बकरी नाटक (Bakri Natak)

     💐💐 बकरी  नाटक 💐💐

◆ नाटककार :- सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

◆ प्रकाशन :- 1974 ई.

◆ एक प्रतीक नाटक

◆ अंक:-  दो अंक

◆ दृश्य  :- 6 दृश्य ( प्रत्येक अंक में 3 दृश्य)

★ नाटक की शैली:- प्रतीकात्मक और  व्यंग्यात्मक

◆ बकरी गरीब जनता का प्रतीक है।

◆ नाटक के पात्रः-
1.  नट और  नटी
2. भिश्ती
3. दुर्जन सिंह
4. कर्मवीर सिंह
5.  सत्यवीर
6. विपती( एक गरीब स्त्री जिसकी बकरी चोरी होती है)
7. सिपाही
8. काका –  काकी
9.  चाचा राम
10.  एक ग्रामीण
11.  दूसरा ग्रामीण
12. युवक 

◆ नाटक का विषय :

★ आम आदमी के पीड़ा का चित्रण

★ भ्रष्टाचार और विसंगतियों का चित्रण

★ युवा वर्ग का आक्रोश

★ व्यवस्था के प्रति आक्रोश

★ समकालीन राजनीति की कुरूपता पर व्यंग्य

◆ नाटक का मंचन :-

★नाटक के प्रकाशनोद्घाटन के अवसर पर ‘जन नाट्य मंच’ द्वारा 13 जुलाई 1974 को त्रिवेणी कला संगम, नई दिल्ली की उद्यान रंगशाला में आयोजित ।

◆  नाटक के महत्वपूर्ण कथन :-

★   “ठीक है। कल को आप लोगों को भी जेल ले जाएँगे । आज बकरी गाँधीजी की हुई, कल को गाय कृष्ण जी की हो जायेगी, बैल बलराम जी के हो जाएँगे। ये सब ठग हैं ठग।”(युवक कथन)

★ “इस बकरी ने हमेशा दिया है। आपको आजादी एकता दी, प्रेम दिया। आज भी बहुत कुछ देने को मुंतजिर है।”(दुर्जन का कथन )

★ “जो इतिहास को झुठलाता है वह समाजद्रोही है, देशद्रोही है। समय उसे कभी माफ़ नहीं करेगा। यह युग झूठे दावों का युग नहीं है। अधिकारों का दावा करने के पहले देखना होगा कि आपके कर्त्तव्यों की बुनियाद क्या है।” (युवक का कथन)

★  “यह बकरी सबकी है। इसीलिए किसी की नहीं है। इससे मोह का मतलब अपने प्रति निर्ममता है। ऐसे लोगों की दुनिया में कमी नहीं जो कहेंगे यह बकरी उनकी है। पर इतिहास को झुठलाया नहीं जा सकता।”

★  “यही कि वोट, चुनाव सब मजाक हो गया है। सब झूठ पर चल रहा है। गरीबों की बकरी पकड़कर उनसे पहले पैसा दुहा । अब वोट दुह रहे हैं, फिर पद और कुर्सी दुहेंगे।(युवक का कथन)

◆  नाटक  गीत योजना :-

★ बकरी नाटक में उन्होंने लोक गीतों की भाषा का प्रयोग किया है ।

★ अपने खिलाये फूलों से भी कुछ न कहेगी
उसके ही खूँ के रंग से इतरायेगा गुलाब ।

★ जा मेरी तेरी नापटनी
कैसे बनाई चटनी
गाल बजाया पेट बजाया
जबसे हुई छंटनी, जा तेरी मेरे ना पटनी
कैसी अमीरी, कैसे, गरीबी
प्यारी लगे नटनी, जा तेरी मेरी ना पटनी ।

★ गोली बोले धायं-धांय
जनता बोले कांय काय
नेता बोले भांय भांय हर गली में सांय सांय
तुझसे है यही मेरी फरियाद”

★ बकरी को क्या पता था
मशक बन के रहेगी,
पानो भरेंगे लोग
श्री’ वह कुछ न कहेगी,
जा जा के सींच आएगी
हर एक की क्यारी,
मर कर के भी बुझाएगी
वह प्यास तुम्हारी ( एक भिश्ती मशक लादे सड़क सोचता गा रहा है।,पहला अंक,पहला दृश्य)

