भरत-राम का प्रेम और पद (तुलसीदास): संदर्भ, सप्रसंग व्याख्या, भावार्थ एवं काव्य-सौंदर्य
भक्तिकाल की सगुण रामभक्ति शाखा के प्रतिनिधि कवि गोस्वामी तुलसीदास की अंतरा (भाग-2) में संकलित रचनाओं—‘भरत-राम का प्रेम’ (रामचरितमानस के अयोध्याकांड से) और ‘पद’ (गीतावली से)—का संदर्भ, प्रसंग, सप्रसंग व्याख्या, भावार्थ एवं काव्य-सौंदर्य:
भाग 1: भरत-राम का प्रेम
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मूल ग्रंथ: रामचरितमानस (अयोध्याकांड)
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भाषा: अवधी
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छंद: दोहा और चौपाई
काव्यांश 1 (चौपाई व दोहा):
चौपाई:“पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढ़े। मंगल नीर नयन जनु बाढ़े॥कहब मोर मुनिनाथ निबाहा। एहि ते अधिक कहौं मैं काहा॥मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न काऊ॥मो पर कृपा सनेहु बिसेषी। खेलत खुनिस न कबहुँ देखी॥सिसुपन तें परिहरेउँ न संगू। कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू॥मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जानी। हारेहुँ खेल जितावहिं मोही॥”दोहा:“महूँ सनेह सकोच बस सन्मुख कहि न बैन।दरसन तृपित न आजु लगि प्रेम पिआसे नैन॥”
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संदर्भ व प्रसंग: चित्रकूट की सभा में मुनि वशिष्ठ के कहने पर भरत जी अपने बड़े भाई श्री राम के सामने अपनी बात रखने के लिए खड़े होते हैं। श्री राम के प्रति अगाध श्रद्धा और संकोच के कारण उनका शरीर पुलकित हो उठता है और आँखों में आँसू भर आते हैं।
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व्याख्या (भावार्थ):
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भरत जी का शरीर रोमांचित हो गया और वे सभा में खड़े हुए। उनके नेत्रों में प्रेमाश्रुओं (मंगलकारी जल) की बाढ़ सी आ गई।
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वे बोले—मुनिनाथ वशिष्ठ जी ने जो कुछ कहा, वही मेरी भावना भी है; इससे अधिक मैं और क्या कहूँ?
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मैं अपने स्वामी (श्री राम) के स्वभाव को भली-भाँति जानता हूँ। वे अपराधी पर भी कभी क्रोध (कोह) नहीं करते। मुझ पर तो उनकी विशेष कृपा और अगाध स्नेह रहा है। मैंने बचपन में खेल-कूद के दौरान भी उन्हें कभी अप्रसन्न (खुनिस) होते नहीं देखा।
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मैंने बाल्यावस्था से ही कभी उनका साथ नहीं छोड़ा और उन्होंने भी कभी मेरा मन नहीं तोड़ा (मेरी इच्छा का अनादर नहीं किया)।
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मैं प्रभु की कृपालुता की रीति को हृदय से जानता हूँ; वे खेल में मेरे हारने पर भी मुझे जिता दिया करते थे ताकि मैं दुखी न होऊँ।
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दोहा: भरत जी कहते हैं कि अत्यधिक स्नेह और संकोच के कारण मैं कभी उनके सामने खुलकर कुछ बोल नहीं सका। आज भी मेरे ये प्रेम के प्यासे नेत्र प्रभु के दर्शन से तृप्त नहीं हुए हैं।
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काव्यांश 2 (चौपाई व दोहा):
चौपाई:“बिधि न सकेउ सहि मोर दुलारा। नीच बीचु जननी मिस पारा॥यहउ कहत मोहि आजु न सोभा। अपनी समुझि साधु सुचि को भा॥मातु मंदि मैं साधु सुचाली। उर अस आनत कोटि कुचाली॥फरइ कि कोदव बालि सुसाली। मुकुता प्रसव कि संबुक काली॥सपनेहुँ दोसक लेसु न काहू। मोर अभाग उदधि अवगाहू॥बिनु समझे निज अघ परिपाकू। जारिउँ जायँ जननि कहि काकू॥”दोहा:“हृदयँ हेरि हारेउँ सब ओरा। एकहि भाँति भलेहिं भल मोरा॥गुरु गोसाइँ साहिब सिय रामू। लागत मोहि नीक परिनामू॥”
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प्रसंग: भरत जी राम के वनगमन का मूल कारण माता कैकेयी को न मानकर अपने ही दुर्भाग्य और पापों को मानते हैं तथा आत्मग्लानि व्यक्त करते हैं।
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व्याख्या (भावार्थ):
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भरत जी कहते हैं कि विधाता (भाग्य) से भाइयों के बीच का यह अनन्य प्रेम और दुलार सहन नहीं हुआ, इसलिए उसने नीच माता कैकेयी को माध्यम बनाकर हमारे बीच यह दूरी (दरार) पैदा कर दी।
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फिर वे तुरंत आत्ममंथन करते हैं कि आज मेरे मुख से यह कहना भी शोभा नहीं देता; क्योंकि केवल अपनी समझ से कोई साधु और पवित्र नहीं बन जाता।
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यदि मैं अपने मन में यह विचार भी लाऊँ कि ‘माता दुष्ट है और मैं साधु व सदाचारी हूँ’, तो यह विचार ही करोड़ों कुटिलताओं (पापों) के समान है। क्या कभी ‘कोदों’ (मोटा/घटिया अनाज) की बाली से उत्तम धान (सुसाली) पैदा हो सकता है? क्या कभी काले घोंघे (संबुक) से सच्चे मोती जन्म ले सकते हैं? (अर्थात कुटिल माता का पुत्र होकर मैं श्रेष्ठ कैसे हो सकता हूँ!)
