मेरी तिब्बत यात्रा(meree tibbat yatra)[तीसरा चौथा एवं पांचवा खंड]

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7. • स- क्य के रास्ते एक विहार मिलता है जिसे छा- रोड् मंत्री के पुरुषों का बनवाया है। • जहां दो घरों का समागम होता है उसे सुम्- दो कहा जाता है। • दु – नी – छेन – पो :- ★ स- क्य महन्तराज के प्राइवेट सेक्रेटरी ★ स- क्य पहुंचकर लेखक ने उन्होने ङोर से लाई चिट्ठी दी। ★ भोटभाषा का अच्छा ज्ञान ★ विद्या प्रेमी ★ 60 वर्ष के ★ सज्जन व्यक्ति • स- क्य सर महन्तराज का स्थान दलाई लामा और पणछेन (टशी) लामा के बराबर समझा जाता है। • दग्-छेन-रिन्-पो-छे:- ★ स- क्य के मंहत ★ चंगेज की सन्तान के गुरू स-पण-कुन्-गा-ग्यल-छन् और फम् – पा-.लो-डो-ग्यल छन् के उत्तराधिकारी। ★ इनके पूर्वजों को भोट राज्य मिला था। तिब्बत से महन्त शाही का आरंभ तभी से हुआ था। ★ गर्मियों के डोल्-या- फोब्रड् में रहते जो दक्षिण में है।
8. • स- क्य विहार की स्थापना :- ★ पहाड़ी मैदान के ऊपर दक्षिण में ★ खोन् -कोन्- गर्यल् में द्वारा स्थापित ★ इस विहार का अब पता नहीं है। • स-क्य मठ :- ★ स-क्य मठ के संस्थापक :- कोन् -ग् र्यल्(गृहस्थ) ★ इस मठ/विहार का ङचे- ल्ह – खड् में नम्- थर्- ल्ह- खड् सबसे बड़ा मंदिर। ★ इस मठ के मालिक सोन- कोन्- ग्यल् की सन्तति है जो तब से अब तक मालिक है। ★ स- क्य के सभी महंत गृहस्थ थे।(स-पण-कुन-ग-ग्यल-धन् ,फग्-पा, और धर्नपाल रक्षित को छोड़कर) ★ वर्तमान महंत भी गृहस्थ है :- √ इनकी अवस्था 69 वर्ष √ इसके दो पुत्र (32 – 33 वर्ष के)जिनके नाम पद्म- दुस् और द्ग – छेन √ इनके दोनों लड़के की अब तक कोई संतान नहीं। • सक्य विहार की हस्तलिखित सूची देखकर ★ पे – खड् पुस्तकालय में :- भोट पोथी ★ ग्य- पे पुस्तकालय में भारतीय पोथी ★ दोनों पुस्तकालय में कुल – 1334 पोथियाँ
9. • स – क्य समुद्रतल से 14715 फीट ऊपर है। • चीन सम्राट के गुरू कुष्- ले- हान्- के गुरू :- संघराज फग्- पय- लो- डोस- ग्यल-हत् • सक्य के महन्तराज सर्दी में चिन्दौड् प्रासाद रहते थे। • सक्य के मठ/ विहार में भारतीय पीतल की मूर्तियों का संग्रह। (8 मूर्तियों एक पंक्ति में 7मूर्तियां दुसरी पंक्ति में) • जब से गृहस्थ महन्त होने लगे तभी से उनको द्ग् -छेन् (महात्मा) की पदवी मिली है। • आर्य समाज में भी गृहस्थ महापुरुष को स्वामी न कह सकते के कारण महात्मा का नाम पहले – पहले महात्मा मुंशीराम को और फिर महात्मा हंसराज को दिया गया। • भोट के स-क्य महन्त राजो ने महात्मा(द्ग् -छेन्) नाम को प्रायः 6 शताब्दियों से अपनाया है। • उत्तराधिकारी का नियम :- दोनों महलों में ज्येष्ठ संतान उत्तराधिकारी होता है। दोनों महलों में कोई ज्येष्ठ सन्तान न होने पर कनिष्ठ सन्तान उत्तराधिकारी हो सकेगा। • स- क्य के ल्ह.