कामायनी की भूमिका(kamayani ki bhumika)

                 💐कामायनी की भूमिका 💐

◆ साहित्य में मानवों के आदिपुरुष मनु का इतिहास वेदों से लेकर पुरान और इतिहासों में बिखरा हुआ मिलता है।

◆ श्रद्धा और मनु के सहयोग से मानवता के विकास की कथा को, रूपक के आवरण में, चाहे पिछले काल में मान लेने का वैसा ही प्रयत्न हुआ हो जैसा कि सभी वैदिक इतिहासों के साथ निरुक्त के द्वारा किया गया, किन्तु मन्वन्तर के अर्थात् मानवता के नवयुग के प्रवर्तक के रूप में मनु की कथा आर्यों की अनुश्रुति में दृढ़ता से मानी गई है। इसलिए वैवस्वत मनु को ऐतिहासिक पुरुष ही मानना उचित हैं।

◆ प्रायः लोग गाथा और इतिहास में मिथ्या और सत्य का व्यवधान मानते हैं । किन्तु सत्य मिथ्या से अधिक विचित्र होता है।

◆ आदिम युग के मनुष्यों के प्रत्येक दस ने ज्ञानोन्मेष के अरुणोदय में जो भावपूर्ण इतिवृत्त संगृहीत किये थे, उन्हें आज गाथा या पौराणिक उपाख्यान कह कर अलग कर दिया जाता है; क्योंकि उन चरित्रों के साथ भावनाओं का भी बीच-बीच में सम्बन्ध लगा हुआ सा दीखता है।

◆ घटनाएँ कहीं-कहीं अतिरंजित सी भी जान पड़ती हैं। तथ्य -संग्रहकारिणी तर्कबुद्धि को ऐसी घटनाओं में रूपक का आरोप कर लेने की सुविधा हो जाती है। किन्तु उनमें भी कुछ सत्यांस घटना से सम्बद्ध है ऐसा तो मानना ही पड़ेगा।

◆ आज के मनुष्य के समीप तो उसकी वर्तमान संस्कृति का क्रमपूर्ण इतिहास ही होता है; परन्तु उसके इतिहास की सीमा जहाँ से प्रारम्भ होती है, ठीक उसी के पहिले सामूहिक चेतना की दृढ़ और गहरे रंगों की रेखाओं से बीती हुई और भी पहले की बातों का उल्लेख स्मृति-पट पर अमिट रहता है; परन्तु कुछ अतिरंजित सा ।

◆ वे घटनाएँ आज विचित्रता से पूर्ण जान पड़ती हैं। सम्भवत: इसीलिए हमको अपनी प्राचीन श्रुतियों का निरुक्त के द्वारा अर्थ करना पड़ा, जिससे कि उन अर्थों का अपनी वर्तमान रुचि से सामंजस्य किया जाय।

◆ यदि श्रद्धा और मनु अर्थात् मनन के सहयोग से मानवता का विकास रूपक है, तो भी बड़ा ही भावमय और श्लाध्य है ।

◆  यह मनुष्यता का मनोवैज्ञानिक इतिहास बनने में समर्थ हो सकता है।

◆ आज हम सत्य का अर्थ घटना कर लेते हैं । तब भी उसके तिथि क्रम मात्र से सन्तुष्ट न होकर, मनोवैज्ञानिक अन्वेषण के द्वारा इतिहास की घटना के भीतर कुछ देखना चाहते हैं।

◆ उसके मूल में क्या रहस्य है ? आत्मा की अनुभूति ! हाँ, उसी भाव के रूप ग्रहण की चेष्टा सत्य या घटना बनकर प्रत्यक्ष होती है। फिर वे सत्य घटनाएँ स्थूल और क्षणिक होकर मिथ्या और अभाव में परिणत हो जाती हैं। किन्तु सूक्ष्म अनुभूति या भाव, चिरंतन सत्य के रूप में प्रतिष्ठित रहता है, जिसके द्वारा युग-युग के पुरुषों की और पुरुषार्थों की अभिव्यक्ति होती रहती है।

◆ जल-प्लावन भारतीय इतिहास में एक ऐसी ही प्राचीन घटना है, जिसने मनु को देवों से विलक्षण, मानवों की एक भिन्न संस्कृति प्रतिष्ठित करने का अवसर दिया। वह इतिहास ही हैं।

