कवितावली (उत्तर कांड से) / लक्ष्मण-मूर्च्छा और राम का विलाप पाठ का विस्तृत सार एवं प्रमुख छंद-विश्लेषण

कवितावली (उत्तर कांड से) / लक्ष्मण-मूर्च्छा और राम का विलाप

  • कवि: गोस्वामी तुलसीदास
  • काव्य-धारा: भक्तिकाल की सगुण काव्य-धारा (रामभक्ति शाखा)
  • काव्य-भाषा: ब्रजभाषा (‘कवितावली’) तथा अवधी (‘रामचरितमानस’)
  • मूल रचनाएँ: ‘कवितावली’ (उत्तर कांड) और ‘रामचरितमानस’ (लंका कांड)

1. पाठ का मूल उद्देश्य व संवेदना

भाग-1: कवितावली (उत्तर कांड से)

  • युगीन यथार्थ व आर्थिक विषमता का चित्रण: कलिकाल की बेकारी, भूख, गरीबी और अकाल की त्रासदी को यथार्थवादी दृष्टि से उभारना
  • राम-भक्ति का व्यावहारिक स्वरूप: यह स्पष्ट करना कि ‘पेट की आग’ और जीवन के वास्तविक संकटों का समाधान प्रभु राम (कृपा-रूपी घनश्याम) की भक्ति से ही संभव है
  • सामाजिक पाखंड व जातिवाद का विरोध: समाज में फैली संकीर्ण जाति-पाँति और मजहबी दुराग्रहों को नकारते हुए एकनिष्ठ और स्वाभिमानी भक्त-हृदय का परिचय देना

भाग-2: लक्ष्मण-मूर्च्छा और राम का विलाप (लंका कांड)

  • ईश्वरीय राम का मानवीकरण: भ्रातृशोक में व्याकुल राम के मानवीय संताप और रुदन के माध्यम से रक्त-संबंधों की निश्छल मर्यादा व आदर्श भ्रातृ-प्रेम को प्रतिष्ठित करना
  • शोक के बीच आशा का संचार: करुण रस के घने अंधकार के बीच हनुमान के संजीवनी लेकर आने को वीर रस के आविर्भाव के रूप में चित्रित कर जीवन के मंगल-विकास का संदेश देना

3. विस्तृत पाठ-सार एवं प्रमुख छंद-विश्लेषण

भाग-1: कवितावली (उत्तर कांड से) — ब्रजभाषा

1. पहला छंद (कवित्त) — पेट की आग का दारुण यथार्थ:
  • समाज के सभी वर्ग—मजदूर (किसबी), किसान, व्यापारी (बनिक), भिखारी, चारण (भाट), नौकर (चाकर), नट, गुप्तचर (चार) और बाजीगर (चेटकी)—केवल पेट भरने के लिए ही विद्या पढ़ते हैं, पहाड़ों पर चढ़ते हैं और वनों में शिकार खोजते फिरते हैं
  • भूख मिटाने के लिए लोग ऊँच-नीच, धर्म-अधर्म के काम करते हैं और यहाँ तक कि अपनी संतानों (बेटा-बेटकी) को भी बेचने पर विवश हो जाते हैं
  • तुलसीदास कहते हैं कि पेट की यह भयानक आग समुद्र की आग (बड़वाग्नि) से भी बड़ी है, जिसे केवल ‘राम रूपी घनश्याम (मेघ)’ का कृपा-जल ही बुझा सकता है
2. दूसरा छंद (कवित्त) — बेकारी और दरिद्रता का हाहाकार:
  • समाज में भयानक अकाल और बेरोजगारी छाई है—किसान के पास खेती नहीं, भिखारी को भीख नहीं, व्यापारी के पास व्यापार नहीं और नौकर को नौकरी नहीं मिलती
  • आजीविका विहीन लोग अत्यंत दुखी होकर एक-दूसरे से पूछते हैं—“कहाँ जाईं, का करीं?”
  • वेदों और पुराणों में भी कहा गया है और लोक में भी देखा गया है कि संकट के समय केवल प्रभु राम ही सब पर कृपा करते हैं
  • दरिद्रतारूपी रावण (दारिद-दसानन) ने समूचे संसार को अपने पंजों में दबा रखा है; पापों का नाश करने वाले हे दीनबंधु राम! इस दुर्दशा को देखकर तुलसी हाहाकार कर रहा है
3. तीसरा छंद (सवैया) — स्वाभिमानी भक्त का दुराग्रहों पर प्रहार:
  • तुलसीदास समाज को चुनौती देते हुए कहते हैं कि चाहे कोई उन्हें धूर्त कहे, संन्यासी (अवधूत) कहे, राजपूत कहे या जुलाहा कहे, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता
  • उन्हें किसी की बेटी से अपने बेटे का विवाह करके किसी की जाति नहीं बिगाड़नी है
  • वे तो केवल ‘राम के प्रसिद्ध गुलाम’ हैं; जिसे जो अच्छा लगे वह कहे। वे माँगकर खाएँगे और मस्जिद में जाकर सो रहेंगे; उन्हें दुनिया से न ‘लेने का एक है, न देने के दो’ (कोई सांसारिक स्वार्थ नहीं)

