महादेवी वर्मा कविता व्याख्या: जाग तुझको दूर जाना और सब आँखों के आँसू उजले
छायावाद के चार प्रमुख स्तंभों में से एक, ‘आधुनिक युग की मीरा’ महादेवी वर्मा द्वारा रचित प्रसिद्ध जागरण-गीत ‘जाग तुझको दूर जाना’ का संदर्भ, प्रसंग, प्रत्येक काव्यांश की सप्रसंग व्याख्या एवं काव्य-सौंदर्य:
पाठ-परिचय एवं संदर्भ
-
कवयित्री: महादेवी वर्मा
-
मूल काव्य संग्रह: सांध्यगीत (1936)
-
पाठ्यपुस्तक: अंतरा (भाग-1) – कक्षा 11 (ऐच्छिक)
-
संदर्भ: प्रस्तुत कविता छायावादी गीति-काव्य की अमर साधिका महादेवी वर्मा के प्रसिद्ध काव्य-संग्रह ‘सांध्यगीत’ से उद्धृत है।
-
केंद्रीय विषय: यह एक ओजस्वी ‘जागरण गीत’ (उद्बोधन गीत) है। इसमें साधना-पथ पर अग्रसर साधक (अथवा स्वाधीनता सेनानी) को सांसारिक मोह-माया, शारीरिक सुखों, आलस्य और प्राकृतिक विपदाओं की परवाह किए बिना निरंतर अपने चरम लक्ष्य की ओर बढ़ते रहने का आह्वान किया गया है।
काव्यांश 1: चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसी…
“चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसी,व्यस्त बाना?जाग तुझको दूर जाना!अचल हिमगिरि के हृदय में आज चाहे कंप हो ले,या प्रलय के आँसुओं में मौन अलसित व्योम रो ले;आज पी आलोक को संकल्प-आँसू के घने तम,चीरकर तिमिर की छाती चमक ले विद्युत-हाँस तम;पर तुझे नाश-पंथ पर चिह्न अपने छोड़ आना!जाग तुझको दूर जाना!”
प्रसंग
कवयित्री निरंतर सजग रहने वाले साधक की आँखों में आलस्य और शिथिलता देखकर विस्मित होती हैं और उसे सभी प्राकृतिक बाधाओं को पार करते हुए लक्ष्य-पथ पर अग्रसर होने के लिए जगाती हैं।
सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)
-
आलस्य का त्याग: कवयित्री साधक को संबोधित करते हुए कहती हैं कि तुम्हारी आँखें तो सदा जागरूक और सचेत (चिर सजग) रहती थीं, फिर आज उनमें यह नींद और आलस्य (उनींदी) कैसा छाया हुआ है? तुम्हारी वेश-भूषा (बाना) आज इतनी बिखरी और अस्त-व्यस्त क्यों है? हे पथिक! तुम अपनी तंद्रा से जागो, क्योंकि तुम्हारी साधना का मार्ग अत्यंत लंबा है और तुम्हें बहुत दूर जाना है।
-
प्राकृतिक बाधाओं से न डिगना: चाहे आज सदैव स्थिर रहने वाले हिमालय पर्वत का कठोर हृदय भी किसी महा-भूकंप से कांप उठे, या शांत और अलसाया हुआ आकाश प्रलयंकारी आंसुओं की मूसलाधार बारिश करने लगे; चाहे संपूर्ण प्रकाश (आलोक) को निगलकर घनघोर अंधकार चारों ओर फैल जाए, अथवा घने बादलों के सीने को चीरकर कड़कड़ाती हुई बिजली की भयानक हँसी चमकने लगे—कैसी भी भीषण परिस्थिति क्यों न आ जाए, तुम्हें घबराना नहीं है।
-
बलिदान का पदचिह्न: उस विनाशकारी और कठिन मार्ग (नाश-पंथ) पर भी तुम्हें अपने शौर्य, तप और बलिदान के अमिट पदचिह्न छोड़कर आगे बढ़ना है। इसलिए हे साधक! जाग उठो, तुम्हें अभी बहुत दूर जाना है।
काव्यांश 2: बाँध लेंगे क्या तुझे यह मोम के बंधन सजीले?…
“बाँध लेंगे क्या तुझे यह मोम के बंधन सजीले?पंथ की बाधा बनेंगे तितलियों के पर रंगीले?विश्व का क्रंदन भुला देगी मधुप की मधुर गुनगुन,क्या डुबो देंगे तुझे यह फूल के दल ओस-गीले?तू न अपनी छाँह को अपने लिए कारा बनाना!जाग तुझको दूर जाना!”
