भवानी प्रसाद मिश्र रचित ‘घर की याद’ कविता का सार, सप्रसंग व्याख्या एवं काव्य-सौंदर्य

भवानी प्रसाद मिश्र रचित ‘घर की याद’ कविता का सार, सप्रसंग व्याख्या एवं काव्य-सौंदर्य

सहजता और बातचीत की शैली के अद्वितीय कवि भवानी प्रसाद मिश्र की प्रसिद्ध कविता ‘घर की याद’ का संदर्भ, प्रसंग, प्रमुख काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्या एवं काव्य-सौंदर्य:

पाठ-परिचय एवं संदर्भ

  • कवि: भवानी प्रसाद मिश्र
  • मूल काव्य संग्रह: गीत फरोश
  • रचना काल: 1942 (भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब कवि नरसिंहपुर जेल में बंद थे)
  • पाठ्यपुस्तक: आरोह (भाग-1) – कक्षा 11 (अनिवार्य कोर)
  • संदर्भ: प्रस्तुत कविता ‘गांधी पंचशती’ के रचयिता और सहजता के कवि भवानी प्रसाद मिश्र द्वारा रचित है।
  • केंद्रीय विषय: जेल प्रवास के दौरान सावन की मूसलाधार रात में कवि के मन में घर की स्मृतियों का उमड़ना, माता-पिता, चार भाइयों और चार बहनों के अगाध स्नेह का सजीव स्मरण तथा संदेशवाहक बादल (सावन) के माध्यम से परिजनों को अपनी पीड़ा छुपाकर धैर्य बंधाने की मार्मिक चेष्टा।

काव्यांश 1: आज पानी गिर रहा है…

“आज पानी गिर रहा है,
बहुत पानी गिर रहा है,
रात भर गिरता रहा है,
प्राण-मन घिरता रहा है।
बहुत पानी गिर रहा है,
घर नज़र में तिर रहा है,
घर कि मुझसे दूर है जो,
घर खुशी का पूर है जो।”

प्रसंग

जेल की कोठरी में मूसलाधार बारिश को देखकर कवि को अपने परिवार की याद आती है और उनकी आँखों के सामने उनका सुखी घर तैरने लगता है।

सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)

कवि कहते हैं कि आज बहुत तेज बारिश हो रही है। रात भर से लगातार पानी बरस रहा है और जैसे-जैसे पानी गिर रहा है, वैसे-वैसे कवि का मन और प्राण घर की पुरानी स्मृतियों में घिरते जा रहे हैं। अत्यधिक बारिश के बीच कवि की आँखों के सामने उनका घर तैरता (तिरता) हुआ प्रतीत हो रहा है। वह घर, जो इस समय जेल की सलाखों के कारण कवि से बहुत दूर है, किंतु वह खुशियों का भंडार (पूर) है; जहाँ चारों ओर प्रेम और उल्लास का वातावरण रहता है।

काव्यांश 2: घर कि घर में चार भाई…

“घर कि घर में चार भाई,
मायके में बहिन आई,
बहिन आई बाप के घर,
हाय रे परिताप के घर!
घर कि घर में सब जुड़े हैं,
सब कि इतने कब जुड़े हैं,
चार भाई चार बहिनें,
भुजा भाई प्यार बहिनें।”

प्रसंग

कवि अपने परिवार के सदस्यों के आपसी प्रेम, भाइयों के संगठन और बहनों के स्नेह का सुंदर खाका खींचते हैं।

सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)

कवि याद करते हैं कि घर में मेरे चार भाई हैं और सावन के पावन पर्व पर विवाहिता बहन अपने पिता के घर मायके आई होगी। किंतु भाई भवानी के जेल में होने के कारण वह सुख के घर आने के बजाय संताप और दुख (परिताप) के घर में आकर रो पड़ी होगी। कवि कहते हैं कि उनका परिवार प्रेम के ऐसे अटूट धागों से जुड़ा है जैसा बिरले ही देखने को मिलता है। हम चार भाई और चार बहनें हैं—भाई कर्मठ भुजाओं के समान सहारा देने वाले हैं और बहनें उस घर में निश्छल प्यार और कोमलता का साकार रूप हैं।

