइसराय से मुलाकात करने के लिए आयी।

◆   महारानी तंजौर के साथ में उनके पति राजा सखाराम साहिन और दो लड़को के सिवाय उनकी अनुवादक मिसेस फर्थ भी थीं।

◆ महारानी अपनी भाषा की बोलचाल में बेगम भूपाल की तरह चतुर न थी, इसीलिये ज्यादा बातचीत मिसेस फर्थ से हुई।

◆  श्रीयुत वाइसराय ने  मिसेस फर्थ को प्रसन्न होकर ” मनभावनी अनुवादक” कहा।
* श्रीयुत का अर्थ :- श्रीमन

◆ वाइसराय की किसी बात के उत्तर मै एक बार महारानी के मुह से “यस” निकल गया, जिस पर श्रीयुत ने बडा हर्ष प्रगट किया कि महारानी अगरेजी भी बोल सकती है, पर अनुवादक मेम साहब ने कहा कि वे अगरेजी में दो चार शब्द से अधिक नही जानतीं ।

◆  श्रीयुत वाइसराय ने प्रत्येक से कहा कि आप से दोस्ती कर के हम अत्यन्त प्रसन्न हुए, और तगमा पहिनाने के समय भी बड़े स्नेह से उन की पीठ पर हाथ रख कर बात की।

◆ दिल्ली दरबार का महोत्सव महोत्सव का आयोजन :- 1जनवरी

◆  दिल्ली दरबार महोत्सव हिन्दुस्तान के इतिहास में सदा प्रसिद्ध रहेगा।

◆ एक बड़े भारी मैदान में नगर से पाच मील पर हुआ था।

◆ बीच में श्रीयुत वाइसराय का षटकोण चबूतरा था।

◆ जिसकी गुम्बदनुमा छत पर लाल कपड़ा बढ़ा और सुनहला रुपहला तथा शीशे का काम बना था।

◆ कंगुरे के ऊपर कलसे की जगह श्रीमती राज- राजेश्वरी का सुनहला मुकुट लगा था।

◆ इस चबूतरे पर श्रीयुत वाइसराय अपने राजसिंहासन मै सुशोभित हुए थे।

◆  श्रीयुत वाइसराय के बगल में एक कुर्सी पर लेडी साहिब बैठी थीं और ठीक पीछे खवास लोग हाथों में चवर लियेऔर श्रीयुत के ऊपर कारचोबी छत्र लगाए खड़े थे
* खवास :- विशिष्ट लोग

◆  वाइसराय के सिंहासन के दोनों तरफ दो पेज (दामन बरदार) थे:-
● एक  – श्रीयुत महाराज जम्बू का अत्यन्त सुन्दर सबसे छोटा राजकुमार
● दूसरा – कर्नल बर्न का पुत्र

◆  वाइसराय के चबूतरे के ठीक सामने कुछ दूर पर उस से नीचा एक अर्द्ध चन्द्राकार चबूतरा था, जिस पर शासनाधिकारी राजा लोग और उनके मुसाहिब, मदरास और बबई के गवर्नर, पंजाब, बंगाल और पश्चिमोत्तर देश के लेफ्टिनेन्ट गवर्नर, और हिन्दुस्तान के कमान्डर इन चीफ़ अपने  अधिकारियों समेत सुशोभित थे ।

◆ इस चबूतरे की छत बहुत सुन्दर नीले रंग के साटन की थी।

◆ जिस के आगे लहरियादार छज्जा बहुत सजीला लगा था लहरिये के बीच में सुनहले काम के चाँद तारे बने थे ।

◆ राजाओ की कुर्सिया भी नीली सायन से मढी थी और हर एक के सामने वे झन्डे गड़े थे जो उन्हे वाइसराय ने दिये थे।

◆  कुल  63 शासनाधिकारी राजा को इस चबूतरे पर जगह मिली थी।

◆ वाइसराय के सिंहासन के पीछे, परन्तु राजसी चबूतरे की अपेक्षा उस से अधिक पास, धनुषखण्ड के आकार की श्रेणिया चबूतरो की ओर बनी थीं जो दस भागो में बाट दी गई थी।यहां ऐसे राजाओं को जिन्हे शासन का अधिकार नहीं है और दूसरे सरदारों, रईसो, समाचारपत्रो के सम्पादकों और यूरोपियन तथा हिन्दुस्तानी अधिकारियों को  बैठने की जगह दी गई।(3000 के अनुमान होंगे।)

◆  किलात के खां, गोआ के गवर्नर जनरल, विदेशी राजदूत, बाहरी राज्यों के प्रतिनिधि समाज और अन्य देश सम्बन्ध कांसल लोगों की कुर्सियां भी श्रीयुत वाइसराय के पीछे सरदारो और रईसों की चौकियो के आगे लगी थीं ।

