‘अजपा जाप’ से आप क्या समझते है
” आध्यात्मिक मार्ग में ईश्वर के किसी भी नाम का ध्यानपूर्वक निरंतर रटन करना ” जप या जाप ” कहलाता है
जाप तीन प्रकार के होते है
1 – वाचिक जाप (बोल कर जपना जिसे दूसरे लोग भी सुन सकते है
2 – उपांशु जाप (होठ हिले पर दूसरे लोग नही सुन सके, धीमी आवाज में)
3 – मानस जाप (कंठ जीभ और होठ न हिले, मन ही मन जपना )
मानस जाप इन सबमें सर्वश्रेष्ठ हे, इसे जपो का राजा कहा जाता है परंतु जब साधक निरंतर साधना के द्वारा इन सबसे ऊपर की अवस्था में चौथी अवस्था में पहुंचता है उसे “अजपा जप ” कहते है ।
जैसा कि इसके नाम से स्पष्ट है की इसमें कुछ जपने का प्रयास नही किया जाता बल्कि सहज ही श्वासो की लय के साथ नस नाडियो में नाम चलता रहता है
निष्कर्ष रूप में कह सकते हे की ” जाप ” ओर अजपा जाप दोनो में शब्द की समानता भले ही हो पर दोनो में कोई सीधा संबंध नही है
एक भक्ति की शुरुआत है और दूसरा भक्ति की उच्चतम अवस्था ।
अनुराग सागर नामक ग्रंथ में इससे संबंधित एक पंक्ति भी आई है – “ जाप अजपा हो सहज ध्वनि, परखी गुरुगम धारिए होत जप रसना विना करमाल बिंदु निर्वारीय “
अजपा जाप शब्द का अर्थ कबीर का कहना है-‘मेरा मन जब राम का स्मरण करता है तब वह राममय हो जाता है इस प्रकार जब मन राम ही हो गया तो फिर मैं किसके सामने अपना शिर झुकाऊं?”
सुमिरन तीन प्रकार का होता है:-
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‘जाप’ :- जो कि बाह्य क्रिया होती है।
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‘अजपा जाप’ :- जिसके अनुसार साधक बाहरी जीवन का परित्याग कर आभ्यंतरिक जीवन में प्रवेश करता है।
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‘अनाहत’ :- जिसके द्वारा साधक अपनी आत्मा के गूढ़तम अंश में प्रवेश करता है जहाँ पर अपने आप की पहचान के सहारे वह सभी स्थितियों को पार कर अंत में कारणातीत हो जाता है।
इन क्रमों की ओर कबीर ने इस प्रकार संकेत किया है-‘जाप मर जाता है अजपा- जाप भी नष्ट हो जाता है और अनाहत भी नहीं रह जाता, जब सुरति शब्द में लीन हो जाती है तब उसका जन्म व मरण के चक्कर का भय – छूट जाता है।
मेरा मन सुमिरे राम को, मेरा मन रामहि पाहि । जब मन रामै है रहा, सीस नवावों काहि ॥
जाप मरे अजपा मरे, अनहद हू मरि जाइ । सुरत समानी शब्द में, ताहि काल नहिं खाइ ।।
अजपा जाप
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कभी कभी इसे सहज जाप भी कह दिया जाता है।
- यह जाप का ही एक स्वरूप है ।
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इसमें न तो नाम का उच्चारण किया जाता है और न होठ हिलते हैं।
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इसमें न अँगुलियां हिलती है और न माला पर उपयोग ही होता है।
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केवल अन्तक्रिया होती रहती है।
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बौद्ध सिद्धा की साधना पद्धति में श्वासों का निरोध करके चडाग्नि प्रज्वलित की जाती थी ‘एव’ बीजाक्षर को ध्यान में लाकर इस प्रकार साधना की जाती थी।
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जिससे यह शब्द प्रत्येक श्वास-प्रश्वास में स्वत निकलने लग जाय। इसे अजपा जाप का नाम दिया जाता था।
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इसमें तांत्रिक बीजार्थ तथा हठयोग दोनों का समन्वय हो जाता था और नाम-स्मरण का परम्परागत विधान भी आ जाता था ।
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कहा जाता है कि नाथपंथ में इसी साधना के पीछे अजपा जाप का नाम प्राप्त किया।
