• चिंतामणि प्रथम भाग(1939ई.) निबंध संग्रह से(सम्पादन – आ. रामचंद्र शुक्ल ने)
• चिंतामणि प्रथम भाग में 17 निबंध संगृहीत है।
• जिनके नाम :-
1. भाव एवं मनोविकार
2. उत्साह
3. श्रद्धा और भक्ति
4. करुणा
5. लज्जा और ग्लानि
6. लोभ और प्रीति
7. घृणा
8. ईर्ष्या
9. भय
10. क्रोध
11. कविता क्या है【सबसे लम्बा सैद्धांतिक निबंध】
12. भारतेंदु हरिश्चंद्र
13. तुलसी का भक्ति मार्ग
14. मानस की धर्म भूमि
15. काव्य में लोकमंगल की साधनावस्था【सैद्धांतिक निबंध】
16. साधारणीकरण और व्यक्ति वैचित्र्यवाद【सैद्धांतिक निबंध】
17. रसात्मक बोध के विविध रूप।【सैद्धांतिक निबंध】
💐 श्रद्धा और भक्ति के संबंधित में आ. राम चन्द्र शुक्ल के महत्वपूर्ण कथन:-
◆ श्रद्धा महत्त्व की आनन्दपूर्ण स्वीकृति के साथ-साथ पूज्य बुद्धि का संचार है।
◆ श्रद्धा एक सामाजिक भाव है।
◆ श्रद्धा का मूल तत्त्व है:- दूसरे का महत्त्व स्वीकार।
◆ स्वार्थियों और अभिमानियों के हृदय में श्रद्धा टिक नहीं सकती।
◆श्रद्धा न्याय-बुद्धि के पलड़े पर तुली हुई एक वस्तु है।
◆ श्रद्धा सत्कर्म या सद्गुण ही का मूल्य है, जिससे और किसी प्रकार का सौदा नहीं हो सकता।
◆ यदि प्रेम स्वप्न है तो श्रद्धा जागरण है ।
◆ श्रद्धा सामर्थ्य के प्रति होती है और दया असामर्थ्य के प्रति ।
◆ श्रद्धालु महत्त्व को स्वीकार करता है, पर भक्त महत्त्व की ओर अग्रसर होता है। श्रद्धालु अपने जीवन-क्रम को ज्यों का त्यों छोड़ता है. पर भक्त उसको कोट-छाँट में लग जाता है।
◆ श्रद्धा धर्म की अनुगामिनी है। जहां धर्म का स्फुरण दिखाई पड़ता है, वही श्रद्धा टिकती है ।
◆ श्रद्धा में याचकता का भाव लेशमात्र भी नहीं है।
◆ श्रद्धा द्वारा हम अपने हृदय का परिचय मात्र देते हैं।
◆ श्रद्धेय समाज की स्थिति या सुख का विधान करता है और समाज उसकी स्थिति और सुख का विधान करता है। श्रद्धालु की दृष्टि सामान्य की ओर होनी चाहिए, विशेष की ओर नहीं।
◆ श्रद्धा और प्रेम के योग का नाम भक्ति है।
◆ श्रद्धा द्वारा हम दूसरे महत्त्व के किसी अंश के अधिकारी नहीं हो सकते पर भक्ति द्वारा हो सकते हैं।
◆ श्रद्धालु अपने जीवन क्रम को ज्यों-का-त्यों छोड़ता है, पर भक्त उसकी कॉट-छाँट में लग जाता है।
◆ भक्त दाक्षिण्य चाहता है।
◆ भक्ति राग की वह दिव्यभूमि है, जिसके भीतर सारा चराचर जगत् आ जाता है।
◆ भक्ति के लिए दैन अर्थात् दूसरे के महत्त्व के साथ अपने लघुत्व की भावना पहली बात है।
◆ जो उच्चपथ पहले कष्टकर और श्रमसाध्य जान पड़ता है वही भक्ति के बल से मनोहर लगने लगता है।
