कक्षा 11 हिंदी ऐच्छिक कबीर के पद सप्रसंग व्याख्या | RPSC & Elective Hindi Notes
कक्षा 11 की पाठ्यपुस्तक अंतरा (भाग-1) में संकलित निर्गुण संत कवि कबीरदास के दोनों पदों—‘अरे इन दोहुन राह न पाई’ और ‘बालम, आवो हमारे गेह रे’—का संदर्भ, प्रसंग, प्रत्येक पंक्ति की सप्रसंग व्याख्या एवं काव्य-सौंदर्य:
पद 1: अरे इन दोहुन राह न पाई
“अरे इन दोहुन राह न पाई।हिंदू अपनी करै बड़ाई गागरि छुअन न देई।बेस्या के पायन तर सोवै यह देखो हिंदुआई॥मुसलमान के पीर औलिया मुरगी मुरगा खाई।खाला केरी बेटी ब्याहैं घरहीं में करैं सगाई॥बाहर से इक मुरदा लाए धोइ धाइ चढ़वाया।सब सखियाँ मिलि जेवन बैठीं घर भर करैं बड़ाई॥हिंदून की हिंदुआई देखी तुरकन की तुरकाई।कहै कबीर सुनो हो संतो कौन राह ह्वै जाई॥”
संदर्भ एवं प्रसंग
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संदर्भ: प्रस्तुत पद निर्गुण ज्ञानाश्रयी शाखा के शीर्ष कवि कबीरदास द्वारा रचित है, जो अंतरा (भाग-1) में संकलित है।
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प्रसंग: कबीरदास जी तत्कालीन समाज में प्रचलित हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों के खोखले रीति-रिवाजों, बाह्याडंबरों, छुआछूत और नैतिक विरोधाभासों पर सीधा प्रहार करते हुए बताते हैं कि दोनों ही ईश्वर प्राप्ति के सच्चे मार्ग से भटक चुके हैं।
प्रत्येक पंक्ति की सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)
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“अरे इन दोहुन राह न पाई। हिंदू अपनी करै बड़ाई गागरि छुअन न देई। बेस्या के पायन तर सोवै यह देखो हिंदुआई॥”
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व्याख्या: कबीरदास जी कहते हैं कि इन दोनों (हिंदू और मुसलमान) को ईश्वर प्राप्ति की सच्ची राह नहीं मिली है। हिंदू अपनी जाति और धर्म की श्रेष्ठता का झूठा घमंड करते हैं और छुआछूत के कारण दूसरों को अपनी पानी की मटकी (गागरि) तक नहीं छूने देते। किंतु विडंबना यह है कि वही तथाकथित श्रेष्ठ हिंदू वैश्याओं के चरणों में जाकर सोते हैं। कबीर व्यंग्य करते हैं कि देखो, यह इनका कैसा खोखला धर्म और कैसी इनकी ‘हिंदुआई’ है!
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“मुसलमान के पीर औलिया मुरगी मुरगा खाई। खाला केरी बेटी ब्याहैं घरहीं में करैं सगाई॥”
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व्याख्या: मुसलमानों के धर्मगुरु (पीर-औलिया) दया और करुणा का उपदेश तो देते हैं, किंतु स्वयं स्वाद के लिए मुर्गे-मुर्गियों (निर्दोष जीवों) की हत्या करके खाते हैं। वे रिश्तों की मर्यादा भूलकर अपनी मौसी (खाला) की बेटी से ही निकाह कर लेते हैं और अपने घर में ही रिश्ते जोड़ लेते हैं।
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“बाहर से इक मुरदा लाए धोइ धाइ चढ़वाया। सब सखियाँ मिलि जेवन बैठीं घर भर करैं बड़ाई॥”
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व्याख्या: वे बाहर से एक मृत पशु (मुरदा) काटकर लाते हैं, उसे धो-धाकर आग पर पकाते हैं। फिर घर की सभी स्त्रियाँ और सगे-संबंधी मिलकर उस मांस को बड़े चाव से खाने बैठते हैं और घर भर में उस स्वाद की प्रशंसा करते हैं।
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“हिंदून की हिंदुआई देखी तुरकन की तुरकाई। कहै कबीर सुनो हो संतो कौन राह ह्वै जाई॥”
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व्याख्या: कबीर कहते हैं कि मैंने हिंदुओं का खोखलापन देख लिया और मुसलमानों की कथनी-करनी का भेद भी देख लिया। हे संतो, सुनो! जब दोनों ही धर्म पाखंड, हिंसा और दिखावे में लिप्त हैं, तो कोई भी विवेकशील मनुष्य ईश्वर प्राप्ति के लिए किस रास्ते पर चले? दोनों ही मार्ग भटकाव के हैं।
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पद 2: बालम, आवो हमारे गेह रे
“बालम, आवो हमारे गेह रे।तुम्ह बिनु दुखिया देह रे॥सब कोइ कहै तुम्हारी नारी, मोकौं लगत संदेहो रे।दिल से नहीं मिलाया जब लग, तब लग कैसा नेहो रे॥अन्न न भावै नींद न आवै, गृह बन धरै न धीर रे।कामिनि कूं है बालम प्यारा, ज्यों प्यासे कूं नीर रे॥है कोई ऐसा पर-उपकारी, पिव सौं कहै सुनाइ रे।अब तो बेहाल कबीर भयो है, बिनु देखे जिय जाइ रे॥”
संदर्भ एवं प्रसंग
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संदर्भ: प्रस्तुत पद कबीरदास द्वारा रचित है, जो अंतरा (भाग-1) में संकलित है।
