बिहारी सतसई पर प्रमुख कवि
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बिहारी सतसई की प्रथम टीका लिखने वाले – कृष्ण कवि
- हिन्दी में समास पद्धति की शक्ति का सर्वाधिक परिचय बिहारी ने दिया है।
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बिहारी सतसई के दोहों का पल्लवन रोला छंद में करने वाले – अंबिकादत्त व्यास
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बिहारी सतसई की टीका सवैया छंद में करने वाले – कृष्ण कवि
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बिहारी सतसई को शक्कर की रोटी कहने वाले – पद्मसिंह शर्मा
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बिहारी के दोहों का संस्कृत में अनुवाद करने वाले – परमानन्द (शृंगार सप्तशती)
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बिहारी सतसई को रसिकों के हृदय का घर कहने वाले – हजारी प्रसाद द्विवेदी
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बिहारी को हिन्दी का चौथा रत्न मानने वाले – लाला भगवानदीन
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बिहारी को रीतिकाल का सर्वाधिक लोकप्रिय कवि कहने वाले – हजारी प्रसाद द्विवेदी
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“बिहारी की भाषा चलती होने पर भी साहित्यिक है।” – रामचन्द्र शुक्ल का कथन
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बिहारी सतसई को “रामचरितमानस” के बाद सबसे अधिक प्रचारित कृति मानने वाले – श्यामसुन्दर दास
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बिहारी को हिन्दी साहित्य का बेजोड़ कवि मानने वाले – विश्वनाथ सिंह
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सम्पूर्ण विश्व में बिहारी सतसई के समकक्ष कोई रचना प्राप्त नहीं होती कथन है – ग्रियर्सन का
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फिरंगे सतसई के रचनाकार – आनंदीलाल शर्मा (फारसी में)
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बिहारी सतसई की टीका “अमरचन्द्रिका” नाम से लिखने वाले – सूरति मिश्र
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बिहारी सतसई की सरल टीका – लाला भगवानदीन
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बिहारी सतसई की टीका “लाल चन्द्रिका” नाम से लिखने वाले – लल्लू लाल
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राम सतसई – राम सहाय दास
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बिहारी सतसई की सर्वश्रेष्ठ टीका :- बिहारी रत्नाकर (जगन्नाथ दास रत्नाकर, खड़ीबोली में)
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बिहारी का जन्म: 1595 ई० में बसवा, गोविंदपुर, ग्वालियर में हुआ था। इस दोहे से भी प्रमाण मिलता है:“जन्म ग्वालियर जानिए, खंड बुंदेले बाल।आई तरुनाई सुखद, मथुरा बसे ससुराल।।”
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बिहारी का निधन: 1663 ई० में हुआ था।
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पिता का नाम: केशवराय था।
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गुरु का नाम: नरहरिदास (ये नरहरिदास तुलसीदास वाले नहीं हैं। ये निम्बार्क संप्रदाय में दीक्षित थे)।
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बिहारी आरम्भ में शाहजहाँ के आश्रय में कवि रहे।
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1645 ई० में बिहारी का आमेर (जयपुर) आगमन हुआ।
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राजा जयसिंह अपनी नई पत्नी के प्रेम में डूबे रहते थे। वे महल के बाहर नहीं निकलते थे। उन्हें महल के राज कार्य करने के लिए बुलाने की किसी की भी हिम्मत नहीं होती थी। बिहारी के इस एक दोहे ने राजा जयसिंह के जीवन में नया परिवर्तन लाया और वे राजकार्य में संलग्न हो गए:“नहीं पराग नहीं मधुर मधु नहीं विकाश इही काल।अली कली ही सो बंध्यों आगे कौनु हवाल।।”(विश्व साहित्य में आर्थी व्यंजना का यह सर्वश्रेष्ठ दोहा माना जाता है)। इसमें ‘अन्योक्ति’ अलंकार है।
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‘बिहारी सतसई’ की रचना मिर्ज़ा राजा जयसिंह के पुत्र रामसिंह को लोक व्यवहार, राजनीति एवं नीति की शिक्षा देने के लिए की गई।
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बिहारी सतसई की रचना: 1662 में पूर्ण हुई थी।
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डॉ. नगेंद्र के अनुसार: इसमें 713 दोहा और 6 सोरठा छंद हैं। कुल 719 छंद हैं।
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आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार: 700 दोहे बताए गए हैं।
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बाबू जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’ के द्वारा संपादित ‘बिहारी रत्नाकर’ में 700 दोहे हैं।
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‘बिहारी’ रीतिकाल के ‘रीतिसिद्ध’ काव्यधारा के कवि थे।
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डॉ. नगेंद्र ने इन्हें ‘रीतिबद्ध’ कवि माना था।
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बिहारी रीतिकाल के ‘प्रतिनिधि’ कवि भी थे।