प्रसंग
साधक को सांसारिक आकर्षणों, पारिवारिक मोह-जाल और क्षणिक सौंदर्य के प्रलोभनों में न उलझने की चेतावनी।
सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)
-
सांसारिक मोह का विरोध: कवयित्री प्रश्न करती हैं कि क्या सांसारिक रिश्तों और मोह-माया के ये कोमल, क्षणभंगुर व सुंदर बंधन (मोम के बंधन) तुम्हें कर्तव्य-पथ से बाँधकर रोक लेंगे? क्या मार्ग में मिलने वाले आकर्षण और रंगीन तितलियों के पंखों जैसे सुख-विलास तुम्हारे साधना-मार्ग की बाधा बन जाएँगे?
-
विषय-वासनाओं की तुच्छता: क्या भौरों की मधुर और मादक गुंजार तुम्हें संपूर्ण संसार के दुखों और चीत्कारों (क्रंदन) को भुला देगी? क्या फूलों की पंखुड़ियों (दल) पर पड़ी ओस की ठंडी और सुंदर बूँदें तुम्हें अपने सुख-आलिंगन में डुबोकर तुम्हारी कर्मठता को नष्ट कर देंगी?
-
अहंकार रूपी कारागार से मुक्ति: तुम अपने ही शरीर, सुख-साधनों और अपनी ही परछाईं (छाँह) को अपने लिए कारागार (जेल) मत बनने देना; अर्थात व्यक्तिगत स्वार्थों और आत्म-मोह में सिमटकर अपने व्यापक लक्ष्य को मत भूलना। हे साधक, जागो! तुम्हारा गंतव्य बहुत दूर है।
काव्यांश 3: वज्र का उर एक छोटे अश्रु-कण में धो गलाया…
“वज्र का उर एक छोटे अश्रु-कण में धो गलाया,दे किसे जीवन-सुधा दो घूँट मदिरा माँग लाया?सो गई आँधी मलय की वात का उपधान ले क्या,विश्व का अभिशाप क्या चिर नींद बनकर पास आया?अमरता-सुत चाहता क्यों मृत्यु को उर में बसाना?जाग तुझको दूर जाना!”
प्रसंग
कवयित्री साधक के भीतर सोए हुए पौरुष, अमरत्व और संकल्प को झकझोर कर पुनः जाग्रत करने का प्रयास करती हैं।
सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)
-
संकल्प की शिथिलता पर प्रश्न: कवयित्री पूछती हैं कि तुम्हारा हृदय तो वज्र के समान कठोर, दृढ़ और साहसी था; फिर किसी के जरा-से आंसुओं (भावुकता) को देखकर तुमने उस वज्र जैसे संकल्प को क्यों पिघला दिया? तुमने अपने अमूल्य जीवन के अमृत (जीवन-सुधा/कर्तव्य) को त्यागकर किसके बदले आलस्य और प्रमाद रूपी मदिरा के दो घूँट मांग लिए?
-
उत्साह की आंधी का थमना: तुम्हारे भीतर क्रांति और साधना की जो प्रचंड आंधी चल रही थी, क्या वह चंदन के वृक्षों से आने वाली शीतल, मंद और सुगंधित पवन (मलय की वात) का तकिया (उपधान) लगाकर सो गई है? क्या संसार के सारे आलस्य और पतन के अभिशाप तुम्हारे पास एक अंतहीन नींद बनकर आ गए हैं?
-
अमर आत्मा का स्मरण: हे साधक! तुम तो उस अविनाशी और अमर परमात्मा के पुत्र (अमरता-सुत) हो, फिर तुम इस नश्वर संसार के सांसारिक बंधनों और मृत्यु (अकर्मण्यता) को अपने हृदय में क्यों बसाना चाहते हो? उठो, जागो और अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानकर लक्ष्य की ओर बढ़ो!
काव्यांश 4: कह न ठंडी साँस में अब भूल वह जलती कहानी…
“कह न ठंडी साँस में अब भूल वह जलती कहानी,आग हो उर में तभी दृग में सजेगा आज पानी;हार भी तेरी बनेगी मानिनी जय की पताका,राख क्षणिक पतंग की है अमर दीपक की निशानी!है तुझे अंगार-शय्या पर मृदुल कलियाँ बिछाना!जाग तुझको दूर जाना!”
