बाज़ार दर्शन (निबंध) पाठ का मूल उद्देश्य एवं विस्तृत पाठ-सार

 बाज़ार दर्शन (निबंध)

  • लेखक: जैनेंद्र कुमार
  • विधा: विचार-प्रधान निबंध
  • मूल विषय: उपभोक्तावाद, बाज़ारवाद का मायाजाल, पैसे की व्यंग्य-शक्ति तथा बाज़ार की वास्तविक सार्थकता

1. पाठ का उद्देश्य व मूल संवेदना

  1. उपभोक्तावादी संस्कृति पर प्रहार: बाज़ार के आकर्षण, दिखावे और अनावश्यक वस्तुओं के संग्रह की अंधी दौड़ की निरर्थकता को उजागर करना
  2. बाज़ार के जादू से मुक्ति का मार्ग: आवश्यकताओं की सही पहचान करके ही बाज़ार का सदुपयोग करने की प्रेरणा देना
  3. सच्चा अर्थशास्त्र बनाम अनीति-शास्त्र: यह स्पष्ट करना कि जो व्यवस्था केवल शोषण, असंतोष, ईर्ष्या और कपट को बढ़ावा देती है, वह अर्थशास्त्र नहीं बल्कि ‘अनीति-शास्त्र’ है

2. विस्तृत पाठ-सार एवं प्रमुख वैचारिक बिंदु

1. पैसे की ‘पर्चेज़िंग पावर’ और पहला मित्र

  • लेखक के एक मित्र मामूली चीज़ लेने बाज़ार गए और लौटते समय बंडलों का ढेर लेकर आए
  • मित्र ने इसे ‘पत्नी की महिमा’ बताया, परंतु लेखक के अनुसार इसके मूल में ‘मनीबैग’ (पैसे की गर्मी/पावर) और ‘पर्चेज़िंग पावर’ (क्रय-शक्ति) का प्रदर्शन था
  • दो प्रकार के लोग:
    1. जो गैर-ज़रूरी सामान खरीदकर पैसे की शक्ति का रस लेते हैं
    2. जो संयमी और बुद्धिमान होते हैं; वे पैसा बचाते हैं और पैसे के संचय पर ही गर्व महसूस करते हैं

2. बाज़ार का मूक आमंत्रण और दूसरा मित्र

  • लेखक के दूसरे मित्र दोपहर से शाम तक बाज़ार में रहे लेकिन खाली हाथ लौटे
  • कारण पूछने पर उन्होंने बताया कि बाज़ार में सब कुछ लेने योग्य लग रहा था। कुछ लेने का अर्थ था बाकी सब कुछ छोड़ देना, और वे कुछ भी छोड़ना नहीं चाहते थे
  • निष्कर्ष: यदि व्यक्ति को अपनी वास्तविक ज़रूरत का निश्चित ज्ञान न हो, तो चारों तरफ की चाह उसे घेर लेती है, जिसका परिणाम केवल दुःख, भटकाव और कर्महीनता होता है

3. बाज़ार का जादू और उससे बचने का उपाय

  • जादू का स्वरूप: बाज़ार का जादू आँखों की राह काम करता है (रूप व सजावट का जादू)
  • जादू चलने की स्थितियाँ:
    • जेब भरी हो और मन खाली हो (सर्वाधिक असर)
    • जेब खाली हो पर मन भरा न हो
  • जादू का प्रभाव: व्यक्ति गैर-ज़रूरी और फैंसी चीज़ों को आरामदेह समझकर खरीद लेता है, परंतु जादू उतरने पर वे चीज़ें जीवन में केवल खलल डालती हैं
  • बचने का उपाय: बाज़ार जाते समय मन भरा होना चाहिए (लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिए)। जैसे लू में पानी पीकर जाने पर लू का असर नहीं होता, वैसे ही निश्चित लक्ष्य होने पर बाज़ार की चमक-दमक व्यर्थ हो जाती है
  • मन को बंद न करना: ‘मन खाली न रहने’ का अर्थ मन को जबरन बंद या शून्य करना नहीं है (शून्य होने का अधिकार केवल परमात्मा का है)। हठयोग द्वारा इच्छाओं का जबरन दमन करना अज्ञान व जड़ता है