काव्यांश 3: और माँ बिन-पढ़ी मेरी…

“और माँ बिन-पढ़ी मेरी,
दुख में वह गढ़ी मेरी,
माँ कि जिसकी गोद में सिर
रख लिया तो दुख नहीं फिर,
माँ कि जिसकी स्नेह-धारा
का यहाँ तक भी पसारा,
उसे लिखना नहीं आता,
जो कि उसका पत्र पाता।”

प्रसंग

कवि अपनी अशिक्षित, त्यागमयी और ममतामयी माता के वात्सल्य का मर्मस्पर्शी स्मरण करते हैं।

सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)

कवि अपनी माता को याद करते हुए भावुक हो उठते हैं कि मेरी माँ अनपढ़ (बिन-पढ़ी) है और जीवन भर उसने केवल संघर्ष और दुख ही सहे हैं (वह दुख के सांचे में गढ़ी हुई है)। माँ का वात्सल्य ऐसा है कि एक बार यदि उसकी ममता भरी गोद में सिर रख लिया जाए, तो जीवन का कोई भी दुख पास नहीं फटकता। माँ के प्रेम और स्नेह की धारा इतनी असीम है कि जेल की इन काल-कोठरियों तक भी उसका विस्तार (पसारा) अनुभव होता है। विडंबना बस इतनी है कि माँ को लिखना-पढ़ना नहीं आता, नहीं तो आज मुझे जेल में उसका स्नेह भरा पत्र अवश्य मिलता।

काव्यांश 4: पिताजी जिनको बुढ़ापा…

“पिताजी जिनको बुढ़ापा
एक क्षण भी नहीं व्यापा,
जो अभी भी दौड़ जाएँ,
जो अभी भी खिलखिलाएँ,
मौत के आगे न हिचकें,
शेर के आगे न बिचकें,
बोल में बादल गरजता,
काम में झंझा लरजता।”

प्रसंग

कवि अपने वृद्ध पिता के अदम्य साहस, ऊर्जावान व्यक्तित्व और ओजस्वी दिनचर्या का गौरवपूर्ण चित्रण करते हैं।

सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)

कवि अपने पिता के स्वरूप का वर्णन करते हुए कहते हैं कि आयु अधिक होने के बावजूद उनके पिता पर बुढ़ापा एक क्षण के लिए भी हावी नहीं हुआ है। वे आज भी युवाओं की तरह तेजी से दौड़ सकते हैं और बच्चों की तरह खुलकर खिलखिलाते हैं। वे इतने साहसी हैं कि मौत के सामने भी नहीं हिचकिचाते और साक्षात शेर के सामने आ जाने पर भी भयभीत (बिचकें) नहीं होते। उनकी वाणी में बादलों जैसी गर्जना और ओज है, तथा उनके काम करने की फुर्ती ऐसी है कि आंधी-तूफान (झंझा) भी उनके आगे कांपता हुआ प्रतीत होता है।

काव्यांश 5: आज गीता पाठ करके…

“आज गीता पाठ करके
दंड दो सौ साठ करके
खूब मुगदर हिला लेकर,
मूँठ उनकी मिला लेकर,
जब कि नीचे आए होंगे
नैन जल से छाए होंगे,
हाय पानी गिर रहा है,
घर नज़र में तिर रहा है।”

प्रसंग

कवि कल्पना करते हैं कि छत पर व्यायाम और पूजा समाप्त कर जब पिता नीचे आए होंगे, तो अपने पांचवें बेटे (कवि) को न पाकर उनकी आँखों में आंसू आ गए होंगे।

सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)

कवि सोचते हैं कि आज भी नियमपूर्वक पिताजी ने श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ किया होगा, दो सौ साठ दंड-बैठक लगाई होगी और कसरत के लिए मुगदर की मूठ मिलाकर उसे खूब घुमाया होगा। यह सब दैनिक व्यायाम पूरा करके जब वे छत से नीचे आए होंगे और घर में चारों भाइयों और बहनों को देखा होगा, किंतु अपने पांचवें लाडले बेटे भवानी को नहीं पाया होगा, तो उनके मजबूत नयनों में भी आंसुओं की बाढ़ आ गई होगी। कवि फिर व्यथित होकर कहते हैं कि बाहर पानी बरस रहा है और मेरी आँखों में घर का यह कारुणिक दृश्य तैर रहा है।

