अतीत में दबे पाँव (यात्रा-वृत्तांत / निबंध)
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लेखक: ओम थानवी
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विधा: यात्रा-वृत्तांत / पुरातात्विक रिपोर्ताज
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पुस्तक: वितान भाग-2 (पूरक पाठ्यपुस्तक)
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मूल विषय: 5000 वर्ष प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता के महानगर ‘मुअनजो-दड़ो’ का नगर-नियोजन, जल-संस्कृति, समाज-पोषित सौंदर्यबोध एवं आडंबरहीन जीवन-शैली का सजीव अंकन।
1. लेखक एवं पाठ की पृष्ठभूमि
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मुअनजो-दड़ो का परिचय: पाकिस्तान के सिंध प्रांत में स्थित ताम्रकाल का सबसे बड़ा, उत्कृष्ट एवं सुव्यवस्थित नियोजित शहर (विस्तार: 200 हेक्टेयर, अनुमानित आबादी: लगभग 85,000)।
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शाब्दिक अर्थ: ‘मुअनजो-दड़ो’ का अर्थ है—‘मुर्दों का टीला’।
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खुदाई का इतिहास: सन् 1922 में राखालदास बनर्जी बौद्ध स्तूप की खोजबीन करते हुए यहाँ पहुँचे और ईसा पूर्व सभ्यता के साक्ष्य मिले। इसके बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के महानिदेशक जॉन मार्शल के निर्देश पर व्यापक खुदाई शुरू हुई।
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अन्य प्रमुख पुरातात्विक विद्वान: काशीनाथ नारायण दीक्षित (‘डीके’ क्षेत्र), हेरल्ड हरग्रीव्ज (‘एचआर’ क्षेत्र), माधोस्वरूप वत्स (‘वीएस’ क्षेत्र), मार्टिमर व्हीलर आदि।
2. पाठ का उद्देश्य व मूल संवेदना
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प्राचीन भारतीय नगर-नियोजन का गौरव: यह सिद्ध करना कि पाँच हज़ार वर्ष पूर्व भी भारत में ग्रिड-पद्धति पर आधारित अत्यंत आधुनिक और वैज्ञानिक नगर-नियोजन विद्यमान था।
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जल-संस्कृति (Water Culture) की प्रतिष्ठा: कुओं, पक्के स्नानागारों, ढकी हुई नालियों और महाकुंड के माध्यम से सिंधु सभ्यता के बेजोड़ जल-प्रबंधन व स्वच्छता-सरोकार को उजागर करना।
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समाज-पोषित सौंदर्यबोध: यह प्रतिपादित करना कि सिंधु घाटी सभ्यता राज-पोषित या धर्म-पोषित न होकर समाज-पोषित थी। यहाँ भव्य महलों, मंदिरों या हथियारों का आडंबर नहीं, बल्कि उपयोगिता और कला की सहज भव्यता थी।
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जीवंत सांस्कृतिक निरंतरता: अतीत के खंडहरों को केवल मृत अवशेष न मानकर उनके माध्यम से राजस्थान, सिंध और समूचे भारतीय जनजीवन की सांस्कृतिक निरंतरता को जोड़ना।
3. विस्तृत पाठ-सार एवं प्रमुख बिंदु
1. बौद्ध स्तूप और ‘गढ़’ (Citadel)
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शहर के सबसे ऊँचे टीले पर लगभग 25 फुट ऊँचे चबूतरे पर 26वीं सदी ईसा पूर्व की ईंटों से बना बौद्ध स्तूप है, जिसे ‘नागर भारत का सबसे पुराना लैंडस्केप’ कहा गया है।
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स्तूप वाले चबूतरे के पश्चिम में प्रशासनिक इमारतें, सभा भवन, ज्ञानशाला (‘कॉलेज ऑफ प्रीस्ट्स’) और विशाल कोठार स्थित हैं। इस हिस्से को ‘गढ़’ कहा जाता है।
2. नगर-नियोजन एवं ग्रिड शैली (Grid Plan)
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मुअनजो-दड़ो की सभी सड़कें सीधी या आड़ी हैं (समकोण पर काटती हैं), जिसे आज वास्तुकार ‘ग्रिड प्लान’ कहते हैं (जैसे आधुनिक ब्रासीलिया, चंडीगढ़ या इस्लामाबाद)।
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शहर की मुख्य सड़क (फ़र्स्ट स्ट्रीट) 33 फीट चौड़ी है, जिस पर दो बैलगाड़ियाँ एक साथ आ-जा सकती थीं।
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घरों के दरवाजे मुख्य सड़क पर न खुलकर अंदर गलियों में खुलते थे (यही वास्तु-शैली आधुनिक चंडीगढ़ में वास्तुकार कार्बजिए ने अपनाई)।
3. अनूठा जल-प्रबंधन एवं ‘महाकुंड’