प्रसंग
कवि साधक को अतीत की असफलताओं को भूलकर अपने सीने में लक्ष्य-प्राप्ति की धधकती आग को जीवित रखने और पराजय को भी विजय में बदलने की प्रेरणा देती हैं।
सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)
-
निराशा की ठंडी आहों का परित्याग: कवयित्री कहती हैं कि अतीत के संघर्षों, असफलताओं और दुखों की उस जलती हुई कहानी को अब ठंडी साँसें भर-भर कर दोहराने से कोई लाभ नहीं है, उसे भूल जाओ। तुम्हारी आँखों में आंसुओं की सार्थकता (दृग में पानी) तभी है, जब तुम्हारे सीने (उर) में लक्ष्य को पाने की एक तीव्र धधकती हुई आग (तड़प) जल रही हो; बिना आग के आंसुओं का कोई मूल्य नहीं होता।
-
पराजय का विजय में रूपांतरण: यदि इस सत्य और कर्तव्य के मार्ग पर चलते हुए तुम्हें पराजय (हार) भी मिले, तो वह हार भी स्वाभिमानी (मानिनी) विजय की ध्वजा (पताका) बनकर फहरेगी। जिस प्रकार दीपक के प्रेम में जलकर भस्म होने वाले पतंगे की राख उस दीपक की अमरता का प्रमाण बन जाती है, उसी प्रकार तुम्हारा त्याग भी इतिहास में अमर हो जाएगा।
-
अंगारों पर कलियाँ बिछाना: तुम्हारा कार्य अत्यंत कठिन है—तुम्हें इस संसार के कष्टों, विषमताओं और संकटों रूपी अंगारों की सेज (अंगार-शय्या) पर अपनी साधना और करुणा रूपी कोमल कलियों को बिछाना है; अर्थात विनाश के बीच से भी सृजन का मार्ग निकालना है। इसलिए हे पथिक! अपने आलस्य को त्यागो और जागो, क्योंकि तुम्हें बहुत दूर जाना है।
काव्य-सौंदर्य
1. भाव-पक्ष
-
द्वि-अर्थी धरातल (समन्वय): कविता का एक स्तर आध्यात्मिक है (जहाँ आत्मा को माया-मोह से मुक्त होकर परमात्मा की ओर जाने का संदेश है) और दूसरा स्तर राष्ट्रीय जागरण का है (जहाँ 1930 के दशक के स्वाधीनता सेनानियों को देश की आज़ादी के लिए बिना रुके संघर्ष करने का आह्वान है)।
-
ओज और करुणा का मेल: छायावादी सुकुमारता के साथ-साथ कर्मठता, क्रांति और पौरुष की गर्जना का सुंदर समन्वय।
-
रस: प्रधान रूप से वीर रस (उद्बोधन/ओज गुण) के साथ शांत और करुण रस का अंतर्भाव।
2. कला-पक्ष (शिल्प-सौंदर्य)
-
भाषा: संस्कृतनिष्ठ, तत्समप्रधान, नादमय और अत्यंत सुकोमल साहित्यिक खड़ी बोली (उदा. उनींदी, बाना, अचल हिमगिरि, तिमिर, उपधान, अमरता-सुत, अंगार-शय्या)।
-
शैली: रहस्यवादी, प्रतीकात्मक एवं उद्बोधनपरक गीति-शैली (यह पद शास्त्रीय संगीत के रागों पर गाया जाने योग्य है)।
-
प्रमुख अलंकार:
-
रूपक अलंकार: “मोम के बंधन”, “अंगार-शय्या”, “जय की पताका”, “तिमिर की छाती”।
-
मानवीकरण अलंकार: व्योम का रोना, विद्युत का मुस्कुराना (विद्युत-हाँस), आंधी का तकिया लगाकर सो जाना।
-
विरोधाभास अलंकार: “आग हो उर में तभी दृग में सजेगा आज पानी” (हृदय की आग से आँखों में पानी सजना)।
-
अनुप्रास अलंकार: “चिर सजग”, “व्यस्त बाना”, “मधुप की मधुर”, “फूल के दल”, “मलय की वात”।
-
प्रतीक-विधान: ‘मोम के बंधन’ सांसारिक ममता के, ‘तितलियों के रंगीले पर’ क्षणभंगुर आकर्षण के तथा ‘दीपक व पतंगा’ अनन्य आत्म-समर्पण के प्रतीक हैं।
-