◆  ‘मनवे वै प्रातः’ इत्यादि से इस घटना का उल्लेख शतपथ ब्राह्मण के आठवें अध्याय में मिलता है।

◆  देवगण के उच्छृंखल स्वभाव, निर्वाध आत्मतुष्टि में अन्तिम अध्याय लगा और मानवीय भाव अर्थात् श्रद्धा और मनन का समन्वय होकर प्राणी को एक नये युग की सूचना मिली। 

◆ इस मन्वन्तर के प्रवर्तक मनु हुए मनु भारतीय इतिहास के आदि हैं।

◆ राम,कृष्ण और बुद्ध इन्हीं के वंशज हैं।

◆ शतपथ ब्राह्मण में उन्हें श्रद्धादेव कहा गया है, ” श्रद्धादेवो वै मनुः “

◆  भागवत में इन्हीं वैवस्वत मनु और श्रद्धा से मानवीय सृष्टि का प्रारम्भ माना गया है।
” ततो मनुः श्राद्धदेवः संज्ञायामास भारत
श्रद्धायां जनयामास दश पुत्रान् स आत्मवान् । ”

◆  छांदोग्य उपनिषद् में मनु और धड़ा की भावमूलक व्याख्या भी मिलती है ।

◆ ऋग्वेद में श्रद्धा और मनु दोनों का नाम ऋषियों कघ तरह मिलता है।

◆ श्रद्धा का परिचय देते हुए लिखा है, “कामगोत्रा श्रद्धानामर्षिका ” ।

◆ श्रद्धा कामगोत्र की बालिका है, इसीलिए श्रद्धा नाम के साथ उसे कामायनी भी कहा जाता है ।

◆ मनु प्रथम पथ-प्रदर्शक और अग्निहोत्र प्रज्वलित करने वाले तथा अन्य कई वैदिक कथाओं के नायक हैं ।

◆ इनके सम्बन्ध में वैदिक साहित्य में बहुत-सी बातें बिखरी हुई मिलती हैं; किन्तु उनका क्रम स्पष्ट नहीं है।

◆  जल- प्लावन का वर्णन शतपथ ब्राह्मण के प्रथम काण्ड के आठवें अध्याय से आरम्भ होता है; जिससे उनकी नाव के उत्तर गिरि हिमवान प्रदेश में पहुँचने का प्रसंग है ।

◆ वहाँ ओघ के जल का अवतरण होने पर मनु भी जिस स्थान पर उतरे उसे मनोरवसर्पण कहते हैं।

◆ श्रद्धा के साथ मनु का मिलन होने के बाद उसी निर्जन प्रदेश में उजड़ी हुई सृष्टि को फिर से आरम्भ करने का प्रयत्न हुआ। किन्तु असुर पुरोहित के मिल जाने से इन्होंने पशुबलि की ।

◆ इस यज्ञ के बाद मन में जो पूर्व परिचित देव प्रवृत्ति जाग उठी; उसने इड़ा के सम्पर्क में आने पर उन्हें श्रद्धा के अतिरिक्त एक दूसरी ओर प्रेरित किया।

◆ इड़ा के सम्बन्ध में शतपथ में कहा गया है कि उसकी उत्पत्ति या पुष्टि पाक यज्ञ से हुई और उस पूर्ण योषिता को देखकर मनु ने पूछा कि “तुम कौन हो?”

◆  इड़ा ने कहा ‘तुम्हारी दुहिता हूँ”।

◆  मनु ने पूछा कि ” मेरी दुहिता कैसे ? ”

◆ उसने कहा ‘तुम्हारे दही घी इत्यादि के हवियों से ही मेरा पोषण हुआ है।”

◆ इड़ा के लिए मनु को अत्यधिक आकर्षण हुआ और श्रद्धा से वे कुछ खिचे ।

◆ ऋग्वेद में इड़ा का कई जगह उल्लेख मिलता है।

◆ यह प्रजापति मनु की पथ प्रदर्शिका, मनुष्यों का शासन करनेवाली कही गई है।

◆  मन्त्रों में मध्यमा, वैखरी और पश्यन्ती की प्रतिनिधि भारती, सरस्वती के साथ दवा का नाम आया है।