💐 श्रद्धा से सम्बधित अन्य कवियों के कथन:-
◆ श्रद्धा बिना धर्म नहि होई । – तुलसीदास(रामचरितमानस)
◆ “चैतन्य को बन्धन में लाने के लिए प्रकृति ने श्रद्धा के अतिरिक्त और कोई रस्सी बनाई ही नहीं । बाँधने के लिए मनुष्य के हाथ केवल एक यही रस्सी आई है। मन को चाहे देवता के साथ बाँधो, चाहे मातृभूमि या राष्ट्र के साथ, श्रद्धा या प्रेम की दामरी के सिवा और कोई उपाय नहीं है। लोभ या बल के बंधन सब निकृष्ट हैं।” – वासुदेवशरण अग्रवाल
“जिज्ञासा का अभाव अश्रद्धा है। जिज्ञास्य विषय को अपने अध्यवसाय को क्षमता से अनुभव का विषय बना सकना यही श्रद्धा का लक्षण है । आत्म-विश्वास ही श्रद्धा है।” – वासुदेवशरण अग्रवाल
💐 श्रद्धा और भक्ति निबंध का सारांश💐
• श्रद्धा की परिभाषा :- किसी मनुष्य में जन साधारण से विशेष गुण या शक्ति का विकास देख उसके संबंध में जो एक स्थायी आनंद – पद्धति हृदय में स्थापित हो जाती है उसे श्रद्धा कहते हैं ।
• श्रद्धा महत्त्व की आनन्दपूर्ण स्वीकृति के साथ – साथ उच्च पूज्य – बुद्धि का संचार है।
• जिन कर्मों के प्रति श्रद्धा होती है उनका होना संसार को वांछित है।
• विश्व कामना श्रद्धा की प्रेरणा का मेल है।
• किसी कवि का काव्य बहुत अच्छा लगा, किसी चित्रकार का बनाया हुआ चित्र बहुत सुंदर लगा और हमारे चित्त में उस कवि या चित्रकार के प्रति एक सुहृदय-भाव उत्पन्न हुआ तो वह श्रद्धा है, क्योंकि यह काव्य की या चित्ररूप का मध्यस्थ द्वारा प्राप्त हुआ है।
• व्यक्ति को कर्मों के द्वारा मनोहरता प्राप्त होती है। (कर्म प्रधान) :- श्रद्धा
• कर्मों का व्यक्ति द्वारा मनोहरता प्राप्त होती है।(व्यक्ति प्रधान) :- प्रेम
• श्रद्धा एक सामाजिक भाव है, इसमें अपनी श्रद्धा के बदले में हम श्रद्धेय से अपने लिए कोई बात नहीं चाहते ।
• श्रद्धा एक ऐसी आनंदपूर्ण कृतज्ञता है जिस हम केवल समाज के प्रतिनिधि के रूप में प्रकट करते हैं।
• सदाचार पर श्रद्धा और अत्याचार पर क्रोध या घृणा प्रकट करने के लिए समाज ने प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिनिधित्व प्रदान कर रखा है।
• बच्चों में कृतज्ञता का भाव पाया जाता है पर सदाचार के प्रति उस कृतज्ञता देखा का नहीं उसे श्रद्धा कहते हैं।
• किसी विशेष मनुष्य के साथ किए जाने वाले व्यवहार के लिए जो कृतज्ञता होती है वहां श्रद्धा नहीं होती।
• श्रद्धालु की दृष्टि सामान्य की ओर होनी चाहिए, विशेष की ओर नहीं।
