पंडित बालकृष्ण भट्ट:
सामान्य परिचय एवं साहित्यिक योगदान
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मण्डल: भारतेन्दु मण्डल के प्रमुख स्तम्भ।
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उपाधि/महत्त्व: भारतेन्दु मण्डल के लेखकों में पं. प्रतापनारायण मिश्र साहित्य व संस्कृति के पुरोधा थे, जबकि बालकृष्ण भट्ट सामयिक क्रान्ति के अग्रदूत थे।
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प्रमुख पत्र: ‘हिन्दी प्रदीप’ (मासिक पत्र)। इसके माध्यम से राष्ट्र को अस्मिता की पहचान कराई।
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जीवनी सम्बन्धी प्रमुख स्रोत: ‘सरस्वती’ (1914) में प्रकाशित पंडित रासबिहारी शुक्ल का लेख, महावीर प्रसाद द्विवेदी का सम्पादकीय, तथा पुत्र महादेव जी द्वारा संस्मरण।
वंश एवं जन्म विवरण
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मूल निवास: मालवा प्रान्त, उज्जयिनी (अवन्ती) में शिप्रा नदी तटवर्ती मालवीय ब्राह्मण।
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पिता वेणी प्रसाद बालकृष्ण भट्ट (ज्येष्ठ पुत्र) एवं बालमुकुन्द भट्ट।
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गोत्र: गौतम गोत्र।
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जन्म स्थान: प्रयाग (इलाहाबाद) का अहियापुर मुहल्ला।
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जन्म तिथि: 23 जून 1844 ई. (विक्रमी संवत् 1901, आषाढ़ कृष्ण द्वितीया, रविवार)।
शिक्षा एवं कार्यक्षेत्र
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आरम्भिक अध्ययन: ननिहाल में रहकर संस्कृत अध्ययन; तत्पश्चात स्थानीय मिशन स्कूल में प्रवेश।
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अध्यापन कार्य:
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मिशन स्कूल में बाइबिल परीक्षाओं में श्रेष्ठ प्रदर्शन के कारण पादरी डेविड द्वारा अध्यापक नियुक्त किए गए (तिलक लगाने के विरोध के कारण त्यागपत्र दिया)।
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पंडित शिवरासन शुक्ला द्वारा स्थापित ‘शिवराखन स्कूल’ में हेड पंडित रहे।
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मुंशी रामप्रसाद के सहयोग से ‘कायस्थ पाठशाला’ में 20 वर्षों तक संस्कृत के प्रोफेसर रहे।
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पद त्याग: तत्कालीन स्वदेशी आन्दोलन में सक्रिय भागीदारी के कारण सरकारी कोपभाजन बने और अध्यापन पद से त्यागपत्र दिया।
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साहित्यिक मार्गदर्शन: पंडित मदन मोहन मालवीय के सम्पर्क में आकर साहित्य और व्याकरण का गहन अध्ययन किया।
जीवन-संघर्ष एवं चारित्रिक विशेषताएँ
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स्वाभिमान व निस्पृहता: पारिवारिक कलह और पैतृक सम्पत्ति विवाद के समय मित्रों (मुंशी रामप्रसाद व मुंशी ज्वाला प्रसाद) द्वारा वकालतनामे पर हस्ताक्षर करने के सुझाव पर स्पष्ट कहा— “हमें हराम की कौड़ी न चाहिए। यदि मिलना होगा तो हमारे बाहुबल ही से सब कुछ मिलेगा।”
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अध्ययन-निष्ठा: विद्या ही उनकी सबसे बड़ी सम्पत्ति थी। जीवन के अन्तिम दिनों में कुम्भकोणम-सीरीज के ‘महाभारत’ का वनपर्व पढ़ते समय रुग्ण हुए।
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वैचारिक दृष्टि: स्वयं को किसी संकीर्ण मत या सम्प्रदाय से न जोड़कर केवल ‘बुद्धि’ का अनुयायी माना।
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सामाजिक चेतना: बाल-विवाह, संकीर्ण जातिवाद और आडम्बरों के घोर विरोधी; प्राचीन कर्तव्यनिष्ठ, ओजस्वी व त्यागप्रधान सनातन मूल्यों के समर्थक।
पंडित बालकृष्ण भट्ट: आलोचना, पत्रकारिता, भाषा एवं साहित्य (परीक्षापयोगी नोट्स)
आलोचना एवं समीक्षा दृष्टि
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आधुनिक हिन्दी आलोचना के जनक: डॉ. रामविलास शर्मा के अनुसार आधुनिक हिन्दी आलोचना के जनक/जन्मदाता पंडित बालकृष्ण भट्ट हैं; हिन्दी आलोचना साहित्य में वे ‘आदि गुरु’ के रूप में मान्य हैं।
