भारतेन्दु हरिश्चंद्र के प्रमुख मौलिक नाटक(bharatendu harishchandra ke pramukh maulik natak)

भारतेन्दु हरिश्चंद्र के प्रमुख मौलिक नाटक

आधुनिक हिंदी साहित्य और नाट्य विधा के जनक भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने कुल मिलाकर लगभग 17 नाटकों की रचना की, जिनमें 9 मौलिक नाटक (तथा प्रहसन/नाटिका) और शेष अनूदित नाटक हैं।

नाटक का नाम रचना वर्ष विधा / नाट्य रूप प्रमुख विषय / विशेषता
वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति 1873 ई. प्रहसन पाखंडी धर्मावलंबियों, मांस-मदिरा भक्षण और सामाजिक ढोंग पर तीखा व्यंग्य।
सत्य हरिश्चंद्र 1875 ई. नाटक (पौराणिक) सत्यनिष्ठा, कर्तव्यपालन और त्याग का आदर्श निरूपण (चार अंक)।
श्री चंद्रावली 1876 ई. नाटिका कृष्ण-प्रेम और माधुर्य भक्ति की आदर्श अभिव्यक्ति।
विषस्य विषमौषधम् 1876 ई. भाण (एकांकी) बड़ौदा के गायकवाड़ पदच्युत प्रसंग पर आधारित राजनीतिक व्यंग्य।
भारत दुर्दशा 1880 ई. नाट्य रासक / लास्य रूपक भारत के पराभव, ब्रिटिश शासन की शोषण नीति, आलस्य, अंधविश्वास और मदिरापान का मार्मिक चित्रण।
नील देवी 1881 ई. ऐतिहासिक गीति-रूपक भारतीय नारी के अदम्य साहस, देशभक्ति, वीरांगना रूप और जौहर की कथा।
अंधेर नगरी 1881 ई. प्रहसन (6 अंक) चौपट राजा के माध्यम से निरंकुश व भ्रष्ट शासन व्यवस्था और न्याय प्रणाली पर करारा राजनीतिक प्रहार।
प्रेम जोगिनी 1875 ई. नाटिका (चार गर्भांक) काशी के तत्कालीन धार्मिक पाखंड, पंडे-पुजारियों के अनाचार और सामाजिक यथार्थ का उद्घाटन।
सती प्रताप 1883 ई. पौराणिक नाटक सावित्री-सत्यवान की पौराणिक कथा पर आधारित (अपूर्ण नाटक — जिसे बाद में बाबू राधाकृष्ण दास ने पूरा किया)।

प्रमुख बिंदु

  • राष्ट्रीय चेतना का शंखनाद: ‘भारत दुर्दशा’ हिंदी का पहला राजनीतिक नाटक माना जाता है, जिसमें भारतेंदु ने लिखा:

    “रोअहु सब मिलिकै आवहु भारत भाई। हा हा! भारत-दुर्दशा न देखी जाई॥”

  • लोकप्रिय प्रहसन: ‘अंधेर नगरी’ की प्रसिद्ध पंक्ति—“अंधेर नगरी अनबूझ राजा, टका सेर भाजी टका सेर खाजा” आज भी सत्ता की विसंगतियों पर सबसे सशक्त मुहावरा है।

  • रंगमंच और अभिनय की शुरुआत: भारतेंदु जी ने न केवल नाटक लिखे बल्कि स्वयं भी अभिनय किया (उदा. शीतलाप्रसाद त्रिपाठी के नाटक ‘जानकी मंगल’ में लक्ष्मण की भूमिका निभाई)।

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