?? मुर्दहिया (आत्मकथा) ??
【डॉ. तुलसीराम】
◆ प्रकाशन :- 2010 ई.
?मुर्दहिया की भूमिका :-
◆ लेखक के गांव धरमपुर (आजमगढ़) की बहुद्देशीय कर्मस्थली :- मुर्दहिया
◆ चरवाही से लेकर हरवाही तक के सारे रास्ते मुर्दहिया से गुजरते थे।
◆ स्कूल हो या दुकान, बाजार हो या मंदिर, यहाँ तक कि मजदूरी के लिए कलकत्ता वाली रेलगाड़ी पकड़ना हो, तो भी मुर्दहिया से ही गुजरना पड़ता था।
◆ लेखक के गांव की ‘जिओ पॉलिटिक्स’ यानी ‘भू-राजनीति’ में दलितों के लिए मुर्दहिया एक सामरिक केन्द्र जैसी थी।
◆ जीवन से लेकर मरण तक की सारी गतिविधियाँ मुर्दहिया समेट लेती थी।
◆ मुर्दहिया मानव और पशु की मुक्तिदाता थी।
◆ हमारी दलित बस्ती के अनगिनत दलित हजारों दुख-दर्द अपने अंदर लिये मुर्दहिया में दफन हो गए थे। यदि उनमें से किसी की भी आत्मकथा लिखी जाती तो उसका शीर्षक ‘मुर्दहिया’ ही होता ।
◆ मुर्दहिया सही मायनों में हमारी दलित बस्ती की जिंदगी थी। इस जिंदगी को मुर्दा से खोदकर बाहर लाने का पूरा श्रेय ‘तद्भव’ के मुख्य संपादक अखिलेश को जाता है।
◆ अखिलेश हमेशा लेखक के सामने कलम के बदले फावड़ा लिये तैयार मिलते थे। सही अर्थों में लेखक ने उनके ही फावड़े से खोदकर ‘मुर्दहिया’ से अपनी जिंदगी को बाहर निकाला।
◆ मेरे घर से भागने के बाद जब ‘मुर्दहिया’ का प्रथम खंड समाप्त हो जाता है, तो गांव के हर किसी के मुख से निकले पहले शब्द से तुकबंदी बनाकर गानेवाले जोगीबाबा, लक्कड़ ध्वनि पर नृत्यकला बिखेरती नटिनिया, गिद्ध-प्रेमी परगल बाबा तथा सिंघा बजाता बंकिया डोम आदि जैसे जिन्दा लोक पात्र हमेशा के लिए गायब होकर मुझे बड़ा दुख पहुंचाते हैं।
◆ सबसे ज्यादा दुखित करने वाली बात दिल्ली में रह रहे मेरे गांव के कुछ प्रवासी मजदूरों से मालूम हुई।
◆ पचास-साठ साल पहले की जिस ‘मुर्दहिया’ का वर्णन मैंने किया है, वह पूर्णरूपेण उजड़ चुकी है। सारे जंगल कटकर खेत में बदल चुके हैं, जिसके चलते गिद्धों जैसे अनगिनत दुर्लभ पक्षियों तथा साहि, सियारों और खरगोशों जैसे पशुओं का विलोप हो चुका है।
◆ बचपन में दुखित होने का मतलब होता था आंखों में आंसू आ जाना। ऐसे अवसरों पर मेरी दादी आंख धो लेने को कहती थी, किंतु आज का अनुभव बताता है कि चंद पानी के छींटों से दुख की निशानी नहीं मिट पाती।
◆ प्रवासी मजदूरों से ही पता चला कि ‘मुर्दहिया’ से होकर जानेवाली एक सरकारी सड़क ने हमारे गांव को तीन जिलों- आजमगढ़, गाजीपुर तथा बनारस से जोड़ दिया है। उस पर टैम्पो भी चलने लगे हैं।
◆ जिस तरह हमारे गांव से बड़ी संख्या में मजदूरों का पलायन बड़े शहरों में हो चुका है, संभवतः मुर्दहिया से सड़क निकल जाने के कारण वहां के भूत-पिशाचों का भी पलायन अवश्य हो गया होगा।
◆ बढ़ते हुए शहरीकरण ने हर एक के जीवन को प्रभावित किया है। भूत भी इससे अछूते नहीं हैं।
◆ आने वाले ‘मुर्दहिया’ के दूसरे खंड में घर से भागने के बाद कलकत्ता, बनारस तथा दिल्ली होते इंग्लैंड तथा सोवियत संध / रसिया तक की जीवनयात्रा का लेखा-जोखा होगा।मूलतः यह यात्रा मार्क्सवाद से बौद्ध दर्शन की है।
◆ राजकमल प्रकाशन के निदेशक अशोक महेश्वरी इस बात के लिए धन्यवाद के पात्र हैं कि उन्होंने ‘तद्भव’ में अब तक प्रकाशित सात किस्तों को ‘मुर्दहिया’ (खंड-1) के रूप में अविलंब प्रकाशित करने का निर्णय लिया, जबकि आगे का लेखन अभी जारी है।【डॉ. तुलसी राम जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली-110067】
1. भुतही पारिवारिक पृष्ठभूमि
2. मुर्दहिया तथा स्कूली जीवन
3. अकाल में अंधविश्वास
4. मुर्दहिया के गिद्ध तथा लोकजीवन
5. भुतनिया नागिन
6. चले बुद्ध की राह
7. आजमगढ़ में फाकाकशी
? 1. भुतही पारिवारिक पृष्ठभूमि ?
◆ लेखक की जन्मजात विरासत :- मुर्खता
◆ मानव जाति का वह पहला व्यक्ति जो जैविक रूप से मेरा खानदानी पूर्वज था।
◆ तेईस सौ वर्ष पूर्व यूनान देश से भारत आए मिनादर ने कहा कि आम भारतीयों को लिपि का ज्ञान नहीं है, इसलिए वे पढ़-लिख नहीं सकते।
◆ आधुनिक भारतीय पंडों ने मिनांदर का खूब खंडन-मंडन किया।
◆ आज भी करोड़ों भारतीय मिनांदर की कसौटी पर खरा उतरते हैं। सदियों पुरानी इस अशिक्षा का परिणाम यह हुआ कि मूर्खता और मूर्खता के चलते अंधविश्वासों का बोझ मेरे पूर्वजों के सिर से कभी नहीं उतरा…।
◆ लेखक के दादा को एक भूत ने लाठियों से पीट-पीटकर मार डाला था।
◆ अपने पांच भाइयों में पिता जी सबसे छोटे थे।
◆ लेखक के दादा का नाम :- जूठन
◆ मटर के खेत में दादा जी ने फली खाता एक साही नामक जानवर दिखाई दिया।
◆ दादा जी ने अपनी लाठी से साही पर हमला बोल दिया। लाठी लगते ही साही रौद्र रूप धारण करते हुए अपने लम्बे-लम्बे कँटीले रोंगटों को फैलाकर अंतर्धान हो गया। घर वालों के अनुसार वह साहि नहीं, बल्कि उस क्षेत्र का भूत था।
* साही का अर्थ :- नेवले की-सी आकृति का एक जानवर जिसके पूरे शरीर पर लंबे-लंबे काँटे होते हैं और जो ज़मीन में माँद बनाकर रहता है।
◆ दादा जी एक दिन खलिहान में रात को सोए हुए थे कि साही संतरित भूत लाठी लेकर आया और उसने दादा जी को पीट-पीटकर मार डाला।
◆ तर्कसंगत तथ्य तो शायद यही होगा कि दादा जी की गांव के ही किसी अन्य व्यक्ति से अवश्य ही दुश्मनी रही होगी और उसने साही भूत का मनोवैज्ञानिक बहाना निर्मित कर उन्हें मार डाला हो।
◆ सच्चाई चाहे जो भी हो, इस भुतही प्रक्रिया ने मेरे खानदान के हर व्यक्ति को घनघोर अंधविश्वास के गर्त में धकेल दिया। परिणामस्वरूप घर में भूत बाबा की पूजा शुरू हो गई।
◆ भुतहे वातावरण में लेखक का जन्म :- आजमगढ़ जिले के धरमपुर नामक गांव में 1 जुलाई, 1949 को हुआ।(डॉ. तुलसीराम का जन्म)
◆ लेखक की दादी के बारे में :-
● लेखक की दादी का नाम :- मुसड़िया
● सौ वर्ष से भी ज्यादा जिन्दा रही।
● उसके चेहरे तथा बाँहों से लटकते हुए चिचुके चमड़े उसकी लम्बी उम्र को प्रमाणित करते थे।
● कि मेरी दादी ने कौआ का मांस खाया है, इसलिए वह मरती नहीं है।(गांव वालों का कहना)
◆ गांव में यह किंवदंती फैली हुई थी कि कौवे का मांस खाने वाला बहुत दिन तक जिन्दा रहता है।
◆ लेखक के पिता का नाम :- तेरसी (पक्ष के त्रयोदशी के दिन जन्म लेने के कारण)
● मछली मारने में महारत (किसी भी जलस्रोत से बड़ी आसानी से मछलियां मार लाते थे।)
● ‘मछरमरवा’ के रूप में (पौराणिक ख्याति)
● कट्टर शिवभक्त
◆ लेखक की माता का नाम :- धीरजा
◆ एक दलित खेत मजदूर और मजदूरनी की आकांक्षा इससे ज्यादा और क्या हो सकती थी?