काव्यांश 6: चार भाई चार बहिनें…

“चार भाई चार बहिनें,
भुजा भाई प्यार बहिनें,
खेलते या खड़े होंगे
नज़र में उनके पड़े होंगे।
पिताजी जिनको बुढ़ापा
एक क्षण भी नहीं व्यापा,
रो पड़े होंगे बराबर,
पाँचवें का नाम लेकर।”

प्रसंग

पिता के हृदय में पांचवें बेटे के प्रति उमड़े वात्सल्य और उनके अश्रु-प्रवाह का भावुक दृश्य।

सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)

कवि कल्पना करते हैं कि पिता ने जब नीचे उतरकर देखा होगा कि चारों भाई और चारों बहनें आपस में बातें कर रहे हैं, खेल रहे हैं या खड़े हैं। वे चार भाई जो सहारा हैं और बहनें जो प्रेम की मूरत हैं, जब वे पिता की नजर में पड़े होंगे, तो जिन पिता को कभी बुढ़ापा छू भी नहीं पाया था, जो हमेशा चट्टान की तरह अडिग रहते थे, वे अपने इस अनुपस्थित पाँचवें बेटे का नाम लेकर बच्चों की तरह फूट-फूट कर रो पड़े होंगे।

काव्यांश 7: पाँचवाँ मैं हूँ अभागा…

“पाँचवाँ मैं हूँ अभागा,
जिसे सोने पर सुहागा
पिताजी कहते रहे हैं,
प्यार में बहते रहे हैं।
आज उनके स्वर्ण-बेटे
लगे होंगे उन्हें हेटे,
क्योंकि मैं उन पर सुहागा
बँधा बैठा हूँ अभागा।”

प्रसंग

कवि स्वयं को अभागा बताते हुए अपने प्रति पिता के अगाध लाड़-प्यार का स्मरण करते हैं।

सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)

कवि कहते हैं कि वह पाँचवाँ बेटा मैं अभागा हूँ, जिसे पिताजी सभी भाइयों में सबसे श्रेष्ठ मानकर ‘सोने पर सुहागा’ कहा करते थे और सदा स्नेह में डूबे रहते थे। आज जब वे चारों सोने जैसे गुणी बेटे पिता के सामने खड़े होंगे, तो वे भी पिता को ‘हेटे’ (तुच्छ/हीन) लगे होंगे; क्योंकि जिसे वे सोने पर सुहागा कहकर सबसे अधिक दुलारते थे, वह पाँचवाँ बेटा देश के स्वतंत्रता संग्राम के कारण यहाँ जेल की बेड़ियों में बंधा बैठा है।

काव्यांश 8: और माँ ने कहा होगा…

“और माँ ने कहा होगा,
दुख कितना सहा होगा,
आँख में किसलिए पानी,
वहाँ अच्छा है भवानी।
वह तुम्हारा ही समझ है
और उसका यह गिला है,
वह तुम्हारा ही ठिकाना,
पाँव जो पीछे हटाता
कोख को मेरी लजाता,
इस तरह होओ न कच्चे,
रो पड़ेंगे और बच्चे।”

प्रसंग

रोते हुए पिता को ढांढस बंधाती हुई माँ के धैर्य और देशभक्ति के संस्कारों का निरूपण।

सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)

कवि अनुमान लगाते हैं कि पिता को रोते देखकर माँ ने अपने हृदय पर पत्थर रखकर कितना असीम दुख सहा होगा और पिता को समझाते हुए कहा होगा—आपकी आँखों में यह आंसू किसलिए हैं? हमारा भवानी जेल में बहुत सकुशल और आनंद से है। वह आपके ही दिखाए रास्ते और विचारों पर चला है, यह तो आपके दिए संस्कारों का ही मान (ठिकाना) है। यदि वह देश-सेवा के मार्ग से अपने कदम पीछे खींच लेता, तो मेरी कोख को कलंकित (लज्जित) करता। इसलिए हे स्वामी! आप इस तरह मन से कमजोर (कच्चे) मत बनिए, आपको रोता देखकर घर के बाकी बच्चे भी रो पड़ेंगे।

