रीतिकाल: रस एवं नायिका-भेद निरूपण (reetikal: ras evam nayika-bhed nirupan)

रीतिकाल: रस एवं नायिका-भेद निरूपण 

रीतिकाल (संवत् 1700–1900 वि.) में लक्षण-ग्रंथ परंपरा के अंतर्गत रस और नायिका-भेद का शास्त्रीय, सूक्ष्म और बहुआयामी निरूपण हुआ। सामंती दरबारी परिवेश और शृंगार-प्रियता के कारण इस युग के आचार्यों ने संस्कृत काव्यशास्त्र की परंपरा को ब्रजभाषा में पद्यबद्ध रूप में प्रस्तुत किया।

1. रीतिकाल में रस-निरूपण का विस्तृत स्वरूप

(क) आधार-ग्रंथ एवं दार्शनिक पृष्ठभूमि:

रीतिकालीन आचार्यों ने मुख्य रूप से भरतमुनि के ‘नाट्यशास्त्र’, मम्मट के ‘काव्यप्रकाश’, विश्वनाथ के ‘साहित्यदर्पण’ और विशेष रूप से भानुदत्त की ‘रसमंजरी’ एवं ‘रसतरंगिणी’ को अपने रस-विवेचन का आधार बनाया।

(ख) शृंगार रस की एकांगी प्रधानता (रसराजत्व):

  • रीतिकाल में नवरसों का उल्लेख तो मिलता है, किंतु कवियों की मुख्य रुचि शृंगार रस (संयोग व वियोग) में ही रही।
  • देव, मतिराम और पद्माकर जैसे आचार्यों ने शृंगार को समस्त रसों का मूल (रसराज) माना।
  • रस के प्रमुख अंग:
    • स्थायी भाव: रति (दांपत्य व काम-प्रेम)।
    • विभाव: आलंबन (नायक-नायिका) एवं उद्दीपन (ऋतु, उपवन, चाँदनी, संगीत)।
    • अनुभाव: कायिक, वाचिक, आहार्य और सात्त्विक (8 सात्त्विक भाव — स्तंभ, स्वेद, रोमांच, स्वरभंग, वेपथु/कंपन, वैवर्ण्य, अश्रु, प्रलय)।
    • व्यभिचारी / संचारी भाव: 33 परंपरागत भाव। (आचार्य देव ने ‘छल’ को 34वाँ संचारी भाव तथा आधुनिक युग में रामचंद्र शुक्ल ने ‘चकपकाहट’ को संचारी भाव माना)।

(ग) प्रमुख रस-निरूपक ग्रंथ एवं आचार्य:

  • केशवदास: रसिकप्रिया (1591 ई.) — हिंदी में रस व नायिका-भेद का प्रथम व्यवस्थित ग्रंथ।
  • मतिराम: रसराज — शृंगार रस का अत्यंत प्रांजल, स्वाभाविक और मानक ग्रंथ।
  • देव: भावविलास, रसविसास, सुखसागर तरंग, भवानीविलास
  • भिखारीदास: रस सारांश — रस-सिद्धांत, अंगों और भेदों का गहन शास्त्रीय संकलन।
  • पद्माकर: जगतविनोद — छह प्रकाशों में विभाजित शृंगार रस का प्रौढ़ ग्रंथ।
  • रसलीन (सैयद गुलाम नबी): रसप्रबोध (1741 ई.) — दोहा छंद में 1155 दोहों का सुव्यवस्थित ग्रंथ।

2. नायिका-भेद का विस्तृत शास्त्रीय वर्गीकरण

रीतिकालीन आचार्यों ने नायिकाओं का वर्गीकरण मुख्य रूप से 5 प्रमुख आधारों पर किया है:

(1) पति/संबंध (सामाजिक स्थिति) के आधार पर:

  • स्वकीया (स्वीया): जो विधिपूर्वक विवाहित हो और केवल अपने पति से अनन्य प्रेम रखे।
  • परकीया: जो अपने विवाहित पति के अतिरिक्त अन्य पुरुष (उपपति) से गुप्त प्रेम रखे। इसके दो मुख्य उपभेद हैं:
    • अनूढ़ा: अविवाहित कन्या का किसी पुरुष से प्रेम।
    • ऊढ़ा: विवाहिता स्त्री का पर-पुरुष से गुप्त संबंध।
  • सामान्या (गणिका/वेश्या): जो धन के बदले सभी पुरुषों से समान प्रेम का व्यवहार करे (उदा. वसंतसेना)।

(2) वय, अनुभव और लज्जा के आधार पर (स्वकीया के भेद):

