जनकवि नागार्जुन रचित ‘बादलों को घिरते देखा है’ कविता का सार, सप्रसंग व्याख्या एवं काव्य-सौंदर्य

जनकवि नागार्जुन रचित ‘बादलों को घिरते देखा है’ कविता का सार, सप्रसंग व्याख्या एवं काव्य-सौंदर्य

जनकवि और प्रगतिशील काव्यधारा के प्रमुख हस्ताक्षर नागार्जुन (वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’) की पाठ्यपुस्तक अंतरा (भाग-1) में संकलित विख्यात कविता ‘बादलों को घिरते देखा है’ का संदर्भ, प्रसंग, प्रमुख काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्या एवं काव्य-सौंदर्य:

पाठ-परिचय एवं संदर्भ

  • कवि: नागार्जुन
  • मूल काव्य संग्रह: युगधारा (1953)
  • पाठ्यपुस्तक: अंतरा (भाग-1) – कक्षा 11 (ऐच्छिक)
  • संदर्भ: प्रस्तुत कविता जनकवि नागार्जुन द्वारा रचित उनके प्रसिद्ध संग्रह ‘युगधारा’ से संकलित है।
  • केंद्रीय विषय: हिमालय के दुर्गम शिखरों, झीलों, वनस्पति, जीव-जगत और किन्नर-किन्नरियों के जीवन का यथार्थवादी, नैसर्गिक और भव्य सौंदर्य-चित्रण। इसके साथ ही कवि ने महाकवि कालिदास के ‘मेघदूत’ से जुड़े काल्पनिक और रोमानी मिथकों की यथार्थ के धरातल पर पड़ताल की है।

काव्यांश 1: अमल धवल गिरि के शिखरों पर…

“अमल धवल गिरि के शिखरों पर,
बादलों को घिरते देखा है।
छोटे-छोटे मोती जैसे
उसके शीतल तुहिन कणों को,
मानसरोवर के उन स्वर्णिम
कमलों पर गिरते देखा है,
बादलों को घिरते देखा है।”

प्रसंग

कवि हिमालय पर्वत की उज्ज्वल चोटियों और पवित्र मानसरोवर झील में खिले कमलों पर ओस की बूँदों के गिरने का अत्यंत निर्मल दृश्य उपस्थित करते हैं।

सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)

कवि कहते हैं कि उन्होंने हिमालय पर्वत की स्वच्छ (अमल) और बर्फ से ढकी श्वेत (धवल) चोटियों पर बादलों को उमड़ते-घुमड़ते और घिरते अपनी आँखों से देखा है। मानसरोवर झील में खिले हुए प्रातःकालीन सुनहरी आभा वाले कमलों पर, बादलों से छनकर गिरने वाली ओस (तुहिन) की छोटी-छोटी, शीतल और मोतियों जैसी चमकती बूँदों को गिरते देखा है। कवि उस नैसर्गिक दृश्य पर मुग्ध होकर कहते हैं कि मैंने हिमालय के उस विहंगम रूप में बादलों को घिरते देखा है।

काव्यांश 2: तुंग हिमालय के कंधों पर…

“तुंग हिमालय के कंधों पर
छोटी-बड़ी कई झीलें हैं,
उनके श्यामल नील सलिल में
समतल देशों से आ-आकर
पावस की उमस से आकुल
तिक्त-मधुर बिसतंतु खोजते
हंसों को तिरते देखा है,
बादलों को घिरते देखा है।”

प्रसंग

पहाड़ी झीलों में तैरते हुए हंसों और उनके स्वाभाविक भोजन की खोज का जीवंत वर्णन।

सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)

ऊँचे (तुंग) हिमालय की चोटियों और ढलानों (कंधों) पर अनेक छोटी-बड़ी प्राकृतिक झीलें फैली हुई हैं। जब मैदानी भागों (समतल देशों) में वर्षा ऋतु (पावस) के दिनों में अत्यधिक उमस और गर्मी पड़ती है, तो उससे व्याकुल होकर हंस उड़कर इन ठंडी झीलों में चले आते हैं। वे इन झीलों के गहरे नीले-साँवले जल (श्यामल नील सलिल) में स्वच्छंद तैरते हैं और कमल के नाल के भीतर मिलने वाले तीखे-मीठे रेशे (तिक्त-मधुर बिसतंतु) खोजकर खाते हैं। कवि कहते हैं कि मैंने उन हंसों को तैरते और आकाश में बादलों को घिरते देखा है।