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तुलनात्मक समीक्षा: भारत और यूरोप के साहित्य की सर्वप्रथम तुलना अपने लेखों में भट्ट जी ने ही की। वेदों, कणाद, कपिल के शास्त्रों तथा कालिदास और भवभूति के काव्यों की तुलना उनकी विद्वता, विचार-स्वाधीनता और ‘शब्द-कृपण’ शैली का उदाहरण है।
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कालिदास और भवभूति की तुलना (‘हिन्दी प्रदीप’, 1866 ई.):
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“कालिदास की कविता के रसास्वाद को जो कंद में सना मक्खन का लड्डू कहें तो भवभूति की कविता के रस को मिश्री के रोसें में मिली बालाई ही कहना चाहिए।”
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कालिदास शृंगार रस तक सीमित रहे, जबकि भवभूति ने वीर चरित्र में वीरता को भली प्रकार दर्शाया।
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पुस्तकों की व्यावहारिक समीक्षाएँ:
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‘नील देवी’ (हिन्दी प्रदीप, फरवरी 1882)
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‘परीक्षा गुरु’ (हिन्दी प्रदीप, दिसम्बर 1882)
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‘संयोगिता स्वयंवर’ (हिन्दी प्रदीप, अप्रैल 1886) — यह आलोचना विशेष रूप से प्रौढ़ मानी जाती है।
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‘सच्ची समालोचना’ शीर्षक से नाट्य रचना के दोषों का उद्घाटन किया।
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साहित्य की परिभाषा: “साहित्य जन-समूह के हृदय का विकास है।” (साहित्य जीवन का प्रतिबिम्ब है)।
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काव्य-सिद्धांत: कविता के लिए छंद के बंधन को अनावश्यक माना; रीतिकाल की बनावटी कविता के विरोधी थे। कविता के लिए खड़ी बोली की अपेक्षा ब्रजभाषा को अधिक उपयुक्त समझते थे।
हिन्दी पत्रकारिता एवं ‘हिन्दी प्रदीप’
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पत्र: ‘हिन्दी प्रदीप’ (मासिक पत्र)।
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अवधि: अनेक वैयक्तिक व आर्थिक कठिनाइयाँ सहकर भी इसे 33 वर्षों तक जीवित रखा।
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ऐतिहासिक महत्त्व: 1856 की सैनिक क्रान्ति की विफलता के बाद साहित्य को प्रखर राष्ट्रीय चेतना से जोड़ने वाला पहला मासिक पत्र। राष्ट्रीय साहित्यिक पत्रकारिता के सच्चे प्रवर्तक।
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तुलना: यदि ‘सरस्वती’ को साहित्यिक पत्रकारिता के गौरवपथ का प्रथम मील का पत्थर माना जाए, तो ‘हिन्दी प्रदीप’ उसकी सुदृढ़ नींव है। भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र से आयु में 6 वर्ष बड़े थे।
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शिष्य परम्परा: महामना पंडित मदन मोहन मालवीय तथा राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन ने अपने कर्ममय जीवन का आरम्भ पत्रकार के रूप में भट्ट जी के सान्निध्य में किया।
भाषा एवं गद्य-शैली
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भाषा-नीति: वे न तो शुद्ध संस्कृतवादी थे और न ही अतिशय मध्यममार्गी। वे उर्दू और हिन्दी को दो अलग भाषाएँ न मानकर उर्दू को हिन्दी की ही एक शैली मानते थे।
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भाषा संबंधी प्रमुख निबंध (‘हिन्दी प्रदीप’):
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‘भाषाओं का परिवर्तन’ (जून 1885)
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‘ग्रामीण भाषा’ (जुलाई 1885)
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‘भाषा कैसी होनी चाहिए’
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‘हिन्दी की वर्तमान दशा’ (जनवरी 1862 [मुद्रित संवत्/वर्ष])
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‘शब्द परिचय’ (1866)
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‘हमारी मातृभाषा’ (फरवरी-मार्च 1862)
