उषा (कविता)
-
कवि: शमशेर बहादुर सिंह
-
विधा: प्रयोगवादी नई कविता / बिंबप्रधान कविता
-
काव्य-प्रवृत्ति: ‘कवियों के कवि’, ‘बिंबधर्मी कवि’, ‘उर्दू और हिंदी का दोआब’
-
मूल विषय: सूर्योदय से ठीक पूर्व के पल-पल बदलते प्राकृतिक सौंदर्य का ग्रामीण परिवेश से जुड़ा गतिशील शब्द-चित्र।
1. पाठ का उद्देश्य व मूल संवेदना
-
प्रकृति की गतिशीलता का अंकन: सूर्योदय से ठीक पहले भोर के आकाश में प्रतिपल होने वाले रंग-परिवर्तनों को अत्यंत सूक्ष्मता से प्रस्तुत करना।
-
ग्रामीण जीवन व परिवेश का जीवंत जुड़ाव: भोर के प्राकृतिक दृश्यों को किसी दूरस्थ कल्पना से न जोड़कर गाँव के रोजमर्रा जीवन—सिल-बट्टे, चूल्हा-चौका, स्लेट-खड़िया और बाल-सुलभ गतिविधियों से जोड़ना।
-
अंधकार पर प्रकाश की विजय: कालिमा और नीरवता को चीरकर आने वाले नव-प्रभात, नई ऊर्जा और भविष्य के उजास की अनुभूति कराना।
2. विस्तृत पाठ-सार एवं प्रमुख बिंदु
1. प्रातःकालीन आकाश (नीला शंख)
-
भोर के समय आकाश का रंग गहरा नीला, निर्मल और पवित्र दिखाई देता है।
-
कवि ने इसके लिए ‘नीला शंख’ का उपमान दिया है, जो पवित्रता, शांति और उज्ज्वलता का प्रतीक है।
2. राख से लीपा हुआ चौका
-
भोर की नमी और धुंधलेपन के कारण आकाश हल्के स्लेटी (धूसर) रंग का दिखाई देता है।
-
कवि को यह ऐसा लगता है मानो गाँव में किसी गृहिणी ने सुबह-सुबह राख से चौका (रसोई का फर्श) लीपा हो, जो अभी गीला होने के कारण गहरा और नम दिख रहा है।
3. काली सिल पर लाल केसर
-
जैसे ही पूर्व दिशा में सूर्य की हल्की लालिमा फूटती है, आकाश की कालिमा और सूर्य की रक्तिम आभा का सुंदर मिश्रण होता है।
-
ऐसा प्रतीत होता है मानो काले पत्थर की सिल पर किसी ने थोड़ा-सा लाल केसर पीसकर उसे धो दिया हो।
4. स्लेट पर लाल खड़िया चाक
-
अगले ही क्षण आकाश का दृश्य बदलता है और ऐसा लगता है मानो किसी नन्हे बच्चे ने अपनी काली स्लेट पर लाल खड़िया चाक मल दी हो।
5. नील जल में गौर झिलमिल देह
-
सूर्य के आकाश में थोड़ा ऊपर उठने पर नीले आकाश में उसकी श्वेत-सुनहरी किरणें झिलमिलाने लगती हैं।
-
यह दृश्य ऐसा प्रतीत होता है मानो नीले स्वच्छ जल में किसी सुंदरी का गोरा शरीर झिलमिला रहा हो और हवा से हिल रहा हो।
6. उषा का जादू टूटना
-
जैसे ही सूर्य पूर्ण रूप से उदित हो जाता है, उषा का यह सम्मोहक, जादुई और पल-पल रंग बदलता प्राकृतिक सौंदर्य समाप्त (जादू टूट जाता है) हो जाता है।
3. पाठ में प्रयुक्त प्रमुख उपमान एवं बिंब
| काव्यांश पंक्ति | प्रयुक्त उपमान / दृश्य | बिंब का प्रकार |
|
प्रात नभ था बहुत नीला शंख जैसे
|
नीला शंख (पवित्रता व गहरा नीलापन)
|
स्थिर दृश्य बिंब
|
|
राख से लीपा हुआ चौका (अभी गीला पड़ा है)
|
गीला चौका (धूसर रंग व सुबह की नमी)
|
स्पर्श एवं दृश्य बिंब
|
|
बहुत काली सिल जरा से लाल केसर से…
|
काली सिल व लाल केसर (कालिमा पर लालिमा)
|
गतिशील दृश्य बिंब
|
|
