आत्मपरिचय / दिन जल्दी-जल्दी ढलता है पाठ का मूल उद्देश्य व संवेदना

आत्मपरिचय / दिन जल्दी-जल्दी ढलता है (गीत)

  • कवि: हरिवंश राय बच्चन
  • काव्य-धारा: हालावाद / छायावादोत्तर गीतिकाव्य
  • मूल स्रोत: ‘आत्मपरिचय’  तथा ‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है’ (निशा निमंत्रण से)

1. पाठ का मूल उद्देश्य व संवेदना

कविता 1: ‘आत्मपरिचय’(निशा निमंत्रण से)

  • स्वयं की पहचान: यह प्रतिपादित करना कि स्वयं को जानना दुनिया को जानने से कहीं अधिक कठिन है
  • प्रीति-कलह का संबंध: समाज के खट्टे-मीठे अनुभवों, व्यंग्य-बाणों और शासन-प्रशासन के दबावों के बीच रहकर भी दुनिया से पूरी तरह कटा नहीं जा सकता
  • विरुद्धों का सामंजस्य: जीवन में विपरीत परिस्थितियों के बीच संतुलन साधना—उन्मादों में अवसाद, रोदन में राग और शीतल वाणी में आग लिए मस्त रहना

कविता 2: ‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है’ (निशा निमंत्रण से)

  • समय की परिवर्तनशीलता: समय निरंतर बीत रहा है और लक्ष्य तक पहुँचने के लिए तत्परता आवश्यक है
  • प्रेम व अपनत्व की शक्ति: किसी प्रियजन से मिलने की आशा ही कदमों में तेजी (चंचलता) भरती है; प्रेम के अभाव में जीवन शिथिल और एकाकी हो जाता है

2. विस्तृत पाठ-सार एवं प्रमुख बिंदु

भाग-1: ‘आत्मपरिचय’

  • सांसारिक दायित्व और प्रेम: कवि सांसारिक जीवन का भार उठाते हुए भी अपने हृदय में प्रेम की मधुरता बनाए रखता है। किसी प्रिय के स्पर्श से उसकी जीवन-रूपी वीणा के तार झंकृत हो उठे हैं
  • स्नेह-सुरा का पान: वह प्रेम रूपी मदिरा का पान करता है और दुनिया की अनावश्यक टीका-टिप्पणियों की परवाह नहीं करता
  • आदर्श स्वप्न-संसार: भौतिकवादी, धन-लोलुप और अपूर्ण संसार कवि को नहीं भाता; वह अपनी कल्पनाओं का संपूर्ण प्रेममय संसार रचता और मिटाता है
  • सुख-दुख में समभाव: कवि हृदय की आग में स्वयं तपता है और भव-सागर की लहरों पर मस्त होकर बहता है
  • ज्ञान का भ्रम व सहजता: संसार सत्य की खोज में लगा रहा, पर जहाँ समझदार (दाना) हैं वहीं नादान भी हैं। इसलिए कवि सांसारिक चतुराई और छल-प्रपंच वाले सीखे हुए ज्ञान को भुलाकर सहज जीवन जी रहा है
  • कवि बनाम दीवाना: संसार जिसे गीत या छंद कहता है, वह वास्तव में कवि के हृदय का रुदन और आंतरिक आवेग है। वह स्वयं को केवल ‘दीवाना’ कहलाना पसंद करता है

भाग-2: ‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है’

  • पथिक की व्यग्रता: दिन ढलने पर पथिक तेजी से कदम बढ़ाता है ताकि मंजिल पास होने पर भी रास्ते में ही रात न हो जाए
  • वात्सल्य भाव (चिड़ियों का उदाहरण): घोंसलों में भूखे बच्चे इस आशा (प्रत्याशा) में बाहर झाँक रहे हैं कि माता-पिता भोजन लेकर लौटेंगे। यह विचार चिड़ियों के पंखों में तीव्र गति भर देता है
  • एकाकी जीवन का संताप: कवि का कोई अपना नहीं है जो उसके लिए व्याकुल हो। यह अकेलापन उसके कदमों को धीमा (शिथिल) कर देता है और हृदय में गहरी विह्वलता भर देता है

3. पाठ में आए कठिन एवं विशिष्ट शब्दों के अर्थ

शब्द अर्थ
उर
हृदय / दिल
उद्गार
दिल के भाव / विचार
स्नेह-सुरा
प्रेम रूपी मदिरा
भव-सागर
संसार रूपी सागर
उन्माद
मस्ती / दीवानगी / अत्यधिक उत्साह
अवसाद
दुःख / निराशा / उदासी
दाना
चतुर / ज्ञानी / समझदार मनुष्य
नादान
अज्ञानी / नासमझ
मूढ़
मूर्ख
वैभव
धन-दौलत / भौतिक समृद्धि
प्रासाद
महल / राजभवन
भूप
राजा
निःशेष
जो बिल्कुल शेष न हो / पूर्ण / समग्र
पंथी
राही / मुसाफ़िर / पथिक
प्रत्याशा
आशा / किसी के लौटने का इंतज़ार
नीड़
घोंसला
पर
पंख
विकल
व्याकुल / बेचैन
हित
भलाई / वास्ते
शिथिल
ढीला / धीमा / सुस्त
पद
पैर / कदम
विह्वलता
भावुक व्याकुलता / अधीरता

