‘सुमित्रानंदन पंत’ की कविता ‘वे आँखें’ का सप्रसंग व्याख्या और काव्य-सौंदर्य

‘सुमित्रानंदन पंत’ की कविता ‘वे आँखें’ का सप्रसंग व्याख्या और काव्य-सौंदर्य

छायावाद के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत के प्रगतिशील काव्य-दौर की अत्यंत चर्चित और मार्मिक कविता ‘वे आँखें’ का संदर्भ, प्रसंग, प्रत्येक काव्यांश की सप्रसंग व्याख्या एवं काव्य-सौंदर्य:

पाठ-परिचय एवं संदर्भ

  • कवि: सुमित्रानंदन पंत
  • मूल काव्य संग्रह: युगवाणी (1939)
  • पाठ्यपुस्तक: आरोह (भाग-1) – कक्षा 11 (अनिवार्य कोर)
  • संदर्भ: प्रस्तुत कविता छायावादी चेतना से निकलकर यथार्थवादी प्रगतिशील भावधारा की ओर उन्मुख कवि सुमित्रानंदन पंत के काव्य-संग्रह ‘युगवाणी’ से उद्धृत है।
  • केंद्रीय विषय: स्वाधीनता से पूर्व और समकालीन भारतीय समाज में सामंती जमींदारों, महाजनों, पुलिस और सत्ता तंत्र द्वारा एक सीधे-सादे, मेहनतकश किसान के संपूर्ण परिवार के क्रूर शोषण, उसकी अंतहीन त्रासदियों और उसकी आंसुओं भरी सूनी आँखों की करुण व्यथा का मार्मिक चित्रण।

काव्यांश 1: अंधकार की गुहा सरीखी…

“अंधकार की गुहा सरीखी
उन आँखों से डरता है मन,
भरा दूर तक उनमें केवल
दुखद दैन्य का नीरव रोदन!
वह स्वाधीन किसान रहा,
अभिमान भरा आँखों में इसका,
छोड़ उसे मँझधार आज
संसार कगार सदृश बह खिसका!”

प्रसंग

कवि एक शोषित और सर्वस्व लुटा चुके वृद्ध किसान की धंसी हुई, निष्प्राण आँखों के भीतर फैली असीम निराशा और अतीत के स्वाभिमान का चित्रण करते हैं।

सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)

  • गुफा जैसी आँखें और मौन रुदन: किसान की धँसी हुई आँखें अंधेरी गुफा (गुहा) के समान भयावह और गहरी प्रतीत होती हैं। उन निष्प्राण आँखों में झांकने पर मन डर से सिहर उठता है, क्योंकि उनके भीतर दूर-दूर तक केवल असह्य दारिद्रय (दैन्य), घोर निराशा और एक मूक, अनसुना रोना (नीरव रोदन) भरा हुआ है।
  • स्वाभिमान और समाज का विश्वासघात: अतीत के दिनों में वह एक स्वतंत्र और स्वाभिमानी किसान था। उसके पास अपनी जमीन थी और उसकी आँखों में आत्मगौरव झलकता था। किंतु आज जब उस पर विपत्तियों का पहाड़ टूटा, तो यह निर्दयी संसार उसे बीच मंझधार में असहाय छोड़कर नदी के किनारे (कगार) के बालू की तरह उससे कटकर अलग हो गया।

काव्यांश 2: लहलहाते वे खेत दृगों में…

“लहलहाते वे खेत दृगों में
हुआ बेदखल वह अब जिनसे,
हँसती थी उसके जीवन की
हरियाली जिनके तृन-तृन से!
आँखों ही में घूमा करता
वह उसकी आँखों का तारा,
कारकुनों की लाठी से जो
गया जवानी ही में मारा!”

