UGC NET EXAM में आयी हुई हिन्दी के कवियों की पंक्तियां – 2

101. ढलमल – ढलमल चंचल अंतल झलमल झलमल
तार जाल मलमल तारा – मैथलीशरण गुप्त (नदिया
की धारा का वर्णन, साकेत से)

102. बहु बीती थोरी रही खोऊ बीती जाय । – ध्रुवदास

103. जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नहिं – कबीर
दास

104. राम को रूप निहारत जानकी, कंकन के नग की
परछाही । – तुलसीदास

105. हंस पड़ा गगन,वह शून्य लोक – जयशंकरप्रसाद
(कामायनी से)

106. आप अपने से उगा मै – निराला (कुकुरमुत्ता से)

107. शलभ मै शापमय वर हूं – महादेवी वर्मा

108. वियोगी होगा पहला कवि आह से
उपजा होगा गान, निकल कर आँखों से चुपचाप,
बही होगी कविता अनजान! – पंत

109. जसोदा ! कहो कहौ हौ बात । तुम्हारी सुत के
करतब मो पै कहै नहिं जात – चतुर्भुज दास

110. ज्ञान दूर कुछ क्रियाभिन्न है, इच्छा क्यों पूरी हो मन
की,एक दूसरे से न मिल सके यह विडंबना है जीवन
की। – जयशंकर प्रसाद (कामायनी से)

111. देखि सुदामा की दीन दसा‚ करुना करिके
करुनानिधि रोय।
पानी परात को हाथ छुयो नहिं‚ नैनन के जल से पग
धोये। – नरोत्तमदास (सुदामाचरित से)

112. जो बीत गई सो बात गई – हरिवंश राय बच्चन

113. मैं तो डूब गया था स्वंय शून्य में – अज्ञेय (असाध्य
वीणा से)

114. दो पाटों के बीच पिस गया – मुक्तिबोध
(ब्रह्मराक्षस से)

115. रुप की आराधना का मार्ग आलिंगन नहीं तो ओर
क्या है? – रामधारी सिंह दिनकर (उर्वशी से)

116. कितना अकेला हूँ मैं इस समाज में ,जहाँ सदा
मरता है एक और मतदाता। – रघुवीर सहाय(एक
और मतदाता से)

117. वह पत्थर जोड़ रहे है, तुम सपने जोड़ रहे है –
नागार्जुन ( वे और तुम कविता से)

118. मैं ही वसंत का अग्रदूत – निराला

119. यह अभिनव मानव प्रजा सृष्टि। द्वयता में लगी
निरंतर ही वर्णो की करती रहे पुष्टि। – जयशंकर
प्रसाद ( कामायनी के इडा सर्ग से)

120. एही रूप सकती मौ सीऊ। एहि रूप त्रिभुवन कर
जीऊ – मंझन (मधुमालती से)

121. श्रद्धेय बनने का मतलब है नान परसन ‘अव्यक्ति’
हो जाना। – हरिशंकर परसाई( विकलांग श्रद्धा
का दौर, पेज -152)

122. काव्य का आत्मा की संकल्पना अनुभूति है –
जयशंकर प्रसाद( काव्य और कला तथा अन्य
निबंध)

123. चिर सजग आंखें उनींदी आज कैसे व्यस्त बाना।
– महादेवी वर्मा

124. रूपोद्यान प्रफुल्लप्राय कलिका राकेन्दु
बिम्बानना – हरिऔध (प्रियप्रवास से)

125. वेदने ! लू भी भली बनी। – मैथिलीशरण गुप्त
साकेत से उर्मिला )

126. सुरम्य रम्ये, रस राशि रंजिते – महावीर प्रसाद
द्विवेदी

127. वृक्ष हों भले खड़े,
हों घने हों बड़े,
एक पत्र छाँह भी,
माँग मत, माँग मत, माँग मत,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ
– हरिवंश राय बच्चन (अग्निपथ कविता से)

128. अब कहो सन्देश है क्या?
और ज्वाल विशेष है क्या?
अग्नि-पथ के पार चन्दन-चांदनी का देश है क्या?
– महादेवी वर्मा (दीपशिखा काव्य संग्रह से)

129. जिधर अन्याय है उधर शक्ति – निराला (राम की
शक्ति पूजा से)