4. भगत जी का आदर्श चरित्र एवं पैसे की व्यंग्य-शक्ति

  • चूरन वाले भगत जी: वे वर्षों से चूरन बेचते हैं और प्रतिदिन केवल छह आने की कमाई करते हैं
  • छह आने पूरे होते ही वे बाकी चूरन बच्चों को मुफ़्त बाँट देते हैं। वे न तो थोक में बेचते हैं और न ही पेशगी आर्डर लेते हैं
  • बाज़ार के प्रति दृष्टिकोण: भगत जी जब चौक बाज़ार जाते हैं, तो वे बड़े-बड़े फैंसी स्टोरों से अप्रभावित होकर सीधे पंसारी की दुकान पर जाते हैं और ज़रूरत के अनुसार जीरा व काला नमक खरीदकर संतुष्ट भाव से लौट आते हैं
  • पैसे की व्यंग्य-शक्ति की पराजय:
    • पैदल चलते व्यक्ति के पास से जब मोटर धूल उड़ाती निकलती है, तो पैसे की क्रूर व्यंग्य-शक्ति मनुष्य को अपने माता-पिता तक के प्रति कृतघ्न बना देती है
    • परंतु भगत जी जैसे तृष्णाहीन और आत्मिक बल से संपन्न व्यक्ति के आगे पैसे की यह व्यंग्य-शक्ति पूरी तरह कुंठित और चूर-चूर (पानी-पानी) हो जाती है
  • लेखक के अनुसार संचय की तृष्णा और वैभव की चाह मनुष्य की निर्बलता का प्रमाण है, जहाँ धन की मनुष्य पर और जड़ की चेतन पर विजय होती है

5. बाज़ार की सार्थकता और अनीति-शास्त्र

  • सच्चा ग्राहक: बाज़ार को सार्थकता वही मनुष्य देता है जो अपनी आवश्यकता को भली-भाँति जानता है। बाज़ार की असली कृतार्थता आवश्यकता के समय काम आना है
  • बाज़ारूपन: केवल ‘पर्चेज़िंग पावर’ के अहंकार में खरीदारी करने वाले लोग बाज़ार का ‘बाज़ारूपन’ (कपट, दिखावा) बढ़ाते हैं
  • कपट बढ़ने से आपसी सद्भाव नष्ट होता है और व्यक्ति भाई, मित्र या पड़ोसी न रहकर केवल ‘ग्राहक और विक्रेता’ बन जाते हैं, जो एक-दूसरे को ठगने की ताक में रहते हैं
  • अनीति-शास्त्र: ऐसा बाज़ार जहाँ आवश्यकताओं का आदान-प्रदान न होकर केवल शोषण होता है, वह मानवता के लिए अभिशाप है। ऐसे बाज़ार को बढ़ावा देने वाला अर्थशास्त्र वास्तव में ‘मायावी शास्त्र’ और ‘अनीति-शास्त्र’ है

3.’बाज़ार दर्शन’ पाठ का मूल उद्देश्य

  • उपभोक्तावादी और दिखावे की संस्कृति का पर्दाफ़ाश: आधुनिक समाज में बढ़ती ‘पर्चेज़िंग पावर’ की नुमाइश और बिना आवश्यकता केवल सामाजिक प्रतिष्ठा दिखाने के लिए सामान खरीदने की अंधी होड़ की निरर्थकता को उजागर करना

  • बाज़ार के सम्मोहन (जादुई प्रभाव) से सावधान करना: यह स्पष्ट करना कि बाज़ार रूप-सौंदर्य और सजावट के मूक आमंत्रण से व्यक्ति को अपनी ओर खींचता है। यदि व्यक्ति की जेब भरी हो और मन खाली हो, तो वह इस चमक-दमक के जाल में फँसकर अनावश्यक वस्तुएँ बटोरने लगता है, जो अंततः अशांति और असंतोष का कारण बनती हैं

  • आवश्यकताओं की स्पष्ट पहचान का संदेश: पाठकों को यह समझाना कि बाज़ार जाते समय मन भरा (लक्ष्य निश्चित) होना चाहिए। अपनी वास्तविक ज़रूरत को जानकर ही खरीदारी करनी चाहिए, जिससे बाज़ार का सही लाभ उठाया जा सके और बाज़ार को भी सार्थकता दी जा सके

  • इच्छाओं के जबरन दमन (हठयोग) का खंडन: लेखक का उद्देश्य यह स्पष्ट करना भी है कि मन को वश में करने का अर्थ अपनी सभी इच्छाओं का गला घोंटना या शून्य हो जाना नहीं है। व्यक्ति को अपनी स्वाभाविक अपूर्णता स्वीकार करते हुए विवेकपूर्ण व संयमित आचरण अपनाना चाहिए

