रघुवीर सहाय जीवन परिचय, कृतित्व एवं काव्यगत विशेषताएँ
“आधुनिक समाज के राजनीतिक पाखंड, मध्यवर्गीय जीवन के संकट और आम आदमी की पीड़ा के बेबाक कवि”
(पुस्तकें: दूसरा सप्तक, सीढ़ियों पर धूप में, लोग भूल गए हैं, आत्महत्या के विरुद्ध)
1. जीवन वृत्तांत – जन्म और जन्म स्थान
-
जन्म : 9 दिसंबर, 1929
-
जन्म स्थान : उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ।
-
पारिवारिक पृष्ठभूमि : पिता का नाम हरवंश सहाय, जो पेशे से शिक्षक थे। घर में साहित्यिक और बौद्धिक माहौल मिला।
-
जीवन दृष्टि : सजगता और सामाजिक सरोकारों से भरा जीवन। समाज और राजनीति के हर पहलू को पत्रकार की तीखी दृष्टि से देखा और जिया।
2. शिक्षा
-
प्रारंभिक व उच्च शिक्षा : लखनऊ में ही संपन्न हुई।
-
एम.ए. (अंग्रेजी) : वर्ष 1951 में लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. (M.A.) की उपाधि प्राप्त की।
-
साहित्यिक संस्कार : अंग्रेजी में उच्च शिक्षा के बावजूद हिंदी भाषा, उसकी प्रकृति और जनसामान्य की बोलचाल के प्रति गहरा जुड़ाव था। इसी कारण उनकी कविताओं की भाषा अत्यंत व्यावहारिक और सहज हैं।
3. कृतित्व – प्रमुख रचनाएँ, पत्रकारिता, पुरस्कार
(क) प्रमुख रचनाएँ
-
काव्य संग्रह :
-
✓ ‘दूसरा सप्तक’ (1951)
-
✓ ‘सीढ़ियों पर धूप में’
-
✓ ‘लोग भूल गए हैं’
-
✓ ‘आत्महत्या के विरुद्ध’
-
✓ ‘हँसो हँसो जल्दी हँसो’
-
✓ ‘कुछ पत्ते कुछ चिट्ठियां’
-
-
कहानी संग्रह : ‘रास्ता इधर से है’, ‘जो आदमी हम बना रहे हैं’।
-
निबंध संग्रह : ‘दिल्ली मेरा परदेस’, ‘लिखने का कारण’।
(ख) पत्रकारिता और कार्यक्षेत्र
-
✓ ‘प्रतीक’ पत्रिका में सहायक संपादक रहे तथा ‘वाक्’ पत्रिका के संपादन से जुड़े।
-
✓ आकाशवाणी (समाचार विभाग) में उप-संपादक रहे।
-
✓ ‘नवभारत टाइम्स’ के विशेष संवाददाता रहे।
-
1971 से 1982 तक प्रसिद्ध पत्रिका ‘दिनमान’ के मुख्य संपादक रहे।
(ग) पुरस्कार
-
★ साहित्य अकादमी पुरस्कार (1984) – ‘लोग भूल गए हैं’ के लिए।
-
★ कुमारन आशान पुरस्कार – दक्षिण भारत का प्रतिष्ठित सम्मान।
4. मृत्यु
-
हिंदी कविता और पत्रकारिता को एक नया और साहसी तेवर देने वाले यह महान रचनाकार 30 दिसंबर, 1990 को नई दिल्ली में हमेशा के लिए मौन हो गया।
“सबसे खतरनाक होता हैहमारे सपनों का मर जाना,हमारा चुप हो जाना,हमारा सब कुछ सहते रहनाऔर गलत के साथ समझौता कर लेना।”— रघुवीर सहाय
5. काव्यगत प्रमुख विशेषताएँ
-
लोकतांत्रिक चेतना और राजनीतिक व्यंग्य : उनकी कविताओं में लोकतंत्र की कमियों, नेताओं के पाखंड और शासन व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य मिलता हैं। उनकी प्रसिद्ध कविता ‘अधिनायक’ इसका सटीक उदाहरण हैं।
-
मध्यवर्गीय जीवन और आम आदमी की पीड़ा : वे साधारण, शोषित और हाशिए पर खड़े मनुष्य (जैसे – कैमरे में बंद अपाहिज, घरेलू औरतें, गरीब जनता) की लाचारी और संघर्ष को अपनी कविता का विषय बनाते हैं।
-
अखबारी सरोकार और कलात्मकता का मेल : पत्रकार के रूप में उनकी कविताओं में खबरों जैसी तात्कालिकता और सच्चाई होती हैं, लेकिन वे उसे कलात्मक रूप देकर कविता बना देते हैं। वे कविता को यथार्थ के धरातल पर लाते हैं।
-
सहज, सपाट और संवादात्मक भाषा-शैली : भाषा अत्यंत सरल, साफ-सुथरी, आम बोलचाल की खड़ी बोली हैं। उनकी शैली में ‘कथात्मकता’ और ‘संवाद’ होता है, मानो कवि पाठक से सीधे बातचीत कर रहा हो।