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इसमें मन को शून्य में निहित कर दिया जाता है और ‘एव’ वे स्थान पर ‘सोऽहम्’ का ध्यान किया जाता है।
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इसी ‘सोऽहम्’ शब्द-ज्योति प्रकट होती है और अन्तर एवं बाहर प्रकाश हो जाता है।
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कबीर ने ‘सोऽहम्’ का परित्याग तो नही किया किन्तु उनके ध्यान का केन्द्र बिन्दु प्राय ‘राम हो रहा है।
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कबीर के ‘अजपा जाप’ की चरम परिणति ‘आपा माह आप’ में हाती है।
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‘अजपाजप’ ध्यान-रूप है। ध्यान को नाम में लगा देना ‘अजपा जाप’ की वह स्थिति है जो ‘सुरति’ की समकक्ष है।
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उसकी एक स्थिति यह है जिसमें ध्यान, ध्यय और ध्याता निरालब दशा में विलीन हो जाते हैं।
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अजपाजप अभ्यास से बनता है और आत्मस्वरूप में डूब जाता है। यही सहज जाप भी है। ( कबीर एक विवेचन, डा० सरनामसिंह शर्मा)
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नाम स्मरण की एक पद्धति है।
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इसमें जप के बाह्य साधनों, जैसे भाला फेरना, उँगलियों पर गिनते हुए उच्चारण करना आदि को त्यागकर श्वास-प्रश्वास की अंतःक्रिया के द्वारा जप किया जाता है।
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इसी को सिद्धों ने ‘वज्रजाप’ और नाथयोगियों ने ‘अजपाजाप’ नाम दिया है।
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सिद्धों की साधना में चंडाग्नि’ प्रज्वलित करके ‘एवम् बीजाक्षर का जाप किया जाता था।
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नाथपंथियों में यह एवम्’ के स्थान पर सोहम्’ के रूप में प्रचलित हुआ।
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उनके अनुसार इस प्रकार के जाप के द्वारा इंद्रियों का निग्रह संभव है।
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सिद्धों के अनुसार इस जाप के द्वारा ‘णिरक्खर’ (निरक्षर) या शून्यावस्था की भी सिद्धि होती है।
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कबीर तथा अन्य संत भी इस जप की मूल भावना को स्वीकार करते हैं। इसे ‘सहज जप’ भी कहा गया है, यद्यपि इसकी साधना सरल नहीं है। वस्तुतः अजपाजाप का लक्ष्य चित्तवृत्ति का निरोध करते हुए तन्मय भाव से सहज जप है।
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यह एक प्रकार से साधक और साध्य की एकता का मार्ग है। जब साधक का ध्यान शब्दों को दुहराने या अन्य वाह्य क्रियाओं से हटकर इतना सहज हो जाता है कि श्वास क्रिया के साथ वह स्वतः एकाकार हो जाता है तो अजपाजाप की स्थिति होती है।
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इसमें अपने इष्ट या साध्य के सानिध्य की अनुभूति निरन्तर होती रहती है। (कबीर, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी)
सहज
भारतीय साहित्य में ‘सहज’ शब्द का प्रयोग अत्यन्त प्राचीन काल में भी हुआ है। इसीलिए इस शब्द के प्राचीन साहचर्य के बारे में विद्वानों में मतभेद हैं किन्तु इसमें सन्देह नहीं कि सिद्धों के समय से यह शब्द विशेष प्रचलन रहा है। सिद्ध साहित्य, नाथ साहित्य तथा हिन्दी के संत कवियों के साहित्य में इस शब्द का प्रयोग अपना महत्त्वपूर्ण अर्थ रखता है।
सिद्ध लोग सहजावस्था को भाव और अभाव- दोनों से परे की स्थिति मानते हैं। सिद्ध तिल्लोपाद कहते हैं : सहजें भावाभाव ण पुच्छह सुण्ण करुण वहि समरस इच्छह ।।
