UGC NET EXAM में आयी हुई हिन्दी के कवियों की पंक्तियां – 3

201. पुस्तक जल्हण हाथ दे चेलि गज्जन
नृपकाज – चन्दबरदाई (पृथ्वीराज रासो)

202. हो जाने दे गर्क नशे से,मत पड़ने दो फर्क नशे में।
बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’

203. यौवन की इस मधुशाला में प्यासों का ही स्थान
प्रिये। – भगवती चरण वर्मा(तुम अपनी हो, जग
अपना है रचना से)

204. सावधान, मनुष्य! यदि विज्ञान है तलवार, तो इसे
फेंक, तज कर मोह, स्मृति के पार ।
– रामधारीसिंह दिनकर(कुरुक्षेत्र के छठा सर्ग से)

205. अमरता उसमें मनाती है मरण – त्यौहार!
– महादेवी वर्मा (दीपशिखा काव्य संग्रह से)

206. सिर नीचा कर किसकी सत्ता सब करते हैं स्वीकार
यहां। – जयशंकर प्रसाद (कामायनी का आशा
सर्ग से)

207. “हिमालय के आंगन में जिसे प्रथम किरणों कर दे
उपहार”- जयशंकर प्रसाद (स्कंदगुप्त नाटक के
पाचवें अंक से मातृगुप्त के द्वारा गाये गये वीर
गीत की पहली पंक्ति)

208. खुल गये छंद के बंद। प्रास के रजत पाश –
पंत(युगवाणी से)

209. बाँधो न नाव इस ठांव बंधु । पूछेगा सारा गांव बंधु।
– निराला(अर्चना काव्य संग्रह से)

210. “मैं मजदूर हूं , मजदूरी किए बिना मुझे भोजन
करने का अधिकार नहीं।”- प्रेमचंद

211. अबला जीवन हाय!तुम्हारी यही कहानी।
आँचल में है दूध और आँखों में पानी॥ 
– मैथिलीशरण गुप्त(यशोधरा से)

212. जिसे तुम समझे हो अभिशाप,
जगत की ज्वालाओं का मूल
ईश का वो रहस्य वरदान,
कभी मत उसको जाओ भूल।
– जयशंकर प्रसाद  (कामायनी,लज्जा सर्ग)

213. पुरुष विजय का भूखा होता है,
तथा नारी समर्पण की,पुरुष लुटना चाहता है,
नारी लुट जाना चाहती है। – महादेवी वर्मा

214. नारी  तुम  केवल श्रद्धा  हो,विश्वास  रजत  नग-पग
-तल  में ,
पीयुष श्रोत  सी बहा  करो,जीवन  के सुंदर  समतल  में।
– जयशंकर प्रसाद (कामायनी,श्रद्धा सर्ग)

215. ओ स्पर्श मुझे क्षमा करना कि मैं तुमसे होकर भी
तुमसे परे हूँ, ओ माध्यम मुझे क्षमा करना मैं
तुम्हारे पार जाना चाहता हूँ – शमशेर बहादुर सिंह

216. वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे। –
मैथिलीशरण गुप्त(मनुष्यता कविता से)

217. दोनों ओर प्रेम पलता है । सखि, पतंग भी जलता
है हा! दीपक भी जलता है! – मैथिलीशरण गुप्त
(साकेत से)

218. मैं मरूंगा सुखी। मैंने जीवन की धज्जियां उड़ाई है।
– अज्ञेय (जन्मदिवस कविता से)

219. भागता में दम तोड़ ,घूम गया कई मोड़
मुक्तिबोध(अंधेरे में कविता से)

220. कही आग लग गयी,कहीं गोली चल गयी।
मुक्तिबोध( अंधेरे में)

221. गुण ग्राही गोविंद गुण गावा, मजि मजि राम परम
पद पावा – हरिदास निरंजनी

223. पुनि कवि अपने मन मैं गुने, मो कवित कोउ निरस
सुनै। – नंददास (रूपमंजरी से)

224. मुझे जगत – जीवन का प्रेमी। बना रहा प्यार
तुम्हारा। – त्रिलोचन शास्त्री

225. वह धीरता कहां है गंभीरता कहां है- गोपाल शरण
सिंह

226. क्रुद्ध कुरुक्षेत्र के समर में साधा है अकाम ज्ञान
कर्म योग इसमें( सियारामशरण गुप्त, बापू कविता
से)

227. आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे?आज से दो
प्रेम योगी, अब वियोगी ही रहेंगे! – नरेंद्र शर्मा

228. शंखनाद ने कर दिया, समारोह का अंत, अंत यही
ले जाएगा, कुरुक्षेत्र पर्यन्त। – नरेंद्र शर्मा (यह
दोहा इनके जीवन की अंतिम रचना है, जिसे
उन्होंने धारावाहिक ‘महाभारत’ के लिए लिखा
था।)

229. बह चुकी बहकी हवाएं चैत कि, कट गयी पुलें
हमारे खेत की। – अज्ञेय

230. नारी निकले तो असती है,नर यती कहा कर नर
निकले।- मैथिलीशरण गुप्त(विष्णुप्रिया से)

231. घूँघट के पट खोल रे, तो को पीव मिलेंगे। घट घट
में वहाँ साईं बसत है, कटुक वचन मत बोल रे तो
को पीव मिलेंगे। – कबीर

232. स्वस्ति श्री तुलसी कुलभूषण दूषन-हरन गोसाईं।
बारहिं बार प्रणाम करहु अब हरहूँ सोक-समुदाई।।
घर के स्वजन हमारे जेते सबन्ह उपाधि बढ़ाई ।
साधु-संग अरु भजन करत माहिं देत कलेस महाई।।
मेरे माता-पिता के समह, हरिभक्त सुखदाई ।
हमको कहा उचित करिबो है, सो लिखिए
समझाई।। ( मीरा बाई ने घर वालों के व्यवहार से
दुखी होकर मीरा ने तुलसीदास को पत्र लिखा)

भावार्थः- मीरा तुलसी दास जी से कहती हैं कि हे तुलसी दास जी मैं आपको बार-बार प्रणाम करती हूँ कि आप मेरा सभी दुःख दूर करें, मेरा मार्गदर्शन करें। मेरे पति भगवान को प्यारे हो गये हैं अर्थात उनका स्वर्गवास हो गया है। साधु-सन्तों की सेवा और भगवत भजन में मेरे सम्बन्धी लोग (ससुराल वाले) मुझे बहुत कष्ट दे रहें हैं। मुझे मेरे भगवन श्री कृष्ण से दूर करने की कोशिश कर रहे हैं। मेरे लिए मेरे माता – पिता से ज्यादा, भगवान की भक्ति में सुख मिलता है जो मेरे सम्बन्धियों को रास नहीं आती है। अब मैं क्या करूँ मुझे समझ में नहीं आ रहा है। आप मुझे राह दिखाएं या मेरे लिए क्या उचित है मुझे समझाने का कष्ट करें। मीरा बाई के इस पत्र को पढ़कर तुलसीदास जी ने जबाब दिया-

जाके प्रिय न राम-वैदेही।
ताजिये ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही।।
तज्यो पिता प्रह्लाद, विभीषण बंधू, भरत महतारी।
बलि गुरु तज्यो कंत ब्रज-बनितन्हीं, भए मुद-मंगलकारी।।
नाते नेह रामके मनियत सुहृद सुसेब्य जहाँ लौं।
अंजन कहा आँखि जेहि फूटै, बहुतक कहौं कहाँ लौं।
तुलसी सो सब भाँती परम हित पूज्य प्रानते प्यारो ।
जासो होय सनेह राम-पद, एतो मतो हमारो।

भावार्थः- ये पंक्तियाँ तुलसीदास जी के विनय पत्रिका से उद्धृत की गई हैं। यहाँ तुलसीदास जी मीराबाई के पत्र का जबाब देते हुए कहते हैं कि जिन्हें भगवान से प्रेम नहीं हो उसको करोड़ों दुश्मन की तरह समझ कर उसका त्याग कर देना चाहिए, चाहे वो कितना भी प्रिय क्यों न हो। जैसे- प्रह्लाद ने पिता, विभीषण ने भाई, भरत ने माता, राजा बलि ने गुरु शुक्राचार्य तथा ब्रज की गोपियों ने अपने पतियों का त्याग कर दिया। जहाँ तक हो सके भगवान की सेवा में लगना चाहिए। उन्हीं से प्रेम करना चहिए और क्या कहूँ जिस काजल को आँख में लगाने से आँख ही अंधा हो जाए उस काजल को आँख में नहीं लगाना चहिए। तुलसीदास जी कहते हैं कि भगवान ही प्राणों से भी ज्यादा प्रिय हैं और भगवान से ही प्रेम करना चहिए यही मेरा विचार है।