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महाकुंड की माप: 40 फुट लंबा, 25 फुट चौड़ा और 7 फुट गहरा।
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निर्माण-कौशल: पानी के रिसाव को रोकने के लिए ईंटों के जोड़ में चूने और चिरोड़ी (जिप्सम) के गारे तथा दीवारों पर सफेद डामर (बिटुमेन) का प्रयोग किया गया।
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कुंड में उत्तर और दक्षिण से सीढ़ियाँ उतरती हैं। तीन तरफ साधुओं के कमरे और उत्तर में 8 स्नानागार (दो पाँतों में) हैं, जिनके द्वार एक-दूसरे के सामने नहीं खुलते।
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कुएँ एवं नालियाँ: पूरे शहर में लगभग 700 कुएँ मिले। नालियाँ पक्की ईंटों से बनी और ऊपर से पूरी तरह ढकी हुई थीं।
4. कृषि, उद्योग एवं व्यापार
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सिंधु घाटी मूलतः खेतिहर व पशुपालक सभ्यता थी। यहाँ रबी की फसलें (गेहूँ, जौ, सरसों, चना, कपास, ज्वार, बाजरा, रागी) और फल (खजूर, खरबूजे, अंगूर, बेर) उगाए जाते थे।
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दुनिया के दो सबसे पुराने सूती कपड़ों में एक मुअनजो-दड़ो में मिला (दूसरा जॉर्डन में)। यहाँ सूत की कताई-बुनाई व रंगाई का कारखाना (माधोस्वरूप वत्स द्वारा खोजा गया) था।
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मेसोपोटामिया के शिलालेखों में मुअनजो-दड़ो के लिए ‘मेलुहा’ शब्द का प्रयोग मिलता है।
5. मकानों की वास्तुकला एवं ईंटों का अनुपात
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सभी घरों में एक ही निश्चित अनुपात (1:2:4) की भट्टी में पकी ईंटों का प्रयोग हुआ।
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‘मुखिया के घर’ में 2 आँगन और लगभग 20 कमरे हैं।
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डीके-जी क्षेत्र के घरों की मोटी दीवारें और छेद दो-मंजिला मकानों का संकेत देते हैं।
6. प्रमुख पुरावशेष एवं मूर्तियाँ
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नर्तकी (Dancing Girl): काँसे की विश्वप्रसिद्ध मूर्ति (एचआर क्षेत्र से मिली, वर्तमान में राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली में सुरक्षित), जिसे मार्टिमर व्हीलर ने बेजोड़ शिल्प बताया।
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याजक-नरेश (Priest King): दाढ़ी वाले राजा/पुरोहित की पत्थर की प्रतिमा, जिसके बदन पर आकर्षक गुलकारी (कशीदाकारी) वाला दुशाला है।
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अजायबघर की वस्तुएँ: ताँबे का आईना, मिट्टी की बैलगाड़ियाँ, चौपड़ की गोटियाँ, दो पाटन वाली चक्की, माप-तौल के बाट, मिट्टी के कंगन, मनकों के हार और सोने की 3 सुइयाँ (बारीक कशीदाकारी हेतु)।
7. लो-प्रोफाइल व अनुशासित सभ्यता (हथियारों का अभाव)
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पूरे उत्खनन में औजार तो मिले किंतु हथियार नहीं मिले।
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यहाँ भव्य राजमहल, मंदिर या राजाओं की समाधियाँ (पिरामिड) नहीं हैं।
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यह सभ्यता सैन्य-बल के बजाय आंतरिक सामाजिक समझ और अनुशासन से संचालित थी।
8. राजस्थान से तुलना एवं वर्तमान संकट
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लेखक को मुअनजो-दड़ो के खंडहर देखकर जैसलमेर के उजड़े गाँव ‘कुलधरा’ तथा राजस्थान की धूप, खेती और बैलगाड़ियों की याद आती है।
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वर्तमान चुनौती: सिंधु नदी के जल-रिसाव से क्षार (खारेपन) और दलदल की समस्या के कारण अब खुदाई बंद कर दी गई है।
4. पाठ में आए कठिन एवं विशिष्ट शब्दों के अर्थ
| शब्द | अर्थ |
| मुअनजो-दड़ो |
मुर्दों का टीला (सिंधी भाषा का शब्द)
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| इलहाम |
अंतःप्रेरणा / दैवीय अनुभूति / अचानक ज्ञान होना
