कुँवर नारायण जीवन परिचय, कृतित्व एवं काव्यगत विशेषताएँ

कुँवर नारायण जीवन परिचय, कृतित्व एवं काव्यगत विशेषताएँ

“तीसरे सप्तक के प्रमुख कवि और नई कविता आंदोलन के सशक्त हस्ताक्षर”

(पुस्तकें: आत्मजयी, चक्रव्यूह, कोई दूसरा नहीं, वाजश्रवा के बहाने)

1. जीवन वृत्तांत – जन्म और जन्म स्थान

  • जन्म : 19 सितंबर, 1927
  • जन्म स्थान : उत्तर प्रदेश के फ़ैज़ाबाद (अब अयोध्या) में।
  • जीवन यात्रा : कुँवर नारायण जी का जीवन एक समृद्ध और वैचारिक वातावरण में बीता। उन्होंने अपना लंबा समय लखनऊ में बिताया और बाद में दिल्ली आ गए। दुनिया के कई देशों की यात्राएँ कीं, जिसने उनके दृष्टिकोण को वैश्विक बनाया।

2. शिक्षा

  • उच्च शिक्षा : कुँवर नारायण जी ने अपनी उच्च शिक्षा लखनऊ विश्वविद्यालय से प्राप्त की।
  • एम.ए. (अंग्रेजी) : उन्होंने वर्ष 1951 में लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. (M.A.) की डिग्री हासिल की।
  • साहित्यिक रुझान : उनकी रुचि हिंदी साहित्य, भारतीय दर्शन, इतिहास तथा कलाओं (जैसे सिनेमा और संगीत) में गहरी थी, जिसने उनके लेखन को अनूठी बौद्धिक गहराई दी।

3. कृतित्व – प्रमुख रचनाएँ, पत्रकारिता, पुरस्कार

(क) प्रमुख रचनाएँ
  • काव्य संग्रह : ‘चक्रव्यूह’ (1956 – पहला संग्रह), ‘परिवेश : हम-तुम’, ‘इन दिनों’, ‘कोई दूसरा नहीं’, ‘तय की गई लकीरें’, ‘इन दिनों’।
  • प्रबंध काव्य (खंडकाव्य) :
    • ✓ ‘आत्मजयी’ – (कठोपनिषद के ‘नचिकेता’ प्रसंग पर आधारित कालजयी प्रबंध काव्य)।
    • ✓ ‘वाजश्रवा के बहाने’ – (चर्चित प्रबंध काव्य)।
  • कहानी संग्रह : ‘आकारों के आसपास’।
  • समीक्षा और गद्य : ‘आज और आज से पहले’ (समीक्षा), ‘मेरे साक्षात्कार’।
(ख) पत्रकारिता और कार्यक्षेत्र
  • ✓ ‘युगचेतना’ पत्रिका के संपादन मंडल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • ✓ ‘नया प्रतीक’ (अज्ञेय जी द्वारा संपादित) पत्रिका के संपादन से जुड़े रहे।
  • ✓ भारतेंदु नाट्य अकादमी और संगीत नाटक अकादमी से लंबे समय तक जुड़े रहे।
(ग) पुरस्कार
  • ज्ञानपीठ पुरस्कार (2005) – समग्र साहित्यिक योगदान के लिए।
  • साहित्य अकादमी पुरस्कार (1995) – ‘कोई दूसरा नहीं’ के लिए।
  • व्यास सम्मान – के.के. बिड़ला फाउंडेशन द्वारा।
  • पद्म भूषण (2009) – भारत सरकार द्वारा।
  • अन्य सम्मान – लोहिया सम्मान, कबीर सम्मान तथा साहित्य अकादमी की सर्वोच्च फैलोशिप (महत्तर सदस्यता)।

4. मृत्यु

  • हिंदी कविता को वैचारिक और दार्शनिक ऊँचाई देने वाले इस मनीषी कवि का 15 नवंबर, 2017 को 90 वर्ष की आयु में नई दिल्ली में निधन हो गया।
शब्द बचे रहेंगे,
विचार बचे रहेंगे,
मनुष्य की जिजीविषा
सदा अमर रहेगी।

5. काव्यगत प्रमुख विशेषताएँ

  • नागरीय संवेदना और यांत्रिकता का विरोध : आधुनिक नगरीय जीवन के अकेलापन, तनाव और संवेदनहीनता को उन्होंने मुखर रूप से व्यक्त किया है तथा मानवीय मूल्यों को बचाने पर बल दिया हैं।
  • दार्शनिक और वैचारिक गहराई : तीसरे सप्तक (1959) के कवि होने के नाते उनकी कविताओं में प्रयोगशीलता के साथ उपनिषदों और इतिहास के मिथकों को आधुनिक संदर्भों में व्याख्यायित करने की अनूठी दार्शनिक दृष्टि हैं (जैसा कि ‘आत्मजयी’ में दिखता है)।
  • इतिहास और वर्तमान का मेल : वे अतीत की घटनाओं और पौराणिक चरित्रों को वर्तमान जीवन की समस्याओं से जोड़कर देखते हैं। उनकी कविताओं में इतिहासबोध बहुत मजबूत हैं।
  • संयम और साफ-सुथरी भाषा-शैली : उनकी भाषा अत्यंत संयमित, नपी-तुली और साफ-सुथरी खड़ी बोली हैं। वे बनावटी अलंकारों और कठिन शब्दों के जाल से दूर रहते हैं। उनकी शैली में धीर-गंभीर संवाद होता है, जो सीधे पाठक की बुद्धि और विवेक को अपील करता हैं।

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