  • सच्चा अर्थशास्त्र और नैतिक व्यापार की स्थापना: ऐसे बाज़ार का विरोध करना जो केवल कपट, ईर्ष्या और ग्राहक के शोषण को बढ़ावा देकर आपसी भाईचारे को नष्ट करता है। लेखक सिद्ध करते हैं कि केवल मुनाफ़ा कमाने और छल-कपट को बढ़ावा देने वाला अर्थशास्त्र वास्तव में ‘मायावी शास्त्र’ और ‘अनीति-शास्त्र’ है

4.’बाज़ार दर्शन’ की मूल संवेदना

  • मानवीय सद्भाव और आत्म-संतोष की रक्षा: पाठ की केंद्रीय संवेदना गांधीवादी चिंतन और आत्म-संतोष (अपरिग्रह) पर आधारित है। जब मनुष्य अपनी तृष्णा और संचय की प्रवृत्ति को सीमित कर लेता है (जैसे चूरन वाले भगत जी), तब पैसे की क्रूर व्यंग्य-शक्ति भी उसके सामने निष्प्रभावी हो जाती है

  • शोषणमुक्त समाज की कल्पना: बाज़ार केवल क्रय-विक्रय या ठगने का अखाड़ा न होकर परस्पर आवश्यकताओं की सहज पूर्ति का माध्यम बने, जिससे समाज में मानवीय संबंध, समरसता और विश्वास बने रहें

5. पाठ में आए कठिन एवं विशिष्ट शब्दों के अर्थ (शब्द-छवि)

शब्द अर्थ
अतुलित
जिसकी तुलना न की जा सके / असीम
परिमित
सीमित / जिसकी सीमा निश्चित हो
पर्चेज़िंग पावर
क्रय-शक्ति / खरीदने की क्षमता
पेशगी
अग्रिम राशि (Advance payment)
नाचीज़
तुच्छ / महत्त्वहीन
अपदार्थ
जिसका कोई विशेष अस्तित्व या मूल्य न हो
दारुण
अत्यंत कठोर / भयंकर / कष्टदायी
अकिंचित्कर
तुच्छ / अर्थहीन / दीन-हीन
स्पृहा
प्रबल इच्छा / लिप्सा / चाह
पसोपेश
असमंजस / दुविधा
बेहया
निर्लज्ज / बेशरम
अकारथ
व्यर्थ / बेकार
इच्छानिरोधस्तपः
इच्छाओं का दमन ही तपस्या है
हठयोग
जबरदस्ती या हठपूर्वक किया गया साधन/तप
कृश
दुबला-पतला / क्षीण
बाज़ारूपन
बाज़ार का छिछलापन / छल-कपट और दिखावे की प्रवृत्ति
अनीति-शास्त्र
नीति-विरुद्ध नियम या व्यवस्था

6. मुख्य परीक्षा-उपयोगी प्रश्नोत्तर सारांश

  • प्रश्न 1: बाज़ार का जादू चढ़ने और उतरने पर मनुष्य पर क्या असर पड़ता है?
    उत्तर: जादू चढ़ने पर मनुष्य को सभी आकर्षक व फैंसी वस्तुएँ ज़रूरी और सुख-सुविधा बढ़ाने वाली लगती हैं और वह अनावश्यक खरीदारी कर बैठता है। जादू उतरने पर उसे भान होता है कि ये वस्तुएँ आराम देने के बजाय उसके जीवन और शांति में बाधा डालती हैं
  • प्रश्न 2: भगत जी के व्यक्तित्व का कौन-सा सशक्त पहलू समाज के लिए प्रेरणादायी है?
    उत्तर: भगत जी का अपनी आवश्यकताओं पर पूर्ण नियंत्रण, आत्म-संतोष और तृष्णाहीनता उनका सशक्त पहलू है। बाज़ार का कोई भी आकर्षण उन्हें डिगा नहीं पाता, जो समाज में फिजूलखर्ची, शोषण और ईर्ष्या को रोककर शांति स्थापित करने में अत्यंत सहायक है
  • प्रश्न 3: लेखक ने किस प्रकार के अर्थशास्त्र को ‘अनीति-शास्त्र’ कहा है?
    उत्तर: जिस अर्थशास्त्र में मानवीय संवेदना, सद्भाव और आपसी आवश्यकताओं के निष्कपट आदान-प्रदान के स्थान पर केवल शोषण, छल-कपट और बाज़ारूपन को बढ़ावा दिया जाता है, उसे लेखक ने मायावी और अनीति-शास्त्र कहा है

