हिंदी का मिल्टन और हिंदी का सबसे उद्दण्ड(hindi ka milton aur hindi ka sabse uddand)

  • हिंदी का मिल्टन :- केशवदास

    • मिश्रबन्धुओं ने केशवदास को हिंदी का मिल्टन क्यों कहा?
    • तुलना का आधार:

      • प्रसिद्ध अंग्रेज़ी महाकवि जॉन मिल्टन (Paradise Lost के रचयिता) अपनी भाषा की शास्त्रीय गंभीरता, उच्च कल्पना, पांडित्य और दृष्टिहीनता के लिए जाने जाते हैं।

      • हिंदी में आचार्य केशवदास को उनके असाधारण संस्कृत-निष्ठ पांडित्य, महाकाव्यात्मक भव्यता (रामचंद्रिका), क्लिष्ट शब्दावली और शास्त्रीय नियमों के कठोर पालन के कारण विद्वानों ने ‘हिंदी का मिल्टन’ कहा है।

      • क्योंकि मिल्टन और केशवदास दोनों में काफी समानता थी। केशवदास संस्कृत छोड़कर हिन्दी काव्य करने में कुछ लज्जा-सी बोध करते थे, वैसे ही मिल्टन लैटिन त्याग कर अंग्रेजी में ग्रंथ रचना करने में न्यूनता आवश्यक समझते थे। इन दोनों की अवस्था भी प्रायः बराबर थी।

  • हिंदी का सबसे उद्दण्ड :- कवि बेताल बंदीजन

    • मिश्र बंधुओं ने कवि बेताल बंदीजन को हिंदी का सबसे उद्दण्ड कवि क्यों कहा?
      बेताल बंदीजन ने बड़ी सबल कविता की है, ऐसी उद्दंड कविता हिंदी में कोई भी नहीं कर सकता है। गोरेलाल (उपनाम लाल कवि) के बराबर के उत्तम कविता में उद्दंडता लाने में कोई भी कवि समर्थ नहीं हुआ है। भूषण, हरिकेश, शेखर और लाल कवि यह चारों बड़े उद्दंड लेखक हैं, परंतु लाल कवि का प्राबल्य इन सबसे निकलता हुआ है यद्यपि कुल मिलाकर ये भूषण के समान सत्कवि नहीं हैं। बेताल बंदीजन भी एक बड़ा ही उद्दंड कवि है परंतु उसके कथन कुछ ग्रामीणता लिए हुए हैं और लाल कवि साधु भाषा में अद्वितीय उद्दंडता लिए है
  • उपाधि धारक कवि: पं. प्रतापनारायण मिश्र (भारतेंदु युग)

  • तथ्य एवं संदर्भ:

    • भारतेंदु युगीन प्रमुख निबंधकार, नाटककार और कवि पं. प्रतापनारायण मिश्र अपने मस्तमौला, बेपरवाह, अक्खड़ और फक्कड़ स्वभाव के कारण जाने जाते थे।

    • आचार्य रामचंद्र शुक्ल एवं समकालीन साहित्यकारों ने उनके उन्मुक्त व्यक्तित्व, सामाजिक पाखंडों पर बिना लाग-लपेट के व्यंग्य करने तथा भाषा में मर्यादा व रूढ़ियों को तोड़कर मनमौजी प्रयोग करने की प्रवृत्ति के कारण उन्हें ‘हिंदी का सबसे उद्दण्ड/मनमौजी लेखक-कवि’ माना है।

    • वे अपनी पत्रिका ‘ब्राह्मण’ में चंदा माँगने के लिए भी निस्संकोच उद्दण्डता व अल्हड़पन से लिख देते थे:

      “आठ मास बीते जजमान, अब तो करो दच्छिना दान।”

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