भाग-2: लक्ष्मण-मूर्च्छा और राम का विलाप (रामचरितमानस, लंका कांड) — अवधी

1. हनुमान का प्रस्थान एवं भरत-प्रशंसा:
  • हनुमान जी प्रभु राम का प्रताप हृदय में धारण कर संजीवनी बूटी लाने के लिए तुरंत प्रस्थान करते हैं। मार्ग में वे मन ही मन भरत जी के बाहुबल, शील, सद्गुण और प्रभु के प्रति अनन्य भक्ति की बार-बार सराहना करते हैं
2. राम का विलाप एवं मानवीकरण:
  • मध्यरात्रि बीत जाने पर भी जब हनुमान नहीं लौटे, तो श्रीराम लक्ष्मण को उठाकर सीने से लगा लेते हैं और साधारण मनुष्य के समान विलाप करने लगते हैं
  • राम कहते हैं—”हे भाई! तुम मुझे कभी दुखी नहीं देख सकते थे; तुम्हारा स्वभाव सदा से कोमल रहा है। मेरे लिए तुमने माता-पिता को त्याग दिया और वन में सर्दी, धूप और तूफानी हवाओं के कष्ट सहे। यदि मैं जानता कि वन में भाई का वियोग होगा, तो मैं पिता के वचनों को भी नहीं मानता”
3. भ्रातृ-प्रेम की अद्वितीयता:
  • राम कहते हैं कि संसार में पुत्र, धन, स्त्री, घर और परिवार बार-बार मिल सकते हैं और नष्ट हो सकते हैं, किंतु जगत में सगा भाई (सहोदर भ्राता) दोबारा नहीं मिलता
  • उपमाएँ: जिस प्रकार पंखों के बिना पक्षी अत्यंत दीन-हीन हो जाता है, मणि के बिना सर्प और सूँड के बिना श्रेष्ठ हाथी लाचार हो जाता है, लक्ष्मण के बिना राम का जीवन भी वैसा ही निष्प्राण हो जाएगा
4. अयोध्या लौटने और लोकापवाद की चिंता:
  • राम विलाप करते हैं कि वे किस मुँह से अयोध्या लौटेंगे। संसार कहेगा कि पत्नी के लिए अपने प्रिय भाई को गँवा दिया। वे पत्नी-वियोग का अपयश तो सह लेते, क्योंकि स्त्री की हानि कोई विशेष क्षति नहीं थी, किंतु भाई का वियोग असहनीय है
  • माता सुमित्रा ने लक्ष्मण का हाथ राम के हाथ में यह जानकर सौंपा था कि वे उसका हर प्रकार से भला करेंगे; अब राम माता को क्या उत्तर देंगे?
5. हनुमान का आगमन (करुण में वीर रस का संचार) एवं युद्ध-सन्नाटा:
  • राम के कमल-नयनों से अश्रु बहते देख समस्त वानर-भालू व्याकुल हो उठे। तभी अचानक हनुमान जी संजीवनी पर्वत लेकर उपस्थित हो गए
  • यह दृश्य ऐसा लगा मानो करुण रस के शांत परिवेश में सहसा वीर रस का प्रादुर्भाव हो गया हो
  • सुषेण वैद्य ने तुरंत उपचार किया और लक्ष्मण जी प्रसन्न होकर उठ बैठे। श्रीराम ने हर्षित होकर भाई को गले लगाया
  • जब यह समाचार रावण ने सुना तो वह सिर धुनकर रोने लगा और व्याकुल होकर कुंभकर्ण को जगाने पहुँचा
  • कुंभकर्ण जब जागता है तो वह साक्षात ‘काल’ (यमराज) जैसा दिखता है। जब रावण बताता है कि वानरों ने उसके बड़े-बड़े योद्धाओं (दुर्मुख, सुररिपु, अतिकाय, अकंपन, महोदर आदि) को मार गिराया है, तो कुंभकर्ण दुखी होकर कहता है—“अरे मूर्ख! तू साक्षात जगदंबा (सीता) का हरण करके लाया है और अब अपना कल्याण चाहता है!”

