रश्मिरथी की भूमिका(Rashmirathi ki bhumika)

 

 

          💐💐”रश्मिरथी” की भूमिका💐💐
         【 राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर】

◆ रश्मिरथी का अर्थ :- ‘सूर्य की सारथी’

◆ हिन्दी के महान कवि रामधारी सिंह दिनकर द्वारा रचित

◆   खण्डकाव्य

◆ काव्य का आरम्भ :- 26 फरवरी 1950 ई.  को किया था।

◆  प्रकाशन :-  1952 

◆  कुल  सर्ग  :- 7   सर्ग

◆  जिसमें कर्ण के चरित्र के सभी पक्षों का सजीव चित्रण किया गया है।

◆ रश्मिरथी में दिनकर ने कर्ण की महाभारतीय कथानक से ऊपर उठाकर उसे नैतिकता और वफादारी की नयी भूमि पर खड़ा कर उसे गौरव से विभूषित कर दिया है।

◆ रश्मिरथी में दिनकर ने सारे सामाजिक और पारिवारिक संबंधों को नए सिरे से जाँचा है। चाहे गुरु-शिष्य संबंध के बहाने हो. चाहे अविवाहित मातृत्व और विवाहित मातृत्व के बहाने हो, चाहे धर्म के बहाने हो, चाहे छल-प्रपंच के बहाने ।

◆ युद्ध में भी मनुष्य के ऊँचे गुणों की पहचान के प्रति ललक का काव्य है रश्मिरथी

◆ रश्मिरथी यह भी संदेश देता है कि जन्म- अवैधता से कर्म की वैधता नष्ट नहीं होती।

◆  अपने कर्मों से मनुष्य मृत्यु-पूर्व जन्म में ही एक और जन्म ले लेता है। अंततः मूल्यांकन योग्य मनुष्य का मूल्यांकन उसके वंश से नहीं, उसके आचरण और कर्म से ही किया जाना न्यायसंगत है।

◆ “दान जगत का प्रकृत धर्म है, मनुज पर्थ डरता है, एक रोज वो हमें स्वयं सब कुछ देना पड़ता है वचते वही समय पर जो सर्वस्व दान करते हैं, ऋतु का ज्ञान नहीं जिनको वे देकर भी मरते हैं।”[ रश्मिरथी चतुर्थ सर्ग 】

◆ इस सरल सीधे काव्य को भी किसी भूमिका की जरूरत है ऐसा में नहीं मानता; मगर, कुछ न लिखू तो वे पाठक जरा उदास हो जायेंगे जो मूल पुस्तक के पढ़ने में हाथ लगाने से पूर्व किसी न किसी पूर्वाभास की खोज करते हैं। यो भी हर चीज का कुछ न कुछ इतिहास होता है और ” रश्मिरथी” नामक यह विनम्र कृति भी इस नियम का अपवाद नहीं है।

◆ बात यह है कि “कुरुक्षेत्र” की रचना कर चुकने के बाद ही मुझमें यह भाव जगा कि मैं कोई ऐसा काव्य भी लिखू जिसमें केवल विचारोत्तेजकता ही नहीं, कुछ कथा-संवाद और वर्णन का भी माहात्म्य हो स्पष्ट ही, यह उस मोह का उद्गार था जो मेरे भीतर उस परंपरा के प्रति मौजूद रहा है जिसके सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि राष्ट्रकवि श्रीमंथिलीशरणजी गुप्त है।

◆ इस परंपरा के प्रति मेरे बहुत-से सहधर्मियों के क्या भाव है, इससे में अपरिचित नहीं हूँ। मुझे यह भी पता है कि जिन देशों अथवा दिशाओं से आज हिन्दी काव्य की प्रेरणा पार्सल से मौत या उधार मंगाई जा रही हैं, वहाँ कथा – काव्य की परंपरा निःशेष हो चुकी हैं और जो काम पहले प्रबन्ध-काव्य करते थे वही काम अब बड़े मजे में, उपन्यास कर रहे हैं। किन्तु अन्य बहुत-सी बातों की तरह में एक इस बात का भी महत्व समझता हूँ कि भारतीय जनता के हृदय में न्याय का प्रेम आज भी काफी प्रबल है और यह अच्छे उपन्यासों के साथ-साथ ऐसी कविताओं के लिए भी बहुत ही उत्कंठित रहती है।

◆  अगर हम इस सात्विक काव्यप्रेम की उपेक्षा कर दें तो मेरी तुच्छ सम्मति में हिन्दी कविता के लिए यह कोई बहुत अच्छी बात नहीं होगी। परंपरा केवल वहीं मुख्य नहीं है जिसकी रचना बाहर हो रही हैं, कुछ वह भी प्रधान है जो हमें अपने पुरखों से विरासत के रूप में मिली है, जो निखिल मंडल के साहित्य के बीच हमारे अपने साहित्य की विशेषता है और जिसके भीतर से हम अपने हृदय को अपनी जाति के हृदय के साथ आसानी से मिला सकते हैं ।