• अपने संबंधी के प्रति किसी को कोई उपकार करते देख यदि हम चाहे कहे कि उस पर हमारी श्रद्धा हो गयी। :- यह पांखड है श्रद्धा नही
• उसी सज्जन को दस-पांच और ऐसे आदमियों के साथ जब हम उपकार करते देखे जिन्हें हम जानते तक नहीं और इस प्रकार हमारी दृष्टि विशेष से सामान्य की ओर हो जाये।तब यदि हमारे चित्त में उसके प्रति पहले से कही अधिक कृतज्ञता या पूज्य बुद्धि का उदय हो तो हम श्रद्धालु की उच्च पदवी के अधिकारी हो सकते हैं।
• सामान्य रूप में हम किसी के गुण या शक्ति का विचार सारे संसार में संबद्ध करके करते हैं,अपने से या किसी विशेष प्राणी से सम्बद्ध करके नहीं।
• श्रद्धा का मूल तत्व :- दूसरे का महत्व स्वीकारना।
• श्रद्धा के तीन प्रकार (स्थूल रूप से)
★ प्रतिभा संबंधी
★ शील संबंधी
★ साधन – संपत्ति संबंधी
• प्रतिभा से तात्पर्य :- अंतःकरण की उस उद्भाविका क्रिया से है जिसके द्वारा कला, विज्ञान आदि क्षेत्रों में नयी बाते या कृतियाँ उपस्थित की जाती है।
• किसी उत्तम काव्य या चित्रकार की विशेषता न समझने के कारण हम कवि या चित्रकार पर श्रद्धा न कर सके तो यह हमारा अनाड़ीपन है, हमारे रुचि – संस्कार की त्रुटि है।( इस का उपाय – कला – संबंधिनी मर्मज्ञता के प्रचार की व्यवस्था करें।)
• शाल -सम्बंधिनी :- श्रद्धा प्रत्येक व्यक्ति का कर्त्तव्य है।
• शील या धर्म के सामान्य लक्षण संसार के प्रत्येक सभ्य जन- समुदाय में प्रतिष्ठित है।
• सदाचारी के प्रति यदि हम श्रद्धा नहीं रखते हैं तो समाज के प्रति अपने कर्तव्य का पालन नहीं करते है।
• धर्म की पहली सीढ़ी :- श्रद्धा
• मनुष्य का पहला सोपान :- धर्म
• मनुष्य का दूसरा सोपान :- कर्म
• किसी को पद्य रचने की अच्छी अभ्यास सम्पन्नता है।
• यदि शिक्षा द्वारा उसके भाव उन्नत,वह सहृदय है तो वह अपनी इस सम्पन्नता का उपयोग मनोहर उच्च भाव पूर्ण काव्य प्रस्तुत करने में कर सकता है।
• रचनाओं के प्रति श्रद्धा प्रकट की जायेगी तो वह अभ्यास,श्रम और बारीकी अर्थात् साधन – संपन्नता के विचार से होगी।
• किसी मनुष्य में बहुत अधिक शारीरिक बल देख उस पर जन साधारण की श्रद्धा होती है।(उदाहरण :- प्रोफेसर राममूर्ति शारीरिक बल वाला)
• श्रद्धा बिना सदुपयोग या दुरुपयोग की संभावना की कल्पना किये शुभ -साधन- सम्पन्नता ही पर होती है।
• भिन्न मानसिक संस्कार के लोगों में किसी विषय से संबंध रखने वाली श्रद्धा भिन्न मात्रा की हुआ करती है।
• शील,कला और साधन – संपत्ति श्रद्धा के तीनों विषय में से किसका ध्यान मनुष्य होना चाहिए?