★सुबह ओ शाम बोलेगा
मजा तुम से ये मिमिया कर हमारे जा नहीं सकते।
हमारी गली से दीवान जी जाना न तुम आकर।( दुर्जन का गाता है)

★बकरी  मैया तोरे चरनन अरज करू।
गाधी बाबा तोरे चरनन अरज करू।
उनके महलिया सोना बरसे
जनम जनम का में करज करूं
बकरी मैया तोरे चरनन अरज करू।( दुर्जन,कर्मवीर और सत्यवीर गाते हुये)

 

★ तमाम ह्विस्की तमाम रम
मिला करे प्रभु जनम जनम
हो संग कलेजी गरम गरम
ओ’ एक वाला नरम नरम।
(सिपाही दुर्जन यह शायरी कहता है )

★ “लोकतन्त्र जिन्दाबाद जिन्दाबाद” (नट का गीत)

★ जिसकी लेते हैं शरण उसको ही खा जाते हैं
लोग,
जिसका थामा हाथ, उसका ही लगा जाते हैं भोग,
मुह से निकला नाम, जैसे पेट से निकली डकार,
(नट गायन)

★ मंजीरा ढोल बजाओ
    चलो कुछ नाचो आओ
    दिखाओ कर रहे हैं धंधा हम भी पेट का।।  (नटी ने नट से कहा)

★   जिस धूल से शहरों में मची रंगरेलिया
चित छप्परों के बल पे खडी हैं हवेलिया
उस आदमी को आदमी को मानते नहीं
जब काम निकल जाता है पहचानने नहीं।
(नट का गायन)

नियम है, दो और मजदून हो, घास हरी मोरोमन हो, फिर धरती चरागाह से ज्यादा कुछ नहीं हो पाएगी। शुरू कीजिए, इस जनता इस परागाह के नाम पर

हैं तभी भिती का लड़के के साथ प्रवेश ।)

दुन: यही है तुम्हारा सबानी ?

मित्रनी हो हजुर । दुन (दूसरों को है गायो महो, कुछ गाना)

खाने लगा जाता है। उसके साप और लोग शामिल हो जाते हैं।

★ बकरी  हमको बना दिया।
बकरी की मे- मे ने
सब कुछ सहना सिखला दिया।
बकरी की मे- मे ने।(दुर्जन गीत गुनगुने हुये)

★ दिन में दो रोटी के हों जब देश में लाले पड़े हो सभी खामोश सब की जबा पर ताले पड़े।
दिल दिमाग ओ आत्मा पर इस कदर जाले पड़े, सूखे की शतरंज नेता खेलें दिल काले पड़े ।
तोद अड़ियल पिचके पेटो पर चलाए गोलिया
हर तरफ फिर न निकलें क्रांतिकारी टोलिया, फिर बताओ किस तरह खामोश बैठा जाए है अब तो खौले खून रह-रह कर जबा पर आए है  बहुत हो चुका अब हमारी है बारी,
बदलके रहेंगे ये दुनिया तुम्हारी। (नट -नटी का अन्तिम गायन)

 

◆ नाटक का सारांश :

★ नट विद्रोही है। उसे मगलाचरण पर यकीन नही। सारी मंडली मंगलाचरण गाना शुरू करती है। नट चुप रहता है। नटी के आंखें तरेरने पर वह गाता है पर उसे राजनीतिक संदर्भ से जोड़ देता है। गायन शैली : नौटंको ।

★ नटी (समवेत ) दोहा :-

सदा भवानी दाहिने सम्मुख रहें गणेश
पाच देव रक्षा करें, ब्रह्मा, विष्णु, महेश।

★ नट :-
पांच देव सम पाच दल, लगी ढोंग की रेस जिनके कारण हो गया देश आज परदेस ।

★ नटी (समवेत) –  चौबोला

करूं स्वाग प्रारंभ बासरी हमको मातु तुम्हारो मझघारो के बीच भंवर मे डोंगा पड़ो हमारो ।

★ नट :

अनल कंठ में भरो, सकल कायरता जड़ता जारी जन मन संशय हरौ, दैन्य, दानव, दुदिन संहारो।

★नट :- बोड़

मुक्ति की हो अभिलाषा, जगे समता की भाषा ।
तुम्हारे पद सिर नाऊं
अभिनव रूपना के तेरे चरनन फूल चढाऊं।