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बिहारी द्वारा रचित ‘बिहारी सतसई’ हिन्दी में ‘शृंगार सतसई’ परम्परा की पहली रचना मानी जाती है।
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रामचरितमानस को छोड़कर सबसे अधिक टीकाएँ ‘बिहारी सतसई’ पर लिखी गई हैं।
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बिहारी सतसई पर सबसे प्रामाणिक टीका बाबू जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’ की मानी जाती है।
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इस टीका ग्रंथ का नाम ‘बिहारी रत्नाकर’ है।
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“सतसइया के दोहरे ज्यों नावक के तीर।देखन में छोटे लगे घाव करे गंभीर।।”(कुछ विद्वानों के अनुसार यह दोहा महावीर प्रसाद द्विवेदी जी का है।)
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“भाँति-भाँति रचना सरस, देव गिरा ज्यों व्यास।त्यों भाषा सब कविन में विमल बिहारी दास।।”(यह दोहा बाबू जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’ का है।)
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लाला भगवानदीन का कथन: (इनका अन्य नाम ‘मास्टर भगवान दीन’ भी था)“तुलसी और केशव के पश्चात बिहारी – हिन्दी साहित्य के चौथे रत्न थे।”
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‘देव और बिहारी’ पुस्तक कृष्ण बिहारी मिश्र ने लिखी।
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दूसरी किताब ‘बिहारी और देव’ लाला भगवानदीन ने लिखी।
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‘कविवर बिहारी’ नामक पुस्तक बाबू जगन्नाथ दास रत्नाकर ने लिखी थी।
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‘बिहारी’ पुस्तक विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने लिखी।
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‘बिहारी की वाग्विभूति’ पुस्तक विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने लिखी। (इसमें बिहारी की प्रशंसा की गई है)।
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रामचंद्र शुक्ल के कथन:
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“कविता उनकी शृंगारी है, पर प्रेम की उच्च भूमि पर नहीं पहुँचती, नीचे ही रह जाती है।”
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“शृंगार रस के ग्रंथों में जितनी ख्याति और मान ‘बिहारी सतसई’ का हुआ उतना और किसी का नहीं।”
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प० पद्मसिंह शर्मा के कथन:
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“बिहारी सतसई शक्कर की रोटी है, जहाँ से भी खाओ मीठी ही लगेगी।”
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“बिहारी का विरह वर्णन उत्कृष्ट है।”
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“बिहारी की खड़ी बोली कर्णकटु एवं नीरस है।”
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“हिन्दी के कवियों में श्रीयुत बिहारी लाल का स्थान सबसे ऊँचा है।”
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बिहारी के काव्य की सराहना करते हुए लिखा है कि: “बिहारी के दोहे का अर्थ गंगा की विशाल जलधारा के समान है, जो शिव की जटाओं में तो समा गई थी। परन्तु उसके बाहर निकलते ही इतनी असीम और विस्तृत हो गई कि लम्बी-चौड़ी धरती में भी सीमित नहीं रह सकी। बिहारी के दोहे रस के सागर हैं, कल्पना के इंद्रधनुष हैं, भाषा के मेघ हैं। उसमें सौंदर्य के मादक चित्र अंकित हैं।”
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राधाचरण गोस्वामी का कथन:“बिहारी ऐसा पीयूषवर्षी मेघ है, जिसके उदय होते ही वह सूर, तुलसी पर आच्छादित हो जाता है।”
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जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन का कथन:“समस्त यूरोप के साहित्य में बिहारी सतसई के समकक्ष कोई रचना नहीं है।”
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विश्वनाथ प्रसाद मिश्र के शब्दों में:“बिहारी मुक्तक साहित्य के बेजोड़ कवि हैं।”
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आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में:
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“बिहारी सतसई रसिकों के हृदय का घर है।”
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“रीतिकाल के सबसे अधिक लोकप्रिय कवि बिहारी हैं।”
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मिश्रबंधु के शब्दों में:“इस छोटे से ग्रंथ में कवि रत्न ने मानो समुद्र कूजे में बंद कर दिया हो।”
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डॉ. गणपतिचन्द्र गुप्त के शब्दों में:“बिहारी के काव्य में तीनों गुणों (प्रतिभा, अध्ययन, अभ्यास) का समन्वय मिलता है।”
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बिहारी के शब्दों में:“करी कमाई सतसई भरे स्वाद अनेक”
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संपादक: बाबू जगन्नाथ दास रत्नाकर
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संपादन वर्ष: 1925 ई०
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कुल दोहों की संख्या: 700 है। (यह बिहारी सतसई की सबसे प्रामाणिक टीका मानी जाती है)।
1. बिहारी सतसई के प्रमुख टीकाकार एवं टीकाएँ
| प्रमुख टीकाकार / विद्वान | टीका / ग्रंथ का नाम | विशेष तथ्य / महत्त्व |
| कृष्ण कवि (बिहारी के दत्तक पुत्र) | बिहारी सतसई टीका (संवत् 1719 के आसपास) | सर्वप्रथम विस्तृत टीका; प्रत्येक दोहे पर सवैया छंद रचकर व्याख्या की। |
| आनंदीलाल शर्मा (‘आरिफ़’) | फिरंगे सतसई | फ़ारसी भाषा में रचित प्रसिद्ध पद्यबद्ध टीका। |
| परमानंद | शृंगार सप्तशती | संस्कृत भाषा में अनुदित व व्याख्यायित टीका। |
| प्रभुदयाल मीत | प्रभुदयाल टीका | दोहों की विशद भाव-व्याख्या। |
| अमर सिंह (सूरसिंह के पुत्र) | अमर चंद्रिका | सतसई के क्रम और भावों का सुंदर विश्लेषण। |
| हरिप्रकाश | हरिप्रकाश टीका | रीतिकाल की एक प्रामाणिक टीका। |
| लल्लू लाल (फोर्ट विलियम कॉलेज) | लाल चंद्रिका (1818 ई.) | ब्रजभाषा गद्य में रचित सर्वाधिक प्रसिद्ध और लोकप्रिय पारंपरिक टीका। |
| बाबू जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’ | ‘बिहारी रत्नाकर’ (1921 ई.) | सर्वश्रेष्ठ एवं सर्वाधिक प्रामाणिक टीका; पाठ-शोधन, कठिन शब्दार्थ व विशद काव्यशास्त्रीय व्याख्या सहित। |
| पद्मसिंह शर्मा | बिहारी सतसई (संजीवनी भाष्य) | हिंदी में तुलनात्मक आलोचना की शुरुआत; बिहारी और फ़ारसी कवि सादी के शेरों की सुंदर तुलना। |
| अंबिकादत्त व्यास | बिहारी बिहार (1898 ई.) | सतसई के प्रत्येक दोहे का कुंडलिया छंद में सविस्तार पद्य-रूपांतरण। |
2. बिहारी सतसई के दोहों का छंद-विस्तार करने वाले कवि
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कुंडलिया छंद में विस्तार:
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पं. अंबिकादत्त व्यास: ‘बिहारी बिहार’ (सतसई के दोहों को आधार बनाकर कुंडलिया छंद रचा)।
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दुर्गाप्रसाद मिश्र: बिहारी के दोहों पर कुंडलिया रचना।
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सवैया व कवित्त छंद में विस्तार:
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कृष्ण कवि: प्रत्येक दोहे के भाव को सवैया छंद में विस्तार दिया।
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सरदार कवि: सतसई के दोहों पर समस्यापूर्ति एवं सवैया विस्तार।
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मंचित कवि: ‘सुरभि’ शीर्षक से सवैया विस्तार।
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3. ‘देव बड़े कि बिहारी’ विवाद से जुड़े प्रमुख आलोचक एवं कवि
मिश्रबंधुओं द्वारा ‘हिंदी नवरत्न’ में देव को बिहारी से श्रेष्ठ स्थान देने के बाद हिंदी आलोचना में प्रसिद्ध ‘देव और बिहारी’ विवाद आरंभ हुआ:
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पद्मसिंह शर्मा: बिहारी के पक्षधर; ‘बिहारी सतसई की भूमिका’ एवं ‘संजीवनी भाष्य’ लिखकर बिहारी को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध किया।
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कृष्णबिहारी मिश्र: ‘देव और बिहारी’ ग्रंथ लिखा (देव को बिहारी से श्रेष्ठ माना)।
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लाला भगवानदीन: ‘बिहारी और देव’ ग्रंथ लिखा (बिहारी को देव से बड़ा कवि प्रमाणित किया)।
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विश्वनाथ प्रसाद मिश्र: ‘बिहारी की वाग्विभूति’ लिखकर बिहारी की काव्य-कला का सूक्ष्म विश्लेषण किया।
4. अन्य भाषाओं में अनुवादक
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संस्कृत अनुवाद:
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शृंगार सप्तशती — परमानंद द्वारा।
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आर्या सप्तशती रूपक — पं. हरिप्रसाद द्वारा।
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उर्दू / फ़ारसी अनुवाद:
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गुल-ए-नग्मा-ए-बिहारी — मुंशी देवीप्रसाद ‘मुंसिफ़’।
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फिरंगे सतसई — आनंदीलाल शर्मा ‘आरिफ़’।
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अंग्रेज़ी अनुवाद:
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सी. एच. वोवड़े (C.H. Vaudeville) एवं जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन द्वारा सतसई के दोहों का अंग्रेज़ी भावानुवाद व संपादन (‘सतसई ऑफ बिहारी’ – ग्रियर्सन)।
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5. प्रमुख वैचारिक बिंदु
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जॉर्ज ग्रियर्सन का मत: “यूरोप में बिहारी सतसई की तुलना का कोई काव्य-ग्रंथ नहीं मिलता।”
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आचार्य रामचंद्र शुक्ल का मत: “यदि प्रबंध काव्य एक विस्तृत वनस्थली है, तो मुक्तक एक चुना हुआ गुलदस्ता… बिहारी के दोहे रस के छोटे-छोटे छींटे हैं।”
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सतसई का मूल प्रभाव स्रोत: बिहारी सतसई पर मूल रूप से हाल कवि की ‘गाथासप्तशती’, जयदेव के ‘गीतगोविंद’ और गोवर्धनाचार्य की ‘आर्यासप्तशती’ का गहरा प्रभाव है।