◆ दरबार के  दक्षिण तरफ 25000से ज्यादा सरकारी फौज हथियार बांधे लैस खडी थी।

◆  ऐसा समा दिखलाती थी जिसे देख जो जहां था वहीं हक्का – बक्का हो खडा रह जाता था।

◆ वाइसराय के सिंहासन के दोनों तरफ हाइलैन्डर लोगों का गार्ड आव आनर और बाजेवाले थे।

●   बारह बजे श्रीयुत वाइसराय की सवारी पहुची और धनुष खंड आकार के चबूतरो की श्रेणियो के पास एक छोटे से खेमे के दरवाजे पर ठहरी सवारी पहुंचते ही बिल्कुल फौज ने शस्त्रों से सलामी उतारी पर तोपे नहीं छोड़ी गई।

◆ श्रीयुत ने जाकर स्टार व इण्डिया के परम प्रतिष्ठित पद के ग्रांड मास्टर का वस्त्र धारण किया।

◆ जब श्रीयुत राजसिंहासन वाले मनोहर चबूतरे पर चढ़ने लगे तो ग्रांड मार्च का बाजा बन्द हो गया और नेशनल ऐन्थेम अर्थात् ( गौड सेव दि क्वीन — ईश्वर महारानी को चिरंजीवी रखे) का बाजा बजने लगा और गार्डस आव आनर ने प्रतिष्ठा के लिये अपने शस्त्र झुका दिये।

◆ श्रीयुत ने मुख्यबन्दी ( चीफ़ हेरल्ड ) को आशा की कि श्रीमती महारानी के राजराजेश्वरी की पदवी लेने के विषय में अंग्रेजी में राजाज्ञापत्र पढ़ो।

◆ राज्यसिंहासन के चबूतरे के नीचे खड़े थे, तुरही बजाई और उसके बन्द होने पर मुख्य बन्दी ने नीचे की सीढ़ी पर खड़े होकर बड़े ऊचे स्वर से राजाज्ञापत्र पढ़ा।

◆ उस राजाज्ञापत्र के अनुसार जो 1 जनवरी सन् 1809 को राजसी मुहर होने के पीछे प्रकाश किया गया।

◆  हम ने यह पदवी ली “विक्टोरिया ईश्वर की कृपा से ग्रेट ब्रिटेन और आयरलैण्ड के संयुक्त राज की महारानी स्वधर्म रक्षिणी”।

◆ इस ऐक्ट में यह भी वर्णन है कि उस नियम के अनुसार जो हिन्दुस्तान के उत्तम शासन के हेतु बनाया गया था हिन्दुस्तान के राज का अधिकार, जो उस समय तक हमारी ओर से ईस्ट इण्डिया कम्पनी को सर्द था, अब हमारे निज अधिकार में आ गया और हमारे नाम से उसका शासन होगा ।

●  यूनाइटेड किंगडम और उसके आधीन देशों की राजसम्बन्धी पदवियों में नीचे लिखा हुआ वाक्य मिला दिया जाय, अर्थात् लैटिन भाषा मे “इन्डिई एम्परेट्रिक्स” [ हिन्दुस्तान की राज-राजेश्वरी ] और अंग्रेजी भाषा में “एम्प्रेस श्राव इन्डिया” ।

◆ चीफ़ हेरल्ड राजाज्ञापत्र को पढ़ चुका के बाद दरबार  में 101 तोपो की सलामी दी गई।

◆ श्रीयुत ने बड़े ही आदर के साथ दोनों हाथों से हिन्दुस्तानी रीति पर कई बार सलाम करके सब से बैठ जाने का इशारा किया। यह काम श्रीयुत का, जिस से हम लोगो की छाती दूनी हो गई,पायोनियर सरीखे अंग्रेजी समाचार पत्रों के सम्पादकों को बहुत बुरा लगा।

◆ इस राज के रईस और प्रजा जो अपनी  परम्परा की प्रतिष्ठा निर्विघ्न भोगते रहे और जिन की अपने उचित लाभों की उन्नति के यत्न में सदा रक्षा होती रही उनके वास्ते सरकार की पिछले समय की उदारता और न्याय आगे के लिये पक्की जमानत हो गई हैं ।

◆ पृथ्वी पर श्रीमती महारानी के अधिकार में जितने देश है जिन का विस्तार भूगोल के सातवें भाग से कम नहीं हैं और जिन में तीस करोड़ आदमी बसते है ।