प्रसंग

किसान के जीवन का आधार रहे उसके छीने गए खेत और जमींदार के लठैतों द्वारा लाठियों से पीट-पीटकर मार डाले गए उसके इकलौते जवान बेटे की कारुणिक स्मृति।

सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)

  • छिने हुए खेत और उजड़ा जीवन: किसान की आँखों (दृगों) के सामने आज भी उसके वे लहलहाते खेत तैर जाते हैं, जिनसे जमींदार ने उसे छल-कपट से बेदखल कर दिया है। कभी उन लहलहाते खेतों के एक-एक तिनके से किसान के जीवन में खुशहाली और उल्लास हँसता था।
  • इकलौते बेटे की नृशंस हत्या: उसकी आँखों के सामने हर पल उसका इकलौता जवान बेटा (‘आँखों का तारा’) घूमता रहता है। उस निर्दोष बेटे को जमींदार के कारिंदों (कारकुनों) ने केवल इसलिए लाठियों से पीट-पीटकर भरी जवानी में ही मार डाला, क्योंकि उसने अन्याय और बेदखली का विरोध किया था।

काव्यांश 3: बिका दिया घर-द्वार, महाजन ने…

“बिका दिया घर-द्वार, महाजन ने
न ब्याज की कौड़ी छोड़ी,
रह-रह आँखों में चुभती वह
कुरुक हुई बरधों की जोड़ी!
उजरी उसके सिवा किसे कब
पास दुहाने आने देती?
उह! आँखों में नाचा करती
उजड़ गई जो सुख की खेती!”

प्रसंग

महाजन की क्रूर वसूली, उसके हल चलाने वाले प्रिय बैलों की नीलामी और उसकी प्रिय गाय ‘उजरी’ के छिन जाने का हृदयविदारक वर्णन।

सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)

  • घर-बार की नीलामी: ऋण की वसूली के नाम पर लालची महाजन ने किसान का घर-बार तक बिकवा दिया। उसने अपने ब्याज की एक कौड़ी भी नहीं छोड़ी। किसान की आँखों में बार-बार अपने बैलों (बरधों) की नीलाम (कुरुक) हुई वह जोड़ी चुभती रहती है, जो उसके खेती-किसानी और आजीविका का मुख्य आधार थी।
  • गाय ‘उजरी’ का बिछोह: किसान के पास ‘उजरी’ नाम की एक सफेद गाय थी, जो किसान से इतना गहरा प्रेम करती थी कि उसके अतिरिक्त किसी अन्य को अपने पास दूध दुहने तक नहीं आने देती थी। विवशता में वह गाय भी बिक गई। किसान की आँखों के सामने उसके अतीत के सुखी जीवन की उजड़ चुकी खेती एक चलचित्र की तरह घूमकर उसे बेचैन करती रहती है।

काव्यांश 4: बिना दवा-दर्पन के घरनी…

“बिना दवा-दर्पन के घरनी
सरग चली, आँखें आतीं भर,
देख-रेख के बिना दूधमुँही
बिटिया दो दिन बाद गई मर!
घर में विधवा रही पतोहू,
लछमी थी, यद्यपि पति-घातिन,
पकड़ मँगाया कोतवाल ने,
डूब कुएँ में मरी एक दिन!”

प्रसंग

इलाज के अभाव में पत्नी और मासूम दूधमुंही बच्ची की मृत्यु तथा सत्ता (कोतवाल) की कामुकता व सामाजिक प्रताड़ना की शिकार विधवा बहू के आत्मघात का दारुण दृश्य।

सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)

  • पत्नी और दूधमुंही बच्ची की मौत: घोर गरीबी के कारण किसान अपनी बीमार पत्नी (घरनी) का इलाज और दवा-दारू नहीं करा सका, जिससे वह स्वर्ग सिधार गई (मर गई)। यह याद आते ही किसान की आँखें डबडबा जाती हैं। माँ के मरने के बाद उसकी ममता और दूध की देखरेख के अभाव में दो ही दिन बाद उसकी छोटी-सी दूधमुंही मासूम बच्ची भी तड़प-तड़प कर मर गई।
  • बहू पर लांछन और त्रासदी: घर में केवल विधवा बहू (पतोहू) बची थी, जो घर की लक्ष्मी जैसी थी; किंतु रूढ़िवादी समाज ने उस अभागन को ही ‘पति-घातिन’ (पति को खाने वाली) का कलंक दे दिया। उस लाचार स्त्री पर जब दुष्ट कोतवाल की बुरी नजर पड़ी, तो उसने सिपाहियों से उसे जबरन थाने बुलवाकर उसकी अस्मिता को तार-तार किया। इस घोर अपमान और सामाजिक लज्जा को न सह सकने के कारण उस विधवा बहू ने अगले ही दिन कुएँ में कूदकर आत्महत्या कर ली।