4. मुख्य परीक्षा-उपयोगी काव्यांश एवं व्याख्या बिंदु

  • “मैं और, और जग और, कहाँ का नाता” पंक्ति में ‘और’ की विशेषता:
    यहाँ ‘और’ शब्द तीन भिन्न अर्थों में प्रयुक्त होने से यमक अलंकार की छटा है—प्रथम ‘और’ (कवि का विशिष्ट स्वभाव), द्वितीय ‘और’ (संयोजक अव्यय) तथा तृतीय ‘और’ (संसार की भिन्न/भौतिकवादी प्रवृत्ति)
  • “शीतल वाणी में आग” का आशय:
    वाणी की भाषा अत्यंत कोमल, शांत और मधुर है, किंतु उसके भीतर व्यक्त विचार क्रांति, विरह की तपन और सामाजिक रूढ़ियों के प्रति तीव्र विद्रोह से भरे हैं (विरोधाभास अलंकार)
  • “दिन जल्दी-जल्दी ढलता है” की आवृत्ति का प्रभाव:
    यह पुनरुक्ति समय की तीव्र गति, नश्वरता और लक्ष्य प्राप्ति के लिए मानवीय हृदय की आंतरिक छटपटाहट को प्रभावी रूप से ध्वनित करती है

     हरिवंश राय बच्चन द्वारा रचित कविताओं—‘आत्मपरिचय’ तथा ‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है’ के प्रमुख काव्यांशों की विस्तृत सन्दर्भ, प्रसंग, व्याख्या एवं विशेष दी जा रही है:

    काव्यांश 1:

    “मैं जग-जीवन का भार लिए फिरता हूँ,
    फिर भी जीवन में प्यार लिए फिरता हूँ;
    कर दिया किसी ने झंकृत जिनको छूकर
    मैं साँसों के दो तार लिए फिरता हूँ।
    मैं स्नेह-सुरा का पान किया करता हूँ,
    मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हूँ,
    जग पूछ रहा उनको, जो जग की गाते,
    मैं अपने मन का गान किया करता हूँ!”
    • सन्दर्भ: प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग-2’ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से अवतरित है। इसके रचयिता छायावादोत्तर गीतिकाव्य एवं हालावाद के प्रवर्तक कवि हरिवंश राय बच्चन हैं
    • प्रसंग: प्रस्तुत पंक्तियों में कवि सांसारिक दायित्वों को निभाते हुए भी अपने हृदय में प्रेम की मधुरता बनाए रखने तथा दुनिया की चापलूसी से दूर रहकर अपने अंतर्मन के अनुसार जीने का भाव व्यक्त करते हैं
    • व्याख्या: कवि कहते हैं कि उन पर सांसारिक जीवन और समाज की अनेक जिम्मेदारियों का बोझ है, फिर भी वे अपने हृदय में प्रेम और स्नेह की भावना संजोए रखते हैं। किसी प्रियजन ने उनके हृदय-रूपी वीणा के तारों को प्रेमपूर्वक छूकर झंकृत कर दिया था, और वे उसी मधुर स्मृति और प्रेम के सहारे अपनी साँसें चला रहे हैं। कवि प्रेम रूपी मदिरा (स्नेह-सुरा) का आनंद लेते हैं और इस बात की चिंता नहीं करते कि दुनिया उनके बारे में क्या सोचती है। यह संसार केवल उन्हीं की प्रशंसा करता है जो उसकी हाँ में हाँ मिलाते हैं और उसकी झूठी चाटुकारिता करते हैं, किंतु कवि केवल अपनी हार्दिक भावनाओं और अंतर्मन की प्रेरणा से ही गीत गाते हैं
    • विशेष:
      • ‘जग-जीवन’, ‘स्नेह-सुरा’ में रूपक अलंकार तथा ‘किया करता हूँ’ की आवृत्ति में अनुप्रास की छटा
      • सरल, सहज, प्रवाहमयी एवं गेय खड़ी बोली का प्रयोग
      • कवि की आत्मानुभूति और मस्तमौला (हालावादी) स्वभाव का सुंदर उद्घाटन

    काव्यांश 2:

    “मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ,
    शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ,
    हों जिस पर भूपों के प्रासाद निछावर,
    मैं वह खंडहर का भाग लिए फिरता हूँ।
    मैं रोया, इसको तुम कहते हो गाना,
    मैं फूट पड़ा, तुम कहते, छंद बनाना;
    क्यों कवि कहकर संसार मुझे अपनाए,
    मैं दुनिया का हूँ एक नया दीवाना!”
    • सन्दर्भ: पूर्ववत्।
    • प्रसंग: कवि ने अपने जीवन में विरुद्धों के सामंजस्य (रोदन में राग, शीतल वाणी में आग) तथा स्वयं को एक सच्चे मस्त-दीवाने के रूप में प्रस्तुत किया है
    • व्याख्या: कवि कहते हैं कि उनके विरह और रुदन में भी प्रेम का मधुर संगीत (राग) छिपा हुआ है। उनकी वाणी यद्यपि बाहर से अत्यंत शांत और कोमल (शीतल) प्रतीत होती है, किंतु उसके भीतर प्रेम की आंतरिक तपन, ऊर्जा और विद्रोह की ज्वाला (आग) विद्यमान है। उनका हृदय प्रेम की निराशा से खंडहर जैसा हो चुका है, किंतु यह प्रेम-रूपी खंडहर राजाओं के भव्य महलों (प्रासादों) से भी अधिक मूल्यवान है। जब वे अपने हृदय के दुख से रो पड़ते हैं, तो संसार उसे ‘गीत’ समझ लेता है, और जब आंतरिक पीड़ा शब्दों में फूट पड़ती है, तो लोग उसे ‘छंद’ का निर्माण कहते हैं। कवि संसार से आग्रह करते हैं कि वे उन्हें केवल एक ‘कवि’ मानकर न अपनाएँ, बल्कि प्रेम की मस्ती में डूबा हुआ एक स्वतंत्र ‘दीवाना’ समझें
    • विशेष:
      • ‘रोदन में राग’ और ‘शीतल वाणी में आग’ में अत्यंत सुंदर विरोधाभास अलंकार
      • ‘भूपों के प्रासाद निछावर’ में लाक्षणिकता एवं अनुप्रास अलंकार
      • आत्मपरक एवं भावात्मक गीत-शैली का उत्कृष्ट उदाहरण

    काव्यांश 3:

    “हो जाए न पथ में रात कहीं,
    मंजिल भी तो है दूर नहीं-
    यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी-जल्दी चलता है।
    दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!
    बच्चे प्रत्याशा में होंगे,
    नीड़ों से झाँक रहे होंगे-
    यह ध्यान परों में चिड़ियों के भरता कितनी चंचलता है!
    दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!”
    • सन्दर्भ: प्रस्तुत काव्यांश पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग-2’ में संकलित गीत संग्रह ‘निशा निमंत्रण’ के गीत ‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है’ से लिया गया है। इसके रचयिता हरिवंश राय बच्चन हैं
    • प्रसंग: इसमें कवि ने समय के तीव्र प्रवाह तथा लक्ष्य तक पहुँचने व अपने प्रियजनों से मिलने की उत्कंठा का स्वाभाविक चित्रण किया है
    • व्याख्या: दिनभर का थका हुआ यात्री जब देखता है कि शाम होने वाली है और उसकी मंजिल भी अब पास ही है, तो रास्ते में अंधेरा होने के डर से वह तेजी से कदम बढ़ाने लगता है क्योंकि समय तेजी से बीत रहा है। उधर आकाश में उड़ती चिड़िया जब यह सोचती है कि उसके नन्हे बच्चे भोजन और माँ-बाप के स्नेह की आशा में घोंसलों (नीड़ों) से बाहर मुँह निकालकर राह देख रहे होंगे, तो यह वात्सल्य भाव उसके थके हुए पंखों में तीव्र गति और असीम चंचलता भर देता है। वह तेजी से अपने घोंसले की ओर उड़ने लगती है
    • विशेष:
      • ‘जल्दी-जल्दी’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार
      • वात्सल्य रस और मानवीय मनोविज्ञान का अत्यंत कोमल व सजीव बिंब
      • तत्सम-तद्भव युक्त प्रवाहमयी, संगीतात्मक एवं लयात्मक भाषा-शैली

    काव्यांश 4:

    “मुझसे मिलने को कौन विकल?
    मैं होऊँ किसके हित चंचल?
    यह प्रश्न शिथिल करता पद को, भरता उर में विह्वलता है!
    दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!”
    • सन्दर्भ: पूर्ववत्।
    • प्रसंग: कवि ने अपने एकाकी जीवन की पीड़ा, अपने प्रिय के अभाव और उसके कारण उत्पन्न निराशा का मार्मिक अंकन किया है
    • व्याख्या: कवि स्वयं से प्रश्न करते हैं कि इस संसार में ऐसा कोई नहीं है जो उनसे मिलने के लिए बेचैन (विकल) हो, तो फिर वे किसके लिए अपने कदमों में तेजी लाएँ और किसके पास जाने के लिए उत्साहित हों। यह विचार आते ही घर लौटने की उनकी सारी उमंग समाप्त हो जाती है और उनके बढ़ते हुए कदम धीमे (शिथिल) पड़ जाते हैं। यह अकेलापन उनके हृदय में गहरी वेदना और तड़प (विह्वलता) भर देता है, जबकि समय अपनी स्वाभाविक गति से लगातार ढलता जा रहा है
    • विशेष:
      • ‘मुझसे मिलने को कौन विकल?’ और ‘मैं होऊँ किसके हित चंचल?’ में प्रश्नालंकार
      • वियोग श्रृंगार और एकाकीपन की करुण अनुभूति की मार्मिक अभिव्यक्ति
      • भाषा अत्यंत सरल, गंभीर एवं प्रभावोत्पादक है

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