◆ लौकिक संस्कृत में इड़ा शब्द पृथ्वी अर्थात् बुद्धि, वाणी आदि का पर्यायवाची है।

◆  “यो भू वाचरित्वा इला” (अमर) इस इड़ा था वाक् के साथ मनु या मन के एक और विवाद का भी शतपथ में उल्लेख मिलता है, जिसमें दोनों अपने महत्त्व के लिए झगड़ते हैं।”

◆ ऋग्वेद में इड़ा को धी, बुद्धि का साधन करने वाली; मनुष्य को चेतना प्रदान करनेवाली कहा है।
पिछले काल में सम्भवतः इड़ा को पृथ्वी आदि से सम्बद्ध कर दिया गया हो, किन्तु ऋग्वेद  में इड़ा और सरस्वती के साथ नही का अलग उल्लेख स्पष्ट है।

◆ इड़ा को मेघसवाहिनी नाड़ी भी कहा गया है

◆ लौकिक संस्कृत में इड़ा शब्द पृथ्वी अर्थात् बुद्धि, वाणी आदि का पर्यायवाची है।

◆  ” गो भू वाचस्त्विड़ा इला। ” ( अमर ) इस इड़ा या वाक् के साथ मनु या मन के एक और विवाद का भी शतपथ में उल्लेख मिलता है, जिसमें दोनों अपने महत्त्व के लिए झगड़ते हैं।

◆ ऋग्वेद में इड़ा को थी, बुद्धि का साधन करने वाली; मनुष्य को चेतना प्रदान करनेवाली कहा है पिछले काल में सम्भवतः इड़ा को पृथ्वी आदि से सम्बद्ध कर दिया गया हो, किन्तु ऋग्वेद  में इड़ा और सरस्वती के साथ मही का अलग उल्लेख स्पष्ट है ।

◆ ‘ इड़ा सरस्वती मही तिस्त्रोदेवीर्मयोभुवः ‘ से मालूम पड़ता है कि मही से इड़ा भिन्न है। इड़ा को मेघसवाहिनी नाड़ी भी कहा गया है ।

◆ अनुमान किया जा सकता है कि बुद्धि का विकास, राज्य स्थापना इत्यादि इड़ा के प्रभाव से ही मनु ने किया। फिर तो इड़ा पर भी अधिकार करने को चेष्टा के कारण मनु को देवगण का कोपभाजन होना पड़ा।

◆ ‘तद्वै देवानां आग आस (शतपथ में ) इस अपराध के कारण उन्हें दण्ड भोगना पड़ा ।

◆  इड़ा देवताओं की स्वसा थी मनुष्यों को चेतना प्रदान करनेवाली थी इसीलिए यज्ञों में इड़ा कर्म होता है।

◆ यह का बुद्धिवाद श्रद्धा और मनु के बीच व्यवधान बनाने में सहायक होता है। फिर बुद्धिवाद के विकास में अधिक सुख की खोज में, दुःख मिलना स्वाभाविक है।

◆  यह आख्यान इतना प्राचीन है कि इतिहास में रूपक का भी अद्भुत मिश्रण हो गया है। इसीलिए श्रद्धा और इड़ा इत्यादि अपना ऐतिहासिक अस्तित्व रखते हुए, सांकेतिक अर्थ की भी अभिव्यक्ति करें तो मुझे कोई आपत्ति नहीं।

◆  मनु अर्थात् मन के दोनों पक्ष, हृदय और मस्तिष्क का सम्बन्ध क्रमश: श्रद्धा और इड़ा से भी सरलता से लग जाता है।

◆ श्रद्धां हृदय्य याकूत्या श्रद्धया विन्दते वसु (ऋग्वेद में) इन्हीं सब के आधार पर ‘कामायनी’ की कथा सृष्टि हुई है।

◆  हाँ ‘कामायनी’ की कथा व श्रृंखला मिलाने के लिए कहीं कहीं थोड़ी-बहुत कल्पना को भी काम में ले आने का अधिकार, मैं नहीं छोड़ का हूँ ।
-जयशंकर प्रसाद

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