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| अपलक |
बिना पलक झपकाए / एकटक देखना
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| गढ़ (Citadel) |
नगर का ऊँचा और सुरक्षित पश्चिमी भाग जहाँ प्रशासनिक केंद्र व सत्ता होती थी
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| ग्रिड प्लान |
सीधी और आड़ी सड़कों की जालनुमा नगर-योजना (सड़कें समकोण पर काटती हैं)
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| दैव मार्ग (Divinity Street) |
महाकुंड की ओर जाने वाली पवित्र गली
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| चिरोड़ी |
जिप्सम (ईंटों को जोड़ने वाला गारा)
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| कोठार |
विशाल अन्न-भंडार (Granary)
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| मृद्-भांड |
मिट्टी के बने बर्तन
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| शहतीर |
छत को सहारा देने वाली लकड़ी की मोटी कड़ी/बीम
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| याजक |
यज्ञ कराने वाला पुरोहित / धार्मिक प्रधान
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| गुलकारी |
कपड़ों पर फूल-पत्तियों की बारीक कशीदाकारी/कढ़ाई
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| अजरक |
सिंध प्रांत में ठप्पे से छपाई वाली पारंपरिक सूती चादर/कपड़ा
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| बाशिंदा |
निवासी / रहने वाला
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| सिरपेंच |
पगड़ी या मुकुट के आगे लगाया जाने वाला छोटा आभूषण
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| पायदान |
सीढ़ी का डंडा / पैर रखने का स्थान
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| सायास |
जानबूझकर / प्रयासपूर्वक किया गया
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5. मुख्य परीक्षा-उपयोगी प्रश्नोत्तर सारांश
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प्रश्न 1: ‘सिंधु सभ्यता साधन-संपन्न थी, पर उसमें भव्यता का आडंबर नहीं था’—कैसे?उत्तर: मुअनजो-दड़ो में उन्नत नगर-योजना, पक्के मकान, उत्तम जल-निकासी, अन्न-कोठार और उद्योग सब मौजूद थे, किंतु वहाँ मिस्र या मेसोपोटामिया की तरह विशाल मंदिर, भव्य राजप्रसाद, बड़े पिरामिड या राजाओं की समाधियाँ नहीं थीं। वहाँ उपयोगिता और कला को प्राथमिकता दी गई थी, दिखावे को नहीं।
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प्रश्न 2: सिंधु घाटी सभ्यता का सौंदर्यबोध ‘राज-पोषित या धर्म-पोषित न होकर समाज-पोषित था’—स्पष्ट कीजिए।उत्तर: अन्य सभ्यताओं में कला राजाओं या धर्मगुरुओं के प्रभुत्व और अहंकार को दर्शाती थी, जबकि सिंधु सभ्यता में कला आम जनता की दैनिक आवश्यकताओं, सुरुचि और जीवन से जुड़ी थी (जैसे चाक के बर्तन, खिलौने, मुहरें, आभूषण, कशीदाकारी)। इसलिए इसका सौंदर्यबोध समाज-पोषित था।
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प्रश्न 3: पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर कैसे कहा जा सकता है कि सिंधु सभ्यता ‘ताकत से नहीं बल्कि समझ से अनुशासित’ सभ्यता थी?उत्तर: खुदाई में किसी भी प्रकार के सैन्य अस्त्र-शस्त्र या सेना की छावनियाँ नहीं मिली हैं। इसके बावजूद समूचे नगर में सड़कों की चौड़ाई, नालियों की व्यवस्था, ईंटों का एक समान अनुपात (1:2:4) और स्वच्छता के कठोर नियम लागू थे, जो यह सिद्ध करते हैं कि यह व्यवस्था किसी तानाशाही डंडे से नहीं, बल्कि नागरिकों की आंतरिक नागरिक समझ और अनुशासन से चलती थी।
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प्रश्न 4: क्या सिंधु घाटी सभ्यता को ‘जल-संस्कृति’ कहा जा सकता है?उत्तर: हाँ, क्योंकि इस सभ्यता में पानी के उपयोग और शुद्धता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई थी। लगभग 700 कुएँ, अनुष्ठानिक महाकुंड, हर घर में निजी स्नानागार और समूचे शहर में ईंटों से ढकी हुई वैज्ञानिक भूमिगत नालियों का जाल विश्व इतिहास में अद्वितीय है।