इतिहास

सिद्ध साहित्य का सम्पूर्ण परिचय(siddh sahity ka sampoorn parichay)

• सिद्ध साहित्य का समय:– 8 वीं शताब्दी से 13 वीं शताब्दी तक। [ ] सिद्ध साहित्य का कार्यक्षेत्र :- • बंगाल, असम, उड़ीसा बिहार ।(डॉ. नगेन्द्र के अनुसार) • जालंधर, ओडियान,अर्बुद,पूर्वगिरी ,कामरूप। ( प्रकाश बगीची के अनुसार ) • ओडियान, पूर्णगिरि ,कामाख्या (साधनमाला में) [ ] सिद्ध साधना के केंद्र :- • नालंदा विश्वविद्यालय(बिहार के राजगीर जिले में, • ...

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साठोत्तरी कविताओं की प्रवृत्तियां ( Saṭhottari kavitayo ki pravatiya)

साठोत्तरी कविता का साधारण अर्थ है – सन् 1960 के बाद की कविता। साठोत्तरी कविता का तात्पर्य केवल के बाद की कविता से नहीं है बल्कि यह एक विशेष तेवर वाली काव्य प्रवृत्तियों के संदर्भ में अपनी पहचान बनाती है। 1. मोहभंग 2. आक्रोश 3. राजनीति में लगाव 4. व्यंग्य 5. नयी संवेदना 6. सपाट बयानबाजी 7. नूतन शब्द भंडार ...

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नई कविताओं की प्रवृत्तियां( naee kavitayo ki pravatiya)

1. मानव मूल्य की विघटन की पुकार । 2. नव मानव की कल्पना। 3. आस्था – अनास्था का मिश्रण । 4. मानव लघुता और गरिमा का उल्लेख। 5. कवि का खंडित व्यक्तित्व। 6. काव्य भाषा- बातचीत की भाषा । 7. लघु कविता शैली- दो,तीन, चार पंक्तियों में समाप्त होने वाली लघु कविताएं रचने की एक प्रणाली। 8. लयहीन गद्यात्मक – ...

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प्रयोगवादी काव्य की प्रवृत्तियां( prayogavadi kavy ki pravatiya)

* प्रयोगवाद की जन्मदात्री पत्रिका – तार सप्तक * प्रयोगवाद को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले:- अस्तित्ववाद 1. गहन वैयक्तिकता। 2. अतिशय बौद्धिकता। 3. व्यापक अनास्था की भावना। 4. आस्था तथा भविष्य के प्रति विश्वास। 5. सामाजिक यथार्थवाद। 6. क्षणवाद। 7. श्रृंगार का उन्मुक्त चित्रण। 8. कुंठा और निराशा का चित्रण। 9. भदेस या नग्नता का चित्रण। 10. शिल्पगत वैशिष्ट्य -मुक्तक ...

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प्रगतिवादी काव्य की प्रवृत्तियां( pragativadi kavy ki pravatiya)

जो काव्य मार्क्सवाद दर्शन को सामाजिक चेतना और भाव बोध को अपना लक्ष्य बनाकर चला उसे प्रगतिवाद कहा गया है। प्रगतिवादी के अंतर्गत -: यथार्थवाद ,पदार्थवाद एवं समाजवाद शामिल है । 1. सामाजिक व्यवस्था के प्रति असंतोष । 2. सामाजिक यथार्थ का चित्रण। 3. साम्यवादी व्यवस्था का यशोगान। 4. विश्व – बंधुत्व का भाव। 5. साम्राज्यवाद, सामंतवाद एवं पूंजीवादी व्यवस्था ...

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छायावादी काव्य की प्रवृत्तियां( chhayavadi kavy ki pravatiya)

छायावादी काव्य की प्रवृत्तियां

1. आत्माभिव्यंजना /आत्माभिव्यक्ति की प्रधानता। 2. मै शैली /उत्तम पुरुष शैली । 3. मानवीय सौंदर्य का बोध । 4. प्रकृति के रम्य रूपों की रचना। 5. प्रकृति संबंधित बिम्बों की बहुलता । 6. स्वच्छंद कल्पना का नवोन्मेष। 7. रहस्य भावना। 8. अज्ञात व असीम के प्रति जिज्ञासा। 9. श्रृंगार भावना । 10. वेदना की विवृत्ति। 11. मानवतावाद। 12. राष्ट्रीयता की ...

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द्विवेदी युगीन काल की प्रवृत्तियां( Dwivedi yugin kal ki pravatiya)

1. आदर्श एवं नैतिकता का प्राधान्य। 2. राष्ट्रीयता अथवा देशभक्ति। 3. मानवता वादी विचारधारा का प्रादुर्भाव। 4. इतिवृत्तात्मकता। 5. काव्य भाषा के रूप में खड़ी बोली की प्रतिष्ठा। 6. मुक्तिको की अपेक्षा प्रबंध काव्यों की रचना अधिक। 7. जागरण सुधार -राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक सुधार, सामाजिक चेतना, मानवतावादी आदि। 8. सौद्देश्यता आदर्शपरकता एवं नीतिमत्ता। 9. आधुनिकता । 10. समस्यापूर्ति । 11. ...