130. काशी मे हम प्रगट भए , रामानंद चेताये। – कबीर
दास

131. नारी तुम केवल श्रद्धा हो। – जयशंकरप्रसाद
(कामायनी के लज्जा सर्ग से)

132. बहुत दिनों तक चक्की रोई, चूल्हा रहा उदास –
नागार्जुन ( अकाल के बाद कविता से )

133. सिंहासन खाली करो कि जनता आती है। –
रामधारी सिंह दिनकर

134. अब लौन सानी,अब न लसैहौ – तुलसीदास

135. साई के सब जीव है कीरी कुंजर दोय – कबीर

136. देसिल बयना सब जन मिट्ठा – विद्यापति

137. नैन नचाय कही मुसुकाय, ‘लला फिर आइयो
खेलन होरी’। – पद्माकर

138. जो घनीभूत पीड़ा थी – जयशंकरप्रसाद (आंसू
कविता से)

139. हरे प्यारे को सेज पास, नम्र मुख हंसी – खिली ।
निराला(जूही की कली से)

140. हम नहीं कहते कि हमको छोड़कर स्त्रोतस्विनी बह
जाय – अज्ञेय ( नदी के द्वीप से)

141. तोड़ने को ही होंगे मठ और गढ़ सब –
मुक्तिबोध(अंधेरे में कविता)

142. बसो मेरे नैनन में नंदलाल – मीराबाई

143. सेस गनेस महेस दिनेस सुरेसहु जाहि निरंतर
गावै। – रसखान

144. अति सूधो सनेह को मारग है जहाँ नेकु सयानप
बाँक नहीं। – घनानंद

145. तुम कौन धौं पाटी पढ़े हौ लला, मन लेहु पै देहु
छटाँक नहीं। – घनानंद

146. जैसे उड़ि जहाज को पंछी पुनि जहाज पै आवै।-
सूरदास

147. “गिरा अनयन नयन बिनु पानी”
(यह पंक्ति तुलसीदास की इसमें राम के सौंदर्य का
बखान करती सखी कहती है  वाणी बिना नेत्र की
है और नेत्रों के वाणी नहीं है। )

148. अमिया हलाहल मदभरे श्वेत स्याम रतनार –
रसलीन

149. जन गण मन अधिनायक जय है,प्रजा विचित्र
तुम्हारी है भुख भुख चिल्लाने वाली अशुभ
अमंगलकारी है – नागार्जुन (सच न बोलना कविता
से)

150. झांकियां निकलती है ढोंग अविश्वास की,बदबू
आती है मरी हुई बात की, इस हवा में अब नहीं
डालूंगा।नहीं, नहीं, मैं यह फिर खिड़की नही
खोलूंगा।- सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

151. राष्ट्रीय गीत में भला कौन यह भारत भाग्य विधाता
– विजयदेव नारायण साही

152. क्या करूं जो शंभु धनु टूटा तुम्हारा तोड़ने को मैं
विवश हूँ। – गिरिजाकुमार माथुर (नया कवि
कविता से)

153. अब मैं कवि नहीं रहा,काला झंडा हूँ। -प्रभाकर
माचवे

154. साधो आज मेरे सत की परीक्षा है – रघुवीर सहाय

155. सर्वव्यापी एक कुम्हारा, जाकी महिमा आर न पारा
– मलूकदास

156. भाषाप्रबीण, सुछंद सदा रहै, सो घन जू के कबित्त
बखानै। – घनानन्द(सुजानसागर से)

157. अपने यहां संसद तेली की वह घानी है जिसमें
आधा तेल आधा पानी है। – धूमिल

158. अरुण यह मधुमय देश हमारा – जयशंकर प्रसाद

159. हम नदी के दीप है – अज्ञेय (नदी के द्वीप कविता
से)

160. दुखों के दागों को तमगों सा पहना – मुक्तिबोध
(अंधेरे में कविता से)

161. मेरे लिये,हर आदमी एक जोड़ी जूता है – धूमिल
(मोचीराम कविता से)

162. जाति पात पूछे ना कोई हरि को भजै सो हरि का
होई।  – रामानंद

163. मानुष प्रेम भयउ बैकुंठी – जायसी(पद्मावती से)

164. प्रेम प्रेम ते होय प्रेम ते पारहि पाइए।
प्रेम बंधयो संसार प्रेम परमारथ पाइए ।। – सूरदास

167. द्रुत झरो जगत के जीर्ण पत्र – पंत (युगांत काव्य
संग्रह से)