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शब्द-चयन एवं विन्यास: ठेठ बोलचाल, संस्कृत, फारसी और अंग्रेजी शब्दों (यथा—स्ट्रगल, कम्पीटीशन आदि) का बहुतायत प्रयोग। वाक्य विन्यास में कहीं-कहीं उर्दू पद्धति का प्रभाव मिलता है।
प्रमुख रचना-संसार
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उपन्यास: ‘सौ अजान तथा एक सुजान’, ‘नूतन ब्रह्मचारी’।
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नाटक: ‘भिक्षादान’, ‘दमयन्ती स्वयंवर’।
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निबंध-संग्रह एवं निबंध: ‘साहित्य सुमन’ (निबंध संग्रह); ‘आंसू’ (भावात्मक निबंध)।
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अनुवाद कार्य: कायस्थ पाठशाला के अध्यापक रहते हुए बँगला साहित्यकार माइकेल मधुसूदन दत्त के ‘पद्मावती’ व ‘शर्मिष्ठा’ नाटकों का सफल हिन्दी अनुवाद किया।
पंडित बालकृष्ण भट्ट: प्रामाणिक परीक्षापयोगी नोट्स
सामाजिक एवं वैचारिक दृष्टिकोण
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जाति-व्यवस्था पर विचार: वर्ण-व्यवस्था एवं जाति-पाँति को शुद्ध ढकोसला मानते थे तथा इसे ‘कूप-मण्डूकता’ की संज्ञा दी।
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व्यक्तित्व: स्वभाव से निडर, स्पष्टवादी, परोपकारी, साहसी, विचारशील, विनोदी एवं उदार हृदय।
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धर्म परिवर्तन का प्रतिरोध: मिशन स्कूल में अध्ययन के दौरान ‘डेविड पादरी’ ने प्रखर बुद्धि देखकर ईसाई बनाने का प्रयास किया, किन्तु वे भुलावे में नहीं आए।
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चारित्रिक आदर्श: “मनुष्य में चाहे विद्या, धन, वैभव आदि कुछ भी न हो पर यदि वह चरित्र का शुद्ध है तो उसका जीवन बहुत ही आनन्दमय बीतेगा और वह समाज में श्रेष्ठ समझा जायेगा।”
निबंध साहित्य एवं वैशिष्ट्य
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ऐतिहासिक स्थान: भारतेन्दु युग के मूर्धन्य निबंधकार; कुछ शोध प्रबंधकार इनसे ही हिन्दी निबंध-लेखन का शुभारम्भ मानते हैं।
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आरम्भ एवं प्रतिष्ठा: 1877 ई. में ‘हिन्दी प्रदीप’ के प्रकाशन के साथ इनकी निबंध-कला प्रतिष्ठित हुई। इन्होंने लगभग एक हज़ार (1000) निबंध लिखे।
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प्रथम प्रकाशित लेख: ‘कलिराज की सभा’, जो ‘कवि-वचन सुधा’ में प्रकाशित हुआ था।
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अन्य पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन: ‘हिन्दी प्रदीप’ के अतिरिक्त ‘काशी पत्रिका’ और ‘बिहार बंधु’ में भी निबंध प्रकाशित हुए।
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तुलना एवं उपाधि: कुछ विद्वानों ने इन्हें ‘आविष्कारक गद्य लेखक’ कहा है तथा इनकी तुलना अंग्रेजी निबंधकारों—’एडीशन’, ‘स्टील’ तथा ‘चार्ल्स लैम्ब’ से की है।
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उपलब्ध प्रमुख निबंध-संग्रह:
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साहित्य सुमन (प्रकाशक: लक्ष्मीकान्त भट्ट, 94 काटन स्ट्रीट, कलकत्ता)।
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भट्ट निबंधावली (भाग 1-2, सम्पादक: धनंजय भट्ट ‘सरल’, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग)।
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भट्ट निबंधमाला (भाग 1-2, सम्पादक: धनंजय भट्ट ‘सरल’, नागरी प्रचारिणी सभा, काशी)।
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निबंधों के प्रकार: भावात्मक निबंध सर्वाधिक लिखे जो अत्यंत प्रभावशाली व व्यक्तित्व-व्यंजक हैं; वर्णनात्मक, संवादात्मक, प्रहसनात्मक तथा विचारात्मक निबंध भी लिखे।
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निबंधों के प्रमुख शीर्षक: ‘रसाभास’, ‘आचरण’, ‘मानवी सम्पत्ति जात-पात’, ‘माता का स्नेह’, ‘कल्पना’, ‘हाकिम और उनकी हिकमत’, ‘सारल्य सत्तर्मों मार्ग : ईमानदारी (आनेस्टी) जातियों का अठापन (नेशनल कैरेक्टर) आर द नेशन एण्ड इंडिविजुअल टू थिंग्स सबसे भले हैं मूढ़ जिन्हें’।
भाषा, गद्य-शैली एवं शिल्प