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भारतेंदु युगीन काल की प्रवृत्तियां( Bharatendu Yugin kal ki pravartiya)

1. राष्ट्रीयता अथवा देशभक्ति। 2. सामाजिक चेतना के अभिव्यक्ति। 3. भक्ति भावना। 4. श्रृंगारिता। 5. हास्य व्यंग्य । 6. अभिव्यक्ति प्रवृतियां। अधिक जानकारी के लिए हमारी वेबसाइट देखें क्लिक करें

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रीतिमुक्त काव्य की प्रवृत्तियां(Rītimukta kavy ki pravartiya)

1. रीतिमुक्त काव्यधारा अपने युग में रची जा रही कविता की प्रतीक्रियात्मक कविता है। यह कविता काव्य शास्त्रीय विधि-विधानों एवं दरबारी संस्कृति से पराङ्मुख होकर रची गई है,इसीलिए इसे रीतिमुक्त कविता कहते हैं। इस कविता में प्रेमभावना की मस्ती है और इसलिए कुछ समीक्षाकों ने इसे स्वच्छंद काव्यधारा भी कहते हैं। 1. प्रणय भावना । 2. सौंदर्य निरूपण। 3. श्रृंगार ...

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रीति काल की प्रवृत्तियां(riti kal ki pravartiya)

1. रीति निरूपण । 2. श्रृंगारिकता। 3. श्रृंगार रस की प्रधानता। 4. अलंकार का प्राधान्य- पांडि्त्य प्रदर्शन हेतु अलंकारों का चमत्कारों प्रयोग। 5. काव्य रूप- रसिकता प्रधान, दरबारी वातावरण में चमत्कार, मुक्तक काव्य शैली। 6. वीर रसात्मकता काव्यों का प्रणयन। 7. आश्रयदाताओं की प्रशंसा। 8. जीवन दर्शन। 9. ब्रजभाषा – इस युग की प्रमुख साहित्यिक भाषा । 10. नारी के ...

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कृष्ण काव्य की प्रवृत्तियां(Krishna kavy ki pravartiya)

1. निर्गुण ब्रह्म के स्थान पर सगुण ब्रह्म की आराधना पर बल । 2. भक्ति के बहुआयामी स्वरूप का अंकन – संख्य एवं कांता भाव की प्रधानता,वात्सल्य भक्ति के साथ नवधा भक्ति को महत्व। 3. लीला गान में अत्यधिक रूचि। 4. गुरु महिमा और नाम स्मरण की महत्ता का बखान। 5. समकालीन सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन की अभिव्यक्ति – चरावाही ...

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राम काव्य की प्रवृत्तियां(ram kavy ki pravatiya)

1. राम के सगुण – साकार रूप की अर्चना। 2. सौंदर्य बोध :- नर-नारी भाव, अनुभूति,प्रकृति तथा शिल्प का। 3. नीति उपदेश प्रधानता,सद्भाव तथा सात्विकता। 4. राजनीतिक दृष्टिकोणः- रामराज्य की जनतंत्रात्मक रूप में प्रतिष्ठा। 5. मर्यादा का भाव – सामाजिक संवेदना, सामाजिक तथा परिवारिक आदर्श की स्थापना। 6. युगीन समस्याओं का निरूपण – लोक जीवन की विपत्रता का कारुणिक चित्रण। ...

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सूफी काव्य की प्रवृत्तियां(sufi kavy ki pravatiya)

1. हिंदू घरों में प्रचलित लोक कथाओं को आधार बनाया। 2. गुरु का महत्व। 3. इतिहास एवं कल्पना का योग। 4. नायक साधक एवं नायिका का परमात्मा के रूप में। 5. प्रेम की मानवता मूल्य के रूप में स्थापना। 6. लोक जीवन एवं लोक संस्कृति का गहन चित्रण। 7. हिंदू हृदय एवं मुस्लिम हृदय को आमने – सामने रखकर समन्वय ...

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निर्गुण काव्यधारा की प्रवृत्तियां

1. निराकार ब्रह्म की उपासना *निर्गुण सगुण में परे अनादि अनंत अनाम, अज्ञान ब्रह्म का नाम- जप। 2. गुरु की गुरुता के प्रति दिव्य श्रध्दा। 3. माया की व्यर्थता का प्रतिपादन। 4. संसार की असारता का निरूपण। 5. भक्ति भावना के विविध आयाम। *दास्यभक्ति, संख्य भक्ति, वात्सल्य भक्ति, शांत भक्ति,माधुर्य भक्ति। 6. सामाजिक सुधार की संदृष्टि। 7. नारी विषयक चिंतन। ...

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रासो साहित्य की प्रवृत्तियां(raso sahitya ki pravatiya)

1. अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णनों की अधिकता। 2. सामंती समाज की संस्कृति और यथार्थ का चित्रण। 3. ऐतिहासिकता, राष्ट्रीयता का अभाव। 4. युद्धों का जीवन वर्णन। 5. संदिग्ध और अर्द्ध प्रामाणिक रचनाओं को बहुलता। 6. नारी रूप का सौन्दर्यांकन। 7. प्रकृति के बहुआयामी स्वरूप का चित्रण। 8. वीर और श्रृंगार रस निरूपण। 9. विरहानुभूति की मार्मिक अभिव्यक्ति। 10. डिंगल – पिंगल शैली ...

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