-खड्-छात्रों न् मो में आचार्यधर्मकीर्ति की एक मूर्ति है। • 18 तारीख को धर्म वर्धन ने वैशाली(बसाढ,जिला- मुजफ्फरपुर) के कायस्थ पंडित गयाधर की मूर्ति की तस्वीर उतारी । • धर्म साधन को बालक्रीड़ा से उपमा देने की बात लेकर धर्मवर्धन ने कह रहा था। • 16 से 18 तारीख तक लेखक ने घर की मालकिन चम्- छड्- कु- शो- छे- रिह-पल-मो(दीर्घायुश्री) लोकेश्वर का न्यू- ने व्रत कर रही थी। • न्यू -ने व्रत लेखक ने पिछली यात्रा में शुरू किया था किन्तु दोपहर भर की दडंवत मे ही परेशान हो छोड़ दिया। • श्रीमती दीर्घायुश्री :- ★ इनके पति का नाम :- कु-शो-डोङ्-यिग्-छेन-पो ★ अधिक संस्कृत तथा मेधाविनी महिला ★ लेखक के खाने-पीने की ओर ध्यान रखती थी। • 1934 में श्री विलियम्सन (पोलिटिकल एजेंट) स-क्य आए थे। • श्री विलियम्सन की पत्नी के बारे में श्रीमती दीर्घायुश्री ने कहा ” भिखमंगिन की तरह आई थी,न कानो में आभूषण और न कंठ में माला।
11. • 26 अक्टूबर को 17वे दिन स-क्य को 8:00 बजे सवेरे छोड़ा। • डोड् जंगली चंवेरियो को कहते हैं । • ल्ह- दोड् गांव में एक बड़ा मठ था। • मब्- जा गांव में लेखक का चाय से स्वागत किया:- कु- शो- डोड् – पग- छेन् – पो के साले/श्रीमती दीर्घायुश्री के बड़े भाई • मब्- जा गांव समुद्र तल से 15000 फुट ऊपर था। • श्रीमती दीर्घायुश्री के कोई संतान नहीं थी। दीर्घायुश्री के पति ने अपने साले को उत्तराधिकारी बनाया।दीर्घायुश्री के साले या उत्तराधिकारी के अभी कोई संतान नहीं थी । • चाड्- थड् :- तिब्बत का उत्तरी जन – शून्य मैदान। • लङ् कोर भारतीय सिद्ध फ-दम्-प-सड् का बहुत दिनों तक निवास स्थान रहा है। • पाटन( नेपाल) के साहु- जोगमान् से लेखक की भेट हुई।(ञेनम् में) • लेखक को(ञेनम् में) में ढाई महीने की जमी मैलके उतर जाने से चित्त का प्रसन्न होना स्वभाविक था।
13. • डाम् पहुंचने से 3 मील पूर्व देवदार का कटिबंध समाप्त हो गया था। • गोम्- थड़् गांव में लेखक एवं मित्र के द्वारा ढूढ – ढूढकर दूध लाया गया किंतु आग पर रखते फट गया। • गोम्- थड़् गांव के आगे का आगे गांव को लेखक ने ने भैसों का देश कहा। • यङ्ला कोट दो दुकाने (साधारण दुकान) थी। • जल वीरा के बाजार में 24 – 25 दुकानें थी लेकिन बाजार में फल नहीं मिला। • चौतरा पहाड़ी डॉडे पर बसा हुआ है ।बड़े हकीम का निवास स्थान तथा एक जिले का हेड क्वार्टर होने की बस्ती अच्छी है।आरंभ में सैनिक महत्व के ही कारण वह ऊंची पहाड़ी रीढ़ आबादी की गई होगी। • सि- पा गांव के लोग पपीते को मेवा कहते थे।