सिद्ध लोग ‘सहज’ को निर्वाण से भी अधिक महत्त्व देते हैं। सरहपाद के अनुसार सहज छड्डि जे णिव्वाण भाविउ । णउ परमत्थ एक्क ते साहिउ ।। 【दोहाकोश】
‘सहज’ का सीधा-सादा अर्थ है : – एक अकृत्रिम स्वाभाविक स्थिति पर सिद्धों ने सहज को एक ऐसी साधना भी माना जिसमें प्रज्ञा और उपाय के द्वारा परमशक्ति को प्राप्त किया जा सकता है।
सिद्धों ने ‘सहज’ में शून्य की धारणा को भी स्वीकार किया है। नाथपंथियों ने जहाँ कहीं ‘सहज’ शब्द का प्रयोग किया है, वहाँ उसे प्रायः ‘स्वाभाविक’ के अर्थ में ही स्वीकार किया है। गोरखनाथ कहते हैं : हबकि न बोलिबा, ठबकि न चालिबा, धीरे धरिबा पाव गरब न करिबा, सहजै रहिबा, भणत गोरष राव।। (गोरखबानी)
गिरही जो सो गिरहै काया, अभ्यन्तर की त्यागे माया सहज शील का धरै शरीर, सो गिरही गंगा का नीर।। (कबीर, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी)
सुरति-निरति
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सिद्ध साहित्य में सुरति से मिलते-जुलते शब्द ‘सुरअविलास’ (सरहपा) तथा ‘सुरअबीर’ (कण्हपा) प्राप्त होते हैं। ये शब्द रति अर्थात् प्रेमक्रीड़ा के वाचक हैं।
- ये शब्द संत साहित्य के अति परिचित शब्द हैं, किन्तु पहले के साहित्य में इनका प्रयोग कम हुआ है।
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गोरखनाथ की रचनाओं में ‘सुरति’ और ‘निरति दोनों शब्दों का एक साथ प्रयोग मिलता है।
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गोरखबानी में सम्मिलित ‘मछीन्द्र गोरख बोध’ में सुरति शब्द ‘सोचित’ अर्थात् शब्दोन्मुखचित्त के लिए तथा ‘निरति’ शब्द निरालंब स्थिति के लिए प्रयुक्त हुआ है : अवधू सबद अनाहद सुरति सोचित निरति निरालंभ लगे बंध। दुबध्या मेटि सहज में रहे। ऐसा बिचारि मछिंद्र कहै ।। (गोरखबानी)
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संतों द्वारा प्रयुक्त सुरति-निरति शब्द पर नाथपंथी प्रभाव स्पष्ट है। कबीर लिखते हैं :- सुरति समांणी निरति मैं निरति रही निरधार सुरति निरति परचा भया, तब खुले स्यंभ दुवार ।।
सुरति समांणी निरति मैं, अजपा मांहै जाप लेख समांणा अलेख मैं, आपा मांहै आप ।।
यहाँ ‘निरति’ शब्द निरालंब स्थिति के लिए ही प्रयुक्त है। यह स्थिति सुरति की स्थिति के ऊपर है। डॉ० बड़थ्वाल ‘सुरति का सम्बन्ध स्मृति से मानते हैं।
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डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार भी इसका सम्बन्ध स्मरण या स्मृति से ही है।
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पं० परशुराम चतुर्वेदी के अनुसार सुरति’ का अर्थ ‘शब्दोन्मुख चित्त’ है।
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‘सुरति’ शब्द में स्मृति, ध्यान, प्रेम- इन सबका साहचर्य जुड़ा हुआ है।
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लौकिक विषयों की ओर उन्मुख चित्तवृत्ति परमप्रिय ईश्वर की ओर उन्मुख होकर ‘सुरति ‘ कही जाती है।
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डॉ० बड़थ्वाल के अनुसार ‘निरति’ का अर्थ ‘पूर्ण तन्मयता’ की स्थिति है।
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डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार वाह्य भ्रमजाल से निरत होकर अंतर्मुख होने को ही ‘निरति’ कहते हैं।
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पं० परशुराम चतुर्वेदी के अनुसार ‘निरति की दशा शब्द’ तथा ‘सुरति के एक रूप हो जाने ही आती है। उनके अनुसार निरति सुरति की वह चरमावस्था है जहाँ काल के चंगुल से मुक्त होव सहज समाधिस्थ जीव स्वयं परमात्म रूप हो जाता है। (कबीर, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी)