भक्तिन (संस्मरणात्मक रेखाचित्र) पाठ का उद्देश्य व मूल संवेदना

भक्तिन (संस्मरणात्मक रेखाचित्र)

  • लेखिका: महादेवी वर्मा
  • मूल संग्रह: ‘स्मृति की रेखाएँ’
  • विधा: संस्मरणात्मक रेखाचित्र

1. पाठ का उद्देश्य व मूल संवेदना

  1. स्त्री-संघर्ष व अस्मिता की अभिव्यक्ति: पितृसत्तात्मक समाज में एक असहाय व स्वाभिमानी स्त्री के आजीवन संघर्ष को रेखांकित करना
  2. रूढ़ियों व सामाजिक विसंगतियों पर प्रहार: बाल-विवाह, विधवा-समस्या, पुत्र-मोह, पारिवारिक छल-कपट और ग्रामीण पंचायतों के अमानवीय व पक्षपाती फैसलों को उजागर करना
  3. आत्मीय मानवीय संबंध: स्वामी और सेवक के पारंपरिक औपचारिक संबंध से ऊपर उठकर एक अटूट, निस्वार्थ और संवेदनशील मानवीय रिश्ते का चित्रण करना

2. भक्तिन के जीवन का चार परिच्छेदों में विस्तृत सार

पहला परिच्छेद: बाल्यकाल, विवाह एवं विमाता का षड्यंत्र

  • जन्म व नाम: ऐतिहासिक झूसी गाँव के एक प्रसिद्ध गोपालक (अहीर) सुरमा की इकलौती बेटी थी। वास्तविक नाम ‘लछमिन’ (लक्ष्मी) था
  • बाल-विवाह ও गौना: पाँच वर्ष की अल्पायु में हँडिया ग्राम में विवाह और नौ वर्ष की उम्र में गौना कर दिया गया
  • विमाता का छल: पिता की बीमारी का समाचार विमाता ने छुपाए रखा; जब पिता की मृत्यु हो गई तब सूचना भेजी। मायके पहुँचने पर पिता की मृत्यु का समाचार पाकर अपमानित व दुखी मन से ससुराल लौट आई और सास पर खरी-खोटी सुनाकर तथा पति पर गहने फेंककर अपना संताप व्यक्त किया

दूसरा परिच्छेद: दांपत्य जीवन, कन्या-जन्म और अलगौझा

  • पुत्री-जन्म व घरेलू प्रताड़ना: भक्तिन ने लगातार तीन बेटियों को जन्म दिया। सास (तीन बेटों की माँ) और दोनों जिठानियों (काले बेटों की माताएँ) ने भक्तिन और उसकी बेटियों की घोर उपेक्षा की
    • जिठानियाँ व उनके लड़के आराम करते, अच्छा भोजन (भात, गाढ़ा दूध, मलाई) खाते
    • भक्तिन और उसकी नन्ही बेटियाँ घर-खेत का कठोर श्रम करतीं और मोटा-अनाज (चने-बाजरे की घुघरी, मट्ठा, गुड़) खातीं
  • पति का अगाध प्रेम व अलगौझा: पति कर्मठ और निष्ठावान पत्नी से बेहद प्रेम करता था। उसने कभी उस पर हाथ नहीं उठाया। भक्तिन ने बुद्धिमानी से परिवार से अलगौझा (बँटवारा) कर लिया और अपनी मेहनत से खेती-बाड़ी व मवेशियों को समृद्ध बना दिया
  • पति की मृत्यु: बड़ी बेटी का विवाह धूमधाम से करने के बाद, 36 वर्ष की आयु में पति की मृत्यु हो गई (उस समय भक्तिन मात्र 29 वर्ष की थी)

तीसरा परिच्छेद: पारिवारिक षड्यंत्र, पंचायत का क्रूर निर्णय और पलायन

  • जेठ-जिठौतों की गिद्ध दृष्टि: संपत्ति हड़पने के लिए ससुराल वालों ने भक्तिन के पुनर्विवाह की कोशिश की। भक्तिन ने कड़े शब्दों में मना कर दिया और बाल कटवाकर, कंठी पहनकर संन्यासिनी जैसा जीवन अपना लिया
  • बड़ी बेटी का दुर्भाग्य: बड़ी बेटी युवावस्था में ही विधवा हो गई। जेठ के तीतरबाज़ साले ने संपत्ति के लालच में छलपूर्वक बेटी की कोठरी में घुसकर दरवाजा बंद कर लिया
  • पंचायत का अन्यायपूर्ण फैसला: यद्यपि बेटी ने युवक को जमकर पीटा था, परंतु पंचायत ने रूढ़िवादी और पक्षपाती रवैया अपनाते हुए दोनों को पति-पत्नी के रूप में रहने का जबरन आदेश सुना दिया
  • आर्थिक पतन व शहर आगमन: दामाद की निकम्मेपन व तीतरबाज़ी से खेती बर्बाद हो गई। समय पर लगान न चुका पाने पर जमींदार ने भक्तिन को दिनभर कड़ी धूप में खड़ा रखा। स्वाभिमानी भक्तिन इस अपमान को सहन न कर सकी और आजीविका की तलाश में शहर आ गई

चौथा परिच्छेद: लेखिका के सान्निध्य में सेवा-धर्म (वर्तमान जीवन)

  • नया नामकरण: गले में कंठी-माला और संन्यासियों जैसा वेश देखकर महादेवी जी ने उसका नाम ‘भक्तिन’ रखा। भक्तिन ने प्रार्थना की कि कोई उसका असली नाम (लक्ष्मी) न पुकारे
  • रसोई व छूत-पाक: भक्तिन ने चौके में कोयले की लक्ष्मण-रेखा खींचकर छूत-पाक के कड़े नियमों का पालन शुरू किया। लेखिका को उसने देहाती खान-पान (मोटी रोटियाँ, महुए की लपसी, बाजरे के पुए, ज्वार की खिचड़ी) की आदत डाल दी
  • अनोखा तर्कशास्त्र व दुर्गुण: इधर-उधर पड़े पैसों को मटकी में छुपाने को वह चोरी नहीं मानती थी; लेखिका को अप्रिय बातों से बचाने के लिए बात को बदल देना उसका सहज स्वभाव था। सिर मुँडाने के औचित्य के लिए उसने ‘तीरथ गए मुँडाए सिद्ध’ जैसा मनगढ़ंत शास्त्र-वाक्य सुना दिया
  • अटूट स्वामिभक्ति: लेखिका के देर रात तक लिखने-पढ़ने के दौरान वह निरंतर जागकर सेवा करती (कागज़, स्याही, पानी देना)। युद्ध (द्वितीय विश्व युद्ध) की आशंका के समय वह लेखिका को अपने गाँव ले जाने के लिए अपनी गड़ी हुई पूँजी (पाँच बीसी और पाँच रुपये) तक समर्पित करने को तैयार हो गई
  • कारागार का भय और समर्पण: यद्यपि वह जेल जाने से यमलोक के समान डरती थी, लेकिन लेखिका के जेल जाने की कल्पना मात्र से वह उनके साथ जेल जाने के लिए बड़े लाट (वायसराय) तक से लड़ने को तत्पर थी

3. पाठ में आए कठिन एवं विशिष्ट शब्दों के अर्थ (शब्द-छवि)

शब्द अर्थ
दुर्वह
जिसे वहन करना/ढोना बहुत कठिन हो
कुंचित
सिकुड़ी हुई / घुँघराली
इतिवृत्त
संपूर्ण जीवन-वृत्तांत / बीती हुई कहानी
अनामधन्या
जिसका कोई विशेष नाम या प्रसिद्धि न हो
गौना
विवाह के कुछ वर्षों बाद वधू को पहली बार ससुराल भेजने की रस्म
अभिषिक्त
पद या गद्दी पर विधिवत बैठाया हुआ
अलगौझा
संयुक्त परिवार से अलग होकर गृहस्थी या संपत्ति का बँटवारा
होरहा
आग पर भुना हुआ हरा चना/अनाज
भइउहू / भइयहू
छोटे भाई की पत्नी (भावज/बहू)
जिठौत
जेठ (पति के बड़े भाई) का पुत्र
अजिया ससुर
पति के दादा
दुर्लंघ्य
जिसे लाँघना या पार करना अत्यंत कठिन हो
तुषारपात
पाला पड़ना / ओले बरसना (यहाँ अर्थ: उत्साह पर पानी फिरना)
हतबुद्धि
जिसकी बुद्धि चकरा गई हो / निर्णय लेने में असमर्थ
चूड़ाकर्म
मुंडन संस्कार / सिर के बाल घुटवाना
नापित
नाई / हज्जाम
पागुर
जुगाली करना (पशुओं द्वारा चारा चबाना)
निस्तब्धता
सन्नाटा / गहरा मौन
गोंदरा
धान के पुआल (पैरा) का बना बिछौना
पाँच बीसी
सौ (20 × 5 = 100)
जून
पहर / समय (जैसे: दोनों जून का भोजन)

5. परीक्षा-उपयोगी महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर बिंदु

  • भक्तिन अपना वास्तविक नाम सबसे क्यों छुपाती थी?
    उसका वास्तविक नाम ‘लछमिन’ (लक्ष्मी) था, जो धन और समृद्धि का प्रतीक है। परंतु उसका वास्तविक जीवन दरिद्रता और घोर संघर्षों से भरा था। अपने नाम और जीवन की विषमता (विरोधाभास) के कारण वह किसी को अपना नाम नहीं बताती थी
  • भक्तिन और महादेवी के बीच सेवक-स्वामी का संबंध कैसा था?
    यह संबंध औपचारिक नौकर और मालिक का नहीं था। महादेवी जी चाहकर भी उसे हटा नहीं सकती थीं और भक्तिन जाने के आदेश पर केवल मुस्करा देती थी। यह संबंध घर में खिलने वाले गुलाब या आने-जाने वाले प्रकाश की तरह एक स्वतंत्र, सहज व आत्मिक अस्तित्व रखता था
  • पंचायत का न्याय समाज की किस मानसिकता का परिचायक है?
    पंचायत का फैसला पुरुष-प्रधान समाज की उस संकीर्ण और अन्यायी सोच का प्रतीक है, जहाँ स्त्री की इच्छा, सहमति और मानवाधिकारों को कुचलकर परंपरा व लोक-लाज के नाम पर अमानवीय निर्णय थोप दिए जाते हैं

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