(देवताओ के चढ़ाने के लिए) • लेखक ने अनुसार भारत में भी कहीं-कहीं पपीते को रड मेवा कहा जाता है। • सि- पा गांव मे राज्य की ओर से सहायता प्राप्त एक संस्कृत पाठशाला है। • लेखक 15 नवंबर को 11:00 बजे इंद्रावती(कोसी नदी की शाखा) के तट पर पहुंचे। • बोधा के पुराने स्तूप को भूकंप से कोई क्षति नहीं हुई थी। • राज परिवार के चंदे से सहायता की मद में चौदह-पन्द्रह लाख रुपए जमा हो गये थे।(सरकार ने पुनर्निर्माण के लिए एक विभाग खोल दिया था) • श्री धर्म नाथ साहु :- ★ छु- सिस्या के स्वामी। ★ इनका मकान काठमांडू के मित्रता की में प्रसिद्ध पुरुष के दो पुत्र :- त्रिरत्न मान,ज्ञान मान • धर्मवर्धन के भाषा (भोट भाषा) बोलने वाले काठमांडू में मिल गये :- ★ साहु , त्रिरत्नमान, ज्ञानमान और साहु के भांजे । • प्रभाव वार्तिक के भाष्य वार्तिकालड्कार के दो परिच्छेदों को स- क्य मठ में देखा उसका मूल नेपाल के महान विद्वान राजगुरु श्री हेमराज शर्मा को मिल गया। • लेखक का नेपाल के मार्ग से लौटने का कारण :- प्रमाणवार्तिक के भाष्य वार्तिकालंकार के परिच्छेद का मूल देखने के लिए । • 18 नवंबर को सबसे पहले राजगुरु श्री हेमराज शर्मा के भेंट करने का निश्चय किया। • राजगुरु हेमराज शर्मा :- ★ संस्कृत के गंभीर विद्वान ★ व्याकरण साहित्य संस्था के सभी शास्त्रों को विधिवत् अध्ययन जान है। ★ विद्याव्यसनी ★ नम्रता और विनय स्वभाव ★ इनका वंश चिरकाल से गोर्खा राजवंश के गुरु ★ गोर्खा राजवंश में प्रधान गुरु (बड़े गुरु) के अधिकार पाने के अवशिष्ट व्यक्तियों में ज्येष्ठ होने का ध्यान रखा जाता है । ★ इनके पिताजी पहले धर्मा गुरु थे,अब प्रधान राजगुरु इनके वृद्ध चाचा है। ★ यह राजकुल के सलाहकार (वंश में अधिक विद्वान होने कारण) ★ इन्होंने बचपन में संस्कृत भाषा का ही अध्ययन किया है। ★ राजगुरु हेमराज शर्मा को “सजीव विश्वकोश” किसने कहा। :- पंडित जयचन्द विद्यालंकार ने ★ राजगुरु हेमराज शर्मा को देखते ही वक्त किसी अपने पूर्वज तपोधन ऋषि की याद आए बिना नहीं रहती ।(लेखक के अनुसार) ★ गौर मुख पर लडकी हंसी की रेखा हर वक्त खिचीं रहती है। ★ उनके वार्तिक के मूल की ताम्रपोथी रोम के आचार्य तूची को दे दी। ★ सरकार के स्थापिर विभाग के देख के 50वर्ष तक कोई संतान नहीं थी। ★ पहली पत्नी का देहांत हो गया। ★ दूसरी पत्नी (यह संस्कृतज्ञ थी)से:- तीन संतान √ दो पुत्र :-(बड़ा पुत्र 9 वर्ष का, शुद्ध संस्कृत वार्त) √ एक पुत्री ★ यह नेपाल के रत्न है कहे जाते है।
[ ] यात्रा वृत्तांत के रचनाकार :- राहुल सांकृत्यायन
[ ] प्रकाशन वर्ष :- 6 मार्च 1937,पटना से प्रकाशित
[ ] लेखक ने सर्वप्रथम तिब्बत यात्रा की तब प्रेस को दिया किंतु कुछ कारणों से 36 पृष्ठ तक छपकर काम रुक रहा।
[ ] यह लेखक तीसरी बार तिब्बत से लौटने के बाद प्रकाशित हुई।