◆ लेखक पैदा हुआ उनके पिता जी गोद में लेकर गांव से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर एक शिव मंदिर, जिसे शेरपुर कुटी कहते थे पहुंचे और मंदिर के महंत बाबा हरिहर दास से आशीर्वाद देने के लिए विनती की।
◆ बाबा हरिहर दास बड़े उदार पुरुष थे।
◆ लेखक का नाम तुलसी राम नाम किसने रखा ?:- बाबा हरिहर दास
◆ बाबा का कहना था कि तुलसी दास रामभक्त थे। अतः यह लड़का भी बड़ा होकर तुलसी राम के रूप में रामभक्त होगा।
◆ पिता जी ने घर के पास एक नया पीपल का पेड़ लगाया और उसकी पूजा शुरू कर दी।
◆ शनिवार के दिन वे पीपल पर जल चढ़ाते और शाम को घी का दीया जलाते।
◆ दादा का लगाव लेखक पर बढ़ता गया।
◆ लेखक तीन साल के हुआ तब गांव में चेचक की महामारी आई।
◆ लेखक चेचक से मरणासन्न हो गये। घर में स्थानीय ग्रामीण देवी-देवताओं की पूजा शुरू हो गई।
◆ गांव में दलितों के देवी-देवता थे :-
● देवी का नाम :- चमरिया माई
● देवता का नाम :- डीह बाबा
◆ चमरिया माई देवी और डीह बाबा देवता :-
● सूअर तथा बकरे की बलि दी जाती थी।
● हलवा-सोहारी’ (पूड़ी), ‘धार’ तथा ‘पुजौरा’ भी चढ़ाया जाता था।
◆ एक लोटा पानी में कुछ जायफल, छुहारा, लौंग आदि मिला दिया जाता, जिसे ‘धार’ कहते थे।
◆ एक मुट्ठी जौ का आटा ‘पुजौरा’ कहलाता था ।
◆ मटर वाले भुतहे खेत के पास :-
● झाड़ियों वाले टीले पर चमरिया माई का स्थान। ● कुम्हार के आवां में पके मिट्टी के कुछ हाथी और घोड़े रखे हुए थे।
● हाथी – घोड़े गांव के ब्राह्मणों के घरों के पास डीह बाबा के स्थान पर भी रखे हुए थे।
◆ घर वाले भूत की भी पूजा करते थे, किन्तु गांव में चमरिया माई या डीह बाबा की तरह उसका कोई स्थान निर्धारित नहीं था ।
◆ भूत किस पेड़ पर रहता था? :- दौलताबाद नामक गांव के बहुत पुराने पीपल पर (धरमपुर गांव के दक्षिण-पश्चिम कोण की दिशा में)
◆ शीतला माई :-
● मंदिर :- धरमपुर गाँव से करीब बीस किलोमीटर पश्चिमोत्तर में निजामाबाद कसबे के पास था।
● चेचक निकलने पर मनौती
● सुअर के बच्चे की बलि
● हलवा-सोहरी’ भी चढ़ाई जाती थी।
● मंदिर में वेश्याओं का नृत्य भी कराया जाता था।
◆ चमरिया माई की अटूट भक्तिन :- बुढ़िया दादी
◆ बुढ़िया दादी कंड़े की आग में घी डाल-डालकर ‘जय चमरिया माई, ‘जय चमरिया माई’ की बार-बार रट लगाते हुए अगियारी करती रहती थी।
◆ अंततोगत्वा चेचक की आवश्यक बीमारी वाली अवधि समाप्त होने के साथ मैं ठीक होने लगा। घर वाले अटूट विश्वास के साथ कहते कि उनकी पूजा-पाठ से जिन्दा बच गया ।
◆ इस बीच विभिन्न मनौतियों में सूअरों, बकरों की बलि में भैंसा भी शामिल हो चुका था।
◆ चेचक का प्रकोप हटते ही लेखक के पूरी देह पर गहरे गहरे घाव के दाग पड़ गए।
◆ गांव में लोहार अनाज से मिट्टी या कंकड़ निकालने के लिए लोहे की पतली चद्दर काटकर उसे बड़ी चलनी का रूप देते थे और उसकी पेंदी में पतली छेनी से सैकड़ों छेदकर देते थे, जिसे ‘आखा’ कहते थे। आखा की पेंदी का बाहरी हिस्सा छेनी के छेद से खुरदरा हो जाता था।
◆ लेखक का चेचक से चेहरा किस प्रकार हो गया था? :- आखा के बाहरी हिस्से जैसा
◆ मेरे शेष जीवन पर अत्यंत दूरगामी प्रभाव डालने वाली घटना घटी चेचक से मेरी दाईं आंख की रोशनी हमेशा के लिए विलुप्त हो गई।
◆ भारत के अविश्वासी समाज में ऐसे व्यक्ति अशुभ की श्रेणी में हमेशा के लिए सूचीबद्ध हो जाते हैं। ऐसी श्रेणी में मेरा भी प्रवेश मात्र तीन साल की अवस्था में हो गया।
◆ गांव में अपशकुन की श्रेणी में आने वाले व्यक्ति :-
● एक आंख से काना व्यक्ति ( जिसमें स्वयं लेखक)
● अस्सी वर्ष के बूढ़े ब्राह्मण जंगू पांडे।( वे जीवनपर्यन्त कुंआरे रह गए थे।)
● बुढ़िया ब्राह्मणी ( निःसंतान विधवा पंडिताइन)
◆ तीन वर्ष के शैशव काल में जब ‘अशुभ- अपशकुन” की श्रेणी में मेरा प्रवेश हुआ तो भारत की आजादी के पांच साल बीत चुके थे; अर्थात् सन् 1952 का साल अपनी चरणसीमा की ओर बढ़ रहा था।
◆ पांच भाइयों में मेरे पिता जी सबसे छोटे थे।
◆ सभी का एक संयुक्त परिवार था, जिसमें छोटे-बड़े लगभग पचास व्यक्ति एक साथ रहते थे।
◆ पिता जी के बीच वाले भाई वरीयता क्रम में तीसरे नम्बर पर थे, अत्यंत क्रोधी एवं क्रूर पुरुष थे। उनका नाम :- नग्गर
◆ नग्गर के दो बेटे लेखक को कनवा कनवा कहकर पुकारते थे।
◆ मैं उस भारी- भरकम संयुक्त परिवार का सबसे छोटा सदस्य था।
◆ दादी रात को भी मुझे अपने पास सुलाती और हमेशा मेरे मुंह पर हाथ फेरते हुए चमरिया माई की विनती करती रहती।
◆ पिता जी के बीच वाले कटु ह्रदयी भाई का नाम :– नग्गर (घर में किसी बात से नाराज होते तो तुरंत खाना-पीना छोड़ देते थे। एक तरह से वे गांधीवादी अनशन पर बैठे जाते। )
◆ नग्गर के दोनों बेटे भी सही अर्थों में इस आतंक के उत्तराधिकारी थे। ये बाप-बेटे जब कभी अच्छे मूड में होते, तो मुझे पास बुलाते और जिस आंख से मैं देख सकता था उसे हाथ से बंद करा कराकर मेरे सामने अपनी उँगलियां फैलाकर गिनने के लिए कहते। ऐसी स्थिति में मुझे धुंधला-सा दिखाई पड़ता था जिसके सहारे मैं विभिन्न उंगलियों को गिनकर बता देता और वे प्रसन्न हो जाते। इस प्रसन्न मुद्रा में वे हमेशा थाबाशी के रूप में कहते : “कनवा बड़ा तेज हौ।”
◆ अत्यंत मानसिक पीड़ा होती थी, किन्तु उस धुंधली गिनती से पीछा छुड़ा लेने की हिम्मत नहीं पड़ती। यह क्रम वर्षों तक चलता रहा।
◆ इस संदर्भ में मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि इस धुंधली गिनती की परीक्षा से उत्पन्न पीड़ा मेरे जीवन की पहली मानसिक पीड़ा थी। अशुभ-अपशकुन वाली पीड़ा की अनुभूति कुछ देर से आई । इन्हीं पीड़ाओं में मेरा सारा बचपन विलुप्त हो गया और मैं अल्पायु में ही अत्यंत संवेदनशील बन गया।
◆ दादी के ये संस्मरण उसकी शतकीय उम्र को देखते हुए सम्भवतः सन् 1860 या 70 के दशक के मालूम पड़ते हैं।