◆ श्रीमती ने दृढ़ किया एक बड़ा भारी पैतृक धन समझती है जो रक्षा करने और अपने वश के लिये सपूर्ण छोड़ने के योग्य है, और उस पर अधिकार रखने से अपने ऊपर यह कर्त्तव्य जानती है कि अपने बड़े अधिकार को इस देश की प्रजा की भलाई के लिये यहा के रईसो के हक्को पर पूरा  ध्यान रख कर काम में लाये ।

◆ श्रीमती का यह राजसी अभिप्राय है कि अपनी पदवियों पर एक और ऐसी पदवी बढ़ावे जो आगे सदा को हिन्दुस्तान के सब रईसों और प्रजा के लिये इस बात का चिन्ह हो कि श्रीमती के और उन के लाभ एक हैं।

◆ राजसी घरानो की श्रेणियाँ जिनका अधिकार बदल देने और देश की उन्नति करने के लिये ईश्वर ने अंग्रेजी राज को यहाँ जमाया, प्रायः अच्छे और बड़े बादशाहो से खाली न थीं परन्तु उनके उत्तराधिकारियों के राज्यप्रबन्ध से उनके राज्य के देशो में मेल न बना रह सका।

◆ तैमूरलंग के नाश होने का कारण यह था कि उससे पश्चिम के देशों की कुछ उन्नति न हो सकी।

◆ सरकार के समभाव के कारण हर आदमी बिना किसी रोक – टोक के अपने धर्म के नियमों और रीति को बरत सकता है।

◆ राजराजेश्वरी का अधिकार लेने से श्रीमती का अभिप्राय किसी को मिटाने या दबाने का नहीं है।

◆  देश की शीघ्र उन्नति और उसके सब प्रान्तो की दिन पर दिन वृद्धि होने से अंग्रेजी राज के फल सब जगह प्रत्यक्ष देख पड़ते है ।

◆  आप लोगों ने इस भारी राज की भलाई के लिये उन प्रतिष्ठित लोगों से जो आप के पहले इन कामों पर नियत थे किसी प्रकार कम कष्ट नहीं उठाया है और आप लोग बराबर ऐसे साहस, परिश्रम और सचाई के साथ अपने तन, मन को अर्पण करके काम करते रहे जिस से बढ़ कर कोई दृष्टात इतिहासों मै न मिलेगा ।

◆ कीर्ति के द्वार सब के लिये नहीं खुले हैं परन्तु भलाई करने का अवसर सब किसी को जो उसकी खोज रखता हो मिल सकता है।

◆  मुझे विश्वास है कि अंग्रेजी सरकार की नौकरी में ‘कर्त्तव्य का ध्यान’ और ‘स्वामी की सेवा में तन, मन को अर्पण कर देना’ ये दोनों बाते ‘निज प्रतिष्ठा’ और ‘लाभ’ की अपेक्षा सदा बढ़कर समझी जायेगी।

◆ राजकाज सम्बन्धी और सेना सम्बन्धी अधिकारियो के विषय में जितनी गुणग्राहकता और प्रशंसा प्रगट करू थोड़ी है क्योंकि ये तमाम हिन्दुस्तान में ऐसे सूक्ष्म और कठिन कामों को अत्यन्त उत्तम रीति पर करते रहे हैं ।

◆ जो निज पौरुष से उन जातियों के बीच राज्य प्रबन्ध के कठिन काम को करते हो जिन की भाषा धर्म और रीतें आप लोगो से भिन्न हैं- मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि अपने – अपने कठिन कामों को दृढ़ परन्तु कोमल रीत पर करने के समय आप को इस बात का भरोसा रहे कि जिस समय आप लोग अपने जाति की यही कीर्त्ति को थामे हुए है और अपने धर्म के दयाशील आज्ञाओं को मानते है उसी के साथ आप इस देश के सब जाति और धर्म के लोगों पर उत्तम प्रबन्ध के अनमोल लाभों को फैलाते है ।

◆ पश्चिम की सभ्यता के नियमों को बुद्धिमानी के साथ फैलाने के लिये जिससे इस भारी राज का धन बराबर बढ़ता गया हिन्दुस्तान पर केवल सरकारी अधिकारियों ही का एहसान नहीं है।

◆  श्रीमती की उस यूरोपियन प्रजा को जो हिन्दुस्तान में रहती है पर सरकारी नौकर नही है, इस बात का विश्वास कराऊ कि श्रीमती उन लोगों के केवल उस राजभक्ति ही की गुण- ग्राहकता नहीं करती जो ये लोग उन के और उन के सिंहासन के साथ रखते है किन्तु उन लाभों को भी जानती और मानती है जो उन लोगों के परिश्रम से हिन्दुस्तान को प्राप्त होते है तो मै अपनी पूज्य स्वामिनी के विचारों को अच्छी तरह न वर्णन करने का दोषी ठहरूंगा।

