कवि पंडित नरेंद्र शर्मा रचित ‘नींद उचट जाती है’ कविता का सार, सप्रसंग व्याख्या एवं काव्य-सौंदर्य

कवि पंडित नरेंद्र शर्मा रचित ‘नींद उचट जाती है’ कविता का सार, सप्रसंग व्याख्या एवं काव्य-सौंदर्य

उत्तर-छायावादी और गीत-काव्य परंपरा के प्रसिद्ध कवि पंडित नरेंद्र शर्मा की अंतरा (भाग-1) में संकलित विख्यात कविता ‘नींद उचट जाती है’ का संदर्भ, प्रसंग, प्रत्येक काव्यांश की सप्रसंग व्याख्या एवं काव्य-सौंदर्य:

पाठ-परिचय एवं संदर्भ

  • कवि: नरेंद्र शर्मा
  • मूल काव्य संग्रह: काममिनी
  • पाठ्यपुस्तक: अंतरा (भाग-1) – कक्षा 11 (ऐच्छिक)
  • संदर्भ: प्रस्तुत कविता उत्तर-छायावादी दौर के लोकप्रिय गीतकार नरेंद्र शर्मा द्वारा रचित कविता ‘नींद उचट जाती है’ से उद्धृत है।
  • केंद्रीय विषय: कविता में अनिद्रा (नींद के उचट जाने) के माध्यम से बाह्य और आंतरिक स्तर पर फैले घनघोर अंधकार, निराशा, सामाजिक-राजनीतिक गतिरोध तथा चेतना के संघर्ष का चित्रण किया गया है। कवि की नींद इसलिए गायब है क्योंकि चारों ओर अज्ञान, जड़ता और विषमताओं की रात फैली हुई है और सुबह की नई किरण (आशा व परिवर्तन) अभी दूर प्रतीत होती है।

काव्यांश 1: नींद उचट जाती है…

“नींद उचट जाती है
हँसते-हँसते भी आँखें
कभी रो पड़ती हैं,
रोते-रोते भी कभी
आँखें हँस पड़ती हैं।
नींद उचट जाती है।”

प्रसंग

कवि अनिद्रा और मन की अस्थिर, द्वंद्वपूर्ण भावनात्मक स्थिति का चित्रण करते हैं।

सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)

कवि कहते हैं कि गहन अंधकार और आंतरिक बेचैनी के कारण उनकी नींद टूट (उचट) गई है। जब मन गहरी चिंता और संत्रास में घिरा होता है, तो भावों का संतुलन बिगड़ जाता है। कई बार हँसते-हँसते भी अचानक आँखों में आँसू छलक आते हैं (वेदना उभर आती है), और कभी दुख के अतिरेक में रोते-रोते भी विवशता की हँसी छूट पड़ती है। इस अंतर्द्वंद्व और मानसिक उथल-पुथल के कारण आँखों से नींद पूरी तरह विदा हो चुकी है।

काव्यांश 2: तम का सागर गहरा है…

“तम का सागर गहरा है,
डर है, इस अँधियारे में
कोई डूब न जाए,
आँखें थक जाती हैं
पर पथ नहीं सूझता।
पग-पग पर पहरा है,
तम का सागर गहरा है।”

प्रसंग

कवि अंधकार के विस्तार और उसमें रास्ता न मिलने की लाचारी को व्यक्त करते हैं।

सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)

कवि बताते हैं कि यह अंधकार (तम) किसी अथाह और गहरे सागर की तरह फैला हुआ है। मन में यह निरंतर भय बना रहता है कि इस भयंकर अंधियारे में कोई भटककर अपना अस्तित्व ही न खो दे (डूब न जाए)। रास्ता खोजने के प्रयास में आँखें थककर चूर हो गई हैं, किंतु दूर-दूर तक मुक्ति या प्रगति का कोई मार्ग नहीं सूझ रहा। ऐसा प्रतीत होता है मानो कदम-कदम पर निराशा, जड़ता और दमनकारी व्यवस्था का कड़ा पहरा लगा हुआ है।

काव्यांश 3: आशा का दीपक टिमटिमाता है…

“आशा का दीपक टिमटिमाता है,
झोंके से डरता है,
बुझने से डरता है;
रात अभी बाक़ी है,
भोर बहुत दूर है,
मन विवश, मजबूर है।”