काव्यांश 9: हे सजीले हरे सावन! …

“हे सजीले हरे सावन!
ऐ कि मेरे पुण्य पावन,
तुम बरस लो वे न बरसें,
पाँचवें को वे न तरसें।
मैं मजे में हूँ सही है,
घर नहीं हूँ बस यही है,
किंतु यह बस बड़ा बस है,
इसी बस से सब विरस है।”

प्रसंग

कवि बरसते हुए सावन को दूत बनाकर संदेश देते हैं कि वह उनके माता-पिता के सामने उनके कुशल-क्षेम की झूठी तसल्ली दे ताकि वे दुखी न हों।

सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)

कवि सावन का मानवीकरण करते हुए कहते हैं—हे सुंदर और हरियाली से भरे पुण्यकारी, पवित्र सावन! तुम चाहे जितना बरस लो, लेकिन जाकर मेरे घर ऐसा माहौल मत बनाना कि मेरे वृद्ध माता-पिता की आँखों से आंसुओं की बारिश होने लगे और वे अपने पाँचवें बेटे के लिए तरसें। तुम उनसे जाकर कहना कि मैं यहाँ जेल में मजे में हूँ, बस केवल घर पर नहीं हूँ। फिर कवि अपने अंतर्मन की गहरी पीड़ा व्यक्त करते हैं कि कहने को तो यह ‘बस’ (सिर्फ) एक छोटी सी बात लगती है, किंतु वास्तव में यह ‘बस’ बहुत भयानक विवशता है; घर से अलग होने के इसी एकाकीपन के कारण जीवन का सारा रस समाप्त (विरस) हो चुका है।

काव्यांश 10: पर न उनसे हेय कहना…

“पर न उनसे हेय कहना,
उन्हें देते धीर रहना,
उन्हें कहना लिख रहा हूँ,
उन्हें कहना पढ़ रहा हूँ।
काम करता हूँ कि कहना,
नाम करता हूँ कि कहना,
मत करो कुछ शोक कहना।
और कहना मस्त हूँ मैं,
कातने में व्यस्त हूँ मैं,
वजन सत्तर सेर मेरा
और भोजन ढेर मेरा।”

प्रसंग

कवि सावन से आग्रह करते हैं कि जेल की यातनाओं और अवसाद की बात परिजनों से बिल्कुल न कहे, बल्कि उनके स्वाभिमान और स्वास्थ्य की बात बताए।

सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)

कवि सावन को सचेत करते हुए कहते हैं कि मेरे माता-पिता से कोई भी दुखदायी या तुच्छ (हेय) बात मत कहना। उन्हें निरंतर धैर्य बंधाते रहना। उनसे कहना कि भवानी जेल में खाली नहीं बैठा है, वह अध्ययन और लेखन में व्यस्त है। उनसे कहना कि वह गांधीजी के बताए रास्ते पर चरखा कातकर काम कर रहा है और अपने कुल का नाम रोशन कर रहा है, इसलिए उसके लिए कोई शोक न करें। उनसे कहना कि वह पूर्णतः मस्त है, उसका वजन सत्तर सेर (लगभग 65-70 किलो) हो गया है और वह खूब छककर भोजन करता है।

काव्यांश 11: कूदता हूँ, खेलता हूँ…

“कूदता हूँ, खेलता हूँ,
दुख डटकर ठेलता हूँ,
और कहना मस्त हूँ मैं,
यों न कहना अस्त हूँ मैं।
हाय रे, ऐसा न कहना,
है कि जो वैसा न कहना,
कह न देना जागता हूँ,
आदमी से भागता हूँ,
कह न देना मौन हूँ मैं,
खुद न समझूँ कौन हूँ मैं,
देखना कुछ बक न देना,
उन्हें कोई शक न देना।
हे सजीले हरे सावन!
ऐ कि मेरे पुण्य पावन,
तुम बरस लो वे न बरसें,
पाँचवें को वे न तरसें।”