काव्यांश 3: ऋतु वसंत का सुप्रभात था…

“ऋतु वसंत का सुप्रभात था,
मंद-मंद था अनिल बह रहा,
बालारुण की मृदु किरणें थीं,
अगल-बगल स्वर्णाभ शिखर थे;
एक-दूसरे से विरहित हो
अलग-अलग रहकर ही जिनको
सारी रात बितानी होती,
निशा-काल से चिर-अभिशापित
बेबस उन चकवा-चकई का
बंद हुआ क्रंदन, फिर उनमें
उस महान सरवर के तीरे
शैवालों की हरी दरी पर
प्रणय-कलह छिड़ते देखा है,
बादलों को घिरते देखा है।”

प्रसंग

वसंत ऋतु की प्रातः वेला में चकवा-चकवी के पौराणिक विरह के अंत और उनके मिलन के प्रेम-व्यापार का मनोहारी चित्रण।

सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)

वसंत ऋतु की सुहावनी सुबह थी और मंद-मंद शीतल पवन (अनिल) प्रवाहित हो रही थी। उदित होते हुए बाल-सूर्य (बालारुण) की कोमल किरणें चारों ओर बिखर रही थीं, जिससे हिमालय की बर्फीली चोटियाँ सोने के समान चमक (स्वर्णाभ) रही थीं। लोक-मान्यता के अनुसार चकवा और चकवी को यह शाप मिला हुआ है कि वे रात के समय एक-दूसरे से अलग रहकर विरह में तड़पते हैं।
सुबह होते ही उस अभिशप्त रात की विवशता समाप्त हो गई और उनका रात भर का करुण रोदन (क्रंदन) बंद हो गया। उस विशाल मानसरोवर के किनारे काई (शैवाल) की हरी-भरी प्राकृतिक दरी पर, सुबह के मिलन के बाद चकवा-चकवी के बीच प्रेम भरी नोंक-झोंक (प्रणय-कलह) और रूठने-मनाने की क्रीड़ा को कवि ने स्वयं देखा है।

काव्यांश 4: कहाँ गया धनपति कुबेर वह?…

“कहाँ गया धनपति कुबेर वह?
कहाँ गई उसकी वह अलका?
नहीं ठिकाना कालिदास के
व्योम-प्रवाही गंगाजल का,
ढूँढ़ा बहुत परंतु लगा क्या
मेघदूत का पता कहीं पर?
कौन बताए वह छायामय
बरस पड़ा होगा न यहीं पर?
जाने दो, वह कवि-कल्पित था,
मैंने तो भीषण जाड़ों में
नभ-चुंबी कैलास शीर्ष पर,
महामेघ को महाकंप-सहित
गरज-गरज भिड़ते देखा है,
बादलों को घिरते देखा है।”

प्रसंग

महाकवि कालिदास के ‘मेघदूत’ के काल्पनिक आख्यानों पर यथार्थवादी दृष्टि और प्रकृति के भीषण, ओजस्वी रूप का साक्षात्कार।

सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)

कवि प्रश्न करते हैं कि कालिदास ने जिस धन के देवता कुबेर और उसकी वैभवशाली नगरी ‘अलकापुरी’ का वर्णन किया था, वह आज कहाँ है? आकाश में बहने वाली जिस देव-नदी गंगा का उल्लेख था, उसका भी कोई यथार्थ ठिकाना नहीं मिलता। कवि कहते हैं कि मैंने उस काल्पनिक ‘मेघदूत’ (संदेशवाहक बादल) को बहुत खोजा, किंतु उसका कोई पता नहीं चला। हो सकता है कि वह कल्पित बादल यहीं कहीं बरस कर समाप्त हो गया हो।
अंततः कवि कहते हैं कि उस साहित्यिक कल्पना को छोड़ो, वह सब कवि कालिदास की भावुक कल्पना थी। यथार्थ में तो मैंने कड़ाके की भीषण सर्दियों में, आकाश को चूमने वाले कैलास पर्वत के शिखरों पर गरजते हुए विशाल बादलों को भयंकर कंपकंपी के साथ आपस में टकराते और गरज-गरज कर युद्ध करते देखा है।