◆ दादी ने बताया कि जब वह ब्याह कर हमारे गांव आई तो देखा कि गांव में किसी की गाय, भैंस या बैल मर जाता तो पास स्थित जंगल में ले जाकर उसका चमड़ा निकाला जाता फिर उसके बाद गंडासे और कुल्हाड़ियों से काट- काटकर उसका मांस सारे दलित बांस से बनी हुई टोकरियों में भरकर घर लाते। मांस काटने का काम प्रायः महिलाएं करती थीं।
◆ दादी यह भी बताती कि जिस समय कोई चमार पुरुष मरे हुए जानवर का चमड़ा निकालना शुरू करता, अचानक सैकड़ों की संख्या में वहां गिद्ध मंडराने लगते तथा दर्जनों कुते आकर भौंकने लगते थे। कुछ सियार भी चक्कर मारते किन्तु कुत्तों और महिलाओं की उपस्थिति को देखते हुए वे पास नहीं आ पाते।
◆ दादी मांस के कुछ हिस्से को आवश्यकतानुसार तुरंत पकाती किन्तु अधिकांश बचे हुए कच्चे मांस को कई दिन तक तेज धूप में सुखाती। खूब सूख जाने पर मांस को कच्ची मिट्टी से बनी कोठिली में रखकर बंद कर देती।
◆ मरे हुए इन पशुओं के मांस को ‘डांगर’ कहा जाता था ।
◆ आजादी के बाद चमारों ने डांगर खाना बंद करने का अभियान चलाया। यह अभियान मूल रूप से बाबा साहेब अम्बेडकर ने चलाया था ।
◆ बारहगांवा में जगजीवन राम काफी लोकप्रिय थे।
◆ डांगर विरोधी अभियान की सफलता के बावजूद किसी-किसी गांव में कई एक चोरी-छिपे डांगर लाकर खाया करते थे। किन्तु पकड़ लिये जाने पर उनका मामला चौधरी के पास लाया जाता था।
◆ आजादी के पूर्व चौधरी चुने गए थे :- लेखक सबसे बड़े चाचा सोम्मर (जीवनपर्यन्त चौधरी बने रहे)
◆ बारहगांवा से किसी भी मामले के आने के बाद बुलाई गई। पंचायत हमारे घर के सामने स्थित कुएं के काफी बड़े चबूतरे पर बैठकर की जाती थी । पंचायत में बारहों गांव के प्रतिनिधि आते थे, जिसके कारण भारी-भरकम भीड़ हो जाती थी। पंचायत शुरू होते ही गांजा तथा हुक्का पीने का लम्बा दौर चालू हो जाता था । स्वयं हमारे परिवार के दस लोग आला दर्जे के गंजेड़ी थे। शाम के समय सभी गांजा पीते और मुझे बार-बार पुआल की रस्सी की बड़ी-सी गांठ बनाकर उसे जलाना पड़ता। जब जलकर वह लाल हो जाती तो उस धधकती आग को गांजे से भरी पड़ता था। लगभग
◆ पांच साल की उम्र से ही रस्सी की गांठ जलाने( चिलम के ऊपर रखना के लिए) की मेरी नौकरी पक्की हो गई थी। इस काम से मुझे बड़ी नफरत थी किन्तु मजबूरी में करना पड़ता था। नफरत का सबसे बड़ा कारण था, किसी भी प्रकार के धुएं से मेरा दम घुटता था। मेरे बड़े होने पर इसकी पहचान एक एलर्जी के रूप में की गई।
◆ यौन संबंध से जुड़ी युवती के पूरे परिवार को ‘कुजाति’ घोषित कर दिया जाता था।
◆ कुजाति का मतलब :- , उसका हुक्का-पानी बंद अर्थात् सम्पूर्ण रूप से बारहगांवा द्वारा बहिष्कार।
◆ सन् 1950 के दशक में ऐसी पंचायतों का दलितों के बीच काफी बोलबाला था, किन्तु 1960 के दशक से धीरे- धीरे ये परम्पराएं विलुप्त होने लगीं।
◆ पिता जी के दूसरे नम्बर वाले भाई का नाम :-मुनेस्सर
तीसरे वाले भाई का नाम :- नग्गर (गुस्सैल)
◆ मुनेस्सर और नग्गर उत्तर प्रदेश में प्रचलित प्रसिद्ध ‘शिवनारायण पंथ’ के ‘धर्मगुरु थे।
◆ मुनेस्सर चाचा कलकत्ता की एक जूट मिल में नौकरी करते थे।
◆ शिवनारायण पंथ के गुरू साल इन तीन अवसर पर आते :- होली, दीवाली तथा कृष्णजन्माष्टमी के दिन ( इन समारोहों को ‘गादी लगाना’ कहा जाता था।)
◆ हस्तलिखित पांडुलिपि लाल कपड़े में रखी हुई थी, जिसे ‘अन्यास’ कहा जाता था।
◆ किसी शिवनारायण पंथी की मृत्यु हो जाने पर हिन्दुओं की तरह उसकी लाश को जलाया नहीं जाता, बल्कि मुसलमानों की तरह दफनाया जाता था या गंगा नदी में बहा दिया जाता था।
◆ रास्ते में पांच जगह लाश को जमीन पर रखकर एक विशेष भजन गाया जाता जिसे ‘परवाना’ कहते थे।
◆ गेहूं के दाने को ‘बहुरी’ कहा जाता था।
◆ ‘बहुरी भुजाने’ का मतलब :- विपक्षी के सगे-संबंधियों की मृत्यु कामना।
◆ शिवनारायण पंथ की सबसे बड़ी विशेषता :- इसके संस्थापक शिवनारायण स्वयं उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के एक क्षत्रिय थे, किन्तु उनके अनुयायी सिर्फ दलित जाति के लोग बने ।
◆ शिवनारायण पंथी बन जाने पर उस व्यक्ति को ‘गुरुमुख’ कहा जाता था ।
◆ मुन्नर चाचा के संबंध में :-
● पिता जी के चौथे बड़े भाई
● समन्वयवादी किस्म के व्यक्ति
● परिवार का मालिक
● घर का हिसाब-किताब करते
● भूत-पिशाच में बहुत विश्वास
● चमरिया माई के भक्त
● पुजैया आयोजन ( मरिया माई तथा डीह बाबा में) का नेतृत्व करने वाले 【 यह आयोजन साल में गर्मी के दिनों में किया जाता। 】
* पुजैया :- आम पूजा से भिन्न पूजा
◆ पुजैया में भतुआ (एक प्रकार का कद्दू) का तोड़ा जाना सम्भवतः नरबलि का प्रतीक होता था।
◆ दलितों में पासी जाति के लोग सूअर पालते थे।
◆ लेखक के गांव में पासी जाति नही थी।
◆ सूअरों को रखने के निवास को ‘खोभार’ कहते थे।
◆ जिस तरह उस जमाने में सवर्ण घरों की कन्याएं विवाह के बाद विदा होकर डोली में बैठकर ससुराल जाते समय रोती-चिल्लाती तथा रुदन गायकी करती रहती थीं, ये सूअर भी वैसे ही मानव कथों पर काड़ी में बंधे तथा उल्टे लटके हुए रास्ते भर चिल्लाते रहते थे।
◆ दो फीट लम्बी अत्यंत नुकली लोहे की सरिया जिसे ‘हिकना’ कहते थे।
◆ अरहर का डंडा को ‘रहना’ कहा जाता था।
◆ गांव में जब भी सूअर की बलि या बिना बलि वाला सूअर मारा जाता, यह एक किलो की पूंछ चौधरी के नाम पर हमारे परिवार को मुफ्त में मिलती थी।
◆ सुअर की पूंछ चौधरी चाचा की बारह गांवों में विशिष्ट प्रतिष्ठा और उनकी न्यायायिक भूमिका की मान्यता का प्रतीक थी।
◆ लेखक के परिवार लोग आसनसोल और कलकत्ता में खानों और मिलों में काम करते थे।
◆ पूर्वोक्त शिव मंदिर के पास स्थित प्राइमरी स्कूल में मुझे चिट्ठी पढ़ने लायक बनाने के उद्देश्य से भेजा जाने लगा ।(1954 में ,पांच साल की उम्र में)
?? 2. मुर्दहिया तथा स्कूली जीवन ??
