धूमिल का जीवन परिचय[dhoomil ka jeevan parichay]

धूमिल का जीवन परिचय ◆

◆ जन्म :- 9 नवंबर 1936में , ग्राम खेवली, वाराणसी (UP)

◆ मृत्यु :- 10 फरवरी 1975, लखनऊ (UP) ( ब्रेन ट्‌यूमर से)

◆ उपनाम:- धूमिल

◆ मूल नाम :- सुदामा पांडेय

◆ पिता का नाम :- शिवनायक

◆ माता का नाम :- रजवंती देवी

◆ पत्नी का नाम :- मूरत देवी

◆ पुत्र का नाम:- रत्नशंकर पांडेय

◆ हिन्दी कविता के ‛एंग्री यंगमैन’ :- धूमिल

◆ कबीर, निराला और मुक्तिबोध की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले :- कवि धूमिल

काव्य संग्रह :-

(1) संसद से सड़क तक (प्रथम काव्य संग्रह,1972)

*(2) कल सुनना मुझे (1977) (स.अ.पुरस्कार,1979)

*(3) सुदामा पाँडे का प्रजा तंत्र(1984)

* उसके मरणोपरांत प्रकाशित

धूमिल की पंक्तियां :-

1. दुपहर हो चुकी है
हर तरफ़ ताले लटक रहे हैं
दीवारों से चिपके गोली के छर्रों
और सड़कों पर बिखरे जूतों की भाषा में
एक दुर्घटना लिखी गई है
हवा से फड़फड़ाते हिंदुस्तान के नक़्शे पर
गाय ने गोबर कर दिया है।
– (बीस साल बाद कविता ,संसद से सड़क तक काव्य संग्रह से)

2. मगर मैंने सहसा महसूस किया कि
लहू का एक क़तरा
गेहूँ के दाने में गुनगुना उठा है
और इतिहास के मोड़ पर
एक ज़िंदा परछाईं गहरा गई है।
(मुक्ति के तुरंत बाद कविता,कल सुनना मुझे काव्य संग्रह से)

3. सहना ही जीवन है जीवन का जीवन से द्वंद्व है
मेरी हरियाली में मिट्टी की करुणा का छंद है।
(बारिश में भीग कर कविता,कल सुनना मुझे काव्य संग्रह से)

4. एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूँ—
‘यह तीसरा आदमी कौन है?’
मेरे देश की संसद मौन है।
(रोटी और संसद कविता,कल सुनना मुझे काव्य संग्रह से)

5. बाबूजी सच कहूँ—मेरी निगाह में
न कोई छोटा है
न कोई बड़ा है
मेरे लिए, हर आदमी एक जोड़ी जूता है
जो मेरे सामने
मरम्मत के लिए खड़ा है।
(मोचीराम कविता ,संसद से सड़क तक काव्य संग्रह से)

6. मगर जो ज़िंदगी को किताब से नापता है
जो असलियत और अनुभव के बीच
ख़ून के किसी कमज़ात मौके पर कायर है
वह बड़ी आसानी से कह सकता है
कि यार! तू मोची नहीं, शायर है
(मोचीराम कविता ,संसद से सड़क तक काव्य संग्रह से)

7. मेरे हाथों में
एक कविता थी और दिमाग़ में
आँतों का एक्स-रे।

(पटकथा कविता ,संसद से सड़क तक काव्य संग्रह से)

8. इस तरह जो था उसे मैंने
जी भरकर प्यार किया
और जो नहीं था
उसका इंतज़ार किया।
(पटकथा कविता ,संसद से सड़क तक काव्य संग्रह से)

9.मैं सुनता रहा…
सुनता रहा…
सुनता रहा…
मतदान होते रहे
मैं अपनी सम्मोहित बुद्धि के नीचे
उसी लोकनायक को
बार-बार चुनता रहा
जिसके पास हर शंका और
हर सवाल का
एक ही जवाब था
(पटकथा कविता ,संसद से सड़क तक काव्य संग्रह से)

10.आओ! मेरी आत्मा अंधी है
मेरा दुख पीठ पर बँधा है
वसंत सिर्फ़ पेड़ों की आदत का
हिस्सा है,
जहाँ छायाओं में झुलसे हुए
चेहरे लेटे हुए हैं।

(प्रवेश पत्र कविता,कल सुनना मुझे काव्य संग्रह से)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

error: Content is protected !!