आरोह भाग-1 के पाठ ‘रामनरेश त्रिपाठी’ की कविता ‘पथिक’ का संदर्भ, प्रसंग, व्याख्या और काव्य-सौंदर्य
छायावाद-पूर्व (द्विवेदी युगीन) स्वच्छंदतावादी काव्यधारा के प्रमुख कवि रामनरेश त्रिपाठी के खंडकाव्य ‘पथिक’ से संकलित काव्यांशों का संदर्भ, प्रसंग, सप्रसंग व्याख्या एवं काव्य-सौंदर्य:
पाठ-परिचय एवं संदर्भ
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कवि: रामनरेश त्रिपाठी
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मूल स्रोत: खंडकाव्य पथिक (1920)
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पाठ्यपुस्तक: आरोह (भाग-1) – कक्षा 11 (अनिवार्य कोर)
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संदर्भ: प्रस्तुत काव्यांश राष्ट्रीय एवं स्वच्छंदतावादी भावधारा के कवि रामनरेश त्रिपाठी द्वारा रचित प्रसिद्ध खंडकाव्य ‘पथिक’ के पहले सर्ग से उद्धृत हैं।
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केंद्रीय विषय: सांसारिक दुखों से विरक्त होकर प्रकृति की गोद में विचरण करते हुए ‘पथिक’ का सागर, आकाश, मेघ और सूर्योदय के अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य पर मुग्ध होना तथा प्रकृति-प्रेम के माध्यम से देशप्रेम व सत्य की अनुभूति करना।
काव्यांश 1: प्रतिपल नूतन वेश बनाकर…
“प्रतिपल नूतन वेश बनाकर रंग-बिरंग निराला।रबि के सम्मुख थिरक रही है नभ में वारिद-माला॥नीचे नील समुद्र मनोहर, ऊपर नील गगन है।घन पर बैठ, बीच में बिचरूँ, यही चाहता मन है॥रत्नाकर गर्जन करता है, मलयानिल बहता है।हरदम यह हौसला हृदय में, प्रिय! भरा रहता है—इस विशाल, विस्तृत, महिमामय रत्नाकर के घर केकोने-कोने में लहरों पर बैठ फिरूँ जी भर के!”
प्रसंग
सागर तट पर खड़ा पथिक प्रकृति के विराट सौंदर्य को देखकर सम्मोहित हो जाता है। वह बादलों और सागर की लहरों पर बैठकर संपूर्ण प्रकृति का आनंद लेने की उत्कट इच्छा प्रकट करता है।
सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)
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आकाश में बादलों का नृत्य: पथिक देखता है कि आकाश में बादलों का समूह (वारिद-माला) प्रत्येक क्षण नया, अनोखा और रंग-बिरंगा रूप धारण करके सूर्य के सामने ऐसे घूम रहा है मानो कोई नर्तकी थिरक रही हो।
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बादल पर सैर करने की इच्छा: नीचे मन को हरने वाला विशाल नीला समुद्र लहरा रहा है और ऊपर अथाह नीला आकाश फैला हुआ है। इस मनोहर दृश्य को देखकर पथिक का मन करता है कि वह बादलों पर सवार हो जाए और आकाश तथा सागर के बीच स्वच्छंद होकर विचरण करे।
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लहरों पर घूमने का हौसला: सामने सागर (रत्नाकर) अपनी प्रचंड गर्जना कर रहा है और मलय पर्वत से आने वाली सुगंधित शीतल पवन (मलयानिल) बह रही है। यह ऊर्जावान वातावरण देखकर पथिक अपनी प्रिया (अथवा अपनी अंतरात्मा) को संबोधित करते हुए कहता है—हे प्रिय! मेरे हृदय में सदा यह उत्साह भरा रहता है कि मैं इस विशाल, दूर-दूर तक फैले हुए और महिमाशाली समुद्र रूपी घर के कोने-कोने में जाऊँ और उसकी लहरों पर बैठकर जी भरकर सैर करूँ।
काव्यांश 2: निकल रहा है जल-निधि तल पर…
“निकल रहा है जल-निधि तल पर दिनकर-बिंब अधूरा।कमला के कंचन-मंदिर का मानो कांत कँगूरा॥लाने को निज पुण्य-भूमि पर जय-लक्ष्मी की असवारी।रत्नाकर ने निर्मित कर दी स्वर्ण-सड़क अति प्यारी॥निर्भय, दृढ़, गंभीर भाव से गरज रहा सागर है।लहरों पर लहरों का आना सुंदर, अति सुंदर है॥कहो यहाँ से बढ़कर सुख क्या पा सकता है प्राणी?अनुभव करो हृदय से, हे अनुराग-भरी कल्याणी!”