[ ] कुल पृष्ठ :- 140(लेकिन 128 वे पृष्ठ के बाद तीन पृष्ठ लुप्त हो गए इसलिए अभी इसमें 137 पृष्ठ ही है।)
[ ] यात्रा वृत्तांत पांच खंडों में :-
1. ल्हासा से उत्तर की ओर
2. चाड् की ओर
3. स-क्य की ओर
4. ञेनम् की ओर 
5. नेपाल की ओर
[नोट्स :- अंतिम दो खण्ड सरस्वती पत्रिका में प्रकाशित हुए एवं शेष खण्ड प्रवासी (बंगला) पत्रिका में प्रकाशित हुई।
[ ] तृतीय खंड- [ङोर, 1-10-1934] 【बहुत पुस्तकें मिली】
• लेखक को भोजन का निमंत्रण था:- ट-शी- ल्हून- पो मठ के क्यि- खड्- सङ्(कॉलेज) के खन्- पो का था।
• सम्- लो- गे- शे :-
★ ट-शी- ल्हून- पो मठ के सबसे बड़े पंडित
★ 53 वर्ष के
★ पढ़ने का शौक
★ नैयायिक
• तिनदुवारे मंदिर में पीतल की बुद्ध मूर्तियां हैं,जिनमें एक के दाहिने हाथ में हर्र है अर्थात् वह बुद्ध मैषज्यगुरू है।
• ङोर में 3 एवं 4 तारीखों को रात में लिखा। 5 तारीख को दिन में भी थोड़ा समय मिला। 6 तारीख को आधी रात को पुस्तक लिखकर समाप्त हुई। पुस्तक में ताल पत्र के बीच 20 पत्ते या 38 पृष्ठ, आकार:-28×3 अंगुल(प्रत्येक पृष्ठ में 1 से 11 पंक्तियां, प्रत्येक पंक्ति में 70 अक्षर)
[ ] सम् -दोङ् [7-10-1934]
• शि-ग- र्चे से सक्य जाने वाला पूरा रास्ता है जिसमें आचार्य शांति रक्षित और दूसरे भारतीय आचार्य भोट देश में आये।
• चे- सुम(शिखर त्रय) का विहार पहाड़ के पास नदी धनुषाकार हो गई ।
[ ] स-क्य [12- 10- 1934]
• स- क्य के रास्ते एक विहार मिलता है जिसे छा- रोड् मंत्री के पुरुषों का बनवाया है।
• जहां दो घरों का समागम होता है उसे सुम्- दो कहा जाता है।
• दु – नी – छेन – पो :-
★ स- क्य महन्तराज के प्राइवेट सेक्रेटरी
★ स- क्य पहुंचकर लेखक ने उन्होने ङोर से लाई चिट्ठी दी।
★ भोटभाषा का अच्छा ज्ञान
★ विद्या प्रेमी
★ 60 वर्ष के
★ सज्जन व्यक्ति
• स- क्य सर महन्तराज का स्थान दलाई लामा और पणछेन (टशी) लामा के बराबर समझा जाता है।
• दग्-छेन-रिन्-पो-छे:-
★ स- क्य के मंहत
★ चंगेज की सन्तान के गुरू स-पण-कुन्-गा-ग्यल-छन् और फम् – पा-.लो-डो-ग्यल छन् के उत्तराधिकारी।
★ इनके पूर्वजों को भोट राज्य मिला था। तिब्बत से महन्त शाही का आरंभ तभी से हुआ था।
★ गर्मियों के डोल्-या- फोब्रड् में रहते जो दक्षिण में है।
• स- क्य विहार की स्थापना :-
★ पहाड़ी मैदान के ऊपर दक्षिण में
★ खोन् -कोन्- गर्यल् में द्वारा स्थापित
★ इस विहार का अब पता नहीं है।
• स-क्य मठ :-
★ स-क्य मठ के संस्थापक :- कोन् -ग् र्यल्(गृहस्थ)
★ इस मठ/विहार का ङचे- ल्ह – खड् में नम्- थर्- ल्ह- खड् सबसे बड़ा मंदिर।
★ इस मठ के मालिक सोन- कोन्- ग्यल् की सन्तति है जो तब से अब तक मालिक है।
★ स- क्य के सभी महंत गृहस्थ थे।(स-पण-कुन-ग-ग्यल-धन् ,फग्-पा, और धर्नपाल रक्षित को छोड़कर)