233. बिहारिन बावरी सी भई। ऊंची चढ़ी अपने भवन में
टेरत हाय ढई। – मीरा

234. सुना दो ना हे मधुप कुमारी,मुझे भी अपना मीठा
गाना – पंत

235. है अंधेरी रात पर दीया जलाना कब मना है –
हरिवंशराय बच्चन(अँधेरे का दीपक कविता से)

236. बापू के भी ताऊ निकले तीनों बंदर बापू के –
नागार्जुन(‘तीनों बंदर बापू के’कविता से)

237. आज जीत की रात है, पहरुए सावधान रहना –
रघुवीर सहाय (पन्द्रह अगस्त कविता)

238. मैंने उसको नहीं जगाया दबे पांव वापस घर
आया – केदारनाथ अग्रवाल

239. हम तो सारा का सारा लेंगे जीवन कम से कम
वाली बात नहीं हमसे कहिए – रघुवीर सहाय

240. जिंदगी दो उंगली में दबी सस्ती सिगरेट के जलते
हुए हुए टुकड़ो की तरह है – नरेश मेहता

241. देश की भक्ति मनके में नेक नहीं डरना होगा –
नाथूराम शर्मा ‘शंकर’

242. जिसको न निज गौरव तथा निज देश का
अभिमान है, वह नर नहीं नर पशु निरा और मृतक
समान है। – गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’

243. जो भरा नहीं है भावों से,बहती जिसमें रसधार
नहीं वह हृदय नहीं है पत्थर है,जिसमें स्वदेश का
प्यार नहीं। – गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’
(ये पंक्ति इन्होंने ने ’स्वदेश’ नामक अख़बार के लिए
लिखी थीं, जो अख़बार के मुख्य पृष्ठ पर ऊपर ही
प्रकाशित होती थीं)

244. किन्तु हम है द्वीप हम धारा नहीं हैं ।  – अज्ञेय 

245. हम तो ‘ सारा – का – सारा ‘ लेंगे जीवन ‘ कम – से
– कम ‘ वाली बात न हमसे कहिए। – रघुवीर सहाय 

246.  हम सब बौने हैं, मन से – गिरजा कुमार माथुर

247. सखा पियारे कृष्ण के गुलाम राधा रानी के
– भारतेन्दु हरिश्चंद्र 

248. साँझ सवेरे पंछी सब क्या कहते हैं कुछ तेरा है।
हम सब इक दिन उड़ जायेंगे यह दिन चार बसेरा है। 
– भारतेन्दु हरिश्चंद्र 

249. जात भी ओछी , करम भी ओछा , ओछा करब
करम हमारा। – रैदास

250. सियाराममय सब जग जानी , करऊ प्रणाम जोरि
जुग पानि ।  – तुलसीदास 

251. बड़ी कठिन है डगर पनघट की -अमीर खुसरो

252. एक थाल मोती से भरा , सबके सिर पर औंधा
धरा / चारो ओर वह थाल फिरे , मोती उससे एक न
गिरे आकाश – अमीर खुसरो

253. गोरी सोवे सेज पर मुख पर डारे केस
चल खुसरो घर आपने रैन भई चहुँ देस
( अपने गुरु निजामुद्दीन औलिया की मृत्यु पर अमीर
खुसरो ने कहा)

254. तुर्क हिन्दुस्तानियम मन हिंदवी गोयम जवाब ( अर्थात मैं हिन्दुस्तानी तुर्क हूँ , हिन्दवी में जवाब देता हूँ । ) – अमीर खुसरो