प्रसंग

कवि सावन को अंतिम चेतावनी देते हैं कि वह जेल की वास्तविक निराशा और भय की बात भूलकर भी घर पर उजागर न करे।

सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)

कवि कहते हैं कि सावन! उनसे कहना कि भवानी यहाँ खेलता-कूदता है और दुखों को डटकर दूर भगा देता है। उनसे यह कहना कि मैं मस्त हूँ, भूलकर भी यह मत कह देना कि मेरा जीवन अस्त (निराश) हो चुका है। हे सावन, सावधान रहना! जो मेरी वास्तविक दशा है, वह सच वहाँ मत बोल देना। उनसे यह मत कह देना कि मैं रात भर जागता रहता हूँ, अवसाद के कारण आदमियों को देखकर भागता हूँ, गुमसुम व मौन रहता हूँ और अपनी सुध-बुध खो चुका हूँ। संभलकर बोलना, कहीं तुम्हारी जुबान से कोई ऐसा अनर्गल शब्द न निकल जाए जिससे उन्हें मेरी वास्तविक व्यथा पर कोई संदेह हो जाए। हे मेरे पवित्र सावन! तुम चाहे जितना जल बरसा लो, किंतु मेरे पिता और माता की आँखें न बरसें और वे अपने लाडले पाँचवें बेटे के वियोग में तड़पने न पाएँ।

काव्य-सौंदर्य (शिल्प एवं भाव-पक्ष)

1. भाव-पक्ष

  • पारिवारिक तादात्म्य: स्वाधीनता सेनानी के व्यक्तिगत पारिवारिक स्नेह और राष्ट्रीय कर्तव्य के अंतर्द्वंद्व का अत्यंत स्वाभाविक चित्रण।
  • मातृ-पितृ भक्ति: पिता के पौरुष और माँ की ममता के प्रति अगाध श्रद्धा तथा परिजनों को दुख से बचाने के लिए ‘सफेद झूठ’ बोलने की मार्मिक चेष्टा।
  • रस: वात्सल्य, करुण एवं शांत रस का अद्भुत परिपाक।

2. कला-पक्ष (शिल्प-सौंदर्य)

  • भाषा: भवानी प्रसाद मिश्र की विशिष्ट सहज, बोलचाल की प्रवाहमयी खड़ी बोली, जिसमें तुकबंदी और सादगी का अनूठा सम्मोहन है (कवि को ‘सहजता का कवि’ कहा जाता है)।
  • शैली: आत्मकथ्यात्मक, संवादात्मक एवं संबोधनपरक गीति-शैली (सावन को दूत बनाकर कालिदास के ‘मेघदूत’ की परंपरा का आधुनिक निर्वाह)।
  • प्रमुख अलंकार:
    • मानवीकरण अलंकार: सावन को सजीला, पुण्य पावन और संदेशवाहक के रूप में चित्रित करना।
    • मुहावरेदार प्रयोग: ‘सोने पर सुहागा’, ‘पाँव पीछे हटाना’, ‘कोख लजाना’, ‘हेटे लगना’।
    • यमक व श्लेष की छटा: “किंतु यह बस बड़ा बस है / इसी बस से सब विरस है” (‘बस’ शब्द का लाचारी और केवल के अर्थ में प्रयोग)।
    • अनुप्रास अलंकार: “पुण्य पावन”, “पानी गिर रहा है”, “भुजा भाई”, “दुख में वह गढ़ी मेरी”
    • पुनरुक्ति प्रकाश: “सींचि-सींचि” की भांति “पानी गिर रहा है, बहुत पानी गिर रहा है”, “चार भाई चार बहिनें”
  • लय एवं बिंब-विधान: छोटी-छोटी पंक्तियों के कारण कविता में एक अनोखी गीतात्मकता और प्रवाह है। बारिश की झड़ी, पिता का व्यायाम और दंड-बैठक तथा माँ का ढांढस बंधाना सजीव दृश्य बिंब प्रस्तुत करते हैं।

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