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प्रसंग: यह पद कबीर की रहस्यवादी और दांपत्य भाव की भक्ति का सुंदर उदाहरण है। इसमें जीवात्मा (कबीर रूपी विरहिणी स्त्री) अपने प्रियतम परमात्मा (बालम) को अपने हृदय-घर में पधारने के लिए व्याकुलता से पुकारती है।
प्रत्येक पंक्ति की सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)
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“बालम, आवो हमारे गेह रे। तुम्ह बिनु दुखिया देह रे॥”
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व्याख्या: कबीर रूपी विरहिणी आत्मा कहती है—हे मेरे प्रियतम परमात्मा! आप कृपा करके मेरे घर (हृदय रूपी गृह) में पधारिए। आपके वियोग में मेरा यह शरीर और मन अत्यंत दुखी और व्यथित है।
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“सब कोइ कहै तुम्हारी नारी, मोकौं लगत संदेहो रे। दिल से नहीं मिलाया जब लग, तब लग कैसा नेहो रे॥”
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व्याख्या: संसार के सभी लोग मुझे आपकी पत्नी (दासी/भक्त) कहते हैं, किंतु मुझे स्वयं इस बात पर गहरा संशय होता है। जब तक आपने अपने हृदय से मुझे नहीं लगाया, साक्षात साक्षात्कार नहीं दिया, तब तक हमारा यह प्रेम कैसा? केवल लोक-लाज या नाम का संबंध सच्चा प्रेम नहीं हो सकता।
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“अन्न न भावै नींद न आवै, गृह बन धरै न धीर रे। कामिनि कूं है बालम प्यारा, ज्यों प्यासे कूं नीर रे॥”
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व्याख्या: वियोग की इस चरम अवस्था में न तो भोजन अच्छा लगता है और न ही रातों को नींद आती है। न घर में चैन मिलता है और न ही एकांत वन में धीरज धरते बनता है। जिस प्रकार एक प्यासे व्यक्ति के लिए जल ही जीवन होता है, उसी प्रकार इस विरहिणी कामिनी (आत्मा) को केवल अपने प्रियतम (परमात्मा) से ही प्राण-सुख मिल सकता है।
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“है कोई ऐसा पर-उपकारी, पिव सौं कहै सुनाइ रे। अब तो बेहाल कबीर भयो है, बिनु देखे जिय जाइ रे॥”
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व्याख्या: विरहिणी कबीर पुकारते हैं कि क्या संसार में कोई ऐसा परोपकारी सज्जन या सद्गुरु है, जो जाकर मेरे प्रियतम (प्रभु) को मेरी यह करुण दशा सुना दे? कबीर कहते हैं कि अब तो विरह में मेरी दशा अत्यंत बेहाल हो चुकी है; प्रभु के दर्शन किए बिना अब मेरे प्राण निकलने वाले हैं।
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काव्य-सौंदर्य
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भाव-पक्ष:
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प्रथम पद में समाज-सुधारक कबीर का तार्किक, विद्रोही और निर्भीक रूप सामने आता है, जो धार्मिक पाखंड और छुआछूत की संकीर्णता पर प्रहार करता है।
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द्वितीय पद में कबीर का रहस्यवादी और माधुर्य भाव प्रकट हुआ है, जहाँ आत्मा को विरहिणी स्त्री और परमात्मा को प्रियतम मानकर अनन्य समर्पण दर्शाया गया है।
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प्रथम पद में व्यंग्य और शांत रस का मेल है, जबकि द्वितीय पद में विप्रलंभ (वियोग) श्रृंगार रस की मार्मिक अनुभूति है।
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कला-पक्ष (शिल्प-सौंदर्य):
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भाषा: कबीर की ठेठ एवं प्रवाहमयी सधुक्कड़ी भाषा। इसमें अवधी, ब्रज, राजस्थानी और फारसी/अरबी (पीर, औलिया) के शब्दों का स्वाभाविक प्रयोग है।
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शैली: प्रथम पद में व्यंग्यात्मक व संवादात्मक शैली है, द्वितीय पद में शास्त्रीय राग-रागिनियों पर आधारित गेय पद-शैली है।
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अलंकार:
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उपमा अलंकार: “कामिनि कूं है बालम प्यारा, ज्यों प्यासे कूं नीर रे” (प्रियतम की तुलना प्यासे के जल से)।
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अनुप्रास अलंकार: “धोइ धाइ”, “कहै कबीर”, “करैं सगाई”, “दुखिया देह”, “धरै न धीर”।
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रूपक: हृदय को ‘गेह’ (घर) के रूप में निरूपित करना।
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लय एवं संगीतात्मकता: अंत्यानुप्रास के कारण दोनों पदों में सुंदर लयात्मक प्रवाह है।
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