255. काहे को बियाहे परदेस सुन बाबुल मोरे ( गीत )
– अमीर खुसरो

256.   माधव हम परिनाम निरासा । – विद्यापति

257. राम सो बड़ो है कौन , मोसो कौन छोटो ।
राम सो खरो है कौन , मोसो कौन खोटो ।।
– तुलसीदास

258. राम नांव ततसार है – कबीरदास

259. अधिकार खोकर बैठना यह महा दुष्कर्म है । –
मैथिलीशरण गुप्त

260. देशभक्त वीरों , मरने से नेक नहीं डरना होगा । 
– नाथूराम शर्मा ‘शंकर’

261. पढि कमाय कीन्हों कहा , हरे देश कलेस । 
– प्रताप नारायण मिश्र 

262. अन्न नहीं है वस्त्र नहीं है रहने का न ठिकाना,
कोई नहीं किसी का साथी अपना और बिगाना ।
– रामनरेश त्रिपाठी

263. जिसको नहीं गौरव तथा निज देश का अभिमान है।
– मैथिलीशरण गुप्त

264. राम तुम मानव हो ईश्वर नहीं हो क्या ? 
  विश्व में रमे हुए सब कहीं नहीं हो क्या ? 
– मैथिलीशरण गुप्त 

265. मैंने मैं शैली अपनाई देखा एक दुःखी निज भाई।
– निराला

266. नील परिधान बीच सुकुमारास खुल रहा मृदुल
अधखुला अंग भक खिला हो ज्यों बिजली का फूल
माला मेघ बीच गुलाबी रंग । – जयशंकर प्रसाद

 267. अहा , ग्राम्य जीवन भी क्या है , क्यों न इसे सबका
मन चाहे ।  -मैथिलीशरण गुप्त 

268. व्यर्थ हो गया जीवन मैं रण में गया हार।
– निराला

269.  हिमालय के आंगन में जिसे प्रथम किरणों का दे
उपहार । – जयशंकर प्रसाद 

270. हाँ सखि ! आओ बाँह खोलकर हम,
लगकर गले जुड़ा ले प्राण फिर तुम तम में,
मैं प्रियतम में हो जावें द्रुत अंतर्धान । 
– सुमित्रानंदन पंत

271. नील परिधान बीच सुकुमारास खुल रहा मृदुल
अधखुला अंग भक खिला हो ज्यों बिजली का फूल
माला मेघ बीच गुलाबी रंग।- जयशंकर प्रसाद 

272. तोड़ दो यह झितिज , मैं भी देख लूं उस ओर क्या
है ?  – महादेवी वर्मा

273. मंगल भवन अमंगल हारी
द्रवहु सुदशरथ अजिर बिहारी – तुलसीदास

274. सबहिं नचावत राम ग़ोसाई
मोहि नचावत तुलसी गोसाई – फादर कामिल बुल्के

275. अंसुवन जल सींचि-सींचि, प्रेम बेल बोई।
सावन माँ उमग्यो हियरा भणक सुण्या हरि आवण
री। – मीरा

276. घायल की गति घायल जानै और न जानै कोई।
– मीरा

277. मोर पंखा सिर ऊपर राखिहौं, गुंज की माल गरे
पहिरौंगी। – रसखान

278. जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं।
प्रेम गली अती सांकरी, ता में दो न समाहि।।
-कबीर

279. मो सम कौन कुटिल खल कामी -सूरदास

280. हरि है राजनीति पढ़ि आए -सूरदास

281. आँखिन मूंदिबै के मिस,
आनि अचानक पीठि उरोज लगावै -चिंतामणि

282. भले बुरे सम, जौ लौ बोलत नाहिं
जानि परत है काक पिक, ऋतु बसंत के माहिं।
 – वृन्द

283. एक सुभान कै आनन पै कुरबान जहाँ लगि रूप
जहाँ को – बोधा

284. तंत्रीनाद कवित्त रस सरस राग रति रंग। -बिहारी

285. साजि चतुरंग वीर रंग में तुरंग चढ़ि -भूषण

286. सुंदर देही पाय के, मत कोइ करैं गुमान।
काल दरेरा खाएगा, क्या बूढ़ा क्या ज्वान॥
– मलूकदास