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शैलीगत स्वरूप: अंग्रेजी, उर्दू, फारसी, संस्कृत तथा पूर्वी व ब्रजभाषा के प्रचलित शब्दों का निस्संकोच प्रयोग।
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अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग: देवनागरी व रोमन दोनों में प्रयोग किया; जैसे—एजक्शन, ग्रेट मैन, प्रिकाशन, एवलंक, हैबिट इज ए सेकेण्ड चेरर, फैशन आव द डे, स्टैण्डर्ड, कांशेस, एम्बाडिड कबून, हेडक्वार्टर, गारंटी, फैंसी, ब्यूज, इंग्लिसाइज्ड आदि।
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व्याकरणिक विशेषताएँ:
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कहीं-कहीं लिंग नियमन में व्यतिक्रम (स्त्रीलिंग का पुल्लिंग, पुल्लिंग का स्त्रीलिंग)।
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क्रियापदों में ‘ए’ के स्थान पर ब्रजभाषा सम्मत ‘ऐ’ का प्रयोग।
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वाक्य-क्रम विन्यास में कहीं-कहीं उर्दू पद्धति का प्रभाव; जैसे—’लौटा उन्होंने मुझे दिया’, ‘बाद आने के उपरान्त’, ‘समझने के पहले कहने से’।
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नवीन शब्द-सृजन: सुंदरापा, बेबनावट, मर्पण्त्र, साहित्य जन्मभूमि वात्सल्य आदि।
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तकियाकलाम/प्रायः प्रयुक्त वाक्यांश: ‘तात्पर्य यह है’, ‘खुलासा सबका यही है’।
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व्यंग्य एवं विनोद: निबंधों में वस्तुभाव और विषयगत व्यंग्य-विनोद की प्रचुरता, जो निर्वैयक्तिक ढंग से व्यक्त होती है।
नाट्य साहित्य
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स्थान: भारतेन्दु युग में भारतेन्दु के उपरांत सर्वाधिक नाटक लिखने वालों में भट्ट जी प्रथम स्थान पर हैं।
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नाटकों की संख्या: इतिहासकार इनकी प्रकाशित व अप्रकाशित नाट्य-कृतियों की संख्या 15 तक मानते हैं (डॉ. सोमनाथ गुप्त के अनुसार मतभेद हैं)।
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प्रमुख मौलिक नाटक: ‘दमयन्ती स्वयंवर’, ‘वेणु संहार’, ‘जैसा काम वैसा परिणाम’।
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अन्य प्रमुख नाटक सूची:
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शर्मिष्ठा (अनुवाद)
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पद्मावती (अनुवाद)
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चन्द्रसेन
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मृच्छकटिक
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किरासार्जुन Julius / किरासार्जुनीय
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पृथु-चरित्र
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शिशुपाल वध
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नल दमयन्ती
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दमयंती स्वयंवर (हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा संवत् 1999 में पुनर्मुद्रित)
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शिक्षादान (प्रहसन; विक्टोरिया छापस्थान में चैत्र शुक्ल 5 संवत् 1934 में प्रथम बार छपा)
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आचार विडम्बन (प्रहसन)
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नयी रोशनी का विष (प्रहसन)
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बृहन्नला
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वेणु संहार
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जैसा काम वैसा परिणाम
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‘भट्ट नाटकावली’: धनंजय भट्ट ‘सरल’ द्वारा सम्पादित एवं काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित संकलन, जिसमें ‘बृहन्नला’, ‘वेणु संहार’ और ‘जैसा काम वैसा परिणाम’ तीन नाटक संकलित हैं।
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अनुदित नाटक: बँगला नाटककार माइकेल मधुसूदन दत्त कृत ‘पद्मावती’ और ‘शर्मिष्ठा’ का अनुवाद।
