मध्यकालीन भारतीय आर्य भाषाएं( madhyakalin bharatiy aary bhashaen)

💐मध्यकालीन भारतीय आर्य भाषाएं 💐
【500 ई.पू. से 1000 ई.तक】

1. पालि ( प्रथम प्राकृत)【500 ई.पू. से 1 ई.तक】

2.प्राकृत (द्वितीय प्राकृत)【1ई.से 500 ई.तक】

3.अपभ्रंश(तृतीय प्राकृत)
【500 ई.से 1000 ई.तक】

💐1. पालि ( प्रथम प्राकृत)💐
【500 ई.पू. से 1 ई.तक】

• पालि का अर्थ बुद्ध वचन होने से यह शब्द केवल मूल त्रिपिटक ग्रंथों के लिए प्रयुक्त हुआ।

• पालि में ही त्रिपिटक ग्रंथों की रचना हुई।

• पालि भारत प्रथम देश भाषा है।

• प्रथम प्राकृत (पालि)के अंतर्गत ही अभिलेख प्राकृत या शिलालेखी प्राकृत भी आता है। इसके अधिकांश लेख शिला पर अंकित होने के कारण इसकी संज्ञा शिलालेखी प्राकृत हुई।

• त्रिपिटक की संख्या तीन है :- सुत्त पिटक, विनय पिटक और अभिधम्म पिटक

★ सुत्त पिटक :- 

• यह साधरण बातचीत के ढंग पर दिए गए बुद्ध के उपदेशों का संग्रह है।
• इस पिटक के अंतर्गत पांच निकाय आते हैं :- दीर्घ निकाय, मज्झिम निकाय,संयुक्त निकाय,अंगुत्तर निकाय और खुद्दक निकाय(इस अन्तिम निकाय में 15 ग्रंथ संकलित है)

★ विनय पिटक uइसमें बुद्ध की उन शिक्षाओं का संगठन है जो उन्होंने समय-समय पर संघ – संचालन को नियमित करने के लिए दी थी।

• इसमें निम्न ग्रंथ है :- महावग्ग, चुल्लवग्ग, पाचित्तिय

★ अभिधम्म पिटक :- इसमें चित्त, चैतसिक आदि धर्मों का विशद् विश्लेषण किया गया है।

● पालि भाषा की तीन व्याकरण ग्रंथ है :-

(1.) कच्चान व्याकरण(7वीं शती) :-

• रचयिता :- महाकच्चायन

• पालि भाषा का सबसे प्राचीन व्याकरण ग्रंथ

• इस ग्रंथ का अन्य नाम :- कच्चान ग्रंथ , सुसन्धित कप्प

• इसमें 23 परिच्छेद तथा 675 सूत्र

• महाकच्चायन के अनुसार पालि में 8 स्वर तथा 33 व्यंजन होते है।

(2.) मोग्गलान व्याकरण:-

• रचयिता :- मोग्गलान(इन्होंने ही इस वृत्ति और पंचिका लिखी)

• पालि व्याकरण में पूर्णता तथा गंभीरता में सर्वश्रेष्ठ व्याकरण

• 817 सूत्र

• मोग्गलान के अनुसार पालि में 10 स्वर तथा 33 व्यंजन होते है।

(3.) सद्दनीति(1154ई.) :-

• रचयिता :- बर्मी भिक्षु अग्गवंश(अग्गपण्डित तृतीय)

• 27 अध्याय

• 1391सूत्र

• तीन भाग (पद माला,धातुमाला और सूत्तमाला)

◆ विभिन्न विद्वानों द्वारा पालि शब्द की उत्पत्ति :-

1. आचार्य विधुशेखर :-

पन्ति > पत्ति > पट्ठि >पल्लि> पाली

2. मैक्सवालेसर :- पाटलिपुत्र या पालि

3. भिक्षु जगदीश कश्यप :-

परियाय > पलियाय > पालियाय > पालि

4. भंडारकर व वाकर नागल :-

प्राकृत > पाकट > पाअड >पाउल > पाली

5. कौशांबी :- पाल् > पालि

6. उदय नारायण तिवारी :- पा+ णिञ् + लि = पालि

◆ विभिन्न विद्वानों के द्वारा वर्णित पालि भाषा का प्रदेश

विद्वान पालि भाषा का प्रदेश

1. श्रीलंकाई बौद्ध तथा चाइल्डर्स :- मगध

2. वेस्टगार्ड तथा स्टेनकोनो :- उज्जयिनी या विन्ध्य प्रदेश

3. जार्ज ग्रियर्सन और राहुल सांकृत्यायन:- मगध

4. ओलडेन बर्ग :- कलिंग

5. रीज़ डेविड्ण :- कोसल

6. देवेंद्र नाथ शर्मा :- मथुरा के आसपास का भू- भाग

7. सुनीति कुमार चटर्जी :- मध्यदेश की बोली

8. उदय नारायण तिवारी :- मध्यदेश की बोली

◆ पाली भाषा की प्रमुख विशेषताएं :-

1. अनुस्वार (अं) पालि में स्वतंत्र ध्वनि है जिसे पालि वैयाकरण ने निग्गहीत नाम से अभिहित किया है।

2.टर्नर के अनुसार पाली में वैदिकी की भाँति ही
संगीतात्मक एवं बलात्मक दोनों स्वराघात थी।

3. ग्रियर्सन और भोलानाथ तिवारी पालि में बलाघात
स्वराघात मानते हैं जबकि जूल ब्लाक किसी भी
स्वराघात को नहीं स्वीकार करते हैं।

4. पालि में :- तीन लिंग, तीन वाक्य, दो वचन( एकवचन और बहुवचन)

5. पालि में द्विवचन नहीं होता है।

6. पाली में हलंत रहित, छह कारक , आठ लकार( चार काल और चार भाव) तथा आठ गण युक्त भाषा है।

💐 2.प्राकृत (द्वितीय प्राकृत)💐
【1ई.से 500 ई.तक】

• प्राकृत की उत्पत्ति के संबंध में दो मत प्रचलित है:-
1. प्राकृत प्राचीनतम जन भाषा है।

2. प्राकृत उत्पत्ति संस्कृत से हुई है।( मान्य)

• द्वितीय प्राकृत को साहित्य प्राकृतिक कहते हैं। प्राकृत भाषाओं के विषय में सर्वोत्तम भरत मुनि ने ‘नाट्यशास्त्र’ में विचार किया।

• भरत मुनि ने अपने ‘नाट्यशास्त्र’ में सात मुख्य प्राकृत तथा सात गौण विभाषा की चर्चा की।
• प्राकृत वैयाकरणों में सर्वप्रथम नाम वररूचि (सातवीं शताब्दी में) आता है।

★ प्राकृत प्रकाश ग्रंथ :-

• रचयिता :- वररुचि

• 12 अनुच्छेद

• इसमें प्राकृत भाषा के चार भेद बताए :- महाराष्ट्री
पैशाची, मागधी और शौरसेनी

• प्राकृत के पाणिनी :- हेमचन्द्र

★ प्राकृत व्याकरण ग्रंथ :-

• रचयिता :- हेमचन्द्र

• इसमें प्राकृत भाषा के तीन और भेदों की चर्चा की :-
आर्षी(अर्धमागधी), चूलिका पैशाची और अपभ्रंश

• हेमचन्द्र की चूलिका पैशाची को ही आचार्य दण्डी ने भूत भाषा कहा है।

◆ प्राकृत भाषा के भेदों की शार्ट ट्रिक :- शौरसेन महा
पैश की अर्ध मांग कर रहा है।

शौरसेन, महाराष्ट्री, पैशाची, अर्ध मांगधी, मांगधी

(1.) महाराष्ट्री प्राकृत :-

• इसको प्राकृत वैयाकरणों ने आदर्श, परिनिष्टित तथा मानक प्राकृत माना है। इस प्राकृत का मूल स्थान महाराष्ट्र है।

• डॉ. हार्नले के अनुसार महाराष्ट्री का अर्थ महान राष्ट्र की भाषा है। महान राष्ट्र के अंतर्गत राजपूताना तथा मध्यप्रदेश आदि आते हैं।

• जार्ज ग्रियर्सन और जूल ब्लाक ने महाराष्ट्री प्राकृत से ही मराठी की उत्पत्ति मानी जाती है।

• भरतमुनि ने दक्षिणात्य प्राकृत भाषा के भेद महाराष्ट्री के लिए ही किया है।

• अवन्ती और वाह्लीक ये दोनों भाषाएं महाराष्ट्री भाषा के अन्तर्गत है।

• आचार्य दण्डी ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘काव्यादर्शन’ महाराष्ट्री को सर्वोत्कृष्ट प्राकृत भाषा बतलाया है।

• महाराष्ट्री प्राकृत शौरसेनी का ही विकसित रूप है। (डॉ.मनमोहन घोष एवं डॉ. सुकुमार सेन का मत)

• महाराष्ट्री प्राकृत में लिखी गई प्रमुख साहित्यिक कृतियां :-
1. गाहा सतसई(गाथा सप्तशती) :- हाल कवि

2. रावण वहो(सेतु बन्धु) :- प्रवरसेन

3. गउडवहो(गौडवध) :- वाक्पतिः

4. वज्जालग्ग :- जयवल्लभ

5. कुमार पाल चरित :- हेमचन्द्र

(2.) शौरसेनी प्राकृत :-

• यह शूरसैनी या मथुरा के आसपास की बोली थी।

• मध्यप्रदेश की भाषा होने के कारण शौरसैनी का बहुत आदर था।

• डॉ.पिशेल के अनुसार इसका विकास दक्षिण में हुआ।

• शौरसेनी प्राकृत मूलतः नाटकों के गद्य की भाषा थी।

• वररुचि ने शौरसेनी प्राकृत को ही प्राकृत भाषा का मूल माना है।

• विद्वानों ने शौरसेनी प्राकृत का आधार भिन्न – भिन्न बताया है :-
विद्वान शौरसेनी का आधार

1. वररुचि :- संस्कृत

2. रामशर्मन :- महाराष्ट्री

3.पुरुषोत्तम :- संस्कृत तथा महाराष्ट्री

(3.) पैशाची प्राकृत :-

• इसके अन्य नाम :- पैशाचिकी,पैशाचिका,ग्राम्य भाषा,भूतभाषा, भूतवचन तथा भूतभाषित।

• जार्ज ग्रियर्सन ने पैशाची भाषा – भाषी लोगों का आदिम वास – स्थान उत्तर – पश्चिम पंजाब अथवा अफगानिस्तान को माना है तथा इसे ‘दरद’ से प्रभावित बताया।

• लक्ष्मीधर ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ षड्भाषा चन्द्रिका में राक्षस, पिचाश तथा नीच पात्रों के लिए पैशाची भाषा का प्रयोग बतलाया है।

• मार्कंडेय ने ‘प्राकृत सर्वस्य’ में कैकय पैशाची, शौरसेनी पैशाची और पांचाल पैशाची इन तीनों प्रकारों की पैशाची भाषाओं का तीन देशों के आधार पर नामकरण किया है।

(4.) मागधी प्राकृत :-

• मगध देश की भाषा रही है।

• मार्कंडेय ने शौरसेनी से मागधी की उत्पत्ति बतायी है।

• मागधी के साथ शाकारी,चाण्डाली और शाबरी ये तीन प्रकार के मिलते हैं।

• मागधी प्राकृत का प्राचीनतम रूप है अश्वघोष के नाटकों में मिलता है।

• मागधी अन्तःपुर के नौकरों, अश्वपालों आदि की भाषा थी। (भरतमुनि के अनुसार)

(5.) अर्ध मागधी प्राकृत :-

• इसके संबंध में जार्ज ग्रियर्सन ने बताया है कि मध्य देश(शूरसेन) और मगध के मध्यवर्ती देश(कोसल) की भाषा थी।

• अर्ध मागधी का प्रयोग जैन साहित्य में (भगवान महावीर का संपूर्ण धर्मोपदेश इसी भाषा में)

• जैनियों ने अर्ध मागधी को आर्ष,आर्षी,ऋषिभाषा या आदिभाषा से भी अभिहित किया है।

• निशीशचूर्णि ग्रन्थ :- श्रीजिन्दा सगणिमहत्तर(7वीं शताब्दी)

• अर्ध मागधी को चेट,राजपूत एवं सेठों की भाषा बताया है।( आ. विश्वनाथ ने ‘साहित्य दर्पण’ में)

3.अपभ्रंश(तृतीय प्राकृत)
【500 ई. से 1000 ई.तक】

नोट :- अपभ्रंश भाषा का अगले अध्याय में विस्तार पूर्वक वर्णन करेंगे।

 

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