287. काँधे धरी यह पालकी है किस कन्हैयालाल की?
– कुँवर नारायण

288. चुप्पा रहना छोड़ दिया, लड़की ने डरना छोड़
दिया। – श्योराज सिंह बेचैन

289. सिंहसान खाली करो कि जनता आती है -दिनकर

290. कवि कुछ ऐसी तान सुनाओं, जिससे उथल-पुथल
मच जाए
एक हिलोर इधर से आये, एक हिलोर उधर से
आए। – बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’

291. मेरे देश का समाजवाद
मालगोदाम में लटकती हुई
उन बाल्टियों की तरह है जिस पर ‘आग’ लिखा है
और उनमें बालू और पानी भरा है। -धूमिल

292. अपना क्या है इस जीवन में
सब तो लिया उधार – अरुण कमल

293. हम कौन थे, क्या हो गये हैं और क्या होंगे अभी,
आओ, विचारें आज मिलकर ये समस्याएँ सभी। 
– मैथली शरण गुप्त

294. जिसको नहीं गौरव तथा निज देश का अभिमान है।
वह नर नहीं नरपशु निरा हैं, और मृतक समान है।।  -मैथलीशरण गुप्त

295. मैं ढूंढ़ता तुझे था जब कुंज और वन में,
तू मुझे खोजता था जब दीन के वतन में।
 – राम नरेश त्रिपाठी

296. अन्न नहीं है वस्त्र नहीं है रहने का न ठिकाना
कोई नहीं किसी का साथी अपना और बिगाना। 
-रामनरेश त्रिपाठी

297. खरीफ के खेतों में जब सुनसान है,
रब्बी के ऊपर किसान का ध्यान है। – श्रीधर पाठक

298. विजन वन-प्रांत था, प्रकृति मुख शांत था,
अटन का समय था, रजनि का उदय था।
 – श्रीधर पाठक

◆ मोटिवेशनल कविताओं की पंक्तियों ◆

299.  देख कर बाधा विविध, बहु विघ्न घबराते नहीं।
रह भरोसे भाग के दुख भोग पछताते नहीं
काम कितना ही कठिन हो किन्तु उकताते नही
भीड़ में चंचल बने जो वीर दिखलाते नहीं।।
– अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध(कर्मवीर कविता से)

300.वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल, दूर नहीं है;
थककर बैठ गये क्या भाई! मंजिल दूर नहीं है।
– रामधारी सिंह दिनकर

301. मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..

हैं फ़ूल रोकते, काटें मुझे चलाते..
मरुस्थल, पहाड़ चलने की चाह बढाते..
सच कहता हूं जब मुश्किलें ना होती हैं..
मेरे पग तब चलने में भी शर्माते..
मेरे संग चलने लगे हवायें जिससे..
तुम पथ के कण-कण को तूफ़ान करो..
– गोपाल दास नीरज

302. सच है, विपत्ति जब आती है,
कायर को ही दहलाती है,
सूरमा नहीं विचलित होते,
क्षण एक नहीं धीरज खोते,
विघ्नों को गले लगाते हैं,
काँटों में राह बनाते हैं। – रामधारीसिंह दिनकर

303. गति प्रबल पैरों में भरी
फिर क्यों रहूं दर दर खडा
जब आज मेरे सामने
है रास्ता इतना पडा
जब तक न मंजिल पा सकूँ,
तब तक मुझे न विराम है,
चलना हमारा काम है। – शिवमंगल सिंह ‘सुमन
(चलना हमारा काम है कविता से)

304. वृक्ष हों भले खड़े
हों घने, हों बड़े
एक पत्र छाँह भी
मांग मत ! मांग मत ! मांग मत !
अग्निपथ ! अग्निपथ ! अग्निपथ !

तू न थकेगा कभी
तू न थमेगा कभी
तू न मुड़ेगा कभी
कर शपथ ! कर शपथ ! कर शपथ !
अग्निपथ ! अग्निपथ ! अग्निपथ !
– हरिवंश राय बच्चन( अग्निपथ कविता से)

305. बैठ जाओ सपनों के नाव में, मौके की ना तलाश
करो।
सपने बुनना सीख लो।।
खुद ही थाम लो हाथों में पतवार, माझी का ना
इंतजार करो।
सपने बुनना सीख लो।। – नरेंद्र वर्मा

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