4. पाठ में आए कठिन एवं विशिष्ट शब्दों के अर्थ (शब्द-छवि)

शब्द अर्थ
किसबी (कसब)
श्रमजीवी / कारीगर / पेशा करने वाला
भाट
राजाओं की प्रशंसा में कविता/गीत गाने वाला चारण
चार
गुप्तचर / दूत
चेटकी
बाजीगर / मदारी
अटत
घूमता है / भटकता है
गहन-गन
घना जंगल
अहन
दिन
अखेटकी
शिकार करने वाला / शिकारी
पचत
पचते हैं / खपते हैं / पेट भरते हैं
बड़वागि
समुद्र की आग (बड़वानल)
बनिज
व्यापार / व्यवसाय
सीद्यमान
दुखी / कष्ट में डूबे हुए
सोच बस
चिंता के वशीभूत
साँकरे
संकट / विपत्ति के समय
रावरें
आपके / तुमने
दारिद-दसानन
दरिद्रतारूपी रावण
दुरित-दहन
पापों का नाश करने वाले (श्रीराम)
हहा करी
हाहाकार करना / आर्तनाद करना
धूत
त्यागा हुआ / धूर्त
अवधूत
संन्यासी / वैरागी
मसीत
मस्जिद
लैबोको एकु न दैबको दोऊ
किसी से कोई लेना-देना न होना
आतप
धूप / ग्रीष्म की तपन
बाता
आँधी / तूफानी हवा
बित
धन / संपत्ति
सहोदर
एक ही माँ की कोख से जन्मा सगा भाई
करिवर कर
श्रेष्ठ हाथी की सूँड
फनि
साँप / सर्प
अपलोकु
अपयश / बदनामी
गहि पानी
हाथ पकड़कर
सोच बिमोचन
शोक दूर करने वाले
राजिव दल लोचन
कमल की पंखुड़ियों जैसे सुंदर नयन
प्रलाप
दुख और व्यग्रता में व्यर्थ बोलना / विलाप
निसिचर
राक्षस / निशाचर
सुररिपु
देवताओं का शत्रु (राक्षस)
सठ
दुष्ट / मूर्ख

5. प्रयुक्त प्रमुख छंदों की संरचना (इन्हें भी जानें)

  • कवित्त (मनहरण): यह वार्णिक छंद है। इसके प्रत्येक चरण में 31 वर्ण होते हैं (16 और 15 पर यति) तथा अंतिम वर्ण गुरु होता है
  • सवैया: यह 22 से 26 वर्णों का वार्णिक छंद है (जैसे मत्तगयंद/मालती सवैया)
  • चौपाई: यह 16-16 मात्राओं वाला सम मात्रिक छंद है
  • दोहा: विषम चरणों (1, 3) में 13-13 तथा सम चरणों (2, 4) में 11-11 मात्राओं वाला अर्धसम मात्रिक छंद
  • सोरठा: दोहे का उल्टा; विषम चरणों में 11-11 तथा सम चरणों में 13-13 मात्राएँ

6. मुख्य परीक्षा-उपयोगी प्रश्नोत्तर सारांश

  • प्रश्न 1: कवितावली के छंदों के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि तुलसीदास को अपने युग की आर्थिक विषमता की गहरी समझ थी।
    उत्तर: तुलसीदास ने दिखाया कि अकाल और बेकारी के कारण समाज के सभी वर्ग (किसान, व्यापारी, नौकर, भिखारी) त्रस्त थे। लोग भूख मिटाने के लिए अधर्म तक करने और अपनी संतानों को बेचने पर विवश थे। यह वर्णन तत्कालीन समाज के कटु आर्थिक यथार्थ को प्रामाणिक रूप से उजागर करता है
  • प्रश्न 2: ‘धूत कहौ, अवधूत कहौ…’ सवैये में तुलसी के स्वाभिमानी भक्त-हृदय का परिचय कैसे मिलता है?
    उत्तर: तुलसी सामाजिक जाति-पाँति, संकीर्णताओं और आलोचनाओं की परवाह नहीं करते। वे स्वयं को केवल प्रभु राम का समर्पित दास मानकर मस्जिद में सोने और भिक्षा माँगकर खाने में भी संकोच नहीं करते, जो उनके परम निर्भीक और स्वाभिमानी स्वभाव को दर्शाता है
  • प्रश्न 3: शोकग्रस्त माहौल में हनुमान के अवतरण को ‘करुण रस में वीर रस का आविर्भाव’ क्यों कहा गया है?
    उत्तर: लक्ष्मण की मूर्च्छा पर श्रीराम का विलाप और वानर सेना का रुदन वातावरण को अत्यंत कारुणिक और हताश बना चुका था। ऐन वक्त पर संजीवनी पर्वत लेकर हनुमान के प्रकट होते ही निराशा आशा और उत्साह में बदल गई, जिससे करुण रस के बीच सहसा वीर रस का संचार हो गया

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित ‘कवितावली (उत्तर कांड से)’ तथा ‘लक्ष्मण-मूर्च्छा और राम का विलाप (रामचरितमानस, लंका कांड से)’ के सभी प्रमुख काव्यांशों की सन्दर्भ, प्रसंग, व्याख्या एवं विशेष प्रस्तुत हैं:

भाग 1: कवितावली (उत्तर कांड से)

काव्यांश 1 (कवित्त):