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भरत जी कहते हैं कि स्वप्न में भी इसमें किसी का कोई दोष नहीं है; मेरा दुर्भाग्य ही अथाह समुद्र जैसा गहरा है। मैंने अपने पापों के फल को समझे बिना ही व्यर्थ में माता को कटु वचन कहकर अपने हृदय को संताप दिया।
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दोहा: मैंने अपने हृदय में सब ओर से विचार करके देख लिया है—अब मेरा कल्याण केवल एक ही उपाय से हो सकता है। जहाँ गुरु वशिष्ठ जी जैसे स्वामी हों और प्रभु श्री राम व माता सीता जैसे दयालु शासक हों, वहाँ अंततः परिणाम शुभ और कल्याणकारी ही होगा।
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विशेष (भरत-राम का प्रेम):
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रस: शांत रस, वात्सल्य और भक्ति रस का अनूठा समन्वय।
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भाषा: विशुद्ध, मधुर एवं साहित्यिक अवधी भाषा।
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छंद: दोहा और चौपाई छंद की शास्त्रीय संगीतमयता।
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अलंकार:
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दृष्टांत अलंकार: “फरइ कि कोदव बालि सुसाली। मुकुता प्रसव कि संबुक काली॥”
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उत्प्रेक्षा अलंकार: “मंगल नीर नयन जनु बाढ़े” (आँसुओं में मंगलकारी जल की संभावना)।
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रूपक व अनुप्रास: “मोर अभाग उदधि अवगाहू” (अभाग्य रूपी अथाह समुद्र), वर्णों की सुंदर आवृत्ति।
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चरित्र चित्रण: भरत के त्याग, भ्रातृ-प्रेम, निष्कलंक निष्ठा और विनम्रता का चरम आदर्श प्रस्तुत हुआ है।
भाग 2: पद (गीतावली से)
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मूल ग्रंथ: गीतावली (अयोध्याकांड)
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भाषा: ब्रजभाषा
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शैली: गेय पद (राग-रागिनियों पर आधारित)
पद 1 (जननी निरखति बान धनुहियाँ…):
“जननी निरखति बान धनुहियाँ।बार-बार उर नैननि लावति प्रभुजू की ललित लहुहियाँ॥कबहुँ प्रथम ज्यों जाइ जगावति कहि प्रिय बचन सकारे।‘उठहु तात! अनुज सखा सब द्वारे॥’कबहुँ कहति यों ‘बड़ि बार भई जाहु भूप पहँ भय्या।बंधु बोलि जेइय जो भावै गई निछावरि मय्या॥’कबहुँ समुझि बनगमन राम को रहि चकि चित्रलिखी सी।तुलसीदास वह समय कहे तें प्रेम मगन जनु खीसी॥”
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प्रसंग: श्री राम के वनगमन के पश्चात माता कौशल्या की मर्मांतक वियोग-दशा और उनकी वात्सल्य-विह्वल स्मृतियों का मार्मिक अंकन।
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व्याख्या (भावार्थ):
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माता कौशल्या श्री राम के बचपन के छोटे-छोटे धनुष और बाणों को बार-बार देखती हैं और प्रभु राम की उन सुंदर छोटी-छोटी वस्तुओं (धनुहियाँ, जूतियाँ आदि) को बार-बार अपने हृदय और आँखों से लगाती हैं।
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वे पुरानी आदत के अनुसार कभी सुबह-सुबह राम के शयनकक्ष में जाकर अत्यंत मधुर वचनों से उन्हें जगाती हैं—“हे तात! उठो, तुम्हारे छोटे भाई (लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न) और सखा सब द्वार पर तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं।”
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कभी वे मातृत्व के वश में होकर कहती हैं—“भैया! बहुत देर हो गई है, अब महाराज दशरथ के पास जाओ और अपने भाइयों को बुलाकर जो पसंद हो वह भोजन करो, तुम्हारी माँ तुम पर न्योछावर जाती है।”