◆ श्रीमती ने कृपापूर्वक केवल स्टार ऑफ इन्डिया के परम प्रतिष्ठित पद वालों और आर्डर ऑफ ब्रिटिश इन्डिया के अधिकारियों की संख्या ही में थोडी सी बढती नही की है किन्तु इसी हेतु एक बिल्कुल नया पद और नियत किया है जो “ग्रार्डर ऑफ दी इन्डियन एम्पायर” कहलावेगा।

◆ हे हिन्दुस्तान की सेना के अंग्रेजी और देशी अफ्सर और सिपाहियो, आप लोगों ने जो भारी- भारी काम बहादुरी के साथ लड़ भिडकर सब अवसरों पर किये।

हे इम देश के सरदार और रईस लोग, जिन की राजभक्ति इस राज के बल को – पुरनेपाली है और जिनकी उसति इस के प्रताप का कारण है, श्रीमती महारानी आप को यह विश्वास करके धन्यवाद देती है कि यदि इस

◆ राज के लाभों में कोई विघ्न डाले या उन्हे किसी तरह का भय हो तो आप लोग उस की रक्षा के लिये तैयार हो जायेंगे।

◆ श्रीमती महारानी आप के स्वार्थ को अपना स्वार्थ समझती है, और अंग्रेज राज के साथ उस के कर देने वाले और स्नेही राजा लोगों का जी शुभ संयोग से सम्बन्ध है उस के विश्वास को करने और उस के मेल जोल को अचल करने ही के अभिप्राय से श्रीमती ने अनुग्रह करके वह राजसी पदवी ली है

◆ परन्तु हे हिन्दुस्तानी लोग आप चाहे जिस जाति या मत के हो यह निश्चय रखिये कि आप इस देश के प्रधन्ध में योग्यता के अनुसार अंग्रेजों के साथ भली –  भांति काम पाने के योग्य है, और ऐसा होना पूरा न्याय भी है, और इगलिस्तान तथा हिन्दुस्तान के बड़े राजनीति जानने वाले लोग और महारानी की राजसी पार्लमेन्ट व्यवस्थापकों ने बार – बार इस बात को स्वीकार भी किया है।

◆ इस  बड़े राज्य का प्रबन्ध  जिन लोगों के हाथ में सौपा गया है उन में केवल बुद्धि ही के प्रबल होने की आवश्यकता नहीं है वरन उत्तम आचरण और सामाजिक योग्यता की भी वैसी ही आवश्यकता हैं।

◆  इस लिये जो लोग कुल, पत्र, और परम्परा के अधिकार के कारण आप लोगो में स्वाभाविक ही उत्तम है उन्हें अपने को और संतान की केवल उस शिक्षा के द्वारा योग्य करना है जिस से कि वे श्रीमती महारानी अपनी राजराजेश्वरी की गवर्नमेन्ट की राजनीति के तत्वों को समझे और काम में ला सके और इस रीत से उन पदों के योग्य हो जिनके द्वार उनके लिये खुले है।

◆ श्रीमती की गवर्नमेन्ट राज के प्रबन्ध में आप लोगो की सहायता बड़े आनन्द से अंगीकार करेगी, क्योंकि पृथ्वी के जिन – जिन भागों में सरकार का राज है वहाँ गवर्नमेन्ट अपनी सेना के बल पर उतना भरोसा नहीं करती जितना कि अपनी सन्तुष्ट और एकजी  प्रजा की सहायता पर को अपने राजा के समान रहने ही में अपना नित्य मंगल समझ कर सिंहासन के चारों ओर जी से सहायता करने के लिये इकट्ठे हो जाते है।

◆ श्रीमती महारानी निचल राज्यों को जीतने या आसपास की रियासतों को मिला लेने से हिन्दुस्तान के राज की उन्नति नहीं समझतीं ।

◆ ईश्वर विक्टोरिया संयुक्त राज की महारानी और हिंदुस्तान की राजराजेश्वरी की रक्षा करे।

इस ड्रेस के समाप्त होते ही नैशनल ऐन्थेम का बाजा बजने लगा और सेना ने तीन बार हुर्रे शब्द की श्रानन्दध्वनि की । दरबार के लोगो ने भी परम उत्साह से खड़े होकर हुर्रे शब्द और इलियो की आनन्दध्वनि करके अपने जी का उमग प्रगट किया।

◆  महाराज संधिया, निजाम की ओर से सर सालारजग, राजपुताना के महाराजों की तरफ़ से महाराज जयपुर, बेगम भूपाल, महाराज कश्मीर और दूसरे सरदारों ने खड़े होकर एक दूसरे को बधाई दी और अपनी राजभक्ति प्रगट की।

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