“किसबी, किसान-कुल, बनिक, भिखारी, भाट,
चाकर, चपल नट, चोर, चार चेटकी।
पेटको पढ़त, गुन गढ़त, चढ़त गिरि,
अटत गहन-गन अहन अखेटकी।।
ऊँचे-नीचे करम, धरम-अधरम करि,
पेट ही को पचत, बेचत बेटा-बेटकी।
‘तुलसी’ बुझाइ एक राम घनस्याम ही तें,
आगि बड़वागितें बड़ी है आगि पेटकी।।”
  • सन्दर्भ: प्रस्तुत कवित्त हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग-2’ में संकलित ‘कवितावली (उत्तर कांड से)’ से अवतरित है। इसके रचयिता भक्तिकाल की सगुण रामभक्ति धारा के शिरोमणि कवि गोस्वामी तुलसीदास हैं।
  • प्रसंग: इस छंद में कवि ने तत्कालीन समाज में भूख और पेट की आग की दारुण स्थिति का यथार्थपरक चित्रण करते हुए इसका एकमात्र समाधान प्रभु राम की कृपा में बताया है।
  • व्याख्या: तुलसीदास जी कहते हैं कि समाज के सभी वर्ग—श्रमजीवी (मजदूर), किसान-परिवार, व्यापारी, भिखारी, भाट (चारण), नौकर, चंचल नट, चोर, गुप्तचर और बाजीगर—केवल अपना पेट भरने के लिए ही विविध विद्याएँ सीखते हैं, अनेक कलाएँ व हुनर गढ़ते हैं, दुर्गम पर्वतों पर चढ़ते हैं और दिनभर घने जंगलों में शिकार की तलाश में भटकते हैं। पेट की भूख शांत करने के लिए लोग उचित-अनुचित, धर्म और अधर्म के कर्म करते हैं और विवश होकर अपनी संतानों (बेटा-बेटी) तक को बेच डालते हैं। तुलसीदास जी कहते हैं कि पेट की यह ज्वाला समुद्र की आग (बड़वाग्नि) से भी अधिक भयंकर है, जिसे केवल ‘राम रूपी काले मेघ (घनश्याम)’ का कृपा-जल ही बुझा सकता है।
  • विशेष:
    • भाषा: शुद्ध, परिष्कृत एवं लयात्मक ब्रजभाषा।
    • छंद: कवित्त छंद (31 वर्ण वाला मनहरण)।
    • अलंकार:
      • ‘किसबी, किसान-कुल’, ‘चाकर, चपल नट, चोर, चार चेटकी’, ‘गुन गढ़त’, ‘गहन-गन अहन अखेटकी’, ‘बेटा-बेटकी’ और ‘बड़वागितें बड़ी’ में अनुप्रास अलंकार
      • ‘राम घनस्याम’ में रूपक अलंकार
      • पेट की आग को बड़वाग्नि से बड़ा बताने के कारण व्यतिरेक अलंकार
    • तत्कालीन समाज की भुखमरी व आर्थिक विवशता का अत्यंत मर्मभेदी और यथार्थवादी अंकन।

काव्यांश 2 (कवित्त):

“खेती न किसान को, भिखारी को न भीख, बलि,
बनिक को बनिज, न चाकर को चाकरी।
जीविका बिहीन लोग सीद्यमान सोच बस,
कहें एक एकन सों ‘कहाँ जाई, का करी?’
बेदहूँ पुरान कही, लोकहूँ बिलोकिअत,
साँकरे सबै पै, राम ! रावरें कृपा करी।
दारिद-दसानन दबाई दुनी, दीनबंधु !
दुरित-दहन देखि तुलसी हहा करी।।”
  • सन्दर्भ: पूर्ववत्।
  • प्रसंग: प्रस्तुत छंद में कवि ने समाज में फैली भीषण बेकारी, अकाल और दरिद्रता का चित्रण किया है तथा प्रभु राम से संकट हरने की प्रार्थना की है।
  • व्याख्या: कवि कहते हैं कि अकाल और शासन की अव्यवस्था के कारण किसान के पास करने को खेती नहीं है, भिखारी को दान-भीख नहीं मिलती, व्यापारी के पास कोई व्यापार नहीं है और सेवक को नौकरी नहीं मिल पा रही है। आजीविका के साधनों से रहित सभी लोग दुख और चिंता में डूबकर एक-दूसरे से व्याकुल होकर पूछ रहे हैं कि “हम कहाँ जाएँ और क्या करें?”। वेदों और पुराणों में भी यह कहा गया है और लोक-व्यवहार में भी प्रत्यक्ष देखा जाता है कि जब-जब सभी पर घोर संकट आया है, तब-तब केवल हे राम! आपने ही सब पर कृपा की है। हे दीनबंधु! दरिद्रता रूपी रावण (दारिद-दसानन) ने समूचे संसार को अपने शिकंजे में दबा रखा है; पापों का नाश करने वाले प्रभु! इस हाहाकार को देखकर तुलसीदास रक्षा की गुहार लगा रहा है।
  • विशेष:
    • भाषा: प्रौढ़ ब्रजभाषा।
    • छंद: कवित्त छंद।
    • अलंकार:
      • ‘दारिद-दसानन’ (दरिद्रता रूपी रावण) में रूपक अलंकार
      • ‘भिखारी को न भीख, बलि’, ‘बनिक को बनिज’, ‘चाकर को चाकरी’, ‘सीद्यमान सोच’, ‘कहाँ जाई, का करी’, ‘साँकरे सबै’, ‘दबाई दुनी, दीनबंधु’ और ‘दुरित-दहन देखि’ में अनुप्रास अलंकार की छटा।
    • समाज की व्यापक बेरोजगारी और कलिकाल की विभीषिका का सजीव चित्रण।