  • मुग्धा (नवोढ़ा): जिसमें कामांकुर का नया उदय हुआ हो, लज्जा अधिक और संकोच प्रबल हो।
    • अज्ञातयौवना: जिसे अपने शरीर में आ रहे यौवन-परिवर्तनों का ज्ञान न हो।
    • ज्ञातयौवना: जिसे अपने यौवन के उभार का आभास हो चुका हो।
  • मध्या: जिसमें लज्जा और काम-वासना का समान संतुलन हो; जो प्रणय-क्रीड़ा में कुशल हो।
  • प्रौढ़ा (प्रगल्भा): जो काम-कला में पूर्णतः निपुण, लज्जा-मुक्त और सुरत-क्रीड़ा में प्रखर व निर्भीक हो।

(3) मान (रूठने) और व्यवहार के आधार पर (मध्या और प्रौढ़ा के भेद):

  • धीरा: पति के किसी अन्य स्त्री के प्रति अपराध पर केवल व्यंग्य बाणों से आहत करे या शिष्टता से उपेक्षा करे।
  • अधीरा: पति के अपराध पर खुलकर क्रोधित हो, कटु वचन बोले और रोए-धोए।
  • धीराधीरा: जो पति को व्यंग्य भी कसे और रोकर अपना क्षोभ भी प्रकट करे।

(4) प्रेम-प्राधान्य के आधार पर (प्रौढ़ा/ज्येष्ठा भेद):

  • ज्येष्ठा: जिस पर पति का अधिक स्नेह व अनुराग हो।
  • कनिष्ठा: जिस पर पति का कम प्रेम व अनुराग हो।

(5) परिस्थिति, स्थान एवं दशा के आधार पर (अष्टनायिका भेद):

  1. वासकसज्जा: जो प्रिय के आगमन की निश्चित तिथि पर सेज, गृह और स्वयं को शृंगार से सुसज्जित कर प्रतीक्षा करती है।
  2. विरहोत्कंठिता (उत्कंठिता): निश्चित समय बीत जाने पर प्रिय के न आने से व्याकुल और सशंकित होने वाली नायिका।
  3. स्वाधीनपतिका: जिसका पति उसके प्रेम के पूर्णतः वशीभूत हो और सदा उसके पास रहे।
  4. कलहांतरिता: जो प्रणय-कलह में क्रोधवश प्रिय को दुत्कार देती है, किंतु उसके चले जाने पर पश्चाताप करती है।
  5. खंडिता: रातभर किसी अन्य परकीया स्त्री के पास रहकर सुबह देह पर रति-चिह्न लेकर लौटे पति को देखकर क्रोधित होने वाली नायिका।
  6. विप्रलब्धा: जो निश्चित संकेत-स्थल पर पहुँचकर भी प्रिय के न मिलने से अपमानित और दुखी महसूस करती है।
  7. प्रोषितपतिका (प्रोषितप्रेयसी): जिसका पति व्यापार या कार्यवश विदेश/परदेस चला गया हो और वह विरह में कृशकाय हो गई हो।
  8. अभिसारिका: जो मान-मर्यादा, अंधकार और भय की चिंता किए बिना स्वयं प्रिय से मिलने संकेत-स्थल पर जाती है।
    • शुक्लाभिसारिका: चाँदनी रात में श्वेत वस्त्र पहनकर अभिसार करने वाली।
    • कृष्णाभिसारिका: अंधेरी रात में काले/नीले वस्त्र पहनकर अभिसार करने वाली।
    • दिवाभिसारिका: दिन के समय संकेत-स्थल पर जाने वाली।

3. नायक-भेद का समानांतर निरूपण

नायिका के साथ-साथ रीतिकालीन आचार्यों ने नायक का भी शास्त्रीय वर्गीकरण किया:
  • स्वभाव के आधार पर (चतुर्नायक):
    • धीरोदात्त: उत्तम गुणों से युक्त, गंभीर, क्षमाशील और अहंकार-रहित (उदा. श्रीराम)।
    • धीरोद्धत: अहंकारी, क्रोधी, मायावी और आत्म-प्रशंसक (उदा. परशुराम, रावण)।
    • धीरप्रशांत: सामान्य गुणों से युक्त, शांत प्रकृति का ब्राह्मण या वैश्य नायक (उदा. चारुदत्त)।
    • धीरललित: कला-प्रेमी, चिंता-मुक्त, सुखी और विलासी नायक (उदा. श्रीकृष्ण, राजा उदयन)।
  • व्यवहार के आधार पर (शृंगारिक नायक):
    • अनुकूल: केवल अपनी विवाहिता पत्नी/नायिका के प्रति वफादार।
    • दक्षिण: अनेक रानियों/स्त्रियों के रहते हुए भी सभी पर समान कृपा और प्रेम रखने वाला।
    • शठ: मुँह पर मीठा बोले, किंतु गुप्त रूप से अन्य स्त्री से संबंध रखे।
    • धृष्ट: अपराध सिद्ध होने और रति-चिह्न दिखने पर भी निर्लज्ज बना रहे।

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