★ नट :- बहरे तबील

ऐसा नाटक तू हम से कराए है क्या,
जिसमे आती कही तुक नजर ही नहीं।

★ ‘बकरी’ नाटक में तीन डाकू एक सिपाही और एक गरीब औरत पात्रों के रूप में प्रस्तुत किये हैं ।

★ बकरी नाटक में तीन डकैत दुर्जन सिंह, कर्मवीर और सत्यवीर की कहानी है। जिन्हें एक दिन भिश्ती का एक गीत बकरी को क्या पता था, मशक बनकर रहेगी सुनकर एक तरकीब सूझती है।

©  भिश्ती का अर्थ :- मशक से पानी ढोनेवाला व्यक्ति।

© मशक का अर्थ :- चमड़े का बना पानी भरने का थैला। यह चमड़ा अक्सर बकरी की ख़ाल का बनता है

 

★ वह अपने साथी को बकरी का इंतजाम करने को कहते हैं। साथी गरीब महिला विपति की बकरी चुरा ले आता है।

★ जब वह निर्धन और अपनी बकरी वापस माँगने को इसके पास आती है तो ग्रामीणों की उनकी अन्ध श्रद्धा का अनुचित लाभ उठाकर अपने षड्यंत्र में शामिल कर वे उस पर सार्वजनिक संपत्ति को अपनाने का आरोप लगाकर जेल भेज देते हैं। और भोली भाली जनता से उस बकरी को पुजवाते हैं।

★ फिर वह प्रचारित करते हैं कि इस बकरी की मां गांधीजी की बकरी थी और इस बकरी में दैवीय शक्ति है।

★ तीनों डकैत नेता बन जाते हैं और बकरी के नाम पर एक आश्रम स्थापित करते हैं।

★ जनता के कल्याण के लिये बकरी शान्ति प्रतिष्ठान, बकरी संस्थान, बकरी सेवासंघ, बकरी मंडल आदि संस्थाओं की स्थापना करते है।

★ फिर शुरू होता है गांव वालों को लूटने का सिलसिला भोले-भाले ग्रामीण बकरी के नाम पर खूब दौलत लुटा देते हैं।

★ बकरी जितना दुह सकती है, उतना ये दुर्जन दोह लेते हैं। अन्त में बकरी की पूँछ पकड़कर ही चुनाव की वैतरणी पार करना चाहते हैं।

★कर्मवीर चुनाव लड़कर मंत्री बनने की योजना बनाता है।

★ ग्रामीणों को डरा –  धमकाकर सभी वोट अपने पक्ष में डलवा लेते है।

★ इसके बाद डकैत कर्मवीर चुनाव लड़ता है और जीत भी जाता है।

★ सारा समाज विसंगतियों का शिकार है। एक युवक इन विसंगतियों का विरोध करता है । वह जनता को उत्तेजित करता है और नाटक को एक समाधान की ओर ले जाना चाहता है।

★ फिर एक पढ़ा-लिखा युवक उनकी असलियत ग्रामीणों को बताता है। धीरे-धीरे ग्रामीणों को समझ में आने लगता है कि चांडाल चौकड़ी उन्हें गुमराह कर लूट रही है। सो, ग्रामीण उनके विरोध में उतर आए और जेल भिजवाकर ही दम लिया।

★  नाटक का दुर्जनसिंह पात्र दुनिया को चरगाह समझता है, पर शोषितों के अन्दर की आग को वह नहीं देख पाता ।

★ तमाम कोशिशों के बाद जब विपती को बकरी वापिस नहीं मिलती और साबित हो जाता है कि चुनाव जीतने की खुशी में उसका गोस्त पक गया तो अन्ततः जन विद्रोह फूट पड़ता है और राजनीतिज्ञों के वेश में छिपे लुटेरे एवं आतंकवादी बोध लिए जाते हैं । जनता की अदालत उसका फैसला करेगी । विद्रोह की विजय के साथ नाटक समाप्त हो जाता है ।

★ नाटक में गाँधी जी की बकरी का परिचय “यह पचपन करोड़ की बकरी है बीस रूपये की नहीं ।”

◆ महत्वपूर्ण बिन्दु :-

★ बकरी प्रगतिशील जनवादी चेतना युक्त नाटक है।

★ इसमें सत्ता मूलक शोषण और आम आदमी की विडम्बनाओं का यथार्थ चित्रण नाटककार किया है।