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किंतु जैसे ही उन्हें अचानक याद आता है कि राम तो वन चले गए हैं, वे स्तब्ध रह जाती हैं और दीवार पर खिंचे हुए चित्र के समान जड़ (चित्रलिखी सी) हो जाती हैं। तुलसीदास जी कहते हैं कि उस समय माता कौशल्या की उस अकथनीय विरह-वेदना का वर्णन करने में शब्द भी असमर्थ हो जाते हैं।
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पद 2 (राघव एक बार फिरि आवौ…):
“राघव एक बार फिरि आवौ।एहि बर बाजि बिलोकि आपने बहुरो बनहिं सिधावौ॥जे पय पिआइ पोखि कर-पंकज बार-बार चुचुकारे।क्यो जीवहिं पय-तेवत पुनि-पुनि पवन-गमन-रुख न्यारे॥भरत सौगुनी सार करत हैं अति प्रिय जानि तिहारे।तदपि दिनहिं दिन होत झाँगुरे मनहुँ कमल हिममारे॥सुनहु पथिक जो राम मिलहिं बन कहियो मातु संदेसो।तुलसी मोहि और सबहिन तें इन तृन-चरन अंदेसो॥”
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प्रसंग: माता कौशल्या राम के विरह में तड़पते हुए उनके प्रिय घोड़ों (बाजि) की दयनीय दशा का वर्णन करते हुए किसी वन-पथिक के माध्यम से राम को संदेश भेजती हैं।
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व्याख्या (भावार्थ):
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माता कौशल्या पुकारती हैं—“हे राघव (राम)! केवल एक बार अयोध्या लौट आओ। अपने इन श्रेष्ठ घोड़ों (बर बाजि) को एक बार देख लो, फिर चाहे पुनः वन को चले जाना।”
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वे कहती हैं कि जिन घोड़ों को तुम अपने कमल जैसे कोमल हाथों से सहलाकर, पुचकारकर और दूध पिलाकर पाला करते थे, वे तुम्हारे बिना कैसे जीवित रहेंगे? वे तो केवल हवा के रुख को देखकर तुम्हारे आने की प्रतीक्षा में तड़प रहे हैं।
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यद्यपि भरत उन्हें तुम्हारा अति-प्रिय समझकर उनकी सौ गुनी अधिक देखरेख और सेवा करते हैं; तथापि वे घोड़े तुम्हारे वियोग में दिन-प्रतिदिन वैसे ही सूखकर दुर्बल होते जा रहे हैं, जैसे पाला पड़ने पर कमल मुरझा जाता है।
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अंत में कौशल्या किसी राहगीर (पथिक) से कहती हैं कि यदि वन में तुम्हें राम मिलें, तो उनकी माता का यह संदेशा देना कि तुलसीदास के अनुसार माता कहती हैं—मुझे अयोध्या में अपनी या किसी अन्य की उतनी चिंता नहीं है, जितनी इन मूक पशुओं (तृण-चरन/घोड़ों) की चिंता सता रही है।
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विशेष (पद):
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रस: विप्रलंभ (वियोग) वात्सल्य एवं करुण रस की मर्मस्पर्शी पराकाष्ठा।
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भाषा: मधुर, कोमलकांत पदावली से युक्त ब्रजभाषा।
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अलंकार:
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उपमा अलंकार: “रहि चकि चित्रलिखी सी” (चित्र के समान जड़ हो जाना)।
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उत्प्रेक्षा अलंकार: “मनहुँ कमल हिममारे” (घोड़ों का मुरझाना मानो पाले से मारे गए कमल हों)।
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रूपक अलंकार: “कर-पंकज” (कमल रूपी हाथ)।
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अनुप्रास व पुनरुक्ति: “बार-बार”, “पुनि-पुनि”, “दिनहिं दिन”।
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काव्य-गुण: माधुर्य गुण, गेयता और मूक पशुओं के प्रति राम के स्नेह के माध्यम से करुणा का अनूठा धरातल।