काव्यांश 3 (सवैया):

“धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूतु कहौ, जोलहा कहौ कोऊ।
काहू की बेटीसों बेटा न ब्याहब, काहूकी जाति बिगार न सोऊ।।
तुलसी सरनाम गुलामु है राम को, जाको रुचै सो कहै कछु ओऊ।
माँगि कै खैबो, मसीत को सोइबो, लैबोको एकु न दैबको दोऊ।।”
  • सन्दर्भ: पूर्ववत्।
  • प्रसंग: इस सवैये में तुलसीदास जी ने संकीर्ण जातिवादी व्यवस्था, सामाजिक पाखंड और आलोचकों को ठुकराते हुए अपनी अनन्य राम-भक्ति और स्वाभिमान को प्रकट किया है।
  • व्याख्या: तुलसीदास समाज के रूढ़िवादियों को ललकारते हुए कहते हैं कि चाहे कोई मुझे धूर्त कहे, संन्यासी (अवधूत) कहे, क्षत्रिय (राजपूत) कहे या जुलाहा कहे, मुझे किसी की परवाह नहीं है। मुझे किसी की बेटी से अपने बेटे का विवाह रचाकर किसी की जाति या कुल की मर्यादा नष्ट नहीं करनी है। तुलसीदास तो संसार भर में केवल प्रभु राम के प्रसिद्ध दास (गुलाम) के रूप में विख्यात हैं; अतः जिसको जो अच्छा लगे, वह उनके बारे में वैसा कह सकता है। वे निर्द्वंद्व होकर भिक्षा माँगकर खाएँगे और मस्जिद में जाकर निश्चिंत सो रहेंगे; उन्हें दुनिया से न एक लेना है और न दो देना है (अर्थात सांसारिक मान-अपमान से कोई सरोकार नहीं है)।
  • विशेष:
    • भाषा: प्रवाहपूर्ण ब्रजभाषा।
    • छंद: सवैया (मत्तगयंद/मालती सवैया)।
    • अलंकार:
      • ‘कहै कछु’, ‘बेटीसों बेटा’ में अनुप्रास अलंकार
      • ‘लैबोको एकु न दैबको दोऊ’ में लोक-प्रसिद्ध मुहावरे का सटीक प्रयोग।
    • कवि के अक्खड़, स्वाभिमानी और निर्भीक भक्त-व्यक्तित्व का उद्घाटन।
    • ‘मसीत को सोइबो’ पद तुलसीदास जी की उदार, साम्प्रदायिक सद्भाव वाली और निष्पक्ष दृष्टि को दर्शाता है।

भाग 2: लक्ष्मण-मूर्च्छा और राम का विलाप (रामचरितमानस, लंका कांड से)

काव्यांश 1 (दोहा):

“तव प्रताप उर राखि प्रभु जैहउँ नाथ तुरंत।
अस कहि आयसु पाइ पद बंदि चलेउ हनुमंत ।।
भरत बाहु बल सील गुन प्रभु पद प्रीति अपार।
मन महुँ जात सराहत पुनि पुनि पवनकुमार।।”
  • सन्दर्भ: प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग-2’ में संकलित ‘रामचरितमानस’ के ‘लंका कांड’ से उद्धृत है। इसके रचयिता गोस्वामी तुलसीदास हैं।
  • प्रसंग: लक्ष्मण के प्राण बचाने हेतु संजीवनी बूटी लाने के लिए भरत जी से विदा लेकर लंका की ओर प्रस्थान करते हनुमान जी की मनोदशा का वर्णन है।
  • व्याख्या: हनुमान जी भरत जी से कहते हैं कि “हे नाथ! मैं आपके प्रताप को हृदय में धारण करके तुरंत लंका पहुँच जाऊँगा”। ऐसा कहकर और भरत जी की आज्ञा पाकर तथा उनके चरणों की वंदना करके हनुमान जी चल पड़ते हैं। मार्ग में पवनपुत्र हनुमान भरत जी के बाहुबल, शील-स्वभाव, श्रेष्ठ गुणों और प्रभु श्रीराम के चरणों में उनके अपार प्रेम की मन ही मन बारंबार सराहना करते हुए आगे बढ़ते हैं।
  • विशेष:
    • भाषा: साहित्यिक अवधी।
    • छंद: दोहा छंद (13-11 मात्राओं का अर्धसम मात्रिक छंद)।
    • अलंकार:
      • ‘पुनि पुनि’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार
      • ‘पद बंदि’, ‘बाहु बल’, ‘प्रभु पद प्रीति’ में अनुप्रास अलंकार
    • हनुमान जी की सेवा-भावना और भरत जी के चरित्र की गरिमा का उद्घाटन।

काव्यांश 2 (चौपाई):

“उहाँ राम लछिमनहि निहारी। बोले बचन मनुज अनुसारी ।।
अर्ध राति गइ कपि नहिं आयउ। राम उठाइ अनुज उर लायउ ।।
सकहु न दुखित देखि मोहि काऊ। बंधु सदा तव मृदुल सुभाऊ ।।
मम हित लागि तजेहु पितु माता। सहेहु बिपिन हिम आतप बाता।।”
  • सन्दर्भ: पूर्ववत्।
  • प्रसंग: मध्यरात्रि बीत जाने पर भी हनुमान के न लौटने पर लक्ष्मण को सीने से लगाकर विलाप करते हुए श्रीराम का मानवीकरण प्रस्तुत किया गया है।
  • व्याख्या: उधर रणभूमि में लक्ष्मण को मूर्च्छित अवस्था में देखकर श्रीराम एक साधारण मनुष्य की भाँति करुण विलाप करते हुए बोलने लगे। आधी रात बीत चुकी है किंतु हनुमान (संजीवनी लेकर) अभी तक नहीं आए। श्रीराम ने व्याकुल होकर छोटे भाई लक्ष्मण को उठाकर अपने सीने से लगा लिया। वे कहते हैं—”हे भाई! तुम्हारा स्वभाव सदा से अत्यंत कोमल रहा है; तुम मुझे कभी दुखी नहीं देख सकते थे। तुमने केवल मेरे भले के लिए माता-पिता के सुख को त्याग दिया और वन में सर्दी, कड़ी धूप और भयंकर तूफानी हवाओं के असहनीय कष्ट सहे”।
  • विशेष:
    • भाषा: अवधी भाषा की स्वाभाविक मिठास।
    • छंद: चौपाई छंद (प्रत्येक चरण में 16 मात्राएँ)।
    • रस: करुण रस।
    • अलंकार: ‘बोले बचन’, ‘अनुज उर’, ‘मोहि काऊ’, ‘बंधु सदा’ में अनुप्रास अलंकार
    • ईश्वर श्रीराम का एक भावुक, स्नेही बड़े भाई के रूप में यथार्थ मानवीकरण।

काव्यांश 3 (चौपाई):

“सो अनुराग कहाँ अब भाई। उठहु न सुनि मम बच बिकलाई ।।
जौं जनतेउँ बन बंधु बिछोहू। पितु बचन मनतेउँ नहिं ओहू ।।
सुत बित नारि भवन परिवारा। होहिं जाहिं जग बारहिं बारा ।।
अस बिचारि जियँ जागहु ताता। मिलइ न जगत सहोदर भ्राता ।।”
  • सन्दर्भ: पूर्ववत्।
  • प्रसंग: श्रीराम लक्ष्मण के प्रति अपने अगाध स्नेह को व्यक्त करते हुए सहोदर भाई के महत्व को संसार की समस्त वस्तुओं से श्रेष्ठ बताते हैं।
  • व्याख्या: श्रीराम कहते हैं—”हे भाई! तुम्हारा वह पहले जैसा प्रेम अब कहाँ चला गया? तुम मेरी इस व्याकुल वाणी को सुनकर उठते क्यों नहीं? यदि मैं पहले से जानता कि वन में आकर मुझे अपने भाई का वियोग सहना पड़ेगा, तो मैं पिता के वनवास वाले वचन को भी कभी स्वीकार न करता। संसार में पुत्र, धन, पत्नी, घर और परिवार बार-बार प्राप्त हो सकते हैं और नष्ट हो सकते हैं, किंतु इस नश्वर जगत में सगा भाई (सहोदर भ्राता) दोबारा नहीं मिलता। हे तात! अपने मन में यही विचार करके तुम शीघ्र जाग जाओ”।
  • विशेष:
    • रस: विप्रलम्भ करुण रस की पराकाष्ठा।
    • अलंकार:
      • ‘बारहिं बारा’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार
      • ‘बच बिकलाई’, ‘बन बंधु बिछोहू’, ‘जागहु ताता’ में अनुप्रास अलंकार
    • सांसारिक संबंधों की क्षणभंगुरता के सामने भ्रातृ-प्रेम की अद्वितीयता का प्रतिपादन।

काव्यांश 4 (चौपाई):

“जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि करिबर कर हीना ।।
अस मम जिवन बंधु बिनु तोही। जौं जड़ दैव जिआवै मोही ।।
जैहउँ अवध कवन मुहुँ लाई। नारि हेतु प्रिय भाइ गँवाई ।।
बरु अपजस सहतेउँ जग माहीं। नारि हानि बिसेष छति नाहीं ।।”
  • सन्दर्भ: पूर्ववत्।
  • प्रसंग: श्रीराम लक्ष्मण के बिना अपने असहाय जीवन की कल्पना करते हैं और अयोध्या लौटने पर मिलने वाले लोकापवाद के भय से विलाप करते हैं।
  • व्याख्या: श्रीराम सुंदर उपमाएँ देते हुए कहते हैं—”जिस प्रकार पंखों के बिना पक्षी अत्यंत लाचार हो जाता है, मणि के बिना सर्प और सूँड के बिना श्रेष्ठ हाथी दीन-हीन व शक्तिहीन हो जाता है, हे भाई! तुम्हारे बिना मेरा जीवन भी वैसा ही असहाय हो जाएगा यदि यह निष्ठुर भाग्य मुझे जीवित रखेगा। मैं अयोध्या क्या मुँह लेकर लौटूँगा? संसार यही कहेगा कि राम ने अपनी पत्नी के लिए अपने प्रिय भाई को गँवा दिया। मैं जगत में पत्नी खोने का अपयश भले ही सह लेता, क्योंकि भाई के वियोग की तुलना में स्त्री की हानि कोई विशेष क्षति नहीं थी, किंतु तुम्हारा वियोग असहनीय है”।
  • विशेष:
    • अलंकार:
      • ‘जथा पंख बिनु खग…’ में सशक्त दृष्टांत एवं उपमा अलंकार
      • ‘करिबर कर’, ‘बंधु बिनु’, ‘सकल सोच’ में अनुप्रास अलंकार
    • तत्कालीन पुरुष-प्रधान समाज की उस धारणा की अभिव्यक्ति जहाँ परिवार और भाई की मर्यादा को सर्वोपरि माना गया है।
    • विलाप की तीव्रता और गहन आंतरिक पीड़ा का मार्मिक चित्रण।

काव्यांश 5 (चौपाई):

“अब अपलोकु सोकु सुत तोरा। सहिहि निठुर कठोर उर मोरा ।।
निज जननी के एक कुमारा। तात तासु तुम्ह प्रान अधारा ।।
सौंपेसि मोहि तुम्हहि गहि पानी। सब बिधि सुखद परम हित जानी ।।
उतरु काह दैहउँ तेहि जाई। उठि किन मोहि सिखावहु भाई ।।
बहु बिधि सोचत सोच बिमोचन। स्रवत सलिल राजिव दल लोचन ।।”
  • सन्दर्भ: पूर्ववत्।
  • प्रसंग: श्रीराम माता सुमित्रा के प्रति अपनी जिम्मेदारी और उन्हें उत्तर देने की विवशता पर विलाप करते हैं।
  • व्याख्या: श्रीराम कहते हैं—”हे लक्ष्मण! अब मेरा यह निष्ठुर और कठोर हृदय संसार का अपयश और तुम्हारा यह असह्य शोक दोनों सहन करेगा। तुम अपनी माता सुमित्रा के एकमात्र सहारे और उनके प्राणों के आधार थे। उन्होंने सब प्रकार से सुख देने वाला और परम हितैषी जानकर तुम्हारा हाथ पकड़कर मुझे सौंपा था। अब अयोध्या जाकर मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगा? हे भाई! तुम उठकर मुझे सिखाते क्यों नहीं कि मैं माता को क्या कहूँगा?” संसार के सभी शोकों को दूर करने वाले (सोच-बिमोचन) प्रभु श्रीराम इस प्रकार अनेक प्रकार से सोचकर विलाप कर रहे हैं और उनके कमल की पंखुड़ियों जैसे नयनों (राजिव दल लोचन) से आंसुओं की अविरल धारा बह रही है।
  • विशेष:
    • अलंकार:
      • ‘राजिव दल लोचन’ में रूपक अलंकार
      • ‘सोचत सोच बिमोचन’ में विरोधाभास अलंकार (संसार का शोक हरने वाले स्वयं शोकग्रस्त हैं)।
      • ‘स्रवत सलिल’, ‘अपलोकु सोकु’, ‘गहि पानी’ में अनुप्रास अलंकार
    • मातृत्व के प्रति आदर और राम के मानवीय संकोच का उत्कृष्ट चित्रण।

काव्यांश 6 (सोरठा एवं चौपाई):

