रस का स्वरूप(ras ka svarup)

• रस अखंड है।

• रस स्वप्रकाशानंद है।

• रस चिन्मय है।

• रस सचेतन अथवा प्राणवान् आनंद है।

• रस अपने आकर से अभिन्न है।

• रस वेद्यान्तर स्पर्शशून्य है

• रस (काव्यास्वाद) को ब्रह्मास्वाद न कहकर उसका सहोदर कहा जाता है।

• रस लोकोत्तर चमत्कार का प्राण है।

• रस अपने आकार से अभिन्न रूप से आस्वादित किया जाता है।

• रस आविर्भाव सत्वगुण के उद्रेक की स्थिति में होता है।

• रस न कार्य,न ज्ञाप्त है, न परोक्ष,अनिर्वचनीय,न साक्षात् अनुभव है , न वह निर्विकल्प ज्ञान है।

• सहोदर(एक ही गर्भ से उत्पन्न)

• रसास्वाद

• कैश्चित

• लौकिक

• आत्मस्वरूप

• अस्वाद्य और आस्वाद

• आनंदमयी चेतना

• सामाजिक को आनन्दानुभूति

• चेतना अनुभूति

• आस्वाद समझदार व्यक्ति सहृदय करता है।

• रस एक लौकिक आनंद (आस्वाद) है

• रस को लोकोत्तर आनंद भी कहते हैं।

आध्यात्मिक आनंद और रस में अन्तर :-

1. आध्यात्मिक आनंद अलौकिक आनंद है जबकि रस लौकिक आनंद है।
2. आध्यात्मिक आनंद ब्रह्मास्वाद है जबकि रस ब्रह्मास्वाद सहोदर है।
3. आध्यात्मिक आनंद निम्न कोटि का है जबकि रस उच्च कोटि का है।

• विभाव,अनुभव और संचारी भावों के संयोग से स्थायी भाव रस रूप में आस्वाद किया जाता है इसलिए रस को आनंद कहा गया है।

◆ पंडित विश्वनाथ के रस विषयक विश्लेषण से रस की विशेषताएं :-

• रसास्वादन रूप है।

• रस आनंद है।

• रस का उदय सत्वोद्रेक सत्व गुणों का उद्रेक) की स्थिति में होता है।

• रस अखंड होता है।

• रस स्व प्रकाश है।

• रस सहृदय अपने मन का ही प्रकाश होता है।

• रस में स्वयं को प्रकाशित करने की आनंदानुभूति होती है।

• रसास्वाद की स्थिति में सहृदय का सर्वथा आत्मलीन हो जाना वेद्यान्तर स्पर्शशून्य है अर्थात् रसास्वाद की स्थिति पूर्णतः तन्मीय भाव की स्थिति होती है।

• रस ब्रह्मास्वाद सहोदर है।

• रस लोकोत्तर चमत्कार प्राण है।

• रस का आस्वाद मात्र प्रमाता(समझदार व्यक्ति) ही कर सकता है।( कैश्चिचत)

• रस भावों से भिन्न होता है।(स्वाकारवदभिन्न)

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