दी गई छवियों में संकलित सूक्तियों (उद्धरणों) के विषयवार व्यवस्थित नोट्स:
1. गुरु / शिक्षक
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अंधकार का नाश: जो गुरु अज्ञान रूपी रोग का अंजन (दवा) देकर अज्ञान के अंधकार को दूर नहीं करते, वे जन-रंजन नहीं कर पाते (अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ – हरिऔध सतसई)।
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ज्ञान का मूल्य: जो ज्ञान पैसे के लिए बिक जाता है, उसका मान घट जाता है; जो निस्वार्थ/बिना मूल्य ज्ञान देता है, वही सच्चा गुरु है (मेलाराम – शिक्षासहस्त्री)।
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आदर और हितचिंतक: कुल गुरु पिता के समान पूज्य और परम हितैषी होते हैं (तुलसीदास – रामचरित मानस)।
2. घर और परिवार
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सामाजिक यथार्थ:
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“लड़कियों का घर कहीं नहीं होता।” (प्रेमचन्द – निर्मला)
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दुनिया का दस्तूर है कि जो कमाता है, उसी का घर में राज होता है (प्रेमचन्द – सुजान भगत)।
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मनुष्य अपनों (घरवालों) के लिए ही कमाता है, पेट तो पशु भी भर लेते हैं (प्रेमचन्द – गोदान)।
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सूने घर में चमगादड़ बसेरा करते हैं (प्रेमचन्द – मेशरायलीला)।
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भेद और कलह:
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घर का भेदी लंका ढहाता है।
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जिस घर से किसी को निकाला जाए, वह बाहर जाकर भेद खोल ही देता है (रहीम – रहिमन विलास)।
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जहाँ पिता-पुत्र और भाइयों में फूट हो, वहाँ पराई लात (विपत्ति) सिर पर पड़ती है (यदुदत्त-सूक्त)।
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घर बनाम दफ्तर/मकान:
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घर और दफ्तर में उतनी ही दूरी है जितनी स्नेह और स्वार्थ में (जैनेन्द्रकुमार – सोच-विचार)।
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खुलापन चाहने वाले को मकान के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए, मकान वही है जो घिरा है (जैनेन्द्रकुमार)।
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3. चरित्र एवं चापलूसी
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चरित्र निर्माण: चरित्र की जाँच आदर्श नियमों से होती है। दरिद्रता मनुष्य में दृढ़ता, संकल्प, दया और सहानुभूति जगाकर चरित्र को पुष्ट करती है (प्रेमचन्द – प्रेमाश्रम)।
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चापलूसी का स्वभाव व खतरे:
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चापलूसी स्वार्थी, भयभीत या मान के भूखे लोग करते हैं (अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’)।
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चापलूस अत्यंत निकृष्ट शत्रु होते हैं (टैसीटस)।
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चापलूसी दिखावटी मित्रता और खोटे सिक्के के समान है, जो अंततः कष्ट देती है (सुकरात / वैल्स्थर गैरी)।
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आत्म-प्रेम सबसे बड़ा चापलूस है (ला० रोशफोको)।
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हमला करने वाले दुश्मनों से ज्यादा चापलूस दोस्तों से डरना चाहिए (जनरल ओब्रेगोन)।
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चापलूसी का जहर तब तक नुकसान नहीं पहुँचाता जब तक उसे अमृत समझकर न पिया जाए (प्रेमचन्द)।
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4. धर्म
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स्वरूप और मूल्य:
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धार्मिक मनुष्य विश्वासी होता है। धर्म स्वास्थ्य नष्ट करके पालन करने की आज्ञा नहीं देता (जयशंकर प्रसाद)।
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दुखी व्यक्ति को तसल्ली देना और संकट में सहारा निभाना ही सच्चा धर्म है (प्रेमचन्द – रंगभूमि / गोदान)।
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“धर्म तो व्यापार का श्रृंगार है।” (प्रेमचन्द – रंगभूमि)
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धर्म और भय/अंधविश्वास:
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धर्म का मुख्य स्तम्भ भय है; अनिष्ट की शंका दूर होते ही बाह्य धार्मिक आडंबर शांत हो जाते हैं (प्रेमचन्द – रंगभूमि)।
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धर्म-भीरु प्राणी तार्किक नहीं होता, उसकी विवेचना शक्ति शिथिल हो जाती है (प्रेमचन्द – कायाकल्प)।
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कट्टर धर्मपरायणता का सहिष्णुता से बैर होता है (प्रेमचन्द – गोदान)।
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5. नारी
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महत्व और महिमा:
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जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहाँ देवता प्रसन्न रहते हैं (मनु / मनुस्मृति)।
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नारी सदैव अजेय रही है; वह त्याग, प्रेम और समर्पण की प्रतिमूर्ति है (महादेवी वर्मा / अज्ञात)।
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नारी की करुणा अंतर्जगत का उच्चतम विकास है, जिस पर समस्त सदाचार टिके हैं (जयशंकर प्रसाद – अजातशत्रु)।
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नारी केवल लेने नहीं, समाज को देने और संबल प्रदान करने आती है (मैथिलीशरण गुप्त / अतुलकृष्ण गोस्वामी)।
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स्वभाव और शक्ति:
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नारी क्षमा, शांति और करुणा है; उसके तप और त्याग के आगे बड़े-बड़े शूरवीर झुक जाते हैं (रामधारी सिंह ‘दिनकर’)।
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नारी का हृदय नवनीत (मक्खन) सा कोमल और प्रेम का अथाह सागर होता है (शरण – सोना माटी)।
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6. श्रद्धा और जिज्ञासा
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श्रद्धा का संबंध: श्रद्धा धर्म की अनुगामिनी है; जहाँ धर्म का स्फुरण होता है, वहीं श्रद्धा टिकती है (रामचन्द्र शुक्ल – हिन्दी साहित्य का इतिहास)।
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चेतना का बंधन: मन को देवता, मातृभूमि या राष्ट्र से बाँधने का एकमात्र साधन श्रद्धा और प्रेम की डोर है; लोभ या बल निकृष्ट हैं (वासुदेवशरण अग्रवाल – कल्पवृक्ष)।
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जिज्ञासा और आत्मविश्वास:
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जिज्ञासा का अभाव ही अश्रद्धा है।
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आत्मविश्वास ही श्रद्धा है; संशयों व प्रश्नों को परास्त करने की शक्ति ही जिज्ञासु की श्रद्धा कहलाती है (वासुदेवशरण अग्रवाल – वेद-विद्या)।
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