आरोह (भाग-1) में कबीरदास के प्रसिद्ध पद संदर्भ, प्रसंग व्याख्या एवं काव्य-सौंदर्य

आरोह (भाग-1) में कबीरदास के प्रसिद्ध पद संदर्भ, प्रसंग व्याख्या एवं काव्य-सौंदर्य

भक्तिकाल की निर्गुण ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रतिनिधि कवि कबीरदास के प्रसिद्ध पद “हम तौ एक एक करि जाना…” का संदर्भ, प्रसंग, प्रत्येक पंक्ति की सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ) एवं काव्य-सौंदर्य:

पाठ-परिचय एवं संदर्भ

  • कवि: कबीरदास
  • मूल स्रोत: कबीर वांग्मय (खंड-2, सबद) / कबीर ग्रंथावली
  • पाठ्यपुस्तक: आरोह (भाग-1) – कक्षा 11 (ऐच्छिक/अनिवार्य कोर)
  • संदर्भ: प्रस्तुत पद निर्गुण संत काव्यधारा के प्रवर्तक कबीरदास द्वारा रचित पद से उद्धृत है।
  • केंद्रीय विषय: ईश्वर (परमात्मा) की अद्वैत सत्ता (एकेश्वरवाद) का प्रतिपादन, बाह्याडंबरों का खंडन और कण-कण में एक ही ब्रह्म की व्याप्ति का रहस्योद्घाटन।

मूल पद

“हम तौ एक एक करि जाना।
दोइ कहैं तिनहीं कौं दोजग जिन नाहिंन पहिचाना॥
एकै पवन एक ही पानी एकै जोति समाना।
एकै खाक गढ़े सब भांडै एकै कोंहरा साना॥
जैसे बाढ़ी काष्ट ही काटै अगिनि न काटै कोई।
सब घटि अंतरि तूही व्यापक धरै सरूपे सोई॥
माया देखि कै जगत लुभाना काहे रे नर गरबाना।
निरभै भया कछू नहिं ब्यापै कहै कबीर दिवाना॥”

प्रसंग

कबीरदास जी परमात्मा को सृष्टि के कण-कण में समाया हुआ मानते हैं। वे उन अज्ञानी लोगों को फटकारते हैं जो परमात्मा को अलग-अलग रूपों (ईश्वर-अल्लाह, जीव-ब्रह्म) में बांटकर द्वैतभाव रखते हैं। वे विभिन्न सांसारिक उदाहरणों द्वारा ईश्वर की सर्वव्यापकता सिद्ध करते हैं।

प्रत्येक पंक्ति की सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)

