डॉ. प्रभा खेतान — साहित्यिक परिचय एवं प्रमुख रचनाएँ(dr. prabha khetan sahityik parichay evam pramukh rachnayen)

डॉ. प्रभा खेतान — साहित्यिक परिचय एवं प्रमुख रचनाएँ

डॉ. प्रभा खेतान (1942–2009) समकालीन हिंदी साहित्य की अत्यंत प्रखर, निर्भीक और सशक्त नारीवादी कथाकार, कवयित्री, अनुवादक तथा विचारक थीं। उन्होंने अपनी रचनाओं में पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था, स्त्री की आर्थिक-दैहिक स्वायत्तता और महानगरीय जीवन की विसंगतियों का अत्यंत बेबाक और संवेदनात्मक अंकन किया।

1. संक्षिप्त जीवन परिचय

विवरण तथ्य
जन्म 1 नवंबर, 1942
जन्म स्थान कोलकाता (पश्चिम बंगाल)
शिक्षा कलकत्ता विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में एम.ए. एवं ‘ज्याँ-पॉल सार्त्र के अस्तित्ववाद’ पर पी-एच.डी.
व्यक्तित्व प्रख्यात साहित्यकार, सफल व्यवसायी (उद्यमी) और नारी अधिकार कार्यकर्ता
निधन 20 सितंबर, 2009 (कोलकाता)
सम्मान बिहारी पुरस्कार (उपन्यास ‘पीली आँधी’ पर), उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान सम्मान, साहित्य भूषण सम्मान

2. प्रमुख कृतित्व (रचना-संसार)

(क) प्रमुख उपन्यास:

  • आओ पेपे घर चलें (1990): महानगरीय जीवन, संबंधों के टूटने और स्त्री के अकेलेपन का सजीव अंकन।
  • तालाबंदी (1991): व्यावसायिक जगत और पूँजीवादी दबावों पर केंद्रित रचना।
  • छिन्नमस्ता (1993): मारवाड़ी समाज की संकीर्ण मान्यताओं और स्त्री के अस्तित्वगत संघर्ष पर आधारित बहुचर्चित उपन्यास।
  • अपने-अपने चेहरे (1994)
  • पीली आँधी (1996): बिहारी पुरस्कार से सम्मानित उत्कृष्ट कृति।
  • स्त्री पक्ष (1999)

(ख) चर्चित आत्मकथा:

  • अन्या से अनन्या (2007): हिंदी साहित्य की सर्वाधिक बेबाक और लोकप्रिय आत्मकथाओं में से एक, जिसमें उन्होंने अपने व्यक्तिगत जीवन, प्रेम, व्यवसाय और सामाजिक पाखंडों को बिना किसी लाग-लपेट के प्रस्तुत किया।

(ग) काव्य-संग्रह:

  • अपरिचित डगर (1970)
  • सीढ़ियाँ चढ़ती हुई मैं (1976)
  • एक और आकाश की खोज में (1985)
  • कृष्णार्जुन (1988)
  • हुस्न बानो और अन्य कविताएँ (1993)
  • अहल्या (2000)

(घ) वैचारिक एवं अनुवाद साहित्य:

  • बाजार के बीच: बाजार के खिलाफ (निबंध/विचार): उपभोक्तावाद और स्त्री की स्थिति पर तीखा विश्लेषण।
  • उपनिवेश में स्त्री (अनुवाद/वैचारिक): फ्रांसीसी दार्शनिक सिमोन द बोउवा की प्रसिद्ध कृति ‘द सेकंड सेक्स’ (The Second Sex) का हिंदी रूपांतरण।

3. प्रमुख साहित्यिक विशेषताएँ

  • प्रखर स्त्री-विमर्श: प्रभा खेतान ने स्त्री को केवल त्याग की प्रतिमूर्ति या भोग्या के रूप में देखने का विरोध किया और उसके देह-मुक्ति, आर्थिक स्वावलंबन तथा निर्णय लेने की स्वतंत्रता की वकालत की।
  • मारवाड़ी समाज और पूँजीवाद का यथार्थ: व्यावसायिक परिवारों के आंतरिक पाखंड, परंपरा के नाम पर स्त्रियों के दमन और पूँजीवादी लालच का उन्होंने प्रामाणिक चित्रण किया।
  • दार्शनिक गहराई एवं बेबाक भाषा: दर्शनशास्त्र की पृष्ठभूमि होने के कारण उनके साहित्य में अस्तित्ववादी चेतना और मानवीय द्वंद्वों की गहरी समझ मिलती है। भाषा अत्यंत सहज, सीधी और प्रभावोत्पादक है।

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