प्रसंग
कवि प्रातःकालीन सूर्योदय और सागर पर पड़ने वाले सूर्य के सुनहरे प्रकाश के अलौकिक दृश्य का मनोहारी बिंब प्रस्तुत करते हैं।
सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)
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स्वर्ण-मंदिर का कंगूरा: समुद्र (जल-निधि) की क्षितिज रेखा पर प्रातःकालीन सूर्य का आधा बिंब उदित होता दिखाई दे रहा है। वह लाल-सुनहरा अर्ध-बिंब ऐसा प्रतीत होता है मानो लक्ष्मी जी (कमला) के सोने के महल का कोई सुंदर, चमकता हुआ शिखर (कांत कंगूरा) हो।
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सोने की सड़क का रूपक: सूर्य की किरणें जब समुद्र के जल पर सीधी पड़ती हैं, तो पानी में सोने जैसी चमकती रेखा बन जाती है। उसे देखकर कवि कल्पना करते हैं मानो समुद्र ने अपनी पवित्र भारत भूमि पर विजय की देवी लक्ष्मी की सवारी लाने के लिए सोने की अत्यंत सुंदर सड़क बना दी हो।
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सर्वोच्च सुख की अनुभूति: सागर बिना किसी भय के पूरी दृढ़ता और गंभीरता के साथ गरज रहा है। उस पर एक के बाद एक उठती हुई लहरों का दृश्य अत्यंत मनमोहक है। पथिक अपनी प्रेयसी से कहता है—हे प्रेममयी कल्याणी! तुम अपने अंतःकरण से इस आनंद को महसूस करो; क्या इस अलौकिक प्राकृतिक सुख से बढ़कर कोई दूसरा सुख इस संसार में किसी प्राणी को मिल सकता है? (अर्थात प्रकृति का यह सान्निध्य ही संसार का सर्वश्रेष्ठ सुख है)।
काव्यांश 3: जब गंभीर तम अर्ध-निशा में…
“जब गंभीर तम अर्ध-निशा में जग को ढक लेता है।अंतरिक्ष की छत पर तारों को छिटका देता है॥सस्मित-वदन जगत का स्वामी मृदु गति से आता है।तट पर खड़ा गगन-गंगा के मधुर गीत गाता है॥उससे ही विमुग्ध हो नभ में चंद्र विहँस देता है।वृक्ष विविध पत्तों-पुष्पों से तन को सज लेता है॥पक्षी हर्ष संभाल न सकते, मुग्ध चहक उठते हैं।फूल साँस लेकर सुख की सानंद महक उठते हैं॥”
प्रसंग
यहाँ आधी रात के समय प्रकृति के शांत, रहस्यमय और सम्मोहक रूप का मानवीकरण किया गया है।
सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)
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रात्रि का सन्नाटा और तारों का छिटकना: जब आधी रात के समय गहरा अंधकार संपूर्ण संसार को अपनी चादर में ढक लेता है, तब प्रकृति आकाश रूपी छत पर अनगिनत जगमगाते तारों को बिखेर देती है।
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जगत के स्वामी का मौन आगमन: उस नीरव एकांत में मुस्कुराते हुए चेहरे (सस्मित-वदन) वाला इस संसार का स्वामी (ईश्वर/परम चेतना) मंद गति से आता है और आकाशगंगा के किनारे खड़े होकर मानो सृष्टि के कल्याण के मधुर गीत गाता है।
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प्रकृति का उल्लास: ईश्वर के उस अलौकिक सौंदर्य पर मुग्ध होकर आकाश में चंद्रमा हँसने (मुस्कुराने) लगता है। पेड़-पौधे आनंदित होकर नए पत्तों और रंग-बिरंगे फूलों से अपने शरीर को सजा लेते हैं।
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पक्षी और पुष्पों की प्रसन्नता: भोर होते ही पक्षी अपने आनंद को संभाल नहीं पाते और खुशी से चहकने लगते हैं। फूल भी सुख की गहरी साँस लेकर संपूर्ण वातावरण में अपनी आनंदमयी सुगंध बिखेर देते हैं।
काव्यांश 4: वन, उपवन, गिरि, सानु, कुंज में…
“वन, उपवन, गिरि, सानु, कुंज में मेघ बरस पड़ते हैं।मेरा आत्म-प्रलय होता है, नयन-नीर झड़ते हैं॥पढ़ो, बालिते! चरित बने हैं इस प्यारी कुंज-कली में।लहर, तरंग, तृण, तरु, गिरि, नभ, किरन, जलद पर प्यारी—लिखी हुई यह मधुर कहानी विश्व-विमोहनहारी॥कैसी मधुर मनोहर उज्ज्वल है यह प्रेम-कहानी।जी में है अक्षर बन इसके बनूँ विश्व की बानी॥स्थिर, पवित्र, आनंद-प्रवाहित, सदा शांति सुखकर है।अहा! प्रेम का राज्य परम सुंदर, अतिशय सुंदर है!”