  • “हम तौ एक एक करि जाना। दोइ कहैं तिनहीं कौं दोजग जिन नाहिंन पहिचाना॥”
    • व्याख्या: कबीरदास जी दृढ़तापूर्वक कहते हैं कि हमने तो आत्म-साक्षात्कार करके उस परमपिता परमात्मा को एक ही जाना है (अर्थात जीव और ब्रह्म एक ही हैं)। जो लोग परमात्मा के स्वरूप को नहीं पहचानते और अज्ञानतावश उसे दो (द्वैत/विभाजित) बताते हैं, उनके लिए यह संसार अथवा परलोक ‘दोजग’ (नरक) के समान है; क्योंकि वे भेद-भाव के अज्ञान में ही भटकते रहते हैं।
  • “एकै पवन एक ही पानी एकै जोति समाना॥”
    • व्याख्या: कबीर अपने एकेश्वरवाद के पक्ष में तर्क देते हुए कहते हैं कि संपूर्ण संसार में एक ही हवा बहती है, सभी जीवों के लिए एक ही जैसा जल है और समस्त प्राणियों के भीतर एक ही परमात्मा रूपी दिव्य ज्योति (चेतना) समाई हुई है। जब प्राकृतिक तत्वों में कोई भेद नहीं है, तो परमात्मा में भेद कैसे हो सकता है?
  • “एकै खाक गढ़े सब भांडै एकै कोंहरा साना॥”
    • व्याख्या: जिस प्रकार कुम्हार (कोंहरा) एक ही प्रकार की मिट्टी (खाक) को एक साथ सानकर (गूंधकर) अलग-अलग आकार-प्रकार के बर्तन (भांडै) गढ़ता है; ठीक उसी प्रकार उस परम-सृष्टिकर्ता रूपी कुम्हार ने पंचतत्वों (क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर) की एक ही मिट्टी से हम सभी मनुष्यों के अलग-अलग शरीरों का निर्माण किया है। भीतर से सभी जीव एक समान हैं।
  • “जैसे बाढ़ी काष्ट ही काटै अगिनि न काटै कोई॥”
    • व्याख्या: कबीर आत्मा की अमरता और अद्वैतता का दृष्टांत देते हैं कि जिस प्रकार बढ़ई (बाढ़ी) लकड़ी (काष्ट) को तो काट सकता है, किंतु उस लकड़ी के भीतर अदृश्य रूप से समाई हुई अग्नि को कोई नहीं काट सकता। इसी प्रकार मृत्यु केवल नश्वर शरीर की होती है, शरीर के भीतर मौजूद अविनाशी परमात्मा (आत्मा) को कोई नष्ट नहीं कर सकता।
  • “सब घटि अंतरि तूही व्यापक धरै सरूपे सोई॥”
    • व्याख्या: हे ईश्वर! संसार के प्रत्येक घट (हृदय/शरीर) के भीतर तू ही विद्यमान है। भले ही तूने बाहर से प्राणियों के अलग-अलग रूप और वेश धारण कर रखे हों, किंतु आंतरिक सत्ता के रूप में तू सर्वत्र एक ही है।
  • “माया देखि कै जगत लुभाना काहे रे नर गरबाना॥”
    • व्याख्या: कबीर संसार के नश्वर मनुष्यों को चेतावनी देते हुए कहते हैं कि हे अज्ञानी मनुष्य! तू इस सांसारिक धन-दौलत, रूप और भौतिक माया को देखकर उस पर क्यों ललचा रहा है? इस झूठी और क्षणभंगुर माया पर तू इतना घमंड (गरबाना) क्यों करता है?
  • “निरभै भया कछू नहिं ब्यापै कहै कबीर दिवाना॥”
    • व्याख्या: कबीर स्वयं को प्रभु-प्रेम में मतवाला (दिवाना) कहते हुए उद्घोष करते हैं कि जो व्यक्ति माया के बंधनों से मुक्त होकर निर्भय (ईश्वर के ज्ञान से युक्त) हो जाता है, उसे संसार का कोई भय या मोह-जाल नहीं सताता। वह जन्म-मरण और लोक-लाज के बंधन से पार हो जाता है।

काव्य-सौंदर्य (शिल्प एवं भाव-पक्ष)

1. भाव-पक्ष

  • दार्शनिक आधार: अद्वैत वेदांत और सूफ़ी रहस्यवाद का सुंदर समन्वय (जीव और ब्रह्म की एकता का प्रतिपादन)।
  • सामाजिक चेतना: धार्मिक संकीर्णता, जाति-भेद और बाह्य आडंबरों पर करारा प्रहार।
  • रस: शांत रस और निर्वेद (वैराग्य) भाव की प्रधानता।

2. कला-पक्ष (शिल्प-सौंदर्य)

  • भाषा: कबीर की सहज, फक्कड़ और प्रवाहमयी सधुक्कड़ी (पंचमेल खिचड़ी) भाषा, जिसमें अवधी, ब्रज, राजस्थानी और फारसी/अरबी (दोजग) शब्दों का स्वाभाविक मेल है।
  • शैली: उपदेशात्मक, तार्किक एवं गेय पद-शैली।
  • प्रमुख अलंकार:
    • यमक अलंकार: “एक एक” में—प्रथम ‘एक’ का अर्थ परमात्मा और द्वितीय ‘एक’ का अर्थ ‘एक रूप/एक ही’ है।
    • दृष्टांत व उदाहरण अलंकार: बढ़ई और लकड़ी का उदाहरण (“जैसे बाढ़ी काष्ट ही काटै…”) तथा कुम्हार और मिट्टी का उदाहरण।
    • अनुप्रास अलंकार: “काष्ट ही काटै”, “कहै कबीर”, “एकै खाक गढ़े सब भांडै एकै कोंहरा साना”
    • रूपकातिशयोक्ति: ईश्वर को ‘कुम्हार’ और मानव शरीर को ‘बर्तन’ के रूप में देखना।
  • संगीतात्मकता: अंत्यानुप्रास के कारण पद में सुंदर लयात्मकता और गेयता है।

 कबीरदास के प्रसिद्ध पद “संतो देखत जग बौराना…” का संदर्भ, प्रसंग, प्रत्येक पंक्ति की सप्रसंग व्याख्या एवं काव्य-सौंदर्य:

पाठ-परिचय एवं संदर्भ

  • कवि: कबीरदास
  • मूल स्रोत: कबीर वांग्मय (सबद) / कबीर ग्रंथावली
  • पाठ्यपुस्तक: आरोह (भाग-1) – अनिवार्य (Core)
  • संदर्भ: प्रस्तुत पद निर्गुण ज्ञानाश्रयी काव्यधारा के शीर्ष कवि कबीरदास द्वारा रचित पद से उद्धृत है।
  • केंद्रीय विषय: हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों में व्याप्त बाह्याडंबरों, पाखंड, अंधविश्वासों, झूठे धार्मिक दिखावे तथा अज्ञानी धर्मगुरुओं पर तीखा प्रहार।

मूल पद

“संतो देखत जग बौराना।
साँच कहौ तौ मारन धावै, झूठे जग पतियाना॥
नेमी देखा धरमी देखा, प्रात करै अस्नाना।
आतम मारि पखानहि पूजै, उनमें कछु नहिं ज्ञाना॥
बहुतक देखा पीर औलिया, पढ़ैं कितब कुराना।
करैं मुरीद तदबीर बतावैं, उनमें उहै जो ज्ञाना॥
आसन मारि डिंभ धरि बैठे, मन में बहुत गुमाना।
साखी सबदी गावत भूले, आतम खबरि न जाना॥
हिंदू कहैं मोहि राम पियारा, तुरुक कहैं रहमाना।
आपस में दोउ लरि-लरि मूए, मरम न काहू जाना॥
घर-घर मंतर देत फिरत हैं, महिमा के अभिमाना।
गुरु के सहित सिख्य सब बूड़े, अंतकाल पछिताना॥
कहै कबीर सुनौ हो संतो, ई सब भरम भुलाना।
केतिक कहौं कहा नहिं मानै, सहजै सहज समाना॥”

प्रसंग

कबीरदास जी सच्चे साधकों (संतों) को संबोधित करते हुए कहते हैं कि यह संपूर्ण संसार पागल हो गया है। लोग बाह्य नियमों, पत्थरों, समाधियों और धार्मिक ग्रंथों में उलझकर अपने अंतःकरण में बसे ईश्वर को भूल चुके हैं। वे दोनों धर्मों के रूढ़िवादी अनुयायियों को आईना दिखाते हैं।

प्रत्येक पंक्ति की सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)

