महादेवी वर्मा जीवन परिचय, कृतित्व एवं काव्यगत विशेषताएँ
“हिंदी साहित्य की मीरा और आधुनिक युग की महान नारीवादी लेखिका”
(पुस्तकें: नीहार, रश्मि, नीरजा, दीपशिखा, यामा)
1. जीवन वृत्तांत – जन्म और जन्म स्थान
-
जन्म : 26 मार्च, 1907 (होली के दिन)
-
जन्म स्थान : फर्रुखाबाद, उत्तर प्रदेश
-
पारिवारिक पृष्ठभूमि : पिता – श्री गोविंद प्रसाद वर्मा (प्राध्यापक), माता – हेमरानी देवी (धार्मिक एवं सरल स्वभाव)
-
बहुत कम उम्र (9 वर्ष) में विवाह डॉ. स्वरूप नारायण वर्मा से हुआ, परंतु झुकाव शिक्षा, साहित्य और समाज सेवा की ओर अधिक रहा।
-
स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी, जिसके कारण सन 1920 में डेढ़ वर्ष की जेल काटी।
(चित्र: फर्रुखाबाद, उत्तर प्रदेश एवं इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश)
2. शिक्षा
-
प्रारंभिक शिक्षा : इंदौर के मिशन स्कूल में – संस्कृत, अंग्रेजी और चित्रकला की शिक्षा प्राप्त की।
-
उच्च शिक्षा : इलाहाबाद के क्रास्थवेट गर्ल्स कॉलेज से मिडिल और हाई स्कूल उत्तीर्ण किया।
-
इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संस्कृत साहित्य में एम.ए. (M.A.) की उपाधि सर्वोच्च अंकों के साथ प्राप्त की।
-
वैचारिक प्रभाव : कॉलेज के दिनों में सुभद्रा कुमारी चौहान से परिचय। आगे चलकर बौद्ध दर्शन से अत्यधिक प्रभावित हुईं।
3. कृतित्व – प्रमुख रचनाएँ, पत्रकारिता, पुरस्कार
(क) प्रमुख रचनाएँ
-
प्रसिद्ध गद्य रचनाएँ (संस्मरण एवं रेखाचित्र) : ‘अतीत के चल-चित्र’, ‘स्मृति की रेखाएँ’, ‘पथ के साथी’, ‘मेरा परिवार’ (गिल्लू, गोरा आदि पशु-पक्षियों पर संस्मरण) – ‘भक्तिन’ (अनिवार्य हिंदी, कक्षा 12)
-
वैचारिक निबंध संग्रह : ‘श्रृंखला की कड़ियाँ’, ‘साहित्यकार की आस्था’
-
प्रमुख काव्य संग्रह : ‘नीहार’, ‘रश्मि’, ‘नीरजा’, ‘सांध्यगीत’, ‘दीपशिखा’ – इन सभी का वृहद संकलन ‘यामा’ नाम से प्रकाशित।
(ख) पत्रकारिता और कार्यक्षेत्र
-
‘चाँद’ पत्रिका का संपादन कर हिंदी पत्रकारिता को नई दिशा दी।
-
प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्राचार्या एवं बाद में कुलपति (Vice-Chancellor) रहीं। महिला शिक्षा के लिए अभूतपूर्व कार्य किया।
(ग) पुरस्कार
-
★ ज्ञानपीठ पुरस्कार (1982) – ‘यामा’ के लिए।
-
★ पद्म भूषण (1956) तथा पद्म विभूषण (1988 – मरणोपरांत)
-
★ अन्य सम्मान : सेकसरिया पुरस्कार, मंगलाप्रसाद पारितोषिक।
4. मृत्यु
-
जीवन भर शिक्षा, नारी उत्थान और साहित्य साधना में लीन रहने वाली यह महान मनीषी 11 सितंबर, 1987 को इलाहाबाद (प्रयागराज) में हमेशा के लिए मौन हो गईं।
‘दीप जलता रहा निशा काअंतिम प्रहर होने तक,जागती रही मैं तेरी स्मृति मेंजीवन का भी अंत होने तक।’— महादेवी वर्मा
5. साहित्यिक गत प्रमुख विशेषताएँ
-
गद्य और पद्य का अद्भुत समन्वय : महादेवी जी हिंदी साहित्य की उन विरल रचनाकारों में से हैं, जिनका पद्य और गद्य दोनों पर समान अधिकार था। कविताओं में वे ‘आधुनिक मीरा’ के रूप में विरह और वेदना की अभिव्यक्ति करती हैं, वहीं गद्य में समाज के कठोर यथार्थ को सामने लाती हैं।
-
संवेदनात्मक रेखाचित्र और करुणा का स्वर : उन्होंने रेखाचित्र विधा को नई ऊँचाई दी। ‘भक्तिन’, ‘घीसा’ या ‘रामा’ जैसे पात्रों का सजीव चित्रण कर पाठक के मन में करुणा जगाती हैं। मूक पशु-पक्षियों के प्रति उनका अनुराग अद्भुत था।
-
प्रखर नारी चेतना : ‘श्रृंखला की कड़ियाँ’ के माध्यम से भारतीय समाज में स्त्रियों की पराधीनता, उनके अधिकारों और सामाजिक शोषण पर बेबाक, तार्किक और प्रखर विचार व्यक्त किए। वे नारी सशक्तिकरण की पहली आधुनिक प्रणेता हैं।
-
चित्रोपम और संस्कृतनिष्ठ भाषा-शैली : उनकी भाषा अत्यंत परिमार्जित, शुद्ध और संस्कृतनिष्ठ (तत्सम प्रधान) खड़ी बोली हैं। उनकी शैली में ‘चित्रोपमता’ (शब्दों से चित्र बन जाना) का अनूठा गुण हैं। गद्य लिखते समय वे नपे-तुले, गंभीर और काव्यात्मक शब्दों का प्रयोग करती हैं, जिसमें व्यंग्य और विनोद का पुट भी सहज रूप से शामिल रहता हैं।