काव्यांश 5: शत-शत निर्झर-निर्झरिणी कल…

“शत-शत निर्झर-निर्झरिणी कल-
मुखरित देवदारु कानन में,
शोणित-धवल भोजपत्रों से
छाई हुई कुटी के भीतर,
रंग-बिरंगे और सुगंधित
फूलों से कुंतल को साजे,
इन्द्रनील की माला डाले,
शंख-सरीखे सुघड़ गलों में,
कानों में कुवलय लटकाए,
मदिरा-अरुण रक्त नयनों में,
मनभावन मदमस्त किरात-किन्नर
को मदिर बजाते देखा है,
बादलों को घिरते देखा है।”

प्रसंग

किन्नर देश के निवासियों (किन्नर-किन्नरियों) के स्वच्छंद, सौंदर्यप्रिय, संगीत-मय और उन्मुक्त पहाड़ी जीवन का यथार्थवादी अंकन।

सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)

सैकड़ों छोटे-बड़े झरनों (निर्झर-निर्झरिणी) की कल-कल ध्वनि से गूँजते हुए देवदार के घने जंगलों में, लाल-सफेद (शोणित-धवल) भोजपत्रों की छतों से बनी सुंदर कुटियों के भीतर का दृश्य अत्यंत मोहक है। वहाँ किन्नर बालाएँ अपने बालों (कुंतल) को रंग-बिरंगे सुगंधित जंगली फूलों से सजाए हुए हैं। शंख जैसे सुडौल और सुंदर गलों में नीलमणि (इन्द्रनील) की मालाएँ पहनी हुई हैं और कानों में नीलकमल (कुवलय) के झुमके लटकाए हुए हैं।
मदिरा के हलके नशे से लाल हुए मदमस्त नयनों वाले वे किन्नर युवक-युवतियाँ अपनी प्रिय बाँसुरी और वाद्य-यंत्रों (मदिर) पर मदमस्त होकर मधुर धुनें छेड़ रहे हैं। कवि कहते हैं कि इस प्रकार जीवन के सहज राग-रंग के बीच मैंने हिमालय पर बादलों को घिरते देखा है।

काव्य-सौंदर्य

1. भाव-पक्ष

  • प्रकृति का आलंबन चित्रण: यहाँ प्रकृति केवल इंसानी भावनाओं की पृष्ठभूमि नहीं है, बल्कि वह अपने विराट, स्वतंत्र और स्वाभाविक स्वरूप में उपस्थित है।
  • मिथक बनाम यथार्थ: कालिदास के ‘मेघदूत’ और ‘अलकापुरी’ की काल्पनिक रोमानियत को नकारते हुए कवि ने प्रकृति और जन-जीवन के ठोस यथार्थ को प्राथमिकता दी है।
  • रस: अद्भुत रस, संयोग श्रृंगार रस (चकवा-चकवी और किन्नरों के प्रसंग में) तथा रौद्र/वीर रस (कैलाश पर बादलों के टकराने में)।

2. कला-पक्ष (शिल्प-सौंदर्य)

  • भाषा: संस्कृतनिष्ठ, तत्समप्रधान, अत्यंत परिष्कृत और चित्रात्मक साहित्यिक खड़ी बोली (उदा. अमल, धवल, तुहिन, श्यामल, बिसतंतु, बालारुण, स्वर्णाभ, कुवलय, शोणित-धवल)।
  • शैली: वर्णनात्मक एवं प्रवाहमयी मुक्त छंद-शैली, जिसमें अंत्यानुप्रास की मधुर लय है।
  • प्रमुख अलंकार:
    • उपमा अलंकार: “छोटे-छोटे मोती जैसे”, “शंख-सरीखे सुघड़ गलों में”
    • रूपक अलंकार: “शैवालों की हरी दरी”, “तुंग हिमालय के कंधों पर”
    • अनुप्रास अलंकार: “अमल धवल”, “श्यामल नील सलिल”, “निर्झर-निर्झरिणी”, “गरज-गरज”
    • पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार: “छोटे-छोटे”, “आ-आकर”, “गरज-गरज”, “शत-शत”
    • मानवीकरण अलंकार: बादलों का गरज-गरज कर भिड़ना, चकवा-चकई का प्रणय-कलह।
  • बिंब-विधान: मोतियों जैसी ओस, नीले जल में तैरते हंस, स्वर्णिम पर्वत शिखर और भोजपत्रों की कुटिया—कविता में दृश्य बिंबों की अप्रतिम छटा है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

error: Content is protected !!