काव्यांश 5: खैर, पैर की जूती, जोरू…

“खैर, पैर की जूती, जोरू
न सही एक, दूसरी आती,
पर प्रांणों से प्यारे सुत की
याद कर छाती फटती, साँप लोटते!
पिछले सुख की स्मृति आँखों में
क्षण भर एक चमक है लाती,
तुरंत शून्य में गड़ वह चितवन
तीखी नोंक सदृश बन जाती!”

प्रसंग

किसान के अंतर्मन में बेटे की मृत्यु का असह्य आघात, अतीत की क्षणिक सुखद स्मृतियाँ और वर्तमान का तीखा यथार्थ।

सप्रसंग व्याख्या (भावार्थ)

  • बेटे का असह्य शोक: तत्कालीन सामंती और पितृसत्तात्मक सोच के तहत किसान मन को यह कहकर तसल्ली देने की कोशिश करता है कि पत्नी (जोरू) तो पैर की जूती के समान होती है, एक न रही तो दूसरी आ सकती थी। किंतु जब उसे अपने सीने के टुकड़े, प्राणों से प्यारे उस जवान बेटे (सुत) की याद आती है, तो दुख के मारे उसकी छाती फटने लगती है और कलेजे पर सांप लोटने लगते हैं।
  • क्षणिक चमक और वर्तमान का शूल: जब वह अपने अतीत के उस भरे-पूरे, सुखी परिवार और खेतों को याद करता है, तो क्षण भर के लिए उसकी सूनी आँखों में एक चमक कौंध जाती है। किंतु अगले ही पल जब उसे कठोर वर्तमान का भान होता है, तो उसकी वह दृष्टि शून्य में गड़ जाती है और अतीत की वही सुखद यादें वर्तमान में एक तीखी नोंक (नुकीले कांटे) की तरह उसके हृदय को छलनी करने लगती हैं।

काव्य-सौंदर्य (शिल्प एवं भाव-पक्ष)

1. भाव-पक्ष

  • प्रगतिशील चेतना: छायावादी कल्पना-लोक से परे किसान के जीवन के नग्न, खुरदुरे और शोषणयुक्त यथार्थ का प्रामाणिक दस्तावेजीकरण।
  • सत्ता व व्यवस्था पर कटाक्ष: महाजन, जमींदार, उसके लठैत (कारकुन) और पुलिस तंत्र (कोतवाल) के क्रूर गठजोड़ का पर्दाफाश।
  • रस: आदि से अंत तक करुण रस की मर्मस्पर्शी और दहला देने वाली अभिव्यक्ति।

2. कला-पक्ष (शिल्प-सौंदर्य)

  • भाषा: तत्सम शब्दावली के साथ-साथ तद्भव और लोक-प्रचलित ग्रामीण शब्दों का सटीक समन्वययुक्त खड़ी बोली (उदा. गुहा, दैन्य, नीरव, कारकुन, बरध, कुरुक, उजरी, घरनी, पतोहू, जोरू)।
  • शैली: वर्णनात्मक, यथार्थवादी एवं संवेदनात्मक बिंब-प्रधान शैली।
  • प्रमुख अलंकार:
    • उपमा अलंकार: “अंधकार की गुहा सरीखी”, “संसार कगार सदृश बह खिसका”, “तीखी नोंक सदृश बन जाती”
    • मुहावरेदार भाषा: “आँखों का तारा”, “छाती फटना”, “छाती पर साँप लोटना”, “पैर की जूती”, “आँखें भर आना”
    • रूपक अलंकार: “सुख की खेती”
    • पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार: “तृन-तृन”, “रह-रह”
    • अनुप्रास अलंकार: “दुखद दैन्य”, “कारकुनों की लाठी”, “दवा-दर्पन”, “सुत की याद”)।
  • बिंब-योजना: अंधेरी गुफा, लहलहाते खेत, नीलाम होते बैल, कुएँ में डूबती बहू के अत्यंत सशक्त और झकझोरने वाले दृश्य बिंब

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