★ वर्तमान महंत भी गृहस्थ है :-
√ इनकी अवस्था 69 वर्ष
√ इसके दो पुत्र (32 – 33 वर्ष के)जिनके नाम पद्म- दुस् और द्ग – छेन
√ इनके दोनों लड़के की अब तक कोई संतान नहीं।
• सक्य विहार की हस्तलिखित सूची देखकर
★ पे – खड् पुस्तकालय में :- भोट पोथी
★ ग्य- पे पुस्तकालय में भारतीय पोथी
★ दोनों पुस्तकालय में कुल – 1334 पोथियाँ
• स – क्य समुद्रतल से 14715 फीट ऊपर है।
• चीन सम्राट के गुरू कुष्- ले- हान्- के गुरू :- संघराज फग्- पय- लो- डोस- ग्यल-हत्
• सक्य के महन्तराज सर्दी में चिन्दौड् प्रासाद रहते थे।
• सक्य के मठ/ विहार में भारतीय पीतल की मूर्तियों का संग्रह। (8 मूर्तियों एक पंक्ति में 7मूर्तियां दुसरी पंक्ति में)
• जब से गृहस्थ महन्त होने लगे तभी से उनको द्ग् -छेन् (महात्मा) की पदवी मिली है।
• आर्य समाज में भी गृहस्थ महापुरुष को स्वामी न कह सकते के कारण महात्मा का नाम पहले – पहले महात्मा मुंशीराम को और फिर महात्मा हंसराज को दिया गया।
• भोट के स-क्य महन्त राजो ने महात्मा(द्ग् -छेन्) नाम को प्रायः 6 शताब्दियों से अपनाया है।
• उत्तराधिकारी का नियम :- दोनों महलों में ज्येष्ठ संतान उत्तराधिकारी होता है। दोनों महलों में कोई ज्येष्ठ सन्तान न होने पर कनिष्ठ सन्तान उत्तराधिकारी हो सकेगा।
• स- क्य के ल्ह.-खड्-छात्रों न् मो में आचार्यधर्मकीर्ति की एक मूर्ति है।
• 18 तारीख को धर्म वर्धन ने वैशाली(बसाढ,जिला- मुजफ्फरपुर) के कायस्थ पंडित गयाधर की मूर्ति की तस्वीर उतारी ।
• धर्म साधन को बालक्रीड़ा से उपमा देने की बात लेकर धर्मवर्धन ने कह रहा था।
• 16 से 18 तारीख तक लेखक ने घर की मालकिन चम्- छड्- कु- शो- छे- रिह-पल-मो(दीर्घायुश्री) लोकेश्वर का न्यू- ने व्रत कर रही थी।
• न्यू -ने व्रत लेखक ने पिछली यात्रा में शुरू किया था किन्तु दोपहर भर की दडंवत मे ही परेशान हो छोड़ दिया।
• श्रीमती दीर्घायुश्री :-
★ इनके पति का नाम :- कु-शो-डोङ्-यिग्-छेन-पो
★ अधिक संस्कृत तथा मेधाविनी महिला
★ लेखक के खाने-पीने की ओर ध्यान रखती थी।
• 1934 में श्री विलियम्सन (पोलिटिकल एजेंट) स-क्य आए थे।
• श्री विलियम्सन की पत्नी के बारे में श्रीमती दीर्घायुश्री ने कहा ” भिखमंगिन की तरह आई थी,न कानो में आभूषण और न कंठ में माला।
[ ] चतुर्थ खंड [ञेनम् की ओर ]
• 26 अक्टूबर को 17वे दिन स-क्य को 8:00 बजे सवेरे छोड़ा।
• डोड् जंगली चंवेरियो को कहते हैं ।
• ल्ह- दोड् गांव में एक बड़ा मठ था।
• मब्- जा गांव में लेखक का चाय से स्वागत किया:- कु- शो- डोड् – पग- छेन् – पो के साले/श्रीमती दीर्घायुश्री के बड़े भाई
• मब्- जा गांव समुद्र तल से 15000 फुट ऊपर था।