◆ लेखक को स्कूल ले जाने से पहले लेखक के पिता जी ‘साइत’ यानी ‘शुभ’ दिन का मुहूर्त किसे पूछा.? :- गांव के अमिका पांडे को
◆ अमिका पांड़े शादी-विवाह से लेकर फसल बोने तथा काटने तक की साइत बताने के लिये मशहूर थे।
◆ अमिका पांड़े का यह रहस्यमयी पतरा एक छपा हुआ पंचांग था जो वाराणसी से हर साल प्रकाशित होता था।
◆ अमिका पांडे ने पतरा देकर लेखक का स्कूल में जाने का दिन मंगलवार तय किया।( हिन्दू रीति से साढ़ का महीना था। )
◆ लेखक की स्कूल का नाम :- ‘प्राइमरी पाठशाला, शेरपुर कुटी (पूर्वोक्त शिव मंदिर के पास स्थित )【 लेखक के गांव से डेढ़ किलोमीटर दूर 】
◆ अध्यापक मुंशी रामसूरत लाल ने लेखक की जन्म तारीख 1 जुलाई, 1949 प्रवेश फॉर्म में अंकित की। (सन् सही है तारीख अनुमान से की )
◆ उस समय के अध्यापक बरसात बताने पर हर का जन्मदिन एक जुलाई, (जैसे लेखक का लिखा) जाड़ा बताने पर एक जनवरी तथा गर्मी बताने पर एक मार्च लिख देते थे।
◆ लेखक की पहली कक्षा में कुल 43 बच्चे थे
(जिनमें तीन लड़कियां और 40 लड़के)
◆ लेखन का स्थान पहली कतार में रोल नम्बर पांच के साथ होता था।
◆ लेखक सहपाठी के नाम :-【सभी दलित 】
● चिखुरी
● रमझ
● बाबूराम
● यदुनाथ
● मुल्कू
● रामकेर
● दलसिंगार
● जग्गन
● रामनाथ
● बिरजू
● बाबूलाल
● मेवा
◆ मुंशी रामसूरत लाल दलित बच्चों को ‘चमरकिट’ कहकर अपना गुस्सा प्रकट करते।
◆ गुल को मिट्टी से ही बनी एक घरिया में घोल दिया जाता, जिसे पोचारा कहते थे।
◆ एक बड़ी शीशी को चुल्ला कहते थे, जिससे पोचारा लगाने के बाद पटरी को चुला जाता था।
◆ पटसन के सूखे सफेद डंठलों को ‘लग्गा’ या ‘संठा’ कहा जाता था ।
◆ लेखन-पठन सामग्री के रूप में पहली कक्षा में मेरे पास यह सामान थे :-
● एक लकड़ी कि पटरी
● एक घरया दूधिए का घोल
● एक नरकट की कल
● एक भरुकी पोचारा
● एक चुल्ला
● रंगबिरंगे लगे
◆ लेखक सहपाठी छात्र संकठा सिंह की सहायता से क, ख, ग, घ,.. लिखना सीख गया।
◆ संकठा सिंह मेरे गांव के पूरब में करीब तीन कि.मी. दूर स्थित बारी गांव के एक बड़े क्षत्रिय जमींदार के बेटे थे।
◆ मेरे लिये कक्षा एक में संकठा सिंह मुंशी जी से कहीं ज्यादा सफल शिक्षक सिद्ध हुए।
◆ संकठा सिंह ने इस पतली दुधिया को गाढ़ा बनाने के लिये कविता शैली में एक ‘मंत्र’ सिखाया, जिसे वे मेरे साथ गाते थे।
● यह मंत्र थाः ‘ताले के पानी पताले जो,
सेर भर दुधिया मोरे में आ जो’
◆ कक्षा दो में मंत्र जाने के लिये मुंशी जी ने हर बच्चे से दो रुपया ‘पसकराई’ यानी पास कराने का घूस लिया। यह दो रुपया मुझे बड़ी मुश्किल से घर से प्राप्त हुआ।
◆ हमारे स्कूल में कुल पांच अध्यापक थे :-
● परशुराम सिंह (हेडमास्टर) ।
● मुंशी रामसूरत लाल
● वंशी पांडे
● हरी सिंह
● बलराम सिंह
◆ कक्षा तीन में मेरे घर वालों ने दो रुपया पसकराई देने से मना कर दिया। परिणामस्वरूप मुंशी जी ने मुझे फेल कर दिया।
◆ यह खबर ‘बाबू साहब’ बलराम सिंह को जब मालूम हुई तो उन्होंने मुंशी जी को बहुत डांटा।
◆ विशेष रूप से गणित में मुझे बहुत रुचि थी। स्कूल में हर साल 15 अगस्त और 26 जनवरी के दिन अनेक खेल-कूद में एक खेल ‘गणित दौड़’ भी की जाती थी। इसमें भाग लेने वाले विद्यार्थी कक्षा दो से पांच तक के होते थे। इसके लिये बच्चों को लगभग 100 गज की दूरी पर खड़ा करके गणित का एक टेढ़ा सवाल पूछा जाता था और जो बच्चा सवाल का उत्तर उस दूरी को तय कर सबसे पहले दौड़कर देता उसे प्रथम पुरस्कार मिलता।
◆ इस प्रश्न का उत्तर हमेशाबिना किसी लेखन सामग्री का सहारा लिये सिर्फ जबानी देना पड़ता था, जिसे ‘मेण्टल’ कहा जाता था।
◆ मैं गणित दौड़ में हमेशा प्रथम आता था जिसके कारण स्कूल के सारे अध्यापक मुझसे बहुत प्रसन्न रहते थे। यही कारण था कि मुझे कक्षा तीन में फेल करने पर बाबू साहब बलराम सिंह के डांटने पर मुंशी जी एक महीना बाद पुनः पास करके कक्षा चार में ले गए।
◆ सरकार ने दलितों की फीस माफ कर दी थी, फिर भी हर महीने दो ‘पैसा’ हमें चुकाना पड़ता था। अन्य सभी सवर्ण छात्रों की फीस प्रति माह ‘चवन्नी’ थी।
◆ पचास पैसे के सिक्के के बराबर तांबे का बना एक सिक्का होता था जिसके बीच में एक बड़ा गोल छेद होता था, जिसे गांवों में ‘छेदहवा’ पैसा कहा जाता था।
◆ दूसरा एक पैसे वाला सिक्का आज के रुपए वाले बड़े सिक्के के बराबर तांबे का ही बिना छेद वाला होता था, जिसे ‘डब्बल’ कहा जाता था।
◆ एक रुपए वाला चांदी का सिक्का आज के रुपए वाले सिक्के से काफी बड़ा तथा मोटा वजनी होता था जिस पर रानी विक्टोरिया का चित्र होता था। इस सिक्के को हमारे गांव के दलित ‘बिस्टौरिया’ कहते थे।
◆ लेखक की बुढ़िया दादी के पास बिस्टौरिया वाले :- सैंतीस (37) सिक्के थे।
◆ घड़े की आकृति वाले मिट्टी से बने छोटे-से पात्र, जिसे भरुकी कहा जाता था।
◆ मैं जब तीसरी कक्षा में पढ़ रहा था,( सन् 1957 में) तब दादी बीमार गयी।उसे बड़ा तेज बुखार था, जिसे वह ‘जरहंस’ की बीमारी कहती थी।
◆ फटे-पुराने कपड़ों से हाथ से सिलकर बनाए गए बिस्तर जिसे ‘लेवा’ कहा जाता था।
◆ दादी एक से दस तक गिनती अच्छी तरह से जानती थी।
◆ दादी जब भी बीमार पड़ती मैं चिन्ताग्रस्त हो जाता। वह हरदम गांव की देवी चमरिया माई को धार – पुजौरा की मनौती मनाती और घी से अगियारी करती और मैं वहीं बैठकर अक्सर मन-ही-मन मनाता रहता कि हे चमरिया माई! मैं भले ही मर जाऊं किन्तु दादी न मरे ।
◆ दादी की सम्भावित मृत्यु की कल्पना मात्र से ही मैं एकदम उदास हो जाता और ऐसे समय उसका ‘घुंटू- मुंटू’ मुझे बहुत याद आता था।
◆ घुंटू-मंटू छोटे बच्चों को बहलाने का एक खेल होता था, जिसके तहत दादी लेटकर अपने दो घुटनों को मोड़कर मुझे बैठा लेती और झूले की तरह आग पीछे झुलाते हुए एक छोटी-सी काव्यमय कहानी गाती जाती।
◆ दादी की कहानी इस प्रकार थी: ‘राजा रानी आवैली, पोखरा खनावैली…… झपटो-आ लगड़ी के टांग धड़के रहरी में पटको रहरी में पटको ।”
◆ रोते हुए छीटे बच्चे को चुप कराने के लिए एक अन्य अति लघुकथा गई जाती थी, जो इस प्रकार थी “कड़ा कड़ा कौआ, नेपाल क बेटउवा, नेपाल गइलै डिल्ली, उठाइके लिअउलै पिल्ली, खेलावा हो कौआ ।’