प्रसंग

कवि आशा की क्षीण किरण और लंबी रात (कठिन दौर) के बीच मन की विवशता का उद्घाटन करते हैं।

सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)

हृदय में आशा का एक नन्हा-सा दीपक टिमटिमा तो रहा है, किंतु वह हवा के हलके-से झोंके से भी भयभीत है कि कहीं वह पूरी तरह बुझ न जाए। निराशा का यह दौर (रात) अभी बहुत लंबा खिंचने वाला है और ज्ञान, मुक्ति व नव-निर्माण की सुबह (भोर) अभी बहुत दूर दिखाई देती है। परिस्थितियों के आगे मनुष्य का मन अत्यंत विवश, असहाय और लाचार अनुभव कर रहा है।

काव्यांश 4: फिर भी जागना होगा…

“फिर भी जागना होगा,
इस अँधियारे से लड़ना होगा;
जब तक भोर नहीं आती,
आँखों को ज्योति बनकर
जलना होगा।
नींद उचट जाती है।”

प्रसंग

कविता के अंत में कवि निराशा को त्यागकर अंधकार से संघर्ष करने और स्वयं प्रकाश स्तंभ बनने का संकल्प लेते हैं।

सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)

कवि अपनी चेतना को झकझोरते हुए उद्घोष करते हैं कि हताश होकर बैठने से काम नहीं चलेगा; यदि नींद उचट गई है, तो इस जागरण को एक संकल्प बनाना होगा। जब तक अन्याय और अज्ञान का यह अंधकार समाप्त नहीं होता, तब तक इससे अनवरत संघर्ष करना होगा। जब तक नव-प्रभात की पहली किरण फूटकर नहीं आती, तब तक मनुष्य को अपनी ही आँखों को मशाल और ज्योति बनाकर स्वयं तपना व जलना होगा। नींद का उचटना केवल एक शारीरिक विकार नहीं, बल्कि समाज के प्रति जाग्रत रहने की अनिवार्य पुकार है।

काव्य-सौंदर्य

1. भाव-पक्ष

  • प्रतीकात्मक चेतना: कविता का फलक केवल व्यक्तिगत अनिद्रा तक सीमित नहीं है। ‘रात’ और ‘अंधकार’ सामाजिक विषमताओं, राजनीतिक दमन, जड़ता और निराशा के प्रतीक हैं; जबकि ‘भोर’ और ‘दीपक’ चेतना, स्वतंत्रता और नव-निर्माण की आशा के प्रतीक हैं।
  • संघर्ष का संकल्प: निराशा और विवशता के गहन कुहासे के बीच से निकलकर अंततः कविता अंधकार से लड़ने और स्वयं प्रकाश बनने का प्रेरक संदेश देती है।
  • रस: शांत रस के भीतर गहरे करुण रस और अंत में ओज/उत्साह का संचार।

2. कला-पक्ष (शिल्प-सौंदर्य)

  • भाषा: सरल, सुबोध, पारदर्शी एवं बिंब-प्रधान खड़ी बोली। भाषा में किसी दुरूह शब्दावली के बिना भी गहरी अनुभूतियों को व्यक्त करने की अद्भुत क्षमता है।
  • शैली: छायावादोत्तर गीति-शैली, जिसमें अतुकांत मुक्त छंद का स्वाभाविक प्रवाह और लयात्मकता है।
  • प्रमुख अलंकार:
    • रूपक अलंकार: “तम का सागर” (अंधकार रूपी सागर), “आशा का दीपक”
    • विरोधाभास अलंकार: “हँसते-हँसते भी आँखें कभी रो पड़ती हैं / रोते-रोते भी कभी आँखें हँस पड़ती हैं”
    • पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार: “हँसते-हँसते”, “रोते-रोते”, “पग-पग”
    • अनुप्रास अलंकार: “पग-पग पर पहरा”
    • मानवीकरण अलंकार: दीपक का डरना, रात और अंधकार का पहरा देना।
  • बिंब-विधान: टिमटिमाता दीपक, गहरा सागर और झोंकों से कांपती लौ के अत्यंत प्रभावशाली दृश्य बिंब।

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