उपन्यास साहित्य
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हिन्दी का प्रथम उपन्यास सम्बन्धी तथ्य:
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आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लाला श्रीनिवासदास कृत ‘परीक्षा गुरु’ (1882 ई.) को अंग्रेजी ढंग का पहला उपन्यास और श्रद्धाराम फुल्लौरी कृत ‘भाग्यवती’ (रचना 1877 ई., प्रकाशन 1887 ई.) को सामाजिक उपन्यास माना।
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डॉ. विजय शंकर मल्ल ने ‘भाग्यवती’ को पहला उपन्यास माना।
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भट्ट जी कृत ‘रहस्य कथा’ ‘हिन्दी प्रदीप’ के नवम्बर 1879 ई. (पृ. 6) पर प्रकाशित हुआ; अतः प्रकाशन-तिथि की दृष्टि से भट्ट जी को हिन्दी का प्रथम उपन्यासकार माना जा सकता है।
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पुस्तकाकार उपलब्ध उपन्यास (2):
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नूतन ब्रह्मचारी
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सौ अजान एक सुजान
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कुल उपन्यास: कुल 9 उपन्यास मिलते हैं (8 मौलिक और 1 अनूदित)।
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‘हिन्दी प्रदीप’ में धारावाहिक प्रकाशित मौलिक उपन्यास (8):
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रहस्य कथा
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गुप्त वैरी
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उचित दक्षिणा
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नूतन ब्रह्मचारी
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हमारी घड़ी
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रसातल यात्रा (तथा अन्य)
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अनूदित उपन्यास: संस्कृत की आख्यायिका ‘बृहत्कथा’ का हिन्दी अनुवाद, जिसका प्रकाशन ‘हिन्दी प्रदीप’ में मार्च 1899 (पृ. 9) से प्रारम्भ हुआ।
पंडित बालकृष्ण भट्ट: निबंध, सामाजिक एवं राजनीतिक विचार (परीक्षापयोगी नोट्स)
सामाजिक एवं धार्मिक सुधारवादी दृष्टिकोण
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बाल-विवाह विरोध: बाल-विवाह को धर्मशास्त्र-विरुद्ध, महाअधर्म और अन्याय माना। उनका कथन था— “हिन्दुस्तान के माँ-बाप गोली मार देने के लायक हैं, जो अपने लड़कों की शिक्षा आदि का ख्याल न करके उनकी शादी बचपन में ही कर देते हैं मानो अपने लड़के की शादी कर देना ही उनके जीवन का मुख्य उद्देश्य है।”
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कन्या व पुत्र विवाह संबंधी विचार: कन्या का विवाह योग्य वर के साथ वयस्क होने पर ही होना चाहिए। पुत्र का विवाह करना पिता का आवश्यक धर्म नहीं; गुण व विद्या उपार्जन के उपरांत यदि पुत्र की रुचि हो, तभी वह गृहस्थी में पड़े, अन्यथा लोक-कल्याण के कार्यों में प्रवृत्त हो।
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विधवा-विवाह पर दृष्टिकोण: भट्ट जी विधवा-विवाह के विरोधी थे; उनका मानना था कि बाल-विवाह रुक जाने पर यह समस्या स्वतः समाप्त हो जाएगी। वे कुलवधुओं को गृहस्थी की रक्षक ‘आर्य नारियों’ के रूप में देखने के पक्षपाती थे।
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वर्ण एवं जाति प्रथा: वर्ण-व्यवस्था एवं जाति-पाँति को शुद्ध ढकोसला तथा ‘कूप-मण्डूकता’ मानते थे।
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विदेश यात्रा समर्थन: विदेश यात्रा के कट्टर समर्थक थे। उनका मानना था कि बिना विदेश यात्रा किए देश की उन्नति असंभव है; बाहर जाकर पौरुष दिखाना और ज्ञान-दौलत अर्जित करना आवश्यक है। कथन— “अच्छी तरह निश्चय हो गया कि जब तक हम बाहर न जायेंगे मुल्क की दौलत किसी तरह न बढ़ेगी पर तो भी समाज से निष्कासित हो जाने की डर से जहाज पर चढ़ना नहीं पसंद करते।” इस क्रांतिकारी विचार के कारण उन्हें ‘क्रिस्तान’ की संज्ञा तक दी गई।
राजनीतिक विचार एवं कार्य