प्रसंग
प्रकृति के प्रेम-व्यापार को देखकर पथिक का आत्म-समर्पण, उसकी भाव-विह्वलता और प्रकृति के साम्राज्य को परम सत्य के रूप में स्वीकार करने का वर्णन।
सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)
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भावुकता और अश्रु-प्रवाह: प्रकृति के इस अगाध सौंदर्य को देखकर बादलों से वनों, बगीचों, पर्वतों, पठारों (सानु) और लताओं के कुंजों में वर्षा होने लगती है। उस दृश्य को देखकर पथिक भाव-विभोर हो जाता है; उसका अपना अस्तित्व प्रकृति में विलीन (आत्म-प्रलय) हो जाता है और उसकी आँखों से आनंद के आँसू बहने लगते हैं।
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प्रकृति की प्रेम-कथा: पथिक कहता है—हे प्रिये! तुम इस प्रकृति रूपी पुस्तक को पढ़ो। सागर की लहरों, तिनकों, वृक्षों, पर्वतों, आकाश, सूर्य की किरणों और बादलों पर यह संसार को मोहित करने वाली मधुर प्रेम-कहानी लिखी हुई है।
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विश्व की वाणी बनने की आकांक्षा: प्रकृति की यह प्रेम-कहानी कितनी पवित्र, उज्ज्वल और मनोहर है! मेरा मन करता है कि मैं इस प्रेम-कहानी का एक अक्षर बन जाऊँ और संपूर्ण विश्व की वाणी बनकर इस नैसर्गिक सत्य का गान करूँ।
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प्रेम-राज्य की महिमा: प्रकृति का यह प्रेम-राज्य सदा स्थिर, पवित्र, आनंद की अविरल धारा बहाने वाला और परम शांति देने वाला है। सचमुच, प्रकृति और ईश्वर के प्रेम का यह दिव्य साम्राज्य अत्यंत सुंदर और अनुपम है।
काव्य-सौंदर्य (शिल्प एवं भाव-पक्ष)
1. भाव-पक्ष
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स्वच्छंदतावादी चेतना: कविता में प्रकृति को केवल पृष्ठभूमि न मानकर एक सजीव, संवेदनशील और आलंबन रूप में चित्रित किया गया है।
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प्रकृति से तादात्म्य: बाह्य सामाजिक बंधनों से मुक्त होकर प्रकृति के कण-कण में ईश्वरीय सौंदर्य का दर्शन और आत्म-विसर्जन।
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रस: श्रृंगार (संयोग श्रृंगार) तथा अद्भुत व शांत रस का मनोरम संगम।
2. कला-पक्ष (शिल्प-सौंदर्य)
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भाषा: संस्कृतनिष्ठ, तत्समप्रधान, सुव्यवस्थित एवं प्रवाहपूर्ण खड़ी बोली (उदा. वारिद-माला, रत्नाकर, मलयानिल, सस्मित-वदन, सानु, जलद)।
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शैली: वर्णनात्मक, गीतात्मक तथा छायावाद-पूर्व की स्वच्छंदतावादी काव्य-शैली।
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प्रमुख अलंकार:
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उत्प्रेक्षा अलंकार: “मानो कांत कँगूरा” (सूर्य के आधे बिंब में सोने के महल के कंगूरे की संभावना)।
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मानवीकरण अलंकार: वारिद-माला का थिरकना, सागर का गर्जना, चंद्रमा का हँसना, बादलों का प्रेमाश्रु बहाना।
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रूपक अलंकार: “स्वर्ण-सड़क”, “कमला के कंचन-मंदिर”, “नभ की छत”।
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अनुप्रास अलंकार: “नीचे नील समुद्र मनोहर”, “कोने-कोने”, “लहर, तरंग, तृण, तरु”, “विश्व-विमोहनहारी”।
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पुनरुक्ति प्रकाश: “कोने-कोने”, “सुंदर, अति सुंदर”।
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बिंब-विधान: सूर्योदय, सागर की लहरों और आकाशगंगा के अत्यंत मनोहारी दृश्य बिंब।