 जैनेंद्र कुमार द्वारा रचित पाठ ‘बाज़ार दर्शन’ के प्रमुख गद्यांशों की विस्तृत सन्दर्भ, प्रसंग, व्याख्या एवं विशेष दी जा रही है:

गद्यांश 1:

“पैसा पावर है। पर उसके सबूत में आस-पास माल-टाल न जमा हो तो क्या वह खाक पावर है! पैसे को देखने के लिए बैंक हिसाब देखिए, पर माल-असबाब मकान-कोठी तो अनदेखे भी दीखते हैं। पैसे की उस ‘पर्चेज़िंग पावर’ के प्रयोग में ही पावर का रस है।”
  • सन्दर्भ: प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग-2’ में संकलित विचार-प्रधान निबंध ‘बाज़ार दर्शन’ से अवतरित है। इसके लेखक प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक कथाकार एवं निबंधकार जैनेंद्र कुमार हैं
  • प्रसंग: प्रस्तुत अंश में लेखक ने समाज में धन को शक्ति (पावर) मानने वाली भौतिकवादी मानसिकता और दिखावे की प्रवृत्ति पर प्रकाश डाला है
  • व्याख्या: लेखक कहते हैं कि आधुनिक समाज में पैसे को सामर्थ्य और ताकत का प्रतीक माना जाता है। अधिकांश लोगों का मानना है कि यदि पैसे के दम पर सुख-सुविधाओं का सामान, आलीशान मकान, गाड़ियाँ और साजो-सामान न खरीदा जाए, तो उस पैसे का कोई प्रत्यक्ष महत्व नहीं दिखता। बैंक बैलेंस देखने के लिए तो हिसाब-किताब की जरूरत होती है, परंतु भौतिक संपत्ति बिना प्रयास के ही सबको दिखाई देती है। लोग अपनी क्रय-शक्ति (पर्चेज़िंग पावर) का अंधाधुंध प्रदर्शन करके ही पैसे के असली सुख और गर्व का अनुभव करते हैं
  • विशेष:
    • उपभोक्तावादी संस्कृति और सामाजिक दिखावे की प्रवृत्ति पर गहरा कटाक्ष
    • ‘माल-टाल’, ‘माल-असबाब’ जैसे बोलचाल के शब्दों के साथ अंग्रेजी शब्द ‘पर्चेज़िंग पावर’ का सटीक समन्वय
    • भाषा सरल, विचारोत्तेजक और व्यंग्यात्मक है

गद्यांश 2:

“बाज़ार में एक जादू है। वह जादू आँख की राह काम करता है। वह रूप का जादू है; पर जैसे चुंबक का जादू लोहे पर ही चलता है, वैसे ही इस जादू की भी मर्यादा है। जेब भरी हो, और मन खाली हो, ऐसी हालत में जादू का असर खूब होता है।”
  • सन्दर्भ: पूर्ववत्।
  • प्रसंग: यहाँ लेखक ने बाज़ार के सम्मोहन (जादुई प्रभाव) तथा उसके शिकार होने वाली मानवीय मनःस्थिति का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया है
  • व्याख्या: लेखक बाज़ार की तुलना एक सम्मोहक जादू से करते हैं जो आँखों के माध्यम से मनुष्य के मन में प्रवेश करता है। बाज़ार में सजी हुई वस्तुएँ अपने रूप-सौंदर्य से ग्राहक को अपनी ओर खींचती हैं। जिस प्रकार चुंबक केवल लोहे को आकर्षित करता है, उसी प्रकार बाज़ार का जादू भी तभी सफल होता है जब ग्राहक की जेब में पैसा हो (जेब भरी हो) परंतु उसे यह स्पष्ट न पता हो कि उसे वास्तव में क्या चाहिए (मन खाली हो)। ऐसी अनिश्चय की स्थिति में व्यक्ति अनावश्यक वस्तुओं के आकर्षण में फँसकर फिजूलखर्ची कर बैठता है
  • विशेष:
    • बाज़ार के आकर्षण को समझाने के लिए ‘चुंबक और लोहे’ का सुंदर दृष्टांत
    • मानवीय मनोविज्ञान का सूक्ष्म और सटीक चित्रण
    • शैली दार्शनिक, तार्किक एवं प्रवाहमयी है