★ जन साधारण के लिए शील का ही सबसे पहले ध्यान
होना चाहिए स्वाभाविक है क्योंकि उसका संबंध
मनुष्य मात्र की सामान्य स्थिति रक्षा से है।
• दूसरों की श्रद्धा संसार में एक अत्यंत वांछनीय वस्तु है क्योंकि वह एक प्रकार का ऐसा परकीय निश्चय या विश्वास है जिसके सहारे में स्वकीय कार्य सुगम सुगम होता है। जीवन की कठिनता कम होती है। जिस पर लोगों की अश्रद्धा होती है उसके लिए व्यवहार के सब सीधे और सुगम मार्ग बंद हो जाते हैं :- उस या तो कांटो पर या ढाई कोस नौ दिन में चलना पड़ता है।
• जो किसी प्रकार की दूसरों की श्रद्धा संपादित कर लेता है। उसके पैर रखने के लिए फूलों की पंखुड़ियां आजकल लाल बनाते बिछायी जाती है।
• श्रद्धेय :- समाज की स्थिति या सुख का विधान करता है।
• मनुष्य किसी ओर तीन प्रकार से प्रवृत्त होता है :-
★ मन से
★ वचन से
★ कर्म से
• श्रद्धा के विषय तीन है :-
★ शील
★ प्रतिभा
★ साधन – सम्पत्ति
• शील या धर्म से समाज की स्थिति:-
★ प्रतिभा से :- रंजन और साधन
★ साधन – सम्पत्ति से :- शील- साधन और प्रतिभा –
विकास दोनों संभावना है।
• सच्चा दान दो प्रकार के होता हैं :-
★ श्रद्धा वश दिया गया दान
★ दया वश दिया गया दान
• श्रद्धा वश दिया गया दान :- पंडित, विद्वानों और धार्मिक को जो दान दिया जाता है।
• दया वश दिया गया दान :- अंधो,लूलो और लंगड़ा को जो दिया जाता है।
• श्रद्धा :- सामर्थ्य के प्रति
• दया :- असामर्थ्य के प्रति
• जन – साधारण अपनी दया द्वारा केवल का असामर्थ्य के उपस्थिति परिणामों का कुछ स्थान के बीच और कुछ काल तक के लिए निवारण कर सकते हैं।
• श्रद्धा द्वारा वे ऐसे असाधारण जनों को अपने वित्त के अनुसार थोड़ी शक्ति दान करते हैं जो असामर्थ्य के कारणों के निराकरण में समर्थ होते हैं।
• श्रद्धा वश दान में :- उपयोगिता का तत्व
• स्मृतियों में श्रद्धा – वश दान पर जोर दिया जाता है।
• श्रद्धा और प्रेम के योग का नाम :-भक्ति
• भक्त वे ही कहला सकते हैं जो अपने जीवन का बहुत अंश स्वार्थ ( परिवार या शारीरिक सुख आदि) से विभक्त करके किसी के आश्रय से किसी ओर लगा सकते हैं इसी का नाम है आत्मनिवेदन।
• आत्मनिवेदन :- अपने जीवन का बहुत अंश स्वार्थ से विभक्त करके किसी के आश्रय से किसी ओर लगा सकते हैं।
• आकर्षण विधान के बिना अणुओं द्वारा व्यक्ति पिण्डो का आविर्भाव नहीं हो सकता, वैसे ही मनुष्य – जीवन का विशद् अभिव्यक्ति भी नहीं हो सकती।
• व्यक्ति – संबंधहीन सिद्धांत – मार्ग निश्चयात्मकता बुद्धि को चाहे व्यक्त हो, पर प्रवर्तक मन को अव्यक्त रहते हैं तो मनोरंजनकारी तभी लगते हैं जब किसी व्यक्ति के जीवन – क्रम के रूप में देखे जाते हैं।
• श्रद्धा- कीर्तन और स्मरण आदि भी सामीप्य के ही के विधान है।
• बाह्म और अभ्यंतर दोनों प्रत्यत्नों से समीप्य की सिद्धि होती है।
• स्मरण द्वारा हम अपने आराध्य को उसके कर्म – क्षेत्र को अपने अंतःकरण के सामने उपस्थित करते हैं।
• यदि राम हमारे काम के हैं तो रावण भी हमारे काम का है।एक से हम अपने लिए प्रवृत्ति का क्रम पाते है। दुसरे से निवृत्ति का।
• राम से :- अपने लिए प्रवृत्ति का क्रम पाते है।
• रावण से :- अपने लिए निवृत्ति का क्रम पाते है।
• लोक रक्षा का कार्य :- पाप,अन्याय, अत्याचार का आशुफल उत्पन्न करना और संसार के समक्ष रखना, है।
• स्वानुभूति द्वारा ही वह उस परमानुभूति की धारणा कर सकता है। इसी से भर्तृहरि ‘स्वानुभूत्यैकमानव’ कहकर नमस्कार किया है।
• भर्तृहरि ‘स्वानुभूत्यैकमानव’ कहकर नमस्कार किसे किया है?