स्लेट पर या लाल खड़िया चाक मल दी हो…
|
काली स्लेट पर लाल खड़िया (अदृश्य बाल-सुलभ चेष्टा)
|
गतिशील दृश्य बिंब
|
|
नील जल में या किसी की गौर झिलमिल देह…
|
नीले जल में गोरी देह का झिलमिलाना (सूर्य की किरणें)
|
गतिशील दृश्य बिंब
|
4. कठिन एवं विशिष्ट शब्दों के अर्थ
| शब्द | अर्थ |
| प्रात |
प्रातःकाल / सुबह / भोर
|
| नभ |
आकाश / गगन
|
| शंख |
समुद्र से मिलने वाला एक पवित्र खोल/वाद्य (यहाँ अर्थ: निर्मलता व शांति)
|
| चौका |
रसोई का फर्श जहाँ भोजन बनता है
|
| सिल |
मसाला पीसने वाला काला पत्थर (सिलबट्टा)
|
| केसर |
एक सुगंधित व लाल-नारंगी रंग का कीमती मसाला
|
| खड़िया चाक |
लिखने की सफेद/रंगीन मिट्टी या चाक
|
| गौर |
गोरा / उज्ज्वल
|
| झिलमिल |
चमकती हुई / काँपती हुई रोशनी
|
| देह |
शरीर / काया
|
| उषा का जादू |
प्रातःकालीन आकाश का सम्मोहक, चित्ताकर्षक व पल-पल बदलता सौंदर्य
|
5. मुख्य परीक्षा-उपयोगी प्रश्नोत्तर सारांश
-
प्रश्न 1: कविता के किन उपमानों को देखकर कहा जा सकता है कि ‘उषा’ गाँव की सुबह का गतिशील शब्द-चित्र है?उत्तर: कविता में प्रयुक्त उपमान—’राख से लीपा हुआ चौका’, ‘मसाला पीसने की काली सिल’, ‘स्लेट पर लाल खड़िया चाक मलते बच्चों के हाथ’—विशुद्ध ग्रामीण जीवन के घरेलू क्रियाकलापों से जुड़े हैं, जो सुबह की ताजगी और गतिशीलता को सजीव करते हैं।
-
प्रश्न 2: ‘राख से लीपा हुआ चौका (अभी गीला पड़ा है)’—कोष्ठक के प्रयोग से क्या अर्थ-गांभीर्य पैदा हुआ है?उत्तर: कोष्ठक में दी गई पंक्ति (अभी गीला पड़ा है) भोर के वातावरण में मौजूद प्राकृतिक ओस, नमी और ताजगी को स्पष्ट करती है तथा चौके के नएपन व पवित्रता को और अधिक सजीव बना देती है।
-
प्रश्न 3: ‘उषा का जादू टूटना’ का क्या अभिप्राय है?उत्तर: सूर्योदय से पहले आकाश में रंगों और दृश्यों का जो पल-पल बदलता तिलिस्मी आकर्षण छाया हुआ था, सूर्य के पूर्णतः निकल आने पर वह सारा सम्मोहन समाप्त हो जाता है और तेज धूप फैल जाती है।
यहाँ शमशेर बहादुर सिंह द्वारा रचित कविता ‘उषा’ के प्रमुख काव्यांशों की विस्तृत सन्दर्भ, प्रसंग, व्याख्या एवं विशेष दी जा रही है:
काव्यांश 1:
“प्रात नभ था बहुत नीला शंख जैसेभोर का नभराख से लीपा हुआ चौका(अभी गीला पड़ा है)”
-
सन्दर्भ: प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग-2’ में संकलित कविता ‘उषा’ से उद्धृत है। इसके रचयिता प्रयोगवादी कविता के मूर्धन्य कवि शमशेर बहादुर सिंह हैं।
-
प्रसंग: प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने सूर्योदय से ठीक पूर्व भोर के समय आकाश के निर्मल, पवित्र और नमीयुक्त रूप का सुंदर बिंबात्मक चित्रण किया है।
-
व्याख्या: कवि कहते हैं कि भोर के समय सुबह का आकाश शंख के समान गहरा नीला, अत्यंत स्वच्छ और पवित्र दिखाई दे रहा था। कुछ ही पलों बाद जब उसमें हल्की सफेदी और भोर की धुंधली नमी घुलने लगी, तो वह ऐसा प्रतीत होने लगा मानो गाँव के किसी घर में गृहिणी ने राख से चौका (रसोई का स्थान) लीप दिया हो। कोष्ठक में कवि स्पष्ट करते हैं कि वह चौका अभी गीला है, जिससे आकाश में सुबह की ओस, ताजगी और नमी की अनुभूति साकार हो उठती है।