★ दुर्जन कर्मवीर और सत्यवीर आधुनिक नेताओं के प्रतीक है तो सिपाही उनका मात्र रक्षक है।

★ इसमें भारत सुरक्षा अधिनियम, निवारक नज़रबंदी कानून आदि पर भी व्यंग्य किया गया है।

★ हिन्दी नाटक के आधुनिक दौर में विस्तार प्राप्त विद्रोही चेतना का एक हास्य व्यंग्यात्मक  सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के बकरी में प्राप्त होता है।

★ मानव का स्वार्थ सब प्रकार की सीमाओं को लांघकर गैर मानवीयता की किस सीमा तक पहुँच गया है, इसका सशक्त व्यंग्यात्मक चित्रण इस नाटक में किया गया है।

★  कोणार्क में जिस प्रकार सत्ता मोह देश और जनता के सर्वनाश में परिणत होता है उसी प्रकार बकरी’ में आर्थिक मोह और राजनैतिक महत्वकांक्षा साधारण लोगों की धार्मिक विश्वासों का अवांछनीय लाभ उठाकर समाज के धार्मिक एवं नैतिक अध:पतन का हेतु बनता है।

★ यह समकालीन राजनैतिक जीवन की एक प्रामाणिक दस्तावेज है।

★ स्वातंत्र्योत्तर भारत में पिछले पचास वर्ष से भारतीय जनता विशेष कर ग्रामीण जनता को जिन हथकण्डों के द्वारा छला गया है, वे सारी बातें इस नाटक के द्वारा हमारे सामने लायी गयी हैं।

★  इस नाटक में बकरी सभी कामनाएँ पूर्ण करनेवाली कामधेनु और सभी दुःखों को दूर करनेवाली देवी का प्रतीक हैं।

★ बकरी के माध्यम से भारत में अनपढ़  ग्रामीणों के मन में देवी-देवताओं और महापुरुषों से जुड़ी किसी भी वस्तु के प्रति अविवेक पूर्ण अंधश्रद्धा पर व्यंग्य किया गया है।

★  धर्मान्धता और महापुरुष के प्रति अंधश्रद्धा की फायदा उठाकर ठग लुटेरे और ढोंगी सीधी-सादी ग्रामीण जनता को किस प्रकार उल्लू बनाते है उसका एक सफल नाटकीय अभिव्यक्ति है।

★ वर्तमान राजनीति पर व्यंग्यात्मक शैली में हिन्दी नाटककारों ने अपने नाटकों का कथ्य बनाकर रंगमंच के माध्यम से आम जनता तक पहुंचाया ।

★  ‘बकरी’ नाटक समकालीन राजनीति के विदूषकीय एवं विश्वासघाती चरित्र को उजागर करता है।

★ इस नाटक में 1970 के बाद भारत में पैदा हुई परिस्थितियों को लक्ष्य बनाया गया है।

★  राजनीतिक क्षेत्र के उन स्वार्थ व्यक्तियों की मनोवृत्ति व्यक्त करता है, जो गांधीवादी विचारों के साथ प्रति जनता की आस्था का लाभ उठाकर कुर्सी और प्रतिष्ठा के चिपके हुए हैं।

★ डॉ. जयदेव तनेजा ‘बकरी’ नाटक पर विचार करते हुए लिखते है कि ” बकरी आम आदमी की पीड़ा को आम आदमी की भाषा में आम आदमी के सामने प्रस्तुत करने वाला हिन्दी का एक महत्वपूर्ण नाटक है ।”

★ बकरी’ नाटक में बकरी उस गरीब और निरीह जनता का प्रतीक है, जिससे तथाकथित गांधीवादी नेता पहले पैसा दुहते हैं, फिर वोट दुहते हैं और फिर कुर्सी।

★  राजनीतिक चुनाव सम्बन्धी हथकण्डों का जाल बन गई है । जो डाकू है, वही आगे चलकर नेता बन जाता है, नेता लम्बे भाषण देता है और झूठे वायदे करता है।

★ सर्वेश्वर के इस नाटक को पहली बार ‘जन नाट्य मंच’ द्वारा 13 जुलाई, 1974 को दिल्ली के त्रिवेणी कला संगम में खेला गया।

 

 

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