★ स्वानुभूति द्वारा ही वह उस परमानुभूति की
धारणा कर सकता है।
• भक्ति विधान के अंतर्गत(भक्ति के नौ भेद):-
★श्रवण ★ सेवा ★ दास्य
★ कीर्तन ★ अर्चन ★ संख्य
★ स्मरण ★ वंदन ★ आत्म – निवेदन
• कोरी श्रद्धा में :- याचकता का भाव नहीं है।(जब प्रेम के साथ उसका संयोग होता है,तभी इस भाव का की प्राप्ति होती है।)
• श्रद्धावन श्रद्धेय पर अपने निमित्त किसी प्रकार का प्रभाव डालना नहीं चाहता, पर भक्ति दाक्षिण्य चाहता है।
• सिद्धि के विधान :- रामलीला, कृष्णलीला आदि सामीप्य।
• क्षात्र – धर्म :- जनता की संपूर्ण जीवन का स्पर्श करने वाला है।
• क्षात्र – धर्म की व्यापकता के कारण मुख्य अवतार :- राम और कृष्ण क्षत्रिय है।
• क्षात्र -धर्म एकांतिक नहीं है।
• क्षात्र -धर्म का संबंध :- लोक रक्षा से
• कर्म सौंदर्य की योजना क्षात्र – जितने रूप में संभव है उतने रूपों में सम्भव है उतने रूपों में और जीवन में नही।
• शक्ति के साथ :- समय
• वैभव के साथ :- विनय
• पराक्रम के साथ :- रूप -माधर्य
• तेज के साथ :- कोमलता
• सुख – भोग के साथ :- पर दुःख कातरता
• प्रताप के साथ :- कठिन धर्म – पथ का अवलम्बन
• क्षेत्र -धर्म के सौंदर्य में जो मधुर आकर्षण है वह अधिक व्यापक,अधिक मर्मस्पर्शी और अधिक स्पष्ट है।
• किसी सुंदर आंख या नाक देखकर उसके प्रति श्रद्धा नहीं उत्पन्न होगी, प्रीति उत्पन्न हो सकती है।
• श्रद्धा और प्रेम में अन्तर :-
क्रम संख्या |
श्रद्धा |
प्रेम |
1. |
विस्तृत |
एकांत |
2. |
श्रद्धा में विस्तार अधिक |
प्रेम में घनत्व अधिक |
3. |
श्रद्धा रखने वाले सैकड़ों,हजारों, लाखों इत्यादि मिल सकते हैं |
मनुष्य से प्रेम रखने वाले दो ही एक मिलेंगे। |
4. |
श्रद्धा के लिए आवश्यक यह है कि मनुष्य किसी बात में बढ़ा हुआ होने के कारण हमारे सम्मान का पात्र हो। |
प्रेम के लिए इतना ही बस है कि कोई मनुष्य हमें अच्छा लगे। |
5. |
श्रद्धा के तीन पक्ष |
प्रेम के दो पक्ष |
6. |
जागरण |
स्वपन |
7. |
श्रद्धा में मध्यस्थ अपेक्षित |
प्रेम कोई मध्यस्थ नहीं |
8. |
श्रद्धालु और श्रद्धेय के बीच में कोई वस्तु चाहिए। |
प्रेमऔरप्रिय के बीच में कोई और वस्तुओं अनिवार्य नहीं है। |
9. |
श्रद्धा का कारण निर्दिष्ट और ज्ञात होता है। |
प्रेमका कारण बहुत कुछ अनिर्दिष्टऔर अज्ञात होता है। |
10. |
श्रद्धा में दृष्टि पहले कर्मों पर से होती है श्रद्धेय तक पहुंचती है।(कर्म प्रधान) |
प्रीति में प्रिय पर से होती हुई उसके कर्मो आदि पर आ जाती हैः(व्यक्ति प्रधान) |
11. |
श्रद्धा अपनी सामाजिक विशेषताओं के कारण दूसरों के अनुभवों पर जागती है। |
प्रेम एकमात्र अपने अनुभव पर निर्भर करता है। |