◆ ‘अक्का-बक्का’ खेल में दो या दो से ज्यादा बच्चे गोलाकार रूप से बैठते और अपने दोनों हाथों की सभी उंगलियों को नीचे कि तरफ खड़ा करके जमीन पर रख देते थे। कोई एक बच्चा अपनी मुट्ठी बांधकर सिर्फ तर्जनी उंगली को अन्य बच्चों की हथेली के उल्टे भाग पर लघुकथा के हर शब्द गाने के बाद छूता जाता और जिसके ऊपर कथा का अंतिम शब्द समाप्त होता, उसे उसी क्रम में वही कथा दोहरानी पड़ती थी।
● यह कथा इस प्रकार थी- “अक्का बक्का तीन चलक्का, लउवा, लाची चन्ना काठी, चनना में का बा, मकई क लावा, आवा हो बिलार हमरे घरवा में गावा, घरवा में गावा।”
◆ हिंगुहारा यानी हींग बेचने वाला।
◆ हिंगुहारे अपने पुराने ग्राहक के घर के सामने खड़ा होकर गाते हुए पैसा मांगता। वह जगलू नामक ग्राहक को साल भर पहले हींग देकर गया था तो उसके घर के सामने इस तरह गाता : ‘हे जगलू के माई, काम धाम बंद करा हींग के पइसा खर्र करा’।
◆ हिंगुहारे ने मुन्नर चाचा से कहा कि दादी को तुरंत अस्पताल ले जाया जाए अन्यथा मर जाएगी।
◆ हमारे गांव से करीब सात किलोमीटर दूर बरहलगंज नामक छोटे से बाजार के पास एक दो कमरे वाला छोटा-सा अस्पताल था, जिसमें मात्र एक आधुनिक डॉक्टर होता था।
◆ एक ढीली चारपाई, जिसे झिलंगा कहते थे
◆ ‘हिंगुहारा( हींग बेचने वाला) के संबंध में:-
● धोती कुर्ता पहनता था
● सिर पर गांधी टोपी लगाता था, थोड़ा टेढ़ा करके।
● उसकी बड़ी तोंद भी थी, इसलिए टोपी खूब जमती थी।
◆ वह देखने में पुराने कांग्रेसी नेता सीताराम केसरी के बड़े भाई जैसा लगता था।
◆ हिंगुहारा की यह जादुई धोकरी ठीक वैसी ही होती जैसी कि सारंगी बजाकर भजन गाते गांव-गांव भीख मांगने वाले गेरुवाधारी जोगीयों की।
◆ लेखक गांव में साल भर में सिर्फ एक बार आते थे :-
● हिंगुहारा :- हींग बेचने वाले लिए
● जोगी :- न ही भीख मांगते थे(उन्हें लोग राशन आदि पहुंचा देते थे। )
◆ जोगी के संबंध में :-
● जाति :- नोनिया
● गेरुवाधारी नहीं थे
● न ही भीख मांगते थे। उन्हें लोग राशन आदि पहुंचा देते थे।
● वे एक सफेद धोती या लुंगी कमर में लपेटकर दोनों खुटों को आर-पार करके गर्दन के ऊपर बांध लेते थे।
● लम्बी-लम्बी दाढ़ी
● सिर पर बड़े-बड़े बाल थे।
● हाथ में वे हमेशापानी से भरी एक ‘तुमड़ी’ रखते थे। (तुमड़ी सूखी लौकी की जगनुमा टंगने वाली बनी होती थी, जिसे साधुओं का पात्र कहा जाता था।)
● हाथ में एक लोहे का बड़ा चिमटा होता था।
● वे किस देवता के पुजारी थे, यह किसी को मालूम नहीं था।
● घने जंगल के सुनसान में अकेले रहते ।
● उनका फक्कड़ों जैसा अत्यंत निर्भीक जीवन था।
● उन्हें लोग सिर्फ जोगी बाबा के रूप में जानते थे ●उनका असली नाम :- रामर्जीत
● जोगी बाबा भूतपूजक थे।
● हाजिरजवाब काव्य के एक अति कुशल कवि
◆ बंकिया डोम के संबंध में :-
● अस्पताल वाले वरहलगंज बाजार में रहता था।
● इसके का परिवार पेशा :- बांस के फट्टे चीर कर टोकरी, चंगेरी, डाल, मौनी, कुरुई, छिट्टा, दउरी आदि बनाकर बाजार में बेचना।
● सूअर पालन
● ‘सिंघा’ नामक वाद्य बजाने में अद्वितीय था।
( सिंघा को संस्कृत में तूर्यनाद कहते हैं। )
● स्वयं काले लोहे के पतले पत्तर से सिंघा बनाता था ।
● देखने में बिल्कुल करिया भुजंग लगता था।
● उसके कंधे पर टंगा हुआ सिंघा आधा बैठे आधा खड़े फण फैलाए सांप की तरह लगता था।
● वह भोजन के लिए युद्ध ही करता था। वह बैठकर खाता कम था, झोले में भरता ज्यादा था। इसलिए कई बार घरैता (जिसके घर समारोह होता) उससे लड़ जाते थे।
◆ चुड़िहारा :- चूड़ियां बेचने वाला
◆ कपड़हारा :- कपड़े बेचने वाला
◆ सिर्फ कपड़हारा को छोड़कर पैसों के बदले अनाज देकर अन्य फेरी वालों से सामान खरीद लिया जाता।
◆ घर में ढिबरी जलाने के लिए मिट्टी के तेल से लेकर मिर्च मसाला तक अनाज देकर ही खरीदा जाता था।
◆ बरसात के दिनों में भुखमरी की स्थिति पैदा हो जाती थी । झाडू से चूहों को मार-मारकर घर लाते। फिर मसाला डालकर उसका मांस पकाकर खाया जाता था।
◆ बरसाती मछलियां भी उस गरीबी में बड़ी राहत पहुंचाती थीं।
◆ चूहों के बिल से निकली हुई बालियों को ‘मुस्कइल’ कहा जाता था। इन्हें बेचकर हम लोग कौड़ियां खरीदकर चिभ्भी (एक तरह का जुआ) खेलते थे। इमली का चीयां (बीज) भी खरीदते थे, जो जुआ के ही काम आता था।
◆ पिता जी पूरी धोती कभी नहीं पहनते वे एक ही धोती के दो टुकड़े करके बारी- बारी से पहनते ।
◆ घर में सोने के लिए जाड़े के दिनों में घर की फर्श पर धान का पोरा अर्थात् पुआल बिछा दिया जाता था। उस पर कोई लेवा या गुदड़ी बिछाकर हम ओढ़कर सो जाते।
◆ मुर्दों-सा लेटे हुए हमारे नीचे पुआल, ऊपर भी पुआल और बीच में कफन ओढ़े हम सो नहीं रहे बल्कि रात भर अपनी अपनी चिताओं के जलने का इंतजार कर रहे हों।
◆ मेरे वही अति गुस्सैल नग्गर चाचा ने उस चिट्ठी को सुभगिया के घर ले जाने के लिए कहने से पहले मुझसे कहा, ” तनि पढ़ि के देख त रे, पढ़ि सकत हउवे कि ना।”
◆ मैं तीसरी कक्षा में पढ़ रहा था। मैंने धीरे-धीरे पोस्टकॉर्ड पर लिखी आधी चिट्ठी पढ़ दी। यह पहला अवसर था।(1957) – यह चिट्ठी सुभगिया की थी।
◆ सुभगिया के संबंध में :-
● जलंधर नामक बूढ़े दलित की जवान बेटी
● वह बड़ी सुंदर थी।
● कुछ माह पूर्व उसका गौना हुआ था।
● पति का नाम :- बिसराम
√ कलकता के सियालदह स्टेशन के आसपास घोड़े की तरह खींचने वाला ठेला रिक्शा खींचता था।
* ठेले को बंगाल में ‘टाना रिक्शा’ कहते हैं।
√ कलकत्ता के शामबाजार नामक मोहल्ले में किराये की एक बाड़ी रहते थे।
* बाड़ी को बंगाल में ‘बासा’ कहते हैं।
◆ चिट्ठी के अंत में बिसराम ने लिखा था : – लिखता हूं खत खून से स्याही न समझना ।
मरता हूँ तेरी याद में जिन्दा न समझना ॥
(यह शायरी सुनकर सुभगिया ने समझ कि उसके पति बिसराम अब जिन्दा नहीं हैं। )
◆ सन् 1957 का वर्ष भारत के लिए दो महत्त्वपूर्ण घटनाओं के चलते बहुत चर्चा में था:-
● पहली घटना :- भारत का दूसरा आम चुनाव था।
● दूसरी घटना :- सन् 1857 के गदर की सौवीं वर्षगांठ ।
◆ वहां मेरी पुरानी नौकरी – रस्सी की गांठ जला जलाकर गांजे की चिलम में भरना भी जारी रहती थी।
◆ ब्राह्मण उस समय की दो बैलों की जोड़ी चुनाव चिह्न वाली कांग्रेस पार्टी के कट्टर समर्थक थे।
◆ मेरे सबसे बड़े चाचा बारहगांवा के चौधरी हैं।
◆ ब्राह्मणों के मुखिया :- यमुना पांडे
◆ हमारे जिले आजमगढ़ में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का बहुत जोर था तथा अधिकतर दलित कम्युनिस्ट उम्मीदवारों को वोट देते थे।