सोरठा:
“प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर।
आइ गयउ हनुमान जिमि करुना मँह बीर रस ।।”
चौपाई:
“हरषि राम भेंटेउ हनुमाना। अति कृतग्य प्रभु परम सुजाना ।।
तुरत बैद तब कीन्हि उपाई। उठि बैठे लछिमन हरषाई ।।
हृदयँ लाइ प्रभु भेंटेउ भ्राता। हरषे सकल भालु कपि ब्राता ।।
कपि पुनि बैद तहाँ पहुँचावा। जेहि बिधि तबहिं ताहि लइ आवा ।।”
  • सन्दर्भ: पूर्ववत्।
  • प्रसंग: हनुमान जी के संजीवनी लेकर आगमन, करुण रस में वीर रस के प्रादुर्भाव और लक्ष्मण के स्वस्थ होने का आनंदमय वर्णन।
  • व्याख्या: प्रभु श्रीराम के करुण विलाप को सुनकर वानरों और भालुओं का समूह व्याकुल और हताश हो उठा। उसी समय अचानक संजीवनी पर्वत लिए हनुमान जी प्रकट हो गए। उनका आगमन ऐसा प्रतीत हुआ मानो करुण रस के शांत व शोकमय वातावरण में अचानक वीर रस का उदय हो गया हो। परम चतुर एवं कृपालु श्रीराम ने अत्यंत प्रसन्न होकर और कृतज्ञ भाव से हनुमान जी को गले लगाया। तब सुषेण वैद्य ने तुरंत औषधि बनाकर उपचार किया, जिससे लक्ष्मण जी हर्षित होकर उठ बैठे। श्रीराम ने बड़े प्रेम से भाई को हृदय से लगा लिया और यह देखकर पूरी वानर-भालू सेना में उल्लास छा गया। इसके बाद हनुमान जी ने सुषेण वैद्य को सम्मानपूर्वक वहीं पहुँचा दिया जहाँ से उन्हें लाया गया था।
  • विशेष:
    • छंद: सोरठा (विषम में 11-11 तथा सम में 13-13 मात्राएँ) एवं चौपाई छंद।
    • अलंकार:
      • ‘जिमि करुना मँह बीर रस’ में अत्यंत प्रसिद्ध और अद्भुत उपमा अलंकार
      • ‘प्रभु प्रलाप’, ‘प्रभु परम’, ‘हरषे सकल भालु कपि ब्राता’ में अनुप्रास अलंकार
    • शोक के वातावरण का उत्साह और विजय-भाव में नाटकीय रूपांतरण।

काव्यांश 7 (चौपाई एवं दोहा):

चौपाई:
“यह वृतांत दसानन सुनेऊ। अति बिषाद पुनि पुनि सिर धुनेऊ ।।
ब्याकुल कुंभकरन पहिं आवा। बिबिध जतन करि ताहि जगावा ।।
जागा निसिचर देखिअ कैसा। मानहुँ कालु देह धरि बैसा ।।
कुंभकरन बूझा कहु भाई। काहे तव मुख रहे सुखाई ।।
कथा कही सब तेहिं अभिमानी। जेहि प्रकार सीता हरि आनी ।।
तात कपिन्ह सब निसिचर मारे। महा महा जोधा संघारे ।।
दुर्मुख सुररिपु मनुज अहारी। भट अतिकाय अकंपन भारी ।।
अपर महोदर आदिक बीरा। परे समर महि सब रनधीरा ।।”
दोहा:
“सुनि दसकंधर बचन तब कुंभकरन बिलखान।
जगदंबा हरि आनि अब सठ चाहत कल्यान ।।”
  • सन्दर्भ: पूर्ववत्।
  • प्रसंग: लक्ष्मण के स्वस्थ होने का समाचार सुनकर रावण की व्याकुलता, कुंभकर्ण को जगाना और कुंभकर्ण द्वारा रावण की मूर्खता पर पश्चाताप करने का वर्णन है।
  • व्याख्या: जब रावण ने लक्ष्मण के जीवित होने का यह समाचार सुना, तो वह गहरे शोक में डूबकर बार-बार अपना सिर पीटने लगा। घबराकर वह अपने विशालकाय भाई कुंभकर्ण के पास गया और अनेक यत्न करके उसे गहरी नींद से जगाया। जब वह राक्षस जागा, तो ऐसा लगा मानो साक्षात यमराज (काल) शरीर धारण करके बैठ गया हो। कुंभकर्ण ने पूछा—”हे भाई! कहो, तुम्हारा मुँह क्यों सूखा हुआ है?” तब अभिमानी रावण ने जिस प्रकार सीता का हरण किया था, वह सारा वृत्तांत सुनाया। रावण बोला—”हे तात! वानरों ने हमारे सारे राक्षसों को मार डाला है और बड़े-बड़े महान योद्धाओं का संहार कर दिया है। दुर्मुख, देवताओं का शत्रु (सुररिपु), नरभक्षी, भारी योद्धा अतिकाय, अकंपन तथा महोदर जैसे समस्त युद्धवीर रणभूमि में मारे जा चुके हैं”। रावण के ये वचन सुनकर कुंभकर्ण दुखी होकर रो पड़ा और बोला—”अरे दुष्ट-मूर्ख (सठ)! तू साक्षात जगत-जननी जगदंबा (सीता) का हरण करके ले आया है और अब इस कुल-विनाश के बाद भी अपना कल्याण चाहता है!”
  • विशेष:
    • अलंकार:
      • ‘मानहुँ कालु देह धरि बैसा’ में उत्प्रेक्षा अलंकार
      • ‘पुनि पुनि’ और ‘महा महा’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार
      • ‘सिर धुनेऊ’ में मुहावरे का सुंदर प्रयोग।
      • ‘दुर्मुख सुररिपु’, ‘समर महि’ में अनुप्रास अलंकार
    • रावण के अहंकार के पतन और कुंभकर्ण द्वारा धर्म व नीति की स्पष्ट उद्घोषणा।

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