मैला आँचल उपन्यास का सारांश और उद्देश्य( maila aanchal upanyas ka saraansh aur uddeshy)

• प्रकाशन:- अगस्त, 1954ई . समता प्रकाशन, पटना से

• उपन्यासकार :- फणीश्वरनाथ रेणु

• कुल पृष्ठ :- 250

• कुल खण्ड :- 2

• कुल परिछेद : 67

• उपन्यास की कथा भूमि उत्तरी बिहार का पूर्णिया अंचल है और कथाकाल आजादी के कुछ बरस बाद का।

• पहले खंड में :- स्वतंत्रतापुर्ण के गांव का चित्रण।

• द्वितीय खंड में :- स्वतंत्र्योत्तर बदलते हुए ग्राम के जीवन के बिखराव और टुटन का चित्रण।

• प्रथम खंड में मठ के महंत रामदास और बाद में सेवा दास के थोथे आडंबर और पापाचार, मनुष्यों की गरीबी,बेबसी और शोषण,डॉ प्रशांत का अनुसंधान का कार्य, राजनीतिक चेतना, पार्टियों का परस्पर विरोधी एवं प्रचार, सांस्कृतिक चेतना,रूढियो,परंपराओ एवं आडंबरों के प्रति विद्रोह,पर्व त्यौहार रीति- रिवाज,नृत्य,संगीत आदि सामाजिक चेतना संथालों द्वारा तहसीलदार की भूमि पर बलपूर्वकअधिकार सांप्रदायिकता जमींदार प्रथा की समाप्ति
आदि एक साथ विविध चित्रण प्रस्तुत है।

• द्वितीय खंड में पुलिस अत्याचार मठ के आडंबरों का पर्दाफाश,तहसीलदार साहब के कुण्ठाओ,ग्राम्यदंगल, राजनीतिक पार्टियों का खोखलापन, गांधीवाद की रिक्तता, प्रशांत एवं कमला के विवाह और पटना और वापस जाने का निश्चित आदि का चित्र उपन्यास प्रस्तुत है।

• आंचलिक उपन्यास का नायक अंचल ही होता है। इसलिए इस उपन्यास का नायक मेरीगंज है।

• इसके प्रकाशन के बाद इसकी प्रथम समीक्षा आचार्य नलिन विलोचन शर्मा ने की थी जो आलोचना (अप्रैल 1955 ई.)में ‘मैला आंचल की समीक्षा’ शीर्षक से प्रकाशित हुई।

• हिंदी में गोदान के बाद दूसरा श्रेष्ट उपन्यास (आचार्य नलिन विलोचन शर्मा ने कहा)

• उपन्यास दो खंडों में विभक्त है :-
1. प्रथम खंड में :- 44 परिच्छेद
2. दूसरे खंड में :- 23 परिच्छेद

• इसमें प्रथम संस्करण की भूमिका का प्रथम वाक्य है – “यह है मैला आंचल एक आंचलिक उपन्यास है।

• इस उपन्यास में लेखक सार्वजनिक ध्यान अंचलल की जन- चेतना को चित्रित करने पर केन्द्रीय हैं।

• उपन्यास के नामकरण के संबंध में अपने एक साक्षात्कार में रेणु ने स्वीकार किया है कि मैला आंचल नाम उन्होंने पंत जी की कविता से लिया था – “भारत माता ग्रामवासिनी खेतों में फैला है श्यामल धूल भरा मेला सा आंचल नैनों में गंगा – यमुना जल मिट्टी की प्रतिमा उदासिनी।”【प्रथम खंड, सत्ताईसवाँ परिच्छेद में डॉ. प्रशांत के मुख से यह गीत निकलता है।】

• इसमें 1942 से 1948 तक की राजनीतिक गतिविधियों का अकंन।

• पूर्णिया जिले में स्थान – स्थान पर बनी नील की कोठियों का वर्णन।

• रेणू ने उपन्यास की भूमिका में लिखा है – ” यह है मैला आंचल एक आंचलिक उपन्यास।”

• इसमें रेणू ने बिहार राज्य के पूर्णिया जिले के मैरी गंज गांव की गरीबी,जहालत,रोग,अंधविश्वासों लोक विश्वासों, पिछड़ेपन, आचार – व्यवहार – संस्कृति, जीवन पद्धति, उत्सवों, पर्वों,परंपराओं, गीतों संघर्षों, प्रकृति चित्रण के माध्यम से पूरे आंचलिक परिवेश का जीवंत चित्रण किया है।

• शिल्प की दृष्टि से इसमें फिल्म की तरह एक के बाद एक घटनाएं घटकर विलिन हो जाती है और दूसरी प्रारंभ हो जाती है।

• इसमें घटनाप्रधानता, नाटकीयता,लोक गीतों और लोकपर्वों, किस्सागोई का प्रयोग किया गया है।

• डॉ प्रशांत कमली के दिल की बीमारी को नहीं समझने का कमली ने डॉ. प्रशांत को ”मिट्टी का माधव” करने लगती है।

• कमली डॉ. प्रशांत को प्राणनाथ संबोधित करते हुए प्रतिदिन पत्र लिखती है और उन्हें फाड़ती रहती है।

• सुमरितदास को लोग लबड़ा आदमी समझते हैं।

• मुस्लिम लीग के नेता कमरुद्दीन बाबू चीजों को ब्लैक में बेचता था।

• खलिहान खुलने के अवसर पर बिदापत नाच का आयोजन हुआ। इस आयोजन का म्यूजिक डायरेक्टर लिबइ पासवान था।

• कालीचरण वासुदेव को कहता है “यही पार्टी असल पार्टी है गरम पार्टी है।”

• मंहगू की बेटी चुमौना(विवाह) खलासी के साथ कर दे।(कालीचरण का फैसला)

• कांग्रेस का प्रचार कार्य करने के लिए मेरीगंज में बौन दास नामक कार्यकर्ता आ जाता है उसके बारे में प्रसिद्ध है कि उसने 1942 में गोरी मिलिट्री को बहुत छकाया था।

• विश्वनाथ की बहन के खेत से धान लूटते संथलों और ग्रामवासियों में जमकर संघर्ष होता है इस संघर्ष में हरगौरी की मृत्यु हो जाती है।

• उपन्यास का अंतिम वाक्य -“कलीमुद्दीपुर घाट पर चेथरिया पीर में किसी ने मानता करके एक चीथड़ा और लटका दिया है।”

• इस उपन्यास का उद्देश्य नवीन शिल्प विधा का प्रयोग। बिहार के पूर्णिया जिले के मेरीगंज नामक गांव को आधार बनाकर रेणु ने इस गांव के रहन-सहन, खान-पान, पर्व – त्यौहार राजनीतिक गतिविधियां तथा पारस्परिक झगड़े आदि तथ्यों का बड़ी सूक्ष्मता से अंकन किया है।

• “जिस तरह कुछ साधु- संतों के पास बैठकर ही असीम कृतज्ञता का एहसास होता है, हमें अपने धूल जाते हैं ,स्वच्छ हो जाते हैं, रेणु की मूक उपस्थिति हिंदी साहित्य में कुछ ऐसी ही पवित्रता का बोध कराती थी।”( निर्मल वर्मा के अनुसार)

• “रेणु का महत्व मन की आंचलिकता में नहीं, आंचलिकता के अतिक्रमण में निहित है।” (निर्मल वर्मा के अनुसार)

• ‘ग्रामवासिनी भारत माता के आंचल’ को मैला आंचल कहा है। (फणीश्वर नाथ रेणु ने)

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