◆ मुन्नर चाचा जवाहरलाल नेहरू के भक्त थे और वे कांग्रेस को तथा घर गांव के अन्य लोग प्रजा सोशलिस्ट पार्टी को वोट देते थे।
◆ मुरली सिंह के संबंध में :-
● मुन्नर चाचा से मिलने आते थे
● एक क्षत्रिय
● अमठा के मुखिया थे (अमठा गांव के पश्चिम में
स्थित था)
● इनका गांजा लेखक के गांव में बिकता था।
( इसी कारण मुन्नर चाचा की उनसे काफी दोस्ती हो गई थी।)
● अमठा के एक वकील थे जो रोज आजमगढ़ (करीब 18 मील दूर) साइकिल से कचहरी आते-जाते थे।
◆ मुन्नर चाचा हमारी बस्ती के असली ‘राष्ट्रीय नेता’ बन गए थे।
◆ लेखक समाजवाद तथा सोवियत संघ से आठ वर्ष की उम्र में प्रभावित हुआ थे।
◆ आजमगढ़ के दो कम्युनिस्ट :-
● नेता चंद्रजीत यादव
● सुरजन राम 【आजमगढ़ के एक प्रख्यात दलित नेता 】
◆ सनई के संबंध में :-
● गांव से कोई पंद्रह मील दूर सोढरी गांव करने वाला दलित
● शिवनारायनी पंथ वाले मुनेस्सर चाचा का चेला
● बाम्बे की किसी सूती मिल में काम करता था।
◆ सनई ने कहा लाल झंडे वाला एक नेता डंगरिया है, जो मजदूरों की हड़ताल कराकर मालिकों की नाक में एकदम फेर (फायर) कर दिया था। उसी का एक संगी नमरिया है, वह भी बड़ा फैरबाज है।
* सनई डांगे को डंगरिया और नम्बूदरीपाद को नमरिया कहता था।
◆ अंग्रेजों के जमाने वाली एक लाल सी मिनी बस जिसे मेरे पिता जी ‘लोरी’ कहते थे।
◆ आसमान से अचानक चिराग का जलता सफेद छोटा-छोटा या एक फीट लम्बाई वाला पुंज को गांव वाले ‘लूक’ या ‘लुक्का’ (शायद उल्का) कहते थे।
◆ धोकरकसवा बाबा बच्चों को पकड़कर अपनी धोकरी (यानी भिखमंगे जोगीयों के कंधे पर लटकने वाला बोरीनुमा गहरा झोला) में कसकर बांध देते हैं जिससे वे मर जाते हैं
◆ लकवा बाबा एक जादुई कही सुंघाकर बच्चों को बेहोश करके मार डालते हैं।
◆ मुर्दहिया में गांव के मुर्दे जलाए तथा दफनाये जाते थे। यहीं गांव का श्मशान था तथा गांव के आसपास पीपल के पेड़ों पर भूतों ने अपना अड्डा बना लिया है।
◆ केवाड़ियों के नाम पर बांस के फट्ठों को कांटी ठोककर एक पल्ले को केवाड़ीनुमा बना लिया जाता था, जिसे ‘चेचर’ कहा जाता था।
◆ खेती लायक जमीन को पूरे क्षेत्र का सीवान कहते थे ।जिनके अलग-अलग नाम थे:-
● हमारे गांव के सीवान क्रमशः
√ पूरब में :- मुर्दहिया
√ उत्तर में :- भर्थैया, सरदवा, टड़िया,
√ पश्चिम में :- समंडा, महदाई माई, परसा
√ दक्षिण में :- गुदिया
◆ दौलताबाद के बाद वाला पश्चिमी गांव विश्वविख्यात बौद्ध तथा कम्युनिस्ट विद्वान महापंडित राहुल सांकृत्यायन का गांव कलेला था।
◆ ग्रामीण क्षेत्रों में हैजे की महामारी आई जिसका सबसे जबर्दस्त असर पूरब में मुर्दहिया से थोड़ी दूरी पर पड़ोसी गांव टड़वां में पड़ा।
◆ हमारी मुर्दहिया और टड़वां के बीच से होकर वह नाला बहता था जो प्राइमरी स्कूल से होकर आगे बढ़ते हुए लगभग पांच मील दूर स्थित मंगही नदी में मिल जाता था।
◆ दादी कहती थी कि महामारी में मरने वाली औरतें नागिन बनकर घूमती हैं। उनके काटने से कोई भी जिन्दा नहीं बचता।
◆ जब मैंने काफी बड़ा होकर महाभारत” पढ़ा तब जाकर यह गुत्थी सुलझ पाई, वह भी यह जानने पर कि पौराणिक वीर अर्जुन के पौत्र राजा परीक्षित के बेटे का नाम जनमेजय था, जिन्होंने सांपों को मारने का एक “सर्पयज्ञ” कराकर उन्हें हवनकुंड में जला दिया था। तभी से धरती के सारे सांप जनमेजय का नाम सुनते ही अपनी जान बचाने के लिए भाग जाते हैं। जनमेजय ने सांपों से क्रुद्ध होकर इस सर्पयज्ञ को इसलिए कराया था क्योंकि तक्षक नाग के काटने से उनके पिता परीक्षित की मृत्यु हो गई थी।
◆ दादी इसी पौराणिक गाथा को सम्भवतः अपनी दादी से सुनकर जनमेजय का तद्भव अपनी भाषा में ‘जमेदर’ कहती थी।
◆ मुर्दहिया के पास वाली सीवान भया के घने जंगल में हमारे गांव के एक अहीर पौहारी बाबा (पावहारी बाबा) एक झोंपड़ी बनाकर रहते थे।
◆ पेड़ के नीचे मचान बनाकर पड़ोसी गांव टड़वां के एक ‘फक्कड़ बाबा’ रहते थे।
◆ मिट्टी से गोल दीवार उठाकर पानी की सतह तक लाकर उसके ऊपर का हिस्सा हाथ से लीपकर चिकना बना दिया जाता है तथा गोल गइटे से छोटी हंडिया से पानी निकालकर खाली कर दिया जाता है। इसी को अखन्हा बांधना कहते हैं।
◆ लेखक को सभी लोग में ‘कनवा’ कहते थे।
◆ दादी कहती कि भूतों की पोखरे पर जब पंचायत होती हैं, तो उल्लू कुडुकते हुए शंख बजाते हैं जिससे पता चलता है कि ब्राह्मण भूतों की पंचायत हो रही है।
◆ हमारे गांव के पेड़ों पर एक चिड़िया महोखा जैसी लगती थी, वह खो-खो करते हुए बोलती थी जिसे औरतें मरखउको कहती थीं। यह मरखउकी भी बड़े अपशकुन की प्रतीक थी।
◆ इस मामले में गांव के कौए पार्ट टाइम अपशकुन थे। जब कभी कोई उड़ता हुआ कौआ किसी को पैरों या चोंच से मार देता था, तो इसे भी अपशकुन माना जाता।
◆ गाँव में पांचों असली अपशकुन :-
● निःसंतानजंगू पड़े
● विधवा पंडिताइन
● पोखरे वाला उल्लू,
● खो-खो करने वाली मरखउकी चिड़िया
● लेखक स्वयं
◆ पलाश की भी छह-सात इंच लम्बी चिपटी फलियां जिन्हें दादी टेसुल कहती थी।
◆ पलाश के बीज पेट के कीड़ों को मारने की एक अचूक दवा थी।
◆ दालचीनी तथा बांस का सींका पीसकर ललाट पर लगाने से सिरदर्द बंद हो जाता था।
◆ दादी पैसों की रेजगारी को भी सींग में रखती थी।
◆ मुर्दहिया के संदर्भ में सन् 1957 का ‘भादों’ का महीना मेरे जीवन का एक विशेष यादगार वाला महीना है। उस समय हिन्दू धर्म के अनुसार ‘खरवांस’ यानी बहुत अपशकुन वाला महीना था।
◆ इस बीच मेरे पिता जी जिस सुदेस्सर नामक ब्राह्मण की हरवाही करते थे, उनकी बुढ़िया मां मर गई। उनके ही पट्टीदार अमिका पांडे ने ‘पतरा’ देखकर बताया कि अभी पंद्रह दिन खरवांस हैं, इसलिए मृत मां का दाह संस्कार नहीं हो सकता ।
◆ जब मैं पंद्रह वर्ष की अवस्था में हाई स्कूल पास करने के बाद पढ़ाई छूट जाने के कारण घर से 1964 में भागा तो उसी मुर्दहिया से होकर अंतिम बार गुजरा था। वैसे तो मैं अकेला ही था, किन्तु हकीकत तो यही थी कि चल पड़ी थी मेरे साथ मुर्दहिया भी। जब मुझे यह मालूम हुआ कि दुनिया में दुख है, दुख का कारण है और उसका निवारण भी, तो ऐसा लगा कि सत्य को ढूंढ़ने से पहले तथागत गौतम बुद्ध कभी न कभी मेरी मुर्दहिया से अवश्य गुजरे होंगे ।
?? 3.अकाल में अंधविश्वास ??
