पद्माकर ऋतु वर्णन व्याख्या: तीनों छंद (कवित्त) सप्रसंग व्याख्या एवं काव्य-सौंदर्य
रीतिकाल के अंतिम प्रतिनिधि एवं मूर्धन्य कवि पद्माकर (पद्माकर भट्ट) के ‘ऋतु वर्णन’ के तीनों छंदों (कवित्त) का संदर्भ, प्रसंग, प्रत्येक पंक्ति की सप्रसंग व्याख्या एवं काव्य-सौंदर्य:
पाठ-परिचय एवं संदर्भ
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कवि: पद्माकर
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काल: रीतिकाल
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भाषा: परिष्कृत, सरस एवं नाद-सौंदर्ययुक्त ब्रजभाषा
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पाठ्यपुस्तक: अंतरा (भाग-1) – कक्षा 11 (ऐच्छिक)
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संदर्भ: प्रस्तुत तीनों कवित्त रीतिकाल के प्रसिद्ध कवि पद्माकर द्वारा रचित ‘ऋतु वर्णन’ प्रसंग से हमारी पाठ्यपुस्तक ‘अंतरा (भाग-1)’ में संकलित हैं।
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केंद्रीय विषय: प्रकृति के तीन प्रमुख रूपों—वसंत ऋतु, होली (फाग का उल्लास) तथा वर्षा ऋतु—के समय प्रकृति, परिवेश और मानव-मन में होने वाले मादक व चित्ताकर्षक परिवर्तनों का सजीव चित्रण।
कवित्त 1: वसंत ऋतु वर्णन (औरै भाँति कुंजन में गुंजरत…)
“औरै भाँति कुंजन में गुंजरत भौर भौर,औरै रूप मंजुल मुखानी पर मंजरी।कहै पद्माकर सु औरै छबि छगन में,छबि छलकति छिति-छत-पर मंजरी॥औरै भाँति बिहग समाज में अवाज होति,ऐसो रितुराज के न आज दिन द्वै भए।औरै रस, औरै रीति, औरै राग, औरै रंग,औरै तन, औरै मन, औरै बन ह्वै गए॥”
प्रसंग
कवि पद्माकर ऋतुराज वसंत के आगमन पर प्रकृति, पक्षियों, वृक्षों और संपूर्ण मानव-मन में आए अप्रत्याशित और अलौकिक बदलाव का वर्णन करते हैं।
सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)
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भौरों की गुंजार और आम की मंजरी: कवि कहते हैं कि वसंत ऋतु के आते ही लताओं के कुंजों में भौरों के मंडराने और गुंजार करने का ढंग ही बिल्कुल बदल गया है (औरै भाँति = अद्भुत/अनोखा हो गया है)। वृक्षों की सुंदर शाखाओं पर आम की मंजरियों (बौर) का रूप और सुगंध पहले से कहीं अधिक मोहक दिखाई देने लगी है।
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मंजरियों की छटा: पद्माकर कहते हैं कि उपवनों और बागों के झुरमुटों में एक अनोखी छटा छा गई है। पेड़ों की टहनियों पर लदी हुई आम की मंजरियों का सौंदर्य धरती से लेकर आकाश (छत) तक छलक उठा है।
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पक्षियों का कलरव: आकाश और पेड़ों पर विचरण करने वाले पक्षियों के समूह (बिहग समाज) के चहकने की आवाज भी बिल्कुल नए और मधुर स्वर में गूँज रही है।
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वसंत का प्रभाव: अभी तो ऋतुराज वसंत को आए हुए मुश्किल से दो दिन भी नहीं बीते हैं, फिर भी सारा परिवेश पूरी तरह बदल चुका है।
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संपूर्ण कायाकल्प: अब संसार का रस (आनंद) कुछ और हो गया है, जीवन की रीति (ढंग) अनोखी हो गई है, संगीत के राग और जीवन के रंग बदल गए हैं। मनुष्यों के शरीर में एक नया यौवन, मन में नई उमंग और वनों में एक नया ही नैसर्गिक रूप आ गया है।
कवित्त 2: होली / फाग वर्णन (गोकुल के कुल के गली के गोप…)