  • “संतो देखत जग बौराना। साँच कहौ तौ मारन धावै, झूठे जग पतियाना॥”
    • व्याख्या: कबीर कहते हैं कि हे सज्जनों! देखो, यह सारा संसार बौरा (पागल) गया है। इसकी मति उल्टी हो चुकी है। यदि संसार के लोगों को ईश्वर और आत्मा का खरा व कड़वा सत्य बताओ, तो वे क्रोधित होकर मारने दौड़ते हैं; और यदि उनसे झूठी, पाखंडी व आडंबरपूर्ण बातें कही जाएँ, तो वे उस पर तुरंत विश्वास (पतियाना) कर लेते हैं।
  • “नेमी देखा धरमी देखा, प्रात करै अस्नाना। आतम मारि पखानहि पूजै, उनमें कछु नहिं ज्ञाना॥”
    • व्याख्या: कबीर हिंदू धर्म के दिखावटी साधकों पर प्रहार करते हुए कहते हैं कि मैंने बहुत से नियम-धरम पालने वाले लोग देखे हैं, जो प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर पवित्र नदियों में स्नान करते हैं। किंतु वे अपने भीतर मौजूद अंतरात्मा (परमात्मा के अंश) को मारकर निर्जीव पत्थरों और मूर्तियों की पूजा करते हैं। कबीर के अनुसार, ऐसे लोगों में वास्तविक आत्म-ज्ञान लेशमात्र भी नहीं है।
  • “बहुतक देखा पीर औलिया, पढ़ैं कितब कुराना। करैं मुरीद तदबीर बतावैं, उनमें उहै जो ज्ञाना॥”
    • व्याख्या: मुस्लिम धर्म के पाखंडियों पर कटाक्ष करते हुए कबीर कहते हैं कि मैंने ऐसे कई पीर, फकीर और धर्मगुरु (औलिया) देखे हैं, जो धार्मिक पुस्तकें और कुरान शरीफ पढ़ते हैं। वे लोगों को अपना शिष्य (मुरीद) बनाते हैं और उन्हें खुदा तक पहुँचने के उपाय (तदबीर) बताते हैं। वास्तव में, वे अपने शिष्यों को उतना ही बता पाते हैं जितना अल्प व सतही ज्ञान उनके अपने पास होता है।
  • “आसन मारि डिंभ धरि बैठे, मन में बहुत गुमाना। साखी सबदी गावत भूले, आतम खबरि न जाना॥”
    • व्याख्या: कबीर योगियों और तपस्वियों के ढोंग को उजागर करते हुए कहते हैं कि कई लोग समाधि का आसन लगाकर, आडंबर और पाखंड (डिंभ) धारण करके बैठ जाते हैं। उनके मन में अपने तपस्वी होने का भारी घमंड भरा रहता है। वे कबीर के पदों (साखी और सबद) को गाते-गाते ईश्वर के मूल संदेश को ही भूल चुके हैं और उन्हें स्वयं अपनी आत्मा की कोई सुध-बुध (खबर) नहीं है।
  • “हिंदू कहैं मोहि राम पियारा, तुरुक कहैं रहमाना। आपस में दोउ लरि-लरि मूए, मरम न काहू जाना॥”
    • व्याख्या: हिंदू कहते हैं कि उन्हें राम प्रिय हैं और मुस्लिम कहते हैं कि उन्हें रहमान (अल्लाह) प्रिय हैं। नाम के इस भेद पर दोनों संप्रदायों के लोग आपस में लड़-लड़कर नष्ट हो रहे हैं, किंतु दोनों में से किसी ने भी ईश्वर की उस अद्वैत सत्ता के मूल मर्म (सत्य) को नहीं समझा कि राम और रहमान एक ही परम चेतना के दो नाम हैं।
  • “घर-घर मंतर देत फिरत हैं, महिमा के अभिमाना। गुरु के सहित सिख्य सब बूड़े, अंतकाल पछिताना॥”
    • व्याख्या: समाज में पाखंडी गुरु घर-घर जाकर लोगों के कान में गुप्त मंत्र फूंकते फिरते हैं और अपनी सांसारिक महिमा व सिद्धियों के घमंड में चूर रहते हैं। कबीर चेतावनी देते हैं कि अज्ञान के इस भवसागर में ऐसे झूठे गुरुओं के साथ-साथ उनके अंधे शिष्य भी डूब जाते हैं (बूड़े) और अंत समय में उनके हाथ केवल पश्चाताप ही लगता है।
  • “कहै कबीर सुनौ हो संतो, ई सब भरम भुलाना। केतिक कहौं कहा नहिं मानै, सहजै सहज समाना॥”
    • व्याख्या: अंत में कबीरदास जी कहते हैं कि हे साधु संतों, सुनो! ये सारे लोग सांसारिक भ्रम और मायाजाल में पड़कर भटके हुए हैं। मैंने इन्हें कितना समझाया, पुकार-पुकार कर कहा, किंतु ये किसी की बात मानने को तैयार नहीं हैं। कबीर का मूल संदेश यह है कि परमात्मा को कठोर बाह्य क्रियाकलापों से नहीं पाया जा सकता; वह तो सहज साधना और अंतर्मन के निश्छल प्रेम (सहज भाव) से स्वयं ही अंतरात्मा में समा जाता है।

काव्य-सौंदर्य (शिल्प एवं भाव-पक्ष)

1. भाव-पक्ष

  • तार्किक एवं विद्रोही स्वर: कबीर एक निर्भीक समाज-सुधारक के रूप में सामने आते हैं, जो बिना किसी पक्षपात के हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों की कुरीतियों पर तीखा प्रहार करते हैं।
  • आत्म-ज्ञान पर बल: बाह्य पूजा-पाठ (स्नान, मूर्ति-पूजा, समाधि, मंत्र-दीक्षा) की व्यर्थता सिद्ध कर अंतरात्मा के ज्ञान को सर्वोपरि माना गया है।
  • रस: शांत रस एवं व्यंग्य का तीखा पुट।

2. कला-पक्ष (शिल्प-सौंदर्य)

  • भाषा: कबीर की तल्ख, मुहावरेदार और सजीव सधुक्कड़ी भाषा। इसमें अवधी, ब्रज, फारसी और अरबी के व्यावहारिक शब्दों का अत्यंत सटीक प्रयोग है (उदा. बौराना, पखान, मुरीद, तदबीर, डिंभ, तुरुक)।
  • शैली: उपदेशात्मक, व्यंग्यात्मक, संवादात्मक एवं गेय पद-शैली।
  • प्रमुख अलंकार:
    • अनुप्रास अलंकार: “आतम मारि पखानहि पूजै”, “कितब कुराना”, “कहै कबीर”, “सहजै सहज समाना”
    • पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार: “लरि-लरि”, “घर-घर”
    • विरोधाभास व विडंबना: सत्य कहने पर मारना और झूठ पर विश्वास करना।
  • गेयता: पद में लोकधुनों की लय, आंतरिक संगीतात्मकता और अंत्यानुप्रास का निर्दोष प्रवाह है।

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