◆ किसी भी साधु या लम्बी दाढ़ी वाले व्यक्ति को देखते ही लोग इधर-उधर भागने लगते थे। स्कूल जाने वाले बच्चे सबसे ज्यादा डरते थे। मैं उस समय कक्षा चार में पहुंच गया था।
◆ पुड़िया में स्वाही बाजार में बिकती थी जिसे पानी में घोलकर लिखा जाता था।
◆ गरीब बच्चे घर में चावल को तवे पर खूब जलाकर कोयले जैसा कर देते थे, फिर उसे सिल पर लोढ़े से पीसकर पाउडर बनाकर पानी में घोलकर स्याही बना लेते थे।
◆ गांवों में प्रभातफेरी निकाली जाती :-
● 15 अगस्त
● 26 जनवरी
◆ प्राइमरी स्कूल में गांधी टोपी रोज पहनकर आना पड़ता था।
◆ मिसिर बाबा के संबंध में :-
● लेखक का सहपाठी
● उम्र में काफी बड़े 9 वर्ष के पढ़ने आये थे
● परसपुर गांव का
● लेखक को पानी पिलाते थे ( मुंशी जी इसको कुएं से बाल्टी खींचकर पानी पिलाने को कहते थे।)
● एक विचित्र किस्म के व्यक्ति थे।
● पिता जी का बचपन में ही देहांत हो चुका था।
● उनकी एक बहन और चार भाई थे।
● उनके चाचा सिंगापुर में नौकरी करते थे।
● सिंगापुरी चारखाने की जांघिया तथा अधबहियां पहनकर स्कूल आते थे।
● मिसिर अक्सर मृत्युभोज के लिए जाया करते थे।
● रामलीला में मिसिर बाबा को सीता जी की भूमिका के लिए चुन लिया गया।(पाँचवें कक्षा में)
◆ हमारे साथ पढ़ रही तीन लड़कियों में एक हनौता गांव की सतिया नोनियाइन थी, जो उम्र में उनकी ही तरह बड़ी थी।
◆ स्कूल के मास्टर जी लोग ही मंदिर के बाबा हरिहर दास के सहयोग से रामलीला करवाते थे। सीता जी के वेश में साड़ी पहने मिसिर बाबा एकदम युवती कन्या जैसे दिखाई देते थे। दलित लड़कों को रावण की सेना में विभिन्न राक्षसों की भूमिका दी जाती थी। हम राक्षस बने रामलीला में रोज मरते रहते थे। बाद में रामलीला तथा मेला समाप्त होने के बाद सबसे बुरी हालत सीता जी बनने वाले की होती थी।
◆ असली सीता जी तो सिर्फ एक बार अपहृत हुई थीं, किन्तु यह रामलीला वाली सीता अनेक बार अपहृत हुई। बाद में मिसिर को समय-समय पर अपहृत होने में बड़ी ख्याति मिली।
◆ सिरगोदवा बाबा के संबंध में:-
● प्राइमरी स्कूल में पढ़ते समय का बड़ा आतंक था।
● स्कूलों में सरकार द्वारा भेजे गए चेचक का टीका
लगाने वाले कम्पाउंडर
● लोग इन टीका लगाने वालों को सिरगोदवा बाबा कहते थे।
◆ जो के सत्तू में महुवे के फूल, जिसे गोदा कहते थे, को सुखाकर थोड़ा गुड़ डालकर सान लिया जाता था। इसे लाटा कहते थे।
◆ महुवे का फूल कठजमुनियां की तरह गोल तथा बड़ी गुरिया की तरह एकदम सफेद होता था।
◆ महुवा ही एक ऐसा पेड़ होता है जिसका फूल ही फल की तरह होता है। इसी से देशी शराब भी बनाई जाती थी। किन्तु लाटा खाना एक तरह से दरिद्रता का प्रतीक था।
◆ वैदिक संस्कृत पाठशाला के संबंध में :-
● दो पक्के कमरों वाला
● इसमें दो पंडित अध्यापक थे
● बीस छात्र।
● इसके सामने एक छोटा-सा पीपल का पेड़ था।
● प्राइमरी स्कूल के चौथी और पांचवीं कक्षा के बच्चों के लिए एक विचित्र मनोरंजन का केन्द्र
◆ हाई स्कूल के संस्कृत अध्यापक चंद्रशेखर पांडे से बच्चों ने ‘पं शुद्ध वर्तते का अर्थ पूछा। उन्होंने बताया कि अशुद्धम् वर्तते का मतलब ‘गलत’ है।
◆ सवर्ण जातियों के बच्चे, मुझसे बहुत घृणा करने लगे थे, जिसका प्रमुख कारण था मेरा अछूत होना तथा ऊपर से चेचक वाला चेहरा तथा एक आंख का खराब होना।
◆ ऐसे छात्र मुझे इंगित करके बाजार में सामान बेचने वालों की बोली की नकल पर कहते : ले अमरूद ए काना ए काना। यानी एक आना का बिगड़ा हुआ रूप ‘ए काना”।
◆ पढ़ाई के दृष्टिकोण से हेडमास्टर परशुराम सिंह मेरे सबसे बड़े प्रेरणास्रोत थे।
◆ वह हैटधारी डिप्टी साहब नही थे वे स्कूल के पास वाले टड़वा गांव के तेजई सिंह नामक जमींदार थे जो सिर्फ पांचवीं तक पढ़े थे किन्तु हैट लगाकर हमेशा साहबी रोब झाड़ा करते थे।
◆ जाड़े के दिनों में हेडमास्टर साहब(बड़े जमींदार ) का गन्ना चिरैयाकोट थाना स्थित चीनी मिल में बैलगाड़ियों पर लदकर जाता था।
◆ दादी हुक्का पीने की बड़ी शौकीन थी।
◆ दादी के नुस्खे :-
● अमरूद या अमलताश की पत्ती पीसकर छानने के बाद उससे पिलाने से पेचिश की बीमारी ठीक हो जायेगी।
● दादी खुजली ठीक करने के लिए भंगरैया नामक पौधे की पत्तियां पीसकर उस पर छोपने के लिए कहती थी।
● फोड़े-फुंसी के ऊपर वह अकोल्ह के पत्ते पर मदार के दूध को पोतकर चिपकवा देती थी।
◆ बेंगही का मतलब :- खेत में बोने के लिए बीज ।
◆ जमींदार प्रत्येक साल दलितों को प्रति फसल के बोने के लिए ‘सवय्या’ पर बेंगही देते थे।
◆ सवय्या का मतलब :- यदि एक सेर बेंगही दिया गया तो फसल कटने के बाद सवा सेर अनाज लौटाना पड़ेगा ।
◆ डेढ़िया’ का मतलब :- एक सेर के बदले डेढ़ सेर वापस करना।
◆ ‘बनि’ का मतलब :- दिन भर काम के बदले एक सेर अनाज की मजदूरी।
◆ ‘कूर’ बांधने का मतलब :- किसी निर्धारित समय तथा स्थान पर जमीन पर खपड़े से एक खूब लम्बी रेखा खींच देना।
◆ चौधरानी चाची बियाना कमाने में सिद्धहस्त थी तथा गांव के अधिकतर बच्चों को वही पैदा करवाती थी।
◆ बीस ‘केड़ा’ फसल पर एक केड़ा बनि के रूप में मिलता था।
◆ ‘केड़ा’ का मतलब :- दोनों बांहों के बीच जितनी फसल अंट जाती थी, उसे एक केड़ा कहते थे।
◆ रात में सोये हुए दलित मुर्गे की आवाज के बाद बिना नींद पूरी हुए मजबूरी में जागने पर प्रतिदिन दुखित होकर उन मुर्गों को गालियां देते थे। अतः वे जमींदारों का सारा गुस्सा मुर्गों पर ही उतारकर संतुष्ट हो जाते थे। इस सन्दर्भ में राजस्थान के ग्रामीण दीवारों पर रँगी गई एक लोककला दृश्यपटल पर उभरकर सामने आती है। जिसके अनुसार मुर्गे की बांग पर प्रेमी-प्रेमिका को छोड़कर अपने घर चला जाता है और प्रेमिका गुस्से में लाल होकर मुर्गे पर तीर से निशाना साध लेती है।
◆ गांव में सिर्फ छह कुएं थे, जिनमें से सिंचाई के लिए तीन कुओं का ही उपयोग होता था, क्योंकि शेष तीन कुएं ब्राह्मणों के पानी पीने के लिए थे तथा उन्हें दलित छू नहीं सकते थे।
◆ गांव वाले कुओं को ‘इनार’ कहते थे।
◆ पानी की कमी के कारण धान के खेत, जिन्हें ‘कियारा’ कहा जाता था।
◆ कुएं से पानी निकालतीं तो दलित मजदूर एक लोकगीत गाते :-
“ऊंचे ऊंचे कुअना के नीची वा जगतिया रामा निहर के पनीया भरै, हुइ रे साँवर गोरिया”
◆ सन् 1959 की गर्मियों में :- टिड्डियों का बड़ा भारी प्रकोप।
◆ प्राकृतिक खाद्य सामग्री समाप्त हो जाती तो यह खाते :-【गर्मियों में 】
● झाड़ियों में चूहों को मारकर घर लाया जाता।
● जंगल में खरगोश तथा साही मारे जाते ।
● ताल से सेरुकी नामक पौधे की जड़ें उखाड़ ली जाती ।
● ताल के किनारे कर्मी के पौधे तथा दुधिया नामक ब लताएं होती थीं।( साग बड़ा स्वादिष्ट)
◆ प्राकृतिक खाद्य सामग्री समाप्त हो जाती तो :-
【असाढ़ का महीना】
● दो-चार पतियों के पनप जाने के बाद बैंगनी रंग के आम के पौधे बहुत मनमोहक लगते थे। इन्हें अमोला कहा जाता था। गुठलियों को आग में भूनकर खा जाते थे ।
◆ कपड़े धोने का काम धोबी ‘रेह’ से करते थे।
◆ ऊसर की एक विशेष प्रकार की भुरभुरी मिट्टी जो धरती की सतह पर धूल जैसी बिखरी होती थी, जिसमें चूने की तरह कोई प्राकृतिक रसायन मिला रहता था, उसे ‘रेह’ कहते थे।
◆ धोबी की बिटिया के न नइहरे सुख न ससुरे सुख’ अर्थात धोबी की बेटी को मायके तथा ससुराल दोनों जगह कपड़े धोने पड़ते हैं। (कहावत)
◆ मुसहरों की जीविका का मात्र एक ही साधन था— पलाश के पत्तों से पत्तल बनाकर शादी- विवाह आदि के अवसर पर खेप पहुंचाना।
◆ मुसहर इन अवसरों पर खाने के बाद फेंके गए जुठे पत्तलों से बचे हुए भोजन को झाड़-झाड़कर कपड़े बिछाकर इकट्ठा करके अपने परिवार को खिलाते थे।
◆मुसहरों मेढक तथा चूहे खाने के लिए भी जाने जाते थे।
◆ सोफी नामक नट के संबंध में :-
● तीन बड़े बेटे, एक बहु तथा दो जवान होती बेटियां थीं।
● उनकी पत्नी भी थी।
● सोफी शादी-विवाह में ढोल बजाते हुए आल्हा गाकर भीख मांगते थे।
● वे बकरा काटकर गांव में मांस भी बेचते थे।
● यह नट परिवार हमारी दलित बस्ती के पूरब में मुर्दहिया के प्रवेश क्षेत्र में झोपड़ी बनाकर रहता था।
● सोफी की बहू तथा दोनों बेटियां सौन्दर्य के मामले में अपरम्पार सम्पन्न थीं।
◆ घर में वह गुस्सैल नग्गर चाचा का छोटा बेटा, जिसका नाम कुदन था, एक अजीब भुतहे रोग से पीड़ित हो गया।
◆ ओझा के सम्बध में :-
● लेखक के रिश्तेदार
● इनका नाम :- दौलत तथा किसोर।
● ओझा के छोटे भाई :- सोखा (इसका नाम :-किसोर)
● नग्गर चाचा के दोनों बेटों की शादी इसी ओझा की दो सगी बेटियों से हुई थी।
● यह दोनों ओझैती से बहुत पैसा कमाते थे।
● यह दोनों नग्गर चाचा का छोटा बेटा का भुत भगाने आये थे।
* सोखा का अर्थ :- जादूगर
● ये दोनों ओझा सोखा ओझती के बाद चुदैल या भूत बैठाने के लिए बनारस स्थित पिचाश मोचन नामक पोखरे पर जाते थे।
◆एक अंधविश्वास के चलते लोग बत्तख नामक पालतू पक्षी को बच्चे के ऊपर बैठने पर मजबूर करते। इसमें मान्यता यह थी कि चुड़ैल भाग जाएगी।
◆ अकाल की महामारी दूसरे अंधविश्वासों का बोलबाला दलितों के लिए ‘गरीबी में आटा गीला’ करने वाला साबित होता था।
◆ लकड़ी का बना किताब रखकर पढ़ने वाला उपकरण भी, जिसे वे रीहल कहते थे।
◆ मैंने किताब का चहना पड़ा तो उस पर मोटे अक्षरों में लिखा था ‘प. ज्वाला प्रसाद शर्मा द्वारा टीकाकृत रामचरितमानस’। उस पर बम्बई का पता भी लिखा था।
◆ मुनेस्सर चाचा ने तुरंत मुझसे कहा कि बिना हाथ-पैर धोए इसे कभी नहीं छूना तथा इसे कभी जमीन पर भी नहीं रखना। हमेशा रीहल पर रखकर लोगों को गा-गाकर सुनाना। मुनेस्सर चाचा अनपढ़ थे और पढ़ नहीं सकते थे। वे कलकत्ता में रहने वाले हिन्दीभाषी लोगों को हिन्दुस्तानी कहते थे।
◆ कुएं की जगत पर सुंदरकांड लेखक पढ़ रहा तब वह चौथी कक्षा मे थे।(25-30 आदमी सुन रहे थे)
◆ सुंदरकांड के शुरू में रावण द्वारा अपहृत सीता को ढूंढने हनुमान जी के लंका जाने का वर्णन तथा सर्पों की माता ‘सुरसा’ नामक चुड़ैल से मुलाकात एवं छाया पकड़ने वाली एक अन्य राक्षसी की हत्या वाले प्रकरण थे जिन्हें सुनकर कुएं पर बैठे श्रोताओं की उत्सुकता बहुत तेज हो गई।
◆ चुड़ैल के प्रकरण से उनकी रुचि हद से ज्यादा बढ़ने लगी। जिसका मूल कारण था दलित बस्ती में पहले से ही व्याप्त चुड़ैल का आतंक।
◆ सबसे ज्यादा धनवान ब्राह्मण जमींदार निरंजन पांडे के बड़े भाई के संबंध में :-
● विसर्जन पांडे जटाधारी साधु बनकर बभनौटी से एक फर्लांग पश्चिम तरफ बरम बाबा के चौरा के पास कुटी बनाकर रहते थे।
● रूप-रंग से वे पौराणिक विश्वामित्रा की तरह लगते।
● उन्हें लोग पंडित जी के नाम से जानते थे।
● ‘बरम बाबा’ के चौरा के पास एक छोटा चबूतरा था, जिसे सत्ती माई का चौरा कहते थे।
● बरम बाबा के चौरे पर गांव के लोग सत्य नारायण की कथा का आयोजन करते रहते थे।
◆ चुल्ली नामक दलित के संबंध में :-
● दो बेटों के साथ निरंजन पांडे की हरवाही करते थे।
● चुल्ली की पत्नी का नाम :- सोमरिया( वह भी एक अनोखी महिला मजदूरिन थी। )
◆ सप्ताह के दिन के नाम वाली औरतें :- ●सोमरिया( गांव में चुगलखोरी के लिए बहुत प्रसिद्ध )
● मंगरी
● बुधिया
● बेफइया सुखिया
● सनीचरी
● अतवरिया
◆ नन्हकू पांडे के संबंध में :-
● ढोलक वादक(गाँव अकेले व्यक्ति थे।)
● लोग ढोलक बजाने के कारण उन्हें ‘मिरदंगी’ कहते थे।
● उम्र – चालीस वर्ष
● बड़ी भारी तोंद थी।
● कुंवारे व्यक्ति थे।
◆ बगल के परसपुर नामक गांव में एक विधवा युवती अपने मामा के घर आई थी। वह ब्राह्मणी भी थी।
◆ युवा ब्राह्मणों ने विधवा ब्राह्मणी का अपहरण करके मिरदंगी से जबरन विवाह करवा दें।
◆ इसके लिए करीब 20 ब्राह्मण युवक दिन के दस बजे ही लाठी-भाले लेकर परसूपुर जाकर उस औरत को जबरन उठाकर गांव में ले आए।
◆ उसे मिरदंगी के घर में बंद कर दिया गया। विवाह का मंडप उनके घर के सामने सजाया जाने लगा। उनकी शादी अमिका पांडे ही कराने वाले थे।
◆ मिरदंगी सहित अठारह ब्राह्मणों को पुलिस गिरफ्तार करके ले गई। उन सभी को दूसरे दिन आजमगढ़ जेल भेज दिया गया।
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