“गोकुल के कुल के गली के गोप गाउन के,लिन पै कछू न एते आदर कढ़त नाहिं।कहै पद्माकर परोस पिछवारन के,द्वारन के दौरि-दौरि गुन अवगुन गनत नाहिं॥तौ लगि स्याम रंग में चुराई चित,चोरा-चोरी बोरत तौ बोरयो पै निचोरत बनत नाहिं।ऐसो अनुराग मन भयो है अनुरागी सखी,रंग में भीजि गई पै अब छूटत नाहिं॥”
(मूल पाठ्यपुस्तक के अनुसार प्रचलित पाठ):
“गोकुल के कुल के गली के गोप गाउन के,चित्त पै चढ़े सो अब कढ़त कढ़त नाहिं।कहै पद्माकर परोस पिछवारन के,द्वारन के दौरि-दौरि गुन औ अवगुन गनत नाहिं॥तो पै ललितादि सब सखियन के संग मिलि,खेलत बिलोकि स्याम रोके हू रूकत नाहिं।बोरयो अनुराग-रस-रंग में सुअंग-अंग,बोरयो तौ बोरयो पै निचोरत बनत नाहिं॥”
प्रसंग
होली के पावन पर्व पर गोकुल की गलियों में मचे फाग के हुड़दंग, गोपियों के लोक-लाज त्यागने तथा श्री कृष्ण के प्रेम-रंग में पूर्णतः भीग जाने की विवशता का अत्यंत मनोहारी चित्रण।
सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)
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गोकुल में फाग का उल्लास: होली के अवसर पर गोकुल के सभी कुलों, गलियों और ग्वाल-बालों (गोप) के मन पर फाग और उल्लास का ऐसा रंग चढ़ गया है कि वह किसी के उतारे नहीं उतरता।
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गुण-दोष की उपेक्षा: पद्माकर कहते हैं कि पड़ोसी और पीछे के घरों के लोग एक-दूसरे के द्वारों पर दौड़-दौड़कर जा रहे हैं और होली के रंग-गुलाल में डूबे हुए किसी के गुण या दोष (भले-बुरे, छोटे-बड़े) का कोई विचार नहीं कर रहे हैं।
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रोकने पर भी न रुकना: कृष्ण-प्रेम में पगी एक गोपी अपनी सखी से कहती है कि ललिता आदि सभी सखियों के साथ मिलकर जब से उसने श्यामसुंदर को फाग खेलते देखा है, तब से उसका चंचल मन किसी के रोकने पर भी रुक नहीं रहा है।
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प्रेम-रंग की अमिटता (निचोरत बनत नाहिं): गोपी कहती है कि उसने अपने अंग-प्रत्यंग को श्री कृष्ण के प्रेम रूपी रंग और गुलाल में पूरी तरह डुबो (बोरयो) लिया है। अब स्थिति यह है कि यदि रंग में कपड़ा भीग जाए तो उसे निचोड़ा जा सकता है, किंतु श्री कृष्ण के इस प्रेम-रंग में मन ऐसा डूब गया है कि अब इसे चाहा कर भी अपने से अलग (निचोड़ते) नहीं बनता। यह प्रेम-रंग अब अमिट हो चुका है।
कवित्त 3: वर्षा ऋतु वर्णन (भौ रन को गुंजन बिहार बन कुंजन में…)
“भौरन को गुंजन बिहार बन कुंजन में,मंजुल मलारन को गावनि लगत है।कहै पद्माकर गुमानहू ते मानहू ते,प्रानहू ते प्यारो मनभावन लगत है॥मोरन को सोर घनघोर चहूँ ओरन सो,हिंडोरन को बृंद छबि छावनि लगत है।नेह सरसावनि में मेह बरसावनि में,चित खड़सावनि में सावन आवत है॥”
प्रसंग
वर्षा ऋतु (सावन मास) के आगमन पर प्रकृति के संगीतमय वातावरण, मोरों के नृत्य, झूलों के उल्लास और प्रियतम के प्रति बढ़ते प्रेम-भाव का चित्रण।
सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)
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भौरों का गुंजन और मल्हार का गान: सावन के महीने में वनों और लताओं के कुंजों में भौरों का मधुर गुंजार करते हुए विहार करना ऐसा प्रतीत होता है मानो वर्षा ऋतु का प्रसिद्ध ‘मल्हार राग’ गाया जा रहा हो।
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प्रियतम की मधुरता: पद्माकर कहते हैं कि इस मादक मौसम में नायिका का सारा अहंकार (गुमान) और मान (रूठना) स्वतः ही समाप्त हो जाता है और उसे अपना प्रियतम (मनभावन) अपने प्राणों से भी अधिक प्यारा लगने लगता है।