168. केशव, कहि न जाइ का कहिए ,
देखत तव रचना विचित्र अति समुझि मनहिमन
रहिए – तुलसीदास (विनयपत्रिका से)

169. बारह बरिस लै कूकर जीऐं ,और तेरह लै जिऐं
सियार।
बरिस अठारह छत्री जीऐं ,आगे जीवन को
धिक्कार।। – परमालरासो (जगनिक)

170. दुख सबको माँजता है – अज्ञेय

171. सजनि मधुर निजत्व दे कैसे मिलूँ अभिमानिनी में
– महादेवी वर्मा

172. प्रिय के हाथ लगाए जागी, ऐसी मै सो गई
अभागी। – निराला(अर्चना काव्य संग्रह से)

173. तु अब तक सोई है आली, आँखों में मरे विहाग री!
– जयशंकरप्रसाद (बीती विभावरी जाग री कविता से)

174. नैया बिच नदिया डूबति जाए – कबीर

175. गुरु सुआ जेई पन्थ देखावा – जायसी (पद्मावती से)

176. तबही लौं जीवो भलो, दीबो होय न धीम। – रहीम

177. कनल – कदलि पर सिंह समारलता, तापर मेरु
समाने। – विद्यापति (पदावली से)

178. अति सूधो सनेह को मारग है जहाँ नेकु सयानप
बाँक नहीं। – घनानन्द

179 सजन सकारे जायेंगे, नैन मरेंगे रोय
बिधना ऐसी रैन कर, भोर कधूं ना होय।। – अमीर
खुसरो

180. लोगन कवित्त कीबो खेल करि जानो – ठाकुर

181. हरि रस पीया जानिए जे कबहु न जाय खुमार –
कबीर

182. श्रुति सम्मत हरिभक्ति पथ संजुत विरति विवेक –
तुलसीदास (रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड से )

189. जो घनीभूत पीड़ा थी,मस्तक में स्मृति- सी छाई
दुर्दिन में आंसू बनकर वह आज बरसने आई। –
जयशंकर प्रसाद( आंसू कविता से)

190. धिक धाये तुम यों अनाहूत, धो दिय श्रेष्ठ कुल – धर्म
धूत,राम के नही,काम के सूत कहलाये। – निराला
(तुलसीदास रचना से)

191. जो बीत गयी सो बात गयी। – हरिवंशराय बच्चन

192. जह मन पवन न संचरइ रवि शीश नाह पवेश –
सरहपा

193. अंजन माहिं निरंजन भेट्या, तिल मुप भेट्या तेलं ।
मुरति माहिं अमरति परस्या, भया निरतरि घेलं
– गोरखनाथ

194. पिउ चित्तौड़ न आविऊ, सावण पहिली तीज।
जोवै बाट बिरहिणी खिण-खिण अणवै खीज।।
– दलपत विजय(खुमानरासो)

195. बारह सै बहोत्तराँ मझारि। जेठ बदी नवमी
बुधवारि।
नाल्ह रसायण आरंभइ। सारदा तूठी ब्रह्मकुमारि॥
– नरपति नाल्ह (बीसलदेव रासो )
‘बारह सै बहोत्तर’ का अर्थ :- 1212
‘बहोत्तर’ शब्द, ‘द्वादशोत्तर’ का रूपांतर है। अतः ‘बारह सै बहोत्तराँ’ का अर्थ ‘द्वादशोत्तर बारह से’ अर्थात् 1212 होगा। गणना करने पर विक्रम संवत् 1212 में ज्येष्ठ बदी नवमी को बुधवार ही पड़ता है।

196. मनहुँ कला ससभान कला सोलह सो बन्निय।
बाल वैस, ससि ता समीप अम्रित रस पिन्निय॥ – चन्दबरदाई (पृथ्वीराज रासो)

197. जोई   जोई   पिण्डे   सोई   ब्रह्माण्डे। – गोरखनाथ

198. नौ   लख   पातरि   आगे   नाचै ,  पीछे   सहज 
 अखाड़ा। – गोरखनाथ

199. षटभाषा पुराणं च कुराणंग कथित मया (मैंने
अपनी रचना षटभाषा में की है और इसकी प्रेरणा
पुराण व कुरान दोनों से ली है) -चंदरबरदाई
[पृथ्वीराज रासो]

200. अवधू मन चंगा तो कठौती में गंगा – गोरखनाथ

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