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विचारधारा: अपने बत्तीस साल के संपादकीय काल में ‘हिन्दी प्रदीप’ के माध्यम से नरम राजनीतिक विचारधारा व्यक्त की, किंतु उनके कथन में सदैव निठरता और खरापन रहता था। वे कांग्रेस के विचारों को आदर्श मानते थे।
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संबंध व त्यागपत्र: पंडित मदन मोहन मालवीय से अत्यंत घनिष्ठ संबंध थे। स्वदेशी आंदोलन में सक्रिय भाग लेने के कारण ‘कायस्थ पाठशाला कालेज’ के प्राध्यापक पद से त्यागपत्र दिया।
निबंध साहित्य एवं स्वरूप
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निबंध विधा की महत्ता (आचार्य रामचंद्र शुक्ल): “यदि गद्य कवियों या लेखकों की कसौटी है, तो निबंध गद्य की कसौटी है। भाषा की पूर्ण शक्ति का विकास निबंधों में ही सबसे अधिक संभव होता है।”
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स्थान व प्रतिष्ठा: भारतेन्दु युग के यशस्वी निबंधकार; कुछ शोध प्रबंधकार इनसे ही हिन्दी निबंध-लेखन का शुभारंभ मानते हैं। भारतेन्दु से वयोवृद्ध होते हुए भी वे एक महान निबंध-स्रष्टा के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
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रचना-काल व संख्या: सन् 1877 ई. में ‘हिन्दी प्रदीप’ के प्रकाशन के साथ इनकी निबंध-कला प्रतिष्ठित हुई। इन्होंने विभिन्न विषयों और शैलियों में लगभग एक हज़ार (1000) निबंध लिखे।
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प्रथम प्रकाशित लेख: ‘कलिराज की सभा’, जो ‘कवि-वचन सुधा’ में प्रकाशित हुआ था।
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अन्य पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन: ‘हिन्दी प्रदीप’ के अतिरिक्त ‘काशी पत्रिका’ और ‘बिहार बंधु’ में भी निबंध छपे।
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तुलना एवं संज्ञा: कुछ विद्वानों ने इन्हें ‘आविष्कारक गद्य लेखक’ कहा है तथा इनकी तुलना अंग्रेजी निबंधकारों—‘एडीशन’, ‘स्टील’ तथा ‘चार्ल्स लैम्ब’ से की है।
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उपलब्ध प्रमुख निबंध-संग्रह:
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साहित्य सुमन (प्रकाशक— लक्ष्मीकान्त भट्ट, 94 काटन स्ट्रीट, कलकत्ता)।
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भट्ट निबंधावली, भाग 1-2 (सम्पादक— धनंजय भट्ट ‘सरल’, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग)।
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भट्ट निबंधमाला, भाग 1-2 (सम्पादक— धनंजय भट्ट ‘सरल’, नागरी प्रचारिणी सभा, काशी)।
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निबंधों की विषय-वस्तु एवं वर्गीकरण:
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सामयिक विषय: ‘नई सभ्यता की बानगी’, ‘हिन्दुस्तान के रईस’।
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स्थायी महत्त्व के विषय:
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ज्ञान सम्बन्धी: ‘वेद क्या है?’, ‘धर्म के महत्व’।
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चारित्रिक: ‘आत्मगौरव’, ‘ईमानदारी’।
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समाज सुधार: ‘तीर्थों की तीर्थता’, ‘मांसभक्षण’, ‘भिक्षावृत्ति’, ‘गया-यात्रा’।
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साहित्यिक: ‘साहित्य जनसमूह के हृदय का विकास है’।
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जीवनियाँ: ‘शंकराचार्य और गुरुनानक देव’।
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कल्पनापूरक: ‘चन्द्रोदय’, ‘आंसू’, ‘एक अनोखा स्वप्न’।
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भावात्मक: ‘कल्पना’।
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व्यंग्य तथा विनोदमूलक: ‘दंभाख्यान’, ‘अकिल अजीरन रोग’, ‘इंग्लिश पढ़े सो बाबू होय’, ‘एक इंग्लिसाइज्ड नए मित्र से मुलाकात’।
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विचित्र एवं विविध: ‘पुरुष अहेरी स्त्रियाँ अहेर हैं’, ‘भुकुआ कौन-कौन’ आदि।
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