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मोरों का कलरव और झूले: चारों दिशाओं में बादलों की घनघोर घटाओं के बीच मोरों का उल्लासपूर्ण शोर (कूकना) गूँजने लगा है। पेड़ों की डालियों पर झूलों (हिंडोरन) के समूह अत्यंत आकर्षक छवि बिखेरने लगे हैं।
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सावन की विशेषता: सावन का यह महीना ऐसा मनमोहक है जो हृदय में प्रेम के रस को सरसाने (उमड़ाने) वाला है, आकाश से अमृतमयी मेघ (जल) बरसाने वाला है और विरही मन को विरह व मिलन की मधुर बेचैनी (खड़सावनि) से भर देने वाला है।
काव्य-सौंदर्य
1. भाव-पक्ष
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प्रकृति का उद्दीपन रूप: पद्माकर ने ऋतुओं के माध्यम से मानव-मन के हर्ष, विलास, श्रृंगार और काम-भावना का अत्यंत स्वाभाविक उद्दीपन रूप चित्रित किया है।
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रस: संयोग श्रृंगार रस की रससिक्त और उल्लासमय अभिव्यक्ति।
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लोक-संस्कृति का प्रभाव: गोकुल की होली, फाग का हुड़दंग, सावन के झूले और मल्हार गायन भारतीय लोक-परंपरा की सजीव झांकी प्रस्तुत करते हैं।
2. कला-पक्ष (शिल्प-सौंदर्य)
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भाषा: परिमार्जित, माधुर्य गुण संपन्न, नाद-सौंदर्य से ओतप्रोत एवं प्रवाहमयी साहित्यिक ब्रजभाषा।
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छंद विधान: तीनों छंद कवित्त छंद (मनहरण कवित्त) के श्रेष्ठ उदाहरण हैं, जिनमें प्रत्येक पंक्ति की यति और गति शास्त्रीय नियमों के अनुकूल है।
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प्रमुख अलंकार:
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यमक अलंकार: प्रथम छंद में “औरै” शब्द की अनेक बार आवृत्ति हुई है, जहाँ हर बार इसका अर्थ नए और अद्भुत के रूप में विस्तार पाता है।
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रूपक अलंकार: “प्रेम-रंग” (प्रेम रूपी रंग), “अनुराग-रस”।
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छेकानुप्रास एवं वृत्यनुप्रास (अद्भुत नाद-सौंदर्य):
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“कुंजन में गुंजरत भौर भौर”
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“छबि छलकति छिति-छत-पर”
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“गोकुल के कुल के गली के गोप गाउन के” (क और ग वर्ण की संगीतात्मक आवृत्ति)
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“दौरि-दौरि गुन अवगुन”
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“मोरन को सोर घनघोर चहूँ ओरन”
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“नेह सरसावनि में मेह बरसावनि में”
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विरोधाभास एवं लक्षणायुक्त व्यंजना: “बोरयो तौ बोरयो पै निचोरत बनत नाहिं” (भौतिक वस्त्र को निचोड़ा जा सकता है, किंतु मन में रंगे प्रेम को निचोड़ना असंभव है)।
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बिंब-योजना: आम की लदी मंजरियाँ, मोरों का नाचना, आकाश में घिरी घटाएँ और झूलते हिंडोले—अत्यंत जीवंत दृश्य व श्रव्य बिंब निर्मित करते हैं।