• श्रीमती दीर्घायुश्री के कोई संतान नहीं थी। दीर्घायुश्री के पति ने अपने साले को उत्तराधिकारी बनाया।दीर्घायुश्री के साले या उत्तराधिकारी के अभी कोई संतान नहीं थी ।
• चाड्- थड् :- तिब्बत का उत्तरी जन – शून्य मैदान।
• लङ् कोर भारतीय सिद्ध फ-दम्-प-सड् का बहुत दिनों तक निवास स्थान रहा है।
• पाटन( नेपाल) के साहु- जोगमान् से लेखक की भेट हुई।(ञेनम् में)
• लेखक को(ञेनम् में) में ढाई महीने की जमी मैलके उतर जाने से चित्त का प्रसन्न होना स्वभाविक था।
[ ] पंचम खंड[नेपाल की ओर]
• डाम् पहुंचने से 3 मील पूर्व देवदार का कटिबंध समाप्त हो गया था।
• गोम्- थड़् गांव में लेखक एवं मित्र के द्वारा ढूढ – ढूढकर दूध लाया गया किंतु आग पर रखते फट गया।
• गोम्- थड़् गांव के आगे का आगे गांव को लेखक ने ने भैसों का देश कहा।
• यङ्ला कोट दो दुकाने (साधारण दुकान) थी।
• जल वीरा के बाजार में 24 – 25 दुकानें थी लेकिन बाजार में फल नहीं मिला।
• चौतरा पहाड़ी डॉडे पर बसा हुआ है ।बड़े हकीम का निवास स्थान तथा एक जिले का हेड क्वार्टर होने की बस्ती अच्छी है।आरंभ में सैनिक महत्व के ही कारण वह ऊंची पहाड़ी रीढ़ आबादी की गई होगी।
• सि- पा गांव के लोग पपीते को मेवा कहते थे।(देवताओ के चढ़ाने के लिए)
• लेखक ने अनुसार भारत में भी कहीं-कहीं पपीते को रड मेवा कहा जाता है।
• सि- पा गांव मे राज्य की ओर से सहायता प्राप्त एक संस्कृत पाठशाला है।
• लेखक 15 नवंबर को 11:00 बजे इंद्रावती(कोसी नदी की शाखा) के तट पर पहुंचे।
• बोधा के पुराने स्तूप को भूकंप से कोई क्षति नहीं हुई थी।
• राज परिवार के चंदे से सहायता की मद में चौदह-पन्द्रह लाख रुपए जमा हो गये थे।(सरकार ने पुनर्निर्माण के लिए एक विभाग खोल दिया था)
• श्री धर्म नाथ साहु :-
★ छु- सिस्या के स्वामी।
★ इनका मकान काठमांडू के मित्रता की में प्रसिद्ध पुरुष के दो पुत्र :- त्रिरत्न मान,ज्ञान मान
• धर्मवर्धन के भाषा (भोट भाषा) बोलने वाले काठमांडू में मिल गये :-
★ साहु , त्रिरत्नमान, ज्ञानमान और साहु के भांजे ।
• प्रभाव वार्तिक के भाष्य वार्तिकालड्कार के दो परिच्छेदों को स- क्य मठ में देखा उसका मूल नेपाल के महान विद्वान राजगुरु श्री हेमराज शर्मा को मिल गया।
• लेखक का नेपाल के मार्ग से लौटने का कारण :- प्रमाणवार्तिक के भाष्य वार्तिकालंकार के परिच्छेद का मूल देखने के लिए ।
• 18 नवंबर को सबसे पहले राजगुरु श्री हेमराज शर्मा के भेंट करने का निश्चय किया।
• राजगुरु हेमराज शर्मा :-
★ संस्कृत के गंभीर विद्वान
★ व्याकरण साहित्य संस्था के सभी शास्त्रों को
विधिवत् अध्ययन जान है।
★ विद्याव्यसनी
★ नम्रता और विनय स्वभाव
★ इनका वंश चिरकाल से गोर्खा राजवंश के गुरु