-
विशेष:
-
‘नीला शंख जैसे’ में उपमा अलंकार है।
-
ग्रामीण परिवेश के अत्यंत मौलिक और सहज उपमानों (शंख, राख से लीपा चौका) का प्रयोग।
-
कोष्ठक (अभी गीला पड़ा है) का प्रयोग वातावरण की स्वाभाविक नमी और ताजगी को गहराई प्रदान करता है।
-
दृश्य और स्पर्श बिंब का सुंदर संयोजन।
-
काव्यांश 2:
“बहुत काली सिल जरा से लाल केसर सेकि जैसे धुल गई होस्लेट पर या लाल खड़िया चाकमल दी हो किसी ने”
-
सन्दर्भ: पूर्ववत्।
-
प्रसंग: कवि ने भोर के अंधेरे में पूर्व दिशा से फूटती सूर्य की हल्की रक्तिम आभा और आकाश के रंग-परिवर्तन का गतिशील शब्द-चित्र प्रस्तुत किया है।
-
व्याख्या: जैसे ही क्षितिज पर सूर्य की हल्की लालिमा बिखरती है, कालिमा और लालिमा के उस अद्भुत मिश्रण को देखकर कवि को लगता है कि मानो काले पत्थर की बड़ी सिल को किसी ने थोड़े से लाल केसर से धो दिया हो। अगले ही पल दृश्य बदलता है और ऐसा आभास होता है मानो किसी नन्हे बालक ने अपनी काली स्लेट के ऊपर लाल खड़िया मिट्टी (चाक) मल दी हो। आकाश का यह रूप अंधकार के समाप्त होने और प्रकाश के आगमन का संकेत देता है।
-
विशेष:
-
‘जैसे धुल गई हो’ में उत्प्रेक्षा अलंकार की सुंदर व्यंजना है।
-
‘काली सिल’, ‘लाल केसर’, ‘काली स्लेट’ और ‘लाल खड़िया’ के माध्यम से रंगों का सजीव और गतिशील दृश्य बिंब उभारा गया है।
-
घरेलू और बाल-सुलभ गतिविधियों से प्रकृति का सहज तादात्म्य स्थापित किया गया है।
-
भाषा संक्षिप्त, चित्रात्मक एवं प्रभावोत्पादक है।
-
काव्यांश 3:
“नील जल में या किसी कीगौर झिलमिल देहजैसे हिल रही हो।और…जादू टूटता है इस उषा का अबसूर्योदय हो रहा है।”
-
सन्दर्भ: पूर्ववत्।
-
प्रसंग: प्रस्तुत अंश में कवि ने सूर्य की किरणों के प्रस्फुटन तथा सूर्योदय के साथ उषा के जादुई सौंदर्य के समाप्त होने का वर्णन किया है।
-
व्याख्या: कवि कहते हैं कि भोर के समय जब नीले आकाश में सूर्य की श्वेत-उज्ज्वल किरणें फूटती हैं, तो ऐसा मनोहारी दृश्य बनता है मानो नीले स्वच्छ जल के भीतर किसी सुंदरी का गोरा और कांतिमान शरीर हवा या पानी की तरंगों के साथ झिलमिला रहा हो और हिल रहा हो। इसके उपरांत पूर्व दिशा में सूर्य पूर्ण रूप से उदित हो जाता है और सूर्योदय होते ही भोर के पल-पल बदलते रंगों, दृश्यों और तिलिस्मी आकर्षण का वह जादुई सम्मोहन टूटकर समाप्त हो जाता है।
-
विशेष:
-
‘गौर झिलमिल देह जैसे हिल रही हो’ में उत्प्रेक्षा अलंकार का अत्यंत मनोहारी प्रयोग।
-
‘उषा का जादू टूटना’ लाक्षणिक प्रयोग है, जो तेज धूप के फैलने से प्राकृतिक रूप-परिवर्तन के अंत को दर्शाता है।
-
मुक्त छंद में रचित, प्रयोगवादी शिल्प और सजीव बिंबधर्मिता का उत्कृष्ट उदाहरण।
-