गद्यांश 3:

“यहाँ मुझे ज्ञात होता है कि बाज़ार को सार्थकता भी वही मनुष्य देता है जो जानता है कि वह क्या चाहता है। और जो नहीं जानते कि वे क्या चाहते हैं, अपनी ‘पर्चेजिंग पावर’ के गर्व में अपने पैसे से केवल एक विनाशक शक्ति-शैतानी शक्ति, व्यंग्य की शक्ति ही बाज़ार को देते हैं। न तो वे बाज़ार से लाभ उठा सकते हैं, न उस बाज़ार को सच्चा लाभ दे सकते हैं।”
  • सन्दर्भ: पूर्ववत्।
  • प्रसंग: लेखक ने स्पष्ट किया है कि बाज़ार की वास्तविक उपयोगिता और सार्थकता किन परिस्थितियों में सिद्ध होती है और कौन से लोग समाज में विकृति पैदा करते हैं
  • व्याख्या: लेखक का मत है कि बाज़ार का वास्तविक उद्देश्य मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति करना है। जो व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं के प्रति स्पष्ट होता है (जैसे चूरन वाले भगत जी), वही बाज़ार का सही उपयोग करता है और उसे सार्थकता प्रदान करता है। इसके विपरीत, जो लोग बिना आवश्यकता के केवल अपनी क्रय-शक्ति के घमंड में खरीदारी करते हैं, वे बाज़ार में छल-कपट, शोषण और दिखावे (बाज़ारूपन) को बढ़ावा देते हैं। ऐसे लोग न स्वयं संतुष्ट होते हैं और न ही समाज को कोई स्वस्थ संदेश देते हैं
  • विशेष:
    • बाज़ार के आर्थिक और नैतिक पहलू का गंभीर दार्शनिक उद्घाटन
    • ‘विनाशक शक्ति’, ‘शैतानी शक्ति’ जैसे प्रभावोत्पादक विशेषणों का प्रयोग
    • भाषा तत्समप्रधान, परिष्कृत तथा प्रबोधक है

गद्यांश 4:

“ऐसे बाज़ार को बीच में लेकर लोगों में आवश्यकताओं का आदान-प्रदान नहीं होता; बल्कि शोषण होने लगता है। तब कपट सफल होता है, निष्कपट शिकार होता है। ऐसे बाज़ार मानवता के लिए विडंबना हैं और जो ऐसे बाज़ार का पोषण करता है, जो उसका शास्त्र बना हुआ है; वह अर्थशास्त्र सरासर औंधा है, वह मायावी शास्त्र है, वह अर्थशास्त्र अनीति-शास्त्र है।”
  • सन्दर्भ: पूर्ववत्।
  • प्रसंग: निबंध के समापन अंश में लेखक ने मानवीय मूल्यों से विहीन शोषक बाज़ार व्यवस्था और उसके समर्थक अर्थशास्त्र की कटु आलोचना की है
  • व्याख्या: लेखक कहते हैं कि जब बाज़ार में कपट और स्वार्थ बढ़ जाता है, तब वहाँ मानवीय आवश्यकताओं का स्वाभाविक आदान-प्रदान समाप्त हो जाता है और केवल ग्राहकों का शोषण होने लगता है। धूर्त और कपटी लोग लाभ कमाते हैं तथा सीधे-सादे, निष्कपट लोग ठगे जाते हैं। ऐसा बाज़ार मानवता के लिए कलंक है। लेखक घोषणा करते हैं कि जो सिद्धांत या अर्थशास्त्र ऐसी शोषक व अमानवीय व्यवस्था को बढ़ावा देता है, वह सच्चा अर्थशास्त्र नहीं बल्कि उल्टी दिशा में चलने वाला ‘मायावी शास्त्र’ और वास्तव में ‘अनीति-शास्त्र’ है
  • विशेष:
    • पूंजीवादी बाज़ार व्यवस्था और अनैतिक अर्थनीति पर तीव्र व बेबाक प्रहार
    • ‘अर्थशास्त्र को अनीति-शास्त्र’ कहना लेखक की मौलिक व गांधीवादी वैचारिक स्थापना को दर्शाता है
    • लघु, सुगठित वाक्यों से युक्त ओजस्वी एवं प्रभावपूर्ण गद्य शैली

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