◆ कथा कहने में अक्सर ऐसी परिस्थितियां आकर मौजूद हो जाती है जिनका वर्णन करना तो जरूरी होता है, मगर वर्णन काव्यात्मकता में व्याघात डाले बिना निभ नहीं सकता। रामचरितमानस, साकेत और कामायनी के कमजोर स्थल इस बात के प्रमाण है। विशेषतः कामायनीकार ने शायद इसी प्रकार के संकटों से बचने के लिए कथासूत्र को अत्यन्त विरल कर देने की चेष्टा की थी किन्तु यह चेष्टा सर्वत्र सफल नहीं हो सकी।

◆ आजकल लोग बाजारों से ओट्स (जई) मँगा कर खाया करते हैं। आंशिक तुलना में यह गीत और मुक्तक का आनन्द है। मगर, कथाकाव्य आनन्द खेतों में देशी पद्धति से जई उपजाने के आनन्द के समान है। यानी इस पद्धति से जई के दाने तो मिलते ही हैं। कुछ घास और भूसा भी हाथ आता है, कुछ लहलहाती हुई हरियाली देखने का भी सुख प्राप्त होता है और हल चलाने में जो मेहनत पड़ती हैं, उससे कुछ तन्दुरुस्ती भी बनती है।

◆ फिर भी यह सच है कि कथाकाव्य को रचना, आदि से अन्त तक केवल दाहिने हाथ के भरोसे नहीं की जा सकती। जब मन ऊबने लगता है और प्रतिभा आगे बढ़ने से इनकार कर देती हैं, तब हमारा उपेक्षित बायां हाथ हमारी सहायता को आगे बढ़ता है। मगर बेचारा बायाँ हाथ तो बायाँ ही ठहरा वह चमत्कार तो नया दिखलाये, कवि की कठिनाइयों का कुछ परदा ही बोल देता है और इस क्रम में खुलनेवाली कमजोरियों को ढँकने के लिए कवि को नाना कौशलों से काम लेना पड़ता है।

◆ यह तो हुई महाकाव्यों को बात अगर इस ‘रश्मिरथी” काव्य को सामने रखा जाये तो  मेरे जानते इसका आरंभ ही बायें हाथ से हुआ है और आवश्यकतानुसार अनेक बार कलम बायें से दाहिने और दाहिने से बायें हाथ में आती – जाती रही है। फिर भी, खत्म होने पर चीज मुझे अच्छी लगी। विशेषतः मुझे इस बात का संतोष है कि अपने अध्ययन और मनन से में कर्ण के चरित को जैसा समझ सका हूँ यह इस काव्य में ठीक से उतर जाया है और उसके वर्णन के बहाने में अपने समय और समाज के विषय में जो कुछ कहना चाहता था, उसके अवसर भी मुझे यथा- स्थान मिल गये हैं।

◆ उस समय मुझे केवल इतना ही पता था कि प्रयाग के यशस्वी साहित्यकार पं. लक्ष्मीनारायणजी मिश्र कर्ण पर एक महाकाव्य की रचना कर रहे हैं। किन्तु ” रश्मिरथी” के पूरा होते-होते हिन्दी में कर्णचरित पर कई नूतन और रमणीय काव्य निकल गये।

◆ यह युग दलितों और उपेक्षितों के उद्धार का युग है। अतएव यह बहुत स्वाभाविक है कि राष्ट्र –  भारती के जागरूक कवियों का ध्यान उस चरित की ओर जाय जो हजारों वर्षों से हमारे सामने उपेक्षित एवं कलंकित मानवता का मूक प्रतीक पर खड़ा रहा है।

◆ रश्मिरथी में स्वयं कर्ण के मुख से निकला है-
“मैं उनका आदर्श, कहीं जो व्यथा न खोल सकेंगे, पूछेगा जग किन्तु पिता का नाम न बोल सकेंगे, जिनका निखिल विश्व में कोई कहीं न अपना होगा. मन में लिये उमंग जिन्हें चिर-काल कल्पना होगा।”

◆ रश्मिरथी पुस्तक के परिचय में दिनकर कहते हैं: – “कर्ण चरित के उद्वार की चिन्ता इस बात का प्रमाण है कि हमारे समाज में मानवीय गुणों की पहचान बढ़नेवाली है। कुल और जाति का अहंकार विदा हो रहा है। आगे मनुष्य केवल उसी पद का अधिकारी होगा जो उसके अपने सामर्थ्य से सूचित होता है, उस पद का नहीं, जो उसके माता-पिता या वंश की देन है। इसी प्रकार, व्यक्ति अपने निजी गुणों के कारण जिस पद का अधिकारी है, वह उसे मिलकर रहेगा. यहाँ तक कि उसके माता-पिता के दोष भी इसमें कोई बाधा नहीं डाल सकेंगे। कर्णचरित का उद्वार एक तरह से, नयी मानवता की स्थापना का ही प्रयास है और मुझे सन्तोष है कि इस प्रयास में मैं अकेला नहीं, अपने अनेक सुयोग्य सहधर्मियों के साथ हूँ। कर्ण का भाग्य, सचमुच, बहुत दिनों के बाद जगा है। यह उसी का परिणाम है कि उसके पार जाने के लिए आज जलयान पर जलयान तैयार हो रहे हैं। जहाजों के इस बड़े बेड़े में मेरी ओर से एक छोटी-सी डोंगी ही सही। “

 

 

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