★ गोर्खा राजवंश में प्रधान गुरु (बड़े गुरु) के अधिकार पाने के अवशिष्ट     व्यक्तियों में ज्येष्ठ होने का ध्यान रखा जाता है ।
★ इनके पिताजी पहले धर्मा गुरु थे,अब प्रधान राजगुरु इनके वृद्ध चाचा है।
★ यह राजकुल के सलाहकार (वंश में अधिक विद्वान होने कारण)
★ इन्होंने बचपन में संस्कृत भाषा का ही अध्ययन किया है।
★ राजगुरु हेमराज शर्मा को “सजीव विश्वकोश” किसने कहा। :- पंडित जयचन्द विद्यालंकार ने
★ राजगुरु हेमराज शर्मा को देखते ही वक्त किसी अपने पूर्वज तपोधन ऋषि की याद आए बिना नहीं रहती ।(लेखक के अनुसार)
★ गौर मुख पर लडकी हंसी की रेखा हर वक्त खिचीं रहती है।
★ उनके वार्तिक के मूल की ताम्रपोथी रोम के आचार्य तूची को दे दी।
★ सरकार के स्थापिर विभाग के देख के 50वर्ष तक कोई संतान नहीं थी।
★ पहली पत्नी का देहांत हो गया।
★ दूसरी पत्नी (यह संस्कृतज्ञ थी)से:- तीन संतान
√ दो पुत्र :-(बड़ा पुत्र 9 वर्ष का, शुद्ध संस्कृत वार्त)
√ एक पुत्री
★ यह नेपाल के रत्न है कहे जाते है।
★ इनके बारे में लेखक का कथन “आपके ऐसा अद्भूत ज्ञानराशि का धनी हो ओर नेपाल जैसी अनमोल संस्कृत ग्रंथों की खानि हो।”
★ राजगुरु के पास प्राचीन ग्रंथों का संग्रह :- इन संग्रहों
√ दसवीं सिद्ध तिलोपा का एक दोहाकोश मिला।(ग्रंथ- खंडित)
√ सरकारी पुस्तकालय में दोहाकोश(सरहपा)
• भूकंप ने नेपाल में हानि पहुंचाई :- काठमांडू,पाटन और भात गांव।
• भूकंप से सर्वाधिक क्षति होने वाला :- भात गांव।( भात गांव के बाद सर्वाधिक क्षति होने वाला :- पाटन)
• पाटन में सुनयश्रीविहार की समाधि देखी।(23नवम्बर को)
• शिक्षा – विभाग के डायरेक्टर जनलर – मृगेन्द्र शम्सेर एम.ए
★ राज- घराने का सर्वप्रथम एम.ए
★ इनके पास 500 से अधिक हस्तलिखित ग्रंथ।
• नेपाल के सभी विहार में ऐसे पंचायती मंदिर और भनसार है ।
• तिब्बत से साथ लाई मूर्तियां और ताल पोथियों में एक खास अनुज्ञापत्र की  आवश्यकता थी । (यह काम :- जनरल केसर शमसेर ने कर दिया।)
• लेखक का वजन :- 40 पौड घट गया(ज्वार और उपवास[4 दिन] के कारण)
• डाक-खड् के पास पहाड़ पर जमीन में धूप के छोटे-छोटे पौहे है (धूप के पौहे की पत्तियों से भोटिया लोग धूप- बत्ती बनाते हैं)
• नड् – रचे गांव:-
★ बहुत ठंडा स्थान
★ समुद्र तल से 14-15 हजार फीट ऊंचा
★ यहां के लोग मुख्य जीविका भेड और चमरी
★ यह गांव ‘यम् -डो- छा’ नामक महासरोवर सरोवरका घेरा -100 मील से अधिक)
★ ऊन के लिए मशहूर (जहां जितनी अधिक सर्दी पड़ती है,वहां कि ऊन भी उतना ही मुलायम हो जाता है।)
★ यहां का चुक -टुक् (बाल निकला हुआ कम्बल भोटिया लोग को बहुत पसंद है।)
नोट :- इस यात्रा वृत्तांत में शब्द ऐसे